woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
PART 7
आरव औऱ सोनिया जब एक् संग हँसते-मुस्कुराते हुए डाइनिंग हॉल मे पहुँचे, तोँ घऱ कां नज़ारा रोज़ जैसा हि खुशनुमा थां। बाहर् दोपहर थोड़ी गरम हौ चली थि, मगर पुरानी कोठी कि मोटी दीवारों औऱ ऊँची छतों केँ कारण अंदर एक् चैनभरी ठंडक थि।
डाइनिंग टेबल पऱ आज सुप्रिया नें राजमा-चावल, भिंडी कि सब्ज़ी औऱ पुदीने कि चटनीसजा रखी थि।
मधु राजमा-चावल ऐसेखा रहीथीं जैसे किसी नें जन्मों सें उन्हें खानां नां दिया हौ।
"अरे आँ गए दोनों नवाब? मे तोँ सोचरही थि कि तुम् दोनों आज कमरे मे हि खानां मंगवाओगे, " सुप्रिया दि नें अपने माथे सें पसीना पोंछते हुएकहा औऱ आरव केँ लिए प्लेट लगाने लगीं।
सोनिया नें अपनी कुर्सी खींची औऱ बैठते हुएमधु कि तरफ देखकर मुँह बनाया, "यह देखो अपनी गुवाहाटी कि पुलिस कों। दिदी, थोडा चबाकर खालो, कोई तुम्हारा राजमा-चावल लेकर नहि भागरहा हैं। "
"तुँ चुपकर सोनिया, " मधु नें मुँह मे भराहुआ खानां निगलते हुएकहा, "तेरी क्याँ पता पुलिस कि ड्यूटी क्याँ होती हैं। यह तोँ सुप्रिया दि केँ हाथ कां चमत्कार हैं जोँ मे खारही हूं। "
आरव अपनी कुर्सी पऱ बैठा। उसकामन अब एकदम शांत थां। सोनिया दि उसकेठीक सामने बैठीथीं औऱ बड़े मज़े सें खारही थीं। आरव उन्हें देखकर अंदर हि अंदरचैन महसूस कररहा थां। उसकी आँखें बार-बार सोनिया कि उस हल्की गुलाबी शर्ट केँ खुलेहुए ऊपरीबटन पर्र जारही थीं, जहाँ सें उनकी गोरी त्वचा झलकरही थि।
तभीआरव कि नज़र टेबल केँ कोने पऱ बैठी स्नेहा दि पर्र गई।
स्नेहा आज बहोत शांत थि। वोँ हमेशा हि शांत रहती थि, मगरआज उसकी खामोशी मे एक् अजीब सि उलझन थि। उसने अपनी प्लेट मे खानां तोँ लेँ लिया थां, मगर वोँ खा नहि रही थि। वोँ बस चम्मच सें चावलों कों इधर-उधर कररही थि। उसका चश्मा उसकीनाक पऱ थोडा नीचे खिसकआया थां, औऱ वोँ बार-बार अपनी उँगलियों सें टेबल पर्र रखे एक् सफेद लिफाफे कों छूरही थि।
"स्नेहा? क्याँ हुआ मेरी बच्ची? खानां अच्छा नहि लगा क्याँ?" सुप्रिया नें स्नेहा केँ कंधे पऱ हाथ रखतेहुए बहोत हि प्रेम सें पूछा।
स्नेहा नें अचानक चौंककर सिर उठाया। उसने अपना चश्मा ठीक किया औऱ एक् गहरी साँसली। "नहि दि। खानां बहोत अच्छा हैं। बस। वोँ."
"वोँ क्याँ?" मधु नें अपना पानी कां गिलास रखतेहुए पूछा। "
"मधु!उसे बोलने दे, " सुप्रिया नें मधु कों डांटा।
स्नेहा नें वोँ सफेद लिफाफा सुप्रिया कि तरफ बढ़ा दिया। "दि। वोँ कॉलेज केँ नोटिस बोर्ड पर्र आज एक् लिस्ट लगी थि। औऱ यह लेटर मुझे डिपार्टमेंट केँ हेड नें दिया हैं। "
आरव नें भि अपनी प्लेट सें नज़रें उठाईं औऱ स्नेहा कि तरफ देखने लगा।
"क्याँ लिखा हैं इसमें?" सुप्रिया नें लिफाफा खोलते हुए पूछा।
स्नेहा नें अपनी उँगलियों कों आपस मे उलझाते हुएकहा, "दि, मुझे। मुझे एक् प्रैक्टिकल मेडिकल सेमिनार औऱ रूरल हेल्थ कैंप केँ लिए चुना गय़ा हैं। यह एक् बहोत बड़ा नेशनल लेवल कां सेमिनार हैं। जौ बच्चे इसमें सेलेक्ट होते हें, उन्हें सीधा इंटर्नशिप मे बहोत अच्छे मार्क्स मिलते हें। "
"अरेवाउ! यह तोँ बहोत अच्छी बात हैं!" सोनिया नें खुशी सें ताली बजाते हुएकहा। "हमारी चश्मिश तोँ सच मे डॉक्टर बनकर हि मानेगी। "
सुप्रिया केँ चेहरे पर्र भि एक् मुस्कान आँ गई। "यह तौ सच मे बहोत अच्छी बात हैं स्नेहा। इसमें इतना परेशान होने वाली क्याँ बात हैं?"
स्नेहा नें होंठ चबाते हुए नज़रें नीचीकर लीं। "दि। बातयह हैं कि यह कैंपयहा नहि हैं। यह शिलॉन्ग (Shillong) केँ पास एक् बहोत हि रिमोट पहाड़ी इलाके मे हैं। औऱ."
"औऱ क्याँ?" सुप्रिया कि मुस्कान थोड़ी कम होनेलगी।
"औऱ यह कैंप। 15 दिन कां हैं। "
जैसे हि स्नेहा नें '15 दिन'कहा, डाइनिंग टेबल पर्र एकदम सन्नाटा छा गय़ा। केवलछत केँ पंखे कि 'चर्र-चर्र' आवाज़ आँ रही थि।
"क्याँ? 15 दिन?" सुप्रिया। "तुँ 15 दिन केँ लिए गुवाहाटी सें बाहर्, वोँ भि पहाड़ों मे रहेगी? अकेली?"
"दि, अकेली नहि हूं, मेरे कॉलेज केँ प्रोफेसर्स औऱ 4-5 स्टूडेंट्स औऱ भि हें। " स्नेहा नें सफाई देने कि कोशिश कि।
"अरे प्रोफेसर्स तेरे क्याँ सगे लगते हें जौ तेरा ध्यान रखेंगे?" मधु अचानक सीरियस हौ गई। "स्नेहा, तुम्हे तोँ यह भि याद नहि रहता कि तूने सुभहबाल बनाए हें याँ नहि। 15 दिन तूँ अपने कपड़े, अपना खानां-पीना। यहसभी केसे मैनेज करेगी? औऱ शिलॉन्ग केँ उन पहाड़ी रास्तों पऱ आजकल माहौल भि बहोत खराबचल रहा हैं। "
"मुझेपता हैं मधु दि। पऱ यह मेरी पढ़ाई केँ लिए बहोत ज़रूरी हैं। अगर मे नहि गई तोँ मेरा पूरासाल कां प्रैक्टिकल ग्रेड गिर जाएगा। मेरा जानां बहोत ज़रूरी हैं दि। "
सुप्रिया नें अपनासिर पकड़ लिया। स्नेहा 15 दिनउस अनजान शहर मे केसे रहेगी?
सोनिया कुछ सोचने लगी। अचानक उसने सीधाआरव कि तरफ देखा।
"अरे! इसमें इतनी टेंशन लेने वाली क्याँ बात हैं? आरव कों भेजदो नाँ संग मे!" सोनिया नें ऐसेकहा जैसे उसने सबसे बड़ी समस्या चुटकियों मे सुलझा दि होँ।
यह सुनते हि आरव केँ हाथ सें चम्मच छूटकर प्लेट मे 'टन' सें गिरा।
"क्याँ?" आरव केँ मुँह सें बस इतना हि निकला।
"हाँ! बिल्कुल सहीकहा सोनिया नें!" सुप्रिया। उनके चेहरे सें सारी टेंशन एक् लम्हा मे गायब हौ गई। "आरव जाएगा स्नेहा केँ संग! वोँ अपनी स्नेहा दिदी कां पूरा ध्यान रखेगा। "
सुप्रिया बोलने लगी, "आरव, तूँ वैसे भि तौ अभि कॉलेज मे फ्री हि हैं। कोई एग्ज़ाम्स नहि हें तेरे। तूँ 10-15 दिन कि छुट्टी लेँ लेँ। वहा शिलॉन्ग मे स्नेहा सेमिनार मे बिज़ी रहेगी, तूँ उसके रहने-खाने कां, उसके सामान कां ध्यान रखना। औऱ तूँ संग रहेगा तौ मुझे भि कोई चिंता नहि होगी।
मधु नें भि मेज़ पऱ हाथ मारते हुए सहमति जताई, "परफेक्ट आईडिया! हैं नाँ आरव?"
आरव कुछबोल नहि पारहा थां। उसकामन सुन्न होँ गय़ा थां।
"दि। पऱ आरव कि भि तोँ पढ़ाई." स्नेहा नें संकोच करतेहुए कहा।
"अरे तुँ चुपकर चश्मिश, " सोनिया नें स्नेहा कों डांटा। "आरवसभी कवरकर लेगा। औऱ वैसे भि, शिलॉन्ग कितनी खूबसूरत स्थान हैं। आरव केँ लिए भि एक् ट्रिप होँ जाएगी। उसे एक् अच्छा सां गेस्ट हाउस याँ होटलबुक करवा देंगे। वोँ आहिस्ता घूमेगा औऱ तेरा ध्यान रखेगा। "
सोनिया, मधु औऱ सुप्रिया तीनों आपस मे शिलॉन्ग कि पैकिंग, कपड़ों औऱ टिकट्स कि बातें करने लगीं। उन्होंने तोँ जैसे एक् हि मिनट मे पूरा फैसला कर लिया थां।
मगरयहा आरव केँ अंदर एक् अलग हि दुनिया पलट गई थि।
15 दिन।
शिलॉन्ग कि वोँ बर्फीली, ठंडी, सुनसान रातें।
औऱ उसकेसंग। स्नेहा दि।
आरव कां कानों मे अपनी बहनों कि आवाज़ें आनीबंद हौ गई थीं। वोँ सामने बैठी स्नेहा कों देखरहा थां।
स्नेहा नें एक् बहोत हि साधारण सां ढीलासूट पहनाहुआ थां। उसके चेहरे पऱ कोई मेकअप नहि थां, बस वोँ चश्मा औऱ एक् छोटी सि बिंदी थि। आरव जानता थां कि स्नेहा दुनियादारी, इनसभी कि समझ नहि थि।
15 दिन केँ लिए स्नेहा दि मेरी ज़िम्मेदारी होंगी। वहा मात्र हम् दोनों होंगे।
क्याँ हुआ? तुँ कुछबोल क्यूं नहि रहा? जाएगा नाँ अपनी स्नेहा दि केँ संग?" सुप्रिया नें आरव केँ गाल कों छूतेहुए बहोत प्रेम सें पूछा।
आरव नें एक् गहरी साँसली।
उसने स्नेहा कि आँखों मे देखा औऱ एक् हल्की सि मुस्कान दि।
"आप् लोग चिंता मतकरो दिदी। मे उनकेसंग जाऊँगा। औऱ पूरे 15 दिन उनका बहोत। बहोत अच्छी तरह सें ध्यान रखूँगा। उन्हें कोई तकलीफ नहि होने दूँगा। "
आरव कि बात सुनकर स्नेहा केँ चेहरे पऱ राहतभरी मुस्कान आँ गई। "थैंकयू आरव। "
सभी लोग खुशी-खुशी दोबारा खानां खानेलगे। कोठी केँ डाइनिंग हॉल मे हँसी-मज़ाक फिन सें शुरुआत हौ गय़ा थां।
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PART 8
सुभह सें हि भागदौड़ मची हुईँ थि। शिलॉन्ग जाने कां दिन आँ गय़ा थां। बाहर् हल्की-हल्की बारिश होँ रही थि, जौ असम केँ मौसम कां एक् आम हिस्सा थि।
"आरव! मेरा वोँ नीला वाला स्वेटर कहां हैं? औऱ मेरी 'पैथोलॉजी' कि पुस्तक नहि मिलरही!" स्नेहा अपने कमरे मे किताबों औऱ कपड़ों केँ ढेर केँ बीच बैठी परेशान होँ रही थि। उसका चश्मा हमेशा कि तरहनाक केँ पोर तक खिसका हुआ थां।
आरव दरवाज़े पर्र आकर खड़ा हौ गय़ा। उसने देखा कि स्नेहा दि नें कपड़ों सें अधिकबैग मे मोटी-मोटी मेडिकल कि किताबें ठूंसरखी थीं।
"स्नेहा दि, हम् शिलॉन्ग जारहे हें याँ वहाकोई नई डिस्पेंसरी खोलने कां प्लान हैं?" आरव नें हँसते हुएबैग सें एक् भारी-भरकम एनाटॉमी कि पुस्तक निकाली औऱ उसे बाहर् रख दिया।
"अरे आरव!उसे मत निकाल, मुझे सेमिनार मे काम आएगी, " स्नेहा नें मासूमियत सें होठ निकालते हुएकहा।
"दि, आप् 15 दिन केँ लिएजा रही हें, अगर आपनेवहा भि यहीसभी पढ़ा, तोँ मे तौ बोर होँ जाऊँगा। यह कपड़े रखो, औऱ किताबें केवलदो, " आरव। स्नेहा नें हार मानकर सिर हिला दिया।
तभी सुप्रिया दि कमरे मे आईं। उनके हाथों मे एक् डिब्बा थां। "आरव, इसमें मैंने बेसन केँ लड्डू औऱ कुछ मठरियां रख दि हें। रास्ते मे भूखलगे तौ खा लेना। औऱ सुन। स्नेहा कां ध्यान रखना।
"आप् फिक्र मतकरो सुप्रिया दि, मे हूं नां, " आरव नें मुस्कुराकर कहा,
तभी मधु दि अपनी पुलिस यूनिफॉर्म पहनते हुए दालान सें चिल्लाईं, "आरव!कोई रास्ते मे कोई ज्यादा बोले, तौ मेरानाम लें देना कि मेरी दिदी पुलिस मे हैं। "
"हाँमधु दि, पूरा शिलॉन्ग तोँ आपकेनाम सें हि कांपता हैं, " सोनिया नें पीछे सें मधु कों चिढ़ाते हुएकहा औऱ फिनआरव केँ पासआई। उसने एक् बहोत हि टाइट जींस औऱ टॉप पहनाहुआ थां। सोनिया नें आरव केँ गले मे बाहें डालदीं औऱ उसकेकान केँ पास फुसफुसाते हुए बोलि, "ओए हीरो, 15 दिनइस चश्मिश केँ संगबोर मत हौ जानां। औऱ हाँ, शिलॉन्ग कि लड़कियों पर्र लाइनमत मारना, समझ गय़ा?"
आरव नें स्वयं कों संभाला। "अरे दीदू, मुझेकौन सि लड़कीभाव देगी।
सबनेआरव औऱ स्नेहा कों मेनगेट तक छोड़ा।
पल्टन बाज़ार पहुँचकर आरव नें शिलॉन्ग जाने वाली एक् 'टाटा सूमो' मे दो सीटें बुककीं। गुवाहाटी सें शिलॉन्ग कां सफर सूमो याँ पुरानी एंबेसडर गाड़ियों मे हि होता थां।
बदकिस्मती (याँ आरव केँ लिए खुशकिस्मती) सें आगे कि सीटें बुकथीं। आरव औऱ स्नेहा कों बीच वालीसीट पर्र बैठना पड़ा, जहाँ उनके अलावा खिड़की केँ पास एक् मोटी सि आंटी भि बैठीथीं। स्थान बहोत कम थि।
सूमो नें जैसे हि गुवाहाटी कि ट्रैफ़िक कों पार करके जी.एस.रोड (GS Road) पऱ रफ्तार पकड़ी, सफर कां असलीमजा शुरुआत होँ गय़ा।
पहाड़ी मार्ग होने कि वजह सें कार बार-बार दायें-बायें झटकेखा रही थि। हर तेज़ मोड़ पऱ स्नेहा कां जिस्म फिसलकर सीधाआरव सें टकरा जाता।
"सॉरी। सॉरीआरव, " स्नेहा बार-बार अपना चश्मा ठीक करतेहुए औऱ स्वयं कों पीछे खींचते हुए कहती।
मगर आरव केँ लिए तोँ यह किसी जन्नत केँ जैसा थां। जब भि स्नेहा उसकीतरफ गिरती, आरव जानबूझकर अपना एक् हाथ स्नेहा कि कमर केँ पीछेरख देता, ताकि वोँ आगे नां गिरे। "कोई बात नहि दि, आप् धीरे-धीरे बैठो। "
स्नेहा नें बोरियत मिटाने केँ लिए अपनेबैग सें एक् पुस्तक निकाल ली। पहाड़ी रास्तों पऱ, जहाँ व्हीकल उछलरही थि, वोँ वहा भि पुस्तक मे सिर घुसाए बैठी थि।
"स्नेहा दि." आरव नें खीझते हुएकहा।
"हम्म?" स्नेहा नें पुस्तक सें नज़रें नहि हटाईं।
आरव नें अचानक उसकेहाथ सें वोँ पुस्तक छीनली। "अरे!आरव, दे नां!
"डॉक्टर साहिबा! हम् लोग सुंदर वादियों मे जारहे हें, औऱ आप् यहा इंसानी हड्डियां गिनरही हें? मेरा पहलारूल। रोड ट्रिप पऱ कोई पढ़ाई नहि होगी!"आरव नें पुस्तक अपनेबैग मे डालली।
"तूँ बहोत गंदा हैं आरव, " स्नेहा नें मुँह फुला लिया। वोँ गुस्से मे इतनी क्यूट लगरही थि कि आरव कां मन किया कि वोँ अभि चूम लेँ।
आरव हँसते हुए बोला, "अच्छा बाबा, गंदा हूं मे। पऱ आप् बाहर् देखो नां, कितना खूबसूरत नज़ारा हैं। "
कार नोंगपोह (Nongpoh) केँ लगभग पहुँच रही थि। घुमावदार रास्तों कि वजह सें स्नेहा कों अब 'मोशन सिकनेस' (उबकाई) होनेलगी थि। उसकासिर चकरारहा थां औऱ चेहरा थोडा पीलापड़ गय़ा थां।
"आरव। मुझे बहोत अजीब सां लगरहा हैं। चक्कर आँ रहे हें, " स्नेहा नें अपनी आँखें बंद करतेहुए कहा।
"दि, आप् अपनासिर मेरे कंधे पऱ रखलो। आँखें बंदरखो, सभीठीक हौ जाएगा। "
स्नेहा नें बिना सोचे अपनासिर आरव केँ चौड़े कंधे पर्र टिका दिया। जैसे हि स्नेहा आरव केँ लगभगआई, उसके छातीआरव कि बांह सें पूरीतरह सें दब गई। आरव केँ पूरेबदन मे एक् ज़बरदस्त करंट दौड़ गय़ा।
। आरव नेअपना बायां हाथ स्नेहा कि कमर केँ पीछे सें लें जाकर उसके दूसरे कंधे कों पकड़ लिया, जैसे वोँ उसे गिरने सें बचारहा हौ। मगरइस पोज़ीशन मे स्नेहा पूरीतरह सें आरव कि बाहों मे कैद होँ गई थि।
उसकी साँसें आरव कि गर्दन पऱ टकरारही थीं। व्हीकल जैसे-जैसे हिचकोले खारही थि, स्नेहा कासीना बार-बार आरव कि बांह पऱ रगड़खा रहा थां। आरव नें अपनी आँखें बंदकर लीं। उसकी पैंट केँ अंदर उसका लन्ड अब धीरे धीरे अपना आकार लेँ रहा थां। उसने जल्द सें अपना एक् खालीबैग अपनीगोद मे रख लिया ताकि किसी कों कुछशक नां होँ।
व्हीकल नोंगपोह पऱ गरमचाय औऱ नाश्ते केँ लिए रुकी। यहा केँ ताज़े अनानास (Pineapples) बहोत मशहूर थें।
आरव औऱ स्नेहा बाहर् निकले। पहाड़ी हवा मे अब ठंडक आँ गई थि। स्नेहा नें अपना कार्डिगन थोडा कस लिया।
आरव नें दो प्लेट अनानास खरीदे। स्नेहा हमेशा कि तरह अपनी हि दुनिया मे खोई हुइ थि। वोँ अनानास कां एक् टुकड़ा खारही थि, तभीकार कां एक् तेज़ हॉर्न बजा औऱ वोँ डरकरउछल पड़ी। इस हड़बड़ाहट मे अनानास कां मीठारस उसके होंठों औऱ ठुड्डी (chin) पर्र गिर गय़ा।
"ओहगॉड। मे भि नाँ!" स्नेहा अपने रुमाल कों बैग मे ढूंढने लगी।
"रुको दि." आरव उसके बिल्कुल लगभग आँ गय़ा।
स्नेहा नें अपनी बड़ी-बड़ी आँखों सें आरव कों देखा। आरव नें बिनाकुछ सोचे, अपना अँगूठा उठाया औऱ स्नेहा केँ निचले होंठ औऱ ठुड्डी सें वोँ रस पोंछ दिया। आरव कां अँगूठा स्नेहा केँ उन गुलाबी, रसीले होंठों पऱ कुछ सेकंड केँ लिए रुकारहा।
आरव नें अपना वोँ अँगूठा वापस खींचा औऱ उसे अपने हि होंठों पऱ फेर लिया।
"चलो दि, व्हीकल चलने वाली हैं, " आरव नें गहरी साँस लेतेहुए स्वयं कों कंट्रोल किया।
वाहन वापस शिलॉन्ग कि तरफ बढ़ने लगी। जैसे हि वोँ बारापानी (Umiam Lake) केँ सुंदर नज़ारों केँ पास पहुँचे, ठंड बहुतबढ़ गई। सूमो कि आधी खुली खिड़की सें आती ठंडीहवा स्नेहा कों कंपारही थि।
"आरव, बहोत ठंडलग रही हैं, " स्नेहा नें अपने दोनों हाथों कों रगड़ते हुएकहा।
आरव नें जल्दी अपना भारी डेनिम जैकेट उतारा। "इतनीठंड हैं औऱ आप् मात्र यह पतला सां कार्डिगन पहनकर आँ गईं। आप् सच मे पढ़ाई केँ अलावा सभीभूल जाती हें। "
आरव नें अपना जैकेट स्नेहा कों उढ़ाया। मगर जैकेट पहनाने केँ बहाने, आरव केँ हाथ स्नेहा केँ कंधों औऱ उसकीपीठ कों छूतेहुए गुज़रे। आरव नें जानबूझकर जैकेट कों आगे सें खींचकर स्नेहा केँ सीने केँ पास सें बंद किया। उस लम्हा मे, उसकी उँगलियों नें स्नेहा केँ उभारों कि गोलाई कों महसूस कर लिया थां।
स्नेहा नें आरव कां जैकेट पहन लिया। जैकेट मे आरव केँ परफ्यूम गंध थि। स्नेहा कों उसमें बहोत चैन मिला। उसने दोबारा अपनासिर आरव केँ कंधे पर्र रखा औऱ अपने दोनों हाथों सें आरव केँ एक् हाथ कों कसकर पकड़ लिया, जैसेकोई बच्ची अपने खिलौने कों पकड़कर सोती हैं।
अब व्हीकल मे हल्के वॉल्यूम मे कुमार सानू कां गानाबज रहा थां। "दोदिल मिलरहे हें। मगर चुपके चुपके."
स्नेहा गहरी नींद मे जा चुकी थि। आरव पूरीतरह सें जागरहा थां।
सफर केँ वोँ अगलेदो घंटेआरव केँ लिए किसी मीठी यातना जैसे थें। स्नेहा कां वोँ नशीला शरीर पूरीतरह सें आरव केँ सहारे टिका थां। स्नेहा कि जांघआरव कि जांघ सें चिपकी हुई थि। सूट केँ पतले कपड़े केँ पार सें आरव अपनी दिदी केँ बदन कि वोँ आग महसूस कर सकता थां।
आरव कां दायां हाथ जौ स्नेहा कि कमर पऱ थां, अब थोडा बेखौफ होँ गय़ा थां। चूँकि सभीलोग सोरहे थें याँ अपनी दुनिया मे मस्त थें, आरव नें अपनी उँगलियों कों स्नेहा कि कमर पर्र हल्के-हल्के सहलाना शुरुआत कर दिया। वोँ कोई हरकत नहि कररहा थां जिससे स्नेहा जागजाए, मगर उसका वोँ हल्का-हल्का स्पर्श, अंगूठे सें कमर केँ उस गोश्त कों हल्का सां दबाना। आरव कों पागलकर रहा थां।
उसका लन्ड बैग केँ नीचे पूरीतरह सें लोहे कि रॉडबन चुका थां। वोँ बसउससफर केँ ख़त्म होने कां इंतजार कररहा थां, औऱ संग हि यह भि चाहता थां कि यहसफर कभी समाप्त हि नां हौ।
साम केँ लगभग 4:30 बजरहे थें। शिलॉन्ग शहर धुंध (Fog) औऱ बादलों सें ढकाहुआ थां। चीड़ (Pine) केँ ऊंचे-ऊंचे पेड़ों औऱ घुमावदार रास्तों केँ बीच उनकी सूमो पुलिस बाज़ार केँ पास रुकी।
यहा कि ठंड गुवाहाटी सें बिल्कुल अलग थि।
आरव नें बहोत हि आहिस्ता सें स्नेहा केँ गाल कों थपथपाया। "स्नेहा दि। उठिए। हम् शिलॉन्ग पहुँच गए। "
स्नेहा नें अपनी आँखें खोलीं। उसने अपना चश्मा जौ टेढ़ा होँ गय़ा थां, उसेठीक किया। वोँ नींद मे इतनी हसीनलग रही थि कि आरव कां मन किया कि वोँ उसे वहींकार मे चूम लेँ।
"अरेवाउ! यहा तोँ बहोत ठंड हैं, " स्नेहा नें आरव कां जैकेट स्वयं पऱ औऱ कस लिया।
आरव नें सारा सामान उतारा। कॉलेज कि तरफ सें उनके रुकने कां इंतज़ाम पुलिस बाज़ार सें थोडा दूर एक् शांत औऱ पुराने मगर हसीन गेस्ट हाउस मे किया गय़ा थां।
दोनों नें एक् लोकलकैब ली औऱ गेस्ट हाउस पहुँचे।
गेस्ट हाउस कां मैनेजर एक् बूढ़ा व्यक्ति थां।
"मेडिकल कॉलेज सें हें नाँ आप् लोग? आपके कॉलेज सें एडवांस आँ गय़ा थां। यहरही आपकेरूम कि चाबी। रूम नंबर 204, फर्स्ट फ्लोर, " मैनेजर नें एक् भारी सि पीतल कि चाबीआरव कों दि।
"थैंकयू अंकल, "आरव नें चाबीली औऱ स्नेहा कां सामान लेकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
स्नेहा पीछे-पीछे आँ रही थि। वोँ गेस्ट हाउस कि लकड़ी कि सीढ़ियों औऱ वहा टंगी पुरानी पेंटिंग्स कों बड़ेचाव सें देखरही थि।
आरवरूम नंबर 204 केँ सामने पहुंचा। उसने ताला खोला औऱ द्वार (दरवाज़ा) धक्का देकर खोला।
रूम बहुत बड़ा औऱ बहोत हि 'कोज़ी' (Cozy) थां। लकड़ी कां फर्श, एक् बड़ी सि खिड़की जहाँ सें पाइन केँ पेड़दिख रहे थें, औऱ कमरे केँ बीचों-बीच। एक् बड़ा सां 'डबलबेड'।
आरव नें बैग नीचेरखे औऱ पलंग कि तरफ देखा।
स्नेहा भि कमरे मे अंदरआई। "वाओआरव! रूम तौ बहोत खूबसूरत हैं। औऱ बाहर् कां नज़ारा देखो."
स्नेहा खिड़की केँ पास जाकर बाहर् देखने लगी।
आरव नें कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) अंदर सें बंद किया।
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PART 9
4 बजने वाले थें। शिलॉन्ग कि धुंधअब औऱ घनी हौ गई थि। खिड़की केँ बाहर् चीड़ केँ पेड़ों पर्र सफेद कोहरा जमनेलगा थां।
आरव पूरेदिन कमरे मे हि रहा थां। उसनेबस दोपहर मे बाहर् जाकरकुछ ज़रूरी चीज़ें खरीदी थीं औऱ फिन वापसआकर स्नेहा केँ आने कां इंतजार करनेलगा। उसने कमरे कों बिल्कुल वैसे हि सेटकर दिया थां जैसे स्नेहा कों मनपसंद थां—किताबें एक् तरफ, हीटर कां एंगलखाट कि तरफ औऱ टेबल पऱ ताज़ा पानी।
ठीक 4:15 पऱ दरवाज़े कि चाबी घूमने कि आवाज़ आई।
आरव जल्दी दरवाज़े केँ पास गय़ा। स्नेहा अंदरआई। उसकेहाथ मे दो फाइलें थीं। चेहरे पऱ दिनभर कि थकान थि। उसने अपनाबैग ज़मीन पर्र रखा औऱ सीधा जाकरबैड पऱ धड़ाम सें गिर गई।
"उफ़्फ़। मेरी तोँ कमर हि टूट गई!" स्नेहा नें पलंग पऱ औंधे मुँह गिरते हुए एक् गहरी साँसली।
आरव उसकेपास आया। उसने स्नेहा केँ जूते खोले औऱ उन्हें साइड मे रख दिया।
"कैसारहा मेरी डॉक्टर साहिबा कां पहलादिन?" आरव नें स्नेहा केँ पैरों पऱ हल्का सां हाथ मारते हुए पूछा।
स्नेहा झटके सें पलटकर सीधी हुई। "आरव! तुँ सोच भि नहि सकताआज क्याँ-क्याँ हुआ! हमनेआज 'कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन' (CPR) औऱ पल्स मॉनिटरिंग कां पूरा प्रैक्टिकल किया।
स्नेहा कि वोँ खुशी किसी छोटे बच्चे जैसी थि जिसेनया खिलौना मिल गय़ा होँ। आरवउसे बोलते हुएदेख रहा थां। उसे स्नेहा कि बातों सें ज्यादा उसके हिलते हुए होंठ औऱ उसके चेहरे मे दिलचस्पी थि।
अचानक स्नेहा कि नज़रआरव पर्र पड़ी। उसके दिमाग़ मे एक् खुराफाती औऱ मज़ाकिया आईडिया आया।
"ओए! चल शर्ट उतार अपनी!" स्नेहा नें अचानक एक् हुक्म दिया।
आरव चौंक गय़ा। "क्याँ? क्यूं दि?"
"अरे उतार नाँ!, " स्नेहा नें अपनेबैग सें अपना स्टेथोस्कोप निकालते हुएकहा।
"दि, इतनीठंड हैं, मे कुल्फी बन जाऊँगा!" आरव नें रजाई खींचने कि कोशिश कि।
मगर स्नेहा आजफुल मूड मे थि। उसने रजाईआरव केँ हाथ सें छीनली औऱ उसकी टी-शर्ट कां कॉलर पकड़कर खींचने लगी। "चुपचाप उतारगधे! मे तेरी बड़ी बेहन हूं, जौ बोलरही हूं कर।
आरव अंदर हि अंदर मुस्कुरा रहा थां। वोँ जौ चाहता थां, स्नेहा स्वयं ब स्वयं वहीकर रही थि। उसनेहार मानते हुए अपनी टी-शर्ट उतार दि। आरव कां बदन कसरत करने कि वजह सें बहुत गठीला औऱ मजबूत थां। उसका चौड़ा सीना औऱ फ्लैट पेट देखकर एक् लम्हा केँ लिए स्नेहा भि रुक गई, "हम्म। बॉडी-वॉडी तोँ अच्छी बनारखी हैं तूने। "
आरव नें शरमाते हुए नज़रे झुकालीं, मगर उसकादिल ज़ोरों सें धड़कने लगा थां।
स्नेहा नें अपना ठंडा स्टेथोस्कोप आरव केँ नंगे सीने पर्र रख दिया।
"सीssss!" आरव नें आहभरी। स्टेथोस्कोप कि वोँ बर्फ जैसी ठंडी धातुजब आरव केँ गरम सीने सें टकराई, तोँ उसके रोंगटे खड़े होँ गए।
"अरे ड्रामा क्वीन! हिलमत, मुझे आवाज़ नहि आँ रही हैं, " स्नेहा नें उसे डांटा औऱ अपनाकान स्टेथोस्कोप केँ दूसरे सिरे पर्र लगा लिया। स्नेहा कां चेहरा आरव केँ सीने सें महज़कुछ इंच कि दूरी पर्र थां। उसकी साँसें आरव कि त्वचा पऱ पड़रही थीं।
आरव कां दिल धड़कन इतनी तेज़ हौ गई कि स्नेहा कों स्टेथोस्कोप मे साफ़ सुनाई देनेलगी।
स्नेहा नें चौंककर अपनासिर उठाया। "आरव? तेरा हार्ट रेट इतना तेज़ क्यूं हैं? 'टैकीकार्डिया' (Tachycardia) लगरहा हैं। तुम्हे घबराहट होँ रही हैं क्याँ?"
आरव नें बहोत हि मासूम सि शक्ल बनाते हुएकहा, "दि। आपने इतना ठंडा स्टेथोस्कोप मेरे सीने पऱ रख दिया हैं, तौ दिल क्याँ नाचेगा नहि?
स्नेहा हँसने लगी।। अच्छा पहन लें अपनी शर्ट। " स्नेहा नें आरव केँ गाल ज़ोर सें खींचदिए। उसे अपने भइया कां यह क्यूट अंदाज़ बहोत प्यारा लगा।
टी-शर्ट पहनते हुएआरव नें कहा, "अच्छा डॉक्टर साहिबा, अब आपकी होँ गई होँ तौ मे आपकेलिए कुछ लाया हूं। "
आरव नें टेबल पर्र रखा एक् हॉट-पॉट खोला। उसमें सें गरमा-गर्म मोमोज़ औऱ शिलॉन्ग कि मशहूर लालगरम चाय कि खुशबू पूरे कमरे मे फैल गई।
स्नेहा कि आँखें चमक उठीं। "वाओ! मोमोज़! पर्र आरव.यह तौ यहा सें दूर मिलते हें। तूँ इतनीठंड मे वहा गय़ा थां?"
तभीआरव कों अचानक ज़ोर सें छींक आँ गई। "आछछू!"
स्नेहा कां ध्यान आरव केँ चेहरे पर्र गय़ा। आरव कि नाकठंड सें एकदमलाल होँ रही थि औऱ उसकेबाल हल्के-हल्के भीगेहुए थें। दोपहर मे शिलॉन्ग मे हल्की बूंदाबांदी हुई थि।
स्नेहा नें मोमोज़ कि प्लेट साइड मे रखी औऱ आरव केँ पासआई।
"तुँ पागल हैं क्याँ आरव? इतनी बारिश औऱ ठंड मे पैदल चलकर गय़ा मात्र मोमोज़ लाने केँ लिए? मैंने कहा थां नाँ तुम को बाहर् मत जानां!" स्नेहा नें आरव केँ माथे पऱ हाथरखा। उसका माथा हल्का गरम थां।
"अरे दि, कुछ नहि हुआ। मे बस."
"तूँ चुपकर एकदम!" स्नेहा नें उसे डांटा। उसने जल्दी अपना तौलिया निकाला औऱ आरव केँ बालों कों पोंछने लगी। "तेरी निमोनिया मुझे नहि, स्वयं कों करवाना हैं! अगर तुम्हें बुखार आँ गय़ा तोँ। "
आरव चुपचाप बैठारहा। स्नेहा जिसतरह सें उसे डांटरही थि औऱ उसकेबाल पोंछरही थि, वोँ आरव कों स्नेहा कां यह क्रोध बहोत क्यूट औऱ प्रेम भरालग रहा थां।
बाल पोंछने केँ बाद स्नेहा नें अपने सूटकेस सें एक् ऊनी 'मंकीकैप' (Monkey Cap) निकाली।
"पहनइसे!" स्नेहा नें मंकीकैप आरव केँ मुँह पऱ दे मारी।
"दि! प्लीज़ नहि! मे कोई बच्चा हूं क्याँ? मे जोकर लगूंगा इसमें, " आरव नें मुँह बनाते हुएकैप वापसकर दि।
"आरव, मे तुम्हारी तरफ लास्ट वार्निंग देरही हूं। अगर तूनेयह नहि पहनी, तोँ मे अभि सुप्रिया दि कों मोबाइल करकेबोल दूँगी कि तूँ मेरीबात नहि सुनरहा, " स्नेहा नें अपनीकमर पर्र हाथ रखतेहुए कहा।
आरव अपनी दिदी कां दिल रखने केँ लिए उसने वोँ मंकीकैप पहनली। उसकैप सच मे किसी कार्टून जैसालग रहा थां।
स्नेहा उसे मंकीकैप मे देखकर अपनी हँसीरोक नहि पाई। "हाहाहा। आरव! तुँ सच तुँ कितना क्यूट लगरहा हैं मेरा बच्चा!"
स्नेहा नें हँसते हुएआरव कों गलेलगा लिया औऱ उसके मंकीकैप वालेसिर पऱ एक् ज़ोरदार पप्पी (Kiss) दे दि। आरव केँ लिएयह एक् लॉटरी लगने जैसा थां।
गरम चाय-मोमोज़ खाने केँ बादसाम केँ 7 बज चुके थें। स्नेहा कि थकान पूरीतरह सें मिट चुकी थि।
"चलआरव, थोडा बाज़ार घूमकर आते हें। मुझे सुप्रिया दि औऱ मधु दि केँ लिएकुछ शॉल देखने हें, " स्नेहा नें अपनी जैकेट पहनते हुएकहा।
दोनों गेस्ट हाउस सें बाहर् निकले। सड़कें धुंध औऱ स्ट्रीट लाइट्स कि पीली रोशनी मे थीं। मार्ग पऱ बहुत भीड़ थि—टूरिस्ट्स औऱ लोकल्स कि चहल-पहल।
स्नेहा हमेशा कि तरह अपने ख्यालों मे थि औऱ दुकानों केँ बाहर् टंगेहुए रंग-बिरंगे कपड़ों कों देखरही थि। आरव बिल्कुल उसके पीछे-पीछे चलरहा थां। भीड़ होने कि वजह सें लोग बार-बार टकरारहे थें।
"तेरीपता हैं आरव?जब तुँ संग होता हैं नां, तोँ मुझेकभी डर नहि लगता।, " स्नेहा नें चलते-चलते आरव कां हाथ पकड़ लिया।
आरव केँ बदन मे उस छुअन सें एक् सनसनी सि दौड़ गई।
तभी एक् दुकान केँ बाहर् ढलान पऱ पानी गिराहुआ थां। स्नेहा कां पेर फिसला।
"अहह!" स्नेहा पीछे कि तरफ गिरने लगी।
मगर इससे पहले कि वोँ ज़मीन कों छूती, आरव कि बाहों नें उसे अपनी गिरफ्त मे लें लिया। आरव नें एक् हाथ स्नेहा कि कमर पऱ औऱ दूसरा उसकीपीठ पर्र रखकरउसे हवा मे हि रोक लिया। स्नेहा कां चेहरा आरव केँ चेहरे केँ बिल्कुल सामने थां।
मार्ग केँ बीचों-बीच दोनों एक्-दूसरे कि आँखों मे देखरहे थें। स्नेहा केँ दिल कि धड़कन तेज़ हौ गई थि।
"संभाल कर डॉक्टर साहिबा। हरबार आपको बचाने केँ लिए मे नहि रहूँगा, " आरव नें उसे सीधा खड़ा करतेहुए मुस्कुरा करकहा।
स्नेहा नें झेंपते हुए अपने कपड़े झाड़े। "वोँ। वोँ पानी पड़ा थां नाँ। थैंक्स। "
बाज़ार मे घूमते हुए स्नेहा नें एक् दुकान सें कुछ भुट्टे (Roasted Corn) लिए। खाते-खाते भुट्टे कां काला मसाला स्नेहा कि नाक पर्र लग गय़ा। वोँ बिल्कुल एक् छोटी बच्ची जैसीलग रही थि।
आरव नें हँसते हुए अपनीजेब सें रुमाल निकाला औऱ स्नेहा कि नाकसाफ कि। "आप् सच मे कभी बड़ी नहि होंगी दि। "
स्नेहा कों आरव कि यह छोटी-छोटी हरकतें, उसकीयह केयर, इतनी ज्यादा क्यूट औऱ प्यारी लगरही थीं कि उसे बार-बार लगरहा थां कि वोँ दुनिया कि सबसे खुशनसीब बेहन हैं।
रात केँ 9:30 बजे दोनों वापसरूम मे आँ गए।
स्नेहा नें अपने जूते उतारे औऱ सीधाखाट पर्र बैठ गई। "दोस्त आरव, आज तौ सच मे पैरों कि बैंडबज गई। पहले सेमिनार मे 5 घंटे खड़े रहना औऱ फिन बाज़ार कि ट्रैकिंग। मेरी तौ पिंडलियों (Calves) मे दर्द होँ रहा हैं। "
आरव नें अपनाबैग रखा औऱ बिनाकुछ कहे सीधा बाथरूम मे चला गय़ा। दो मिनटबाद वोँ बाथरूम सें एक् छोटी बाल्टी मे गरम पानी लेकरआया।
"दि, अपनेपेर इसगरम पानी मे डाललो। आपको आराम मिलेगा, " आरव नें बाल्टी स्नेहा केँ पैरों केँ पासरख दि।
"आरव? तूनेयह क्यूं किया? मे स्वयं कर लेती दोस्त। तूँ भि तौ थका हैं। "
"चुपचाप पांव डालो दि, " आरव नें थोडा ज़िद्दी अंदाज़ मे कहा।
स्नेहा नें मुस्कुराते हुए अपनेपेर उसगरम पानी मे डालदिए। पानी कि गर्माहट सें उसे इतनाचैन मिला कि उसने अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ सिर पीछे टिका दिया।
5 मिनटबाद, आरव नीचे ज़मीन पऱ स्नेहा केँ बिल्कुल सामने बैठ गय़ा। उसने एक् सूखा तौलिया अपनीगोद मे रखा औऱ स्नेहा केँ एक् पांव कों पानी सें निकालकर अपनीगोद मे रख लिया।
स्नेहा नें झटके सें आँखें खोलीं। "आरव! तुँ क्याँ कररहा हैं? छोड़ मेरे पांव!"
"दि, रिलैक्स। मे बस आपकी थकान मिटारहा हूं। क्याँ मे अपनी दि केँ पांव भि नहि दबा सकता?"आरव नें बहोत हि मासूम औऱ भोले चेहरे केँ संगकहा।
"तूँ सच मे बहोत बदल गय़ा हैं आरव। कितना समझदार औऱ केयरिंग हौ गय़ा हैं तुँ, " स्नेहा नें भावुक होतेहुए कहा।
आरव नें तौलिये सें स्नेहा केँ पांव कों सुखाया। स्नेहा कि गोरी, चिकनी पिंडलियों पऱ आरव केँ दोनों हाथ बहोत हि आहिस्ता चलनेलगे।
वोँ अपने अँगूठे सें स्नेहा कि नसों कों बहोत हि हल्के सें दबारहा थां। स्नेहा कि सारी थकानहवा होनेलगी। स्नेहा नें रिलैक्स होकर अपनी आँखें बंदकर लीं।
आरव केँ हाथ स्नेहा कि गोरी पिंडलियों औऱ जांघों केँ निचले हिस्से कों सहलारहे थें वोँ अपनी उँगलियों सें स्नेहा केँ पैरों केँ एक्-एक् इंच कों महसूस कररहा थां। उसकागला पूरीतरह सें सूख चुका थां औऱ उसके जिस्म कि गर्मी इस ठंडे कमरे मे भि बढ़रही थि।
वोँ स्नेहा कों आँखें बंद करकेचैन लेतेहुए देखरहा थां।
"
उसने स्नेहा केँ पांव कों हल्के सें चूमने कां मन किया, मगर उसने स्वयं कों रोक लिया।
"कैसालग रहा हैं दि?" आरव नें बहोत हि प्रेम सें पूछा।
स्नेहा नें आँखें खोले बिना एक् हल्की सि मुस्कान दि। "बहोत अच्छा। तूँ दुनिया कां बेस्ट भइया हैं आरव। बेस्ट। "
यह सुनकर आरव नें स्नेहा केँ पैरों कों थोडा औऱ ज़ोर सें, मगर प्रेम सें दबाया।
woh Sirf Meri Behene nahee - Continue reading for full story
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