woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
PART 1
हल्की सर्दियों वाली सुभह। गुवाहाटी केँ उज़ान बाज़ार केँ पास, ब्रह्मपुत्र नदी सें आती ठंडी हवाओं केँ बीच एक् बड़ी सि पुरानी हवेली नुमा कोठी शांत खड़ी थि। इसके आस-पास दूर-दूर तक कोई दूसरा घऱ नहि थां। केवल ऊंचे पेड़, पीछे एक् पुरानां स्विमिंग पूल औऱ कोहरे कि सफेद चादर। इस बड़े सें घऱ मे पाँच बेडरूम थें, मगर सबसे बड़ी मुसीबत ये थि कि पूरेघऱ मे बाथरूम मात्र एक् हि थां।
घऱ केँ अंदर कां माहौल बाहर् कि शांति सें बिल्कुल उलट थां।
"सुप्रिया दि! प्लीज जल्द बाहर् निकलो नाँ, मेरा ब्लैडर फट जाएगा!" 20 साल कि सोनिया बाथरूम केँ लकड़ी केँ दरवाजे पऱ मुक्के मारते हुए चिल्ला रही थि।
आरव (19 साल) अपने कमरे केँ दरवाजे पर्र खड़ाये सभीदेख रहा थां। सुभह कि हल्की धूप दालान मे पड़रही थि औऱ सोनिया कां अंदाज़ हमेशा कि तरह बिंदास थां। उसने एक् बेहद शॉर्ट नाईट-पैंट औऱ एक् टाइट स्लीवलेस टॉप पहनाहुआ थां। दरवाजे पर्र ज़ोर-ज़ोर सें हाथ मारते हुए उसकी टांगें किसी फिल्मी हेरोइन सें कम नहि लगरही थीं। औऱ उस टाइटटॉप कि वजह सें उसकी छातियाँ भि हर झटके केँ संग बाहर् कि तरफउछल रहीथीं।
आरव कि नज़रें उसतरफ खिंची चलीजा रहीथीं। आज सें पहले उसने शायद इतनी गहराई सें सोनिया दि केँ शरीर केँ उस गदराएपन कों महसूस नहि किया थां। उसकी स्किन इतनी ग्लोकर रही थि कि आरव कां दिल एक् समय केँ लिए धड़कना भूल गय़ा। उसके दिमाग़ मे एक् गंदा ख्याल कौंधा, मगर उसने जल्दी अपनासिर झटक दिया। "यह गलत हैं। वोँ मेरी दि हैं, " उसने स्वयं सें फुसफुसाते हुएकहा, पऱ अपनी नज़रें वहा सें हटाना उसकेलिए दुनिया कां सबसे मुश्किल कामलग रहा थां।
"अरे चिल्ला क्यूं रही हैं? रुकजा दो मिनट!" बाथरूम केँ अंदर सें 24 साल कि सुप्रिया कि आवाज़ आई। वोँ घऱ कि सबसे बड़ी बेहन थि, औऱ मां-बाप केँ गुज़रने केँ बाद सें इसघऱ कि 'मम्मी' भि वही थि। उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सां रुतबा थां जिसेकोई टाल नहि सकता थां।
तभीआरव केँ पीछे सें एक् औऱ आवाज़ आई, "आरव! दोस्त मेरी बेल्ट कहां हैं? वोँ खडूस सीनियर आज मेरीजान लेँ लेगा!"
ये 22 साल कि मधु थि। घऱ कि तीसरी बेटी, जौ हाल हि मे पुलिस फोर्स मे भर्ती हुईँ थि। वोँ खाकी वर्दी कि पैंट पहनेहुए थि औऱ ऊपर केवल एक् सफेद बनियान जैसाइनर पहना थां। मधु बाहर् सें पुलिस वाली कि कड़क इमेज बनाने कि कोशिश करती थि, पर्र असल मे वोँ सबसे क्लम्ज़ी औऱ नादान लड़की थि।
वोँ भागते हुएआई औऱ हड़बड़ाहट मे आरव सें टकरा गई।
टकराते हि मधु कां नरम सीनाआरव केँ कंधे सें कसकर रगड़खा गय़ा। आरव केँ जिस्म मे जैसे करंट दौड़ गय़ा। उसनेमधु दि कों गिरने सें पकड़ लिया।
"सॉरी। सॉरीआरव! दोस्त मे लेट हौ रही हूं!" मधु अपनी बड़ी-बड़ी आँखों सें उसे देखते हुए पागलों कि तरह बड़बड़ाने लगी। "वोँ डीआईजी सर नाँ, मुझे कच्चा चबा जाएंगे। औऱ आज मुझे दिघलीपुखुरी केँ पास गश्त लगानी हैं। वहा केँ मोमोज़ इतने अच्छे होते हें नां आरव। मे बिनाखाए केसे रहूँगी?"
आरव हल्का सां मुस्कुराया। उसनेमधु केँ खुले बालों कों प्रेम सें सहलाया। "मधु दि, आपकी बेल्ट आपके कमरे मे हि कुर्सी केँ नीचे गिरी पड़ी हैं। मैंने अभि देखी थि। जाइएपहन लीजिए, औऱ मोमोज़ खा लेना, कोई कुछ नहि कहेगा आपको। "
"थैंकयू आरव! तुँ बेस्ट हैं!" मधु नें जल्द सें आरव केँ गाल पर्र एक् ज़ोरदार चुम्मा लिया औऱ अपने कमरे कि तरफभाग गई। आरव केँ गाल पर्र उसकी गीलीकिस कि गर्माहट औऱ उसके जिस्म सें आती वोँ मीठी सि पाउडर कि गंधआरव केँ मन कों सुन्न कररही थि।
तभी दालान केँ कोने मे रखे सोफे सें एक् शांत आवाज़ आई, "ऑक्सिटोसिन."
सबनेपलट कर देखा। 21 साल कि स्नेहा अपने मोटे चश्मे केँ पीछे सें एक् भारी-भरकम मेडिकल कि पुस्तक पढ़ते हुएबोल रही थि। उसने नज़रें पुस्तक सें हटाए बिनाकहा, "जब हम् किसी अपने कों गले लगाते हें याँ चूमते हें, तौ जिस्म मे ऑक्सिटोसिन हॉर्मोन रिलीज़ होता हैं, जिससे स्ट्रेस कम होता हैं। मधु दि कों इसकी सख्त ज़रूरत हैं, उनका कोर्टिसोल लेवलहाई हैं। "
सोनिया नें अपना माथापीट लिया। "अरे ओ चश्मिश! अपना ज्ञान अपनी किताबों मे रख। यहा मेरीजान निकलरही हैं। "
तभी बाथरूम कां दरवाजा खुला।
आरव कि सांसें जैसेहलक मे हि रुकगईं। सुप्रिया बाहर् आई। उसने एक् साधारण सां सूती सलवार सूट पहनाहुआ थां, मगर नहाने केँ बाद वोँ सूट उसके गीले शरीर सें बुरीतरह चिपका हुआ थां। उसके गीले बालों सें पानी कि बूंदें टपककर उसके सीने कि गहरी दरार मे जारही थीं। सुप्रिया कां जिस्म किसी अप्सरा कि तरह आकर्षक थां।
"लेँ जा, घुस जा अंदर। औऱ साबुन ठीक सें स्थान पर्र रखना सोनिया, " सुप्रिया नें अपना तौलिया झटकते हुएकहा।
"थैंकगॉड!" सोनिया तेज़ी सें बाथरूम मे घुसी, मगर द्वार (दरवाज़ा) बंद करने सें पहले उसनेआरव कि तरफ देखा, एक् आँख मारी औऱ होंठों कों काटते हुए द्वार (दरवाज़ा) बंदकर लिया। आरव कां पूराबदन उस एक् इशारे सें जलउठा थां।
सुप्रिया आरव केँ पासआई। उसने बड़े प्रेम सें आरव केँ गाल कों छुआ। "गुड मॉर्निंग मेरेशेर। रात कों ठीक सें सोया?आज कॉलेज जानां हैं नां?"
"हाँ.हाँ सुप्रिया दि। मे ठीक सोया, "आरव नें नज़रे चुराते हुएकहा, क्योंकि सुप्रिया कां गीला जिस्म उसके इतने लगभग थां कि वोँ उसकी साँसों कि गर्माहट महसूस कर सकता थां।
"चल, मे ब्रेकफास्ट लगाती हूं। तूँ फ्रेश हौ जा, " सुप्रिया मुस्कुराकर रसोई कि तरफचली गई।
थोड़ी देरबाद, जब सोनिया बाहर् आँ गई, तोँ आरव बाथरूम मे घुसा। द्वार (दरवाज़ा) अंदर सें लॉक करते हि आरवउस छोटे सें कमरे केँ माहौल मे खो गय़ा। बाथरूम केँ अंदर अभि भि गरम पानी कि भापतैर रही थि। हवा मे सुप्रिया दि केँ चंदन वाले साबुन औऱ सोनिया दि केँ फ्लोरल शैम्पू कि गंध घुली हुइ थि।
आरव कि नज़र दरवाज़े केँ पीछे टंगेहुक पऱ गई। वहा सोनिया दि अपनी एक् पहनी हुईँ पेंटी भूल गई थि—हल्के गुलाबी रंग कि, जिसपर पानी कि कुछ बूंदें थीं।
आरव कां दिल सीने मे हथौड़े कि तरह धड़कने लगा। उसका जिस्म अब उसके कंट्रोल मे नहि थां।
उसने कांपते हुए हाथों सें उस गुलाबी कपड़े कों उतारा औऱ अपने चेहरे पऱ रख लिया। सोनिया दि केँ बदन कि गंध सीधे उसके दिमाग़ मे उतर गई। उसकी आँखें बंद होँ गईं। उसे सोनिया दि कि वोँ सफेद, चिकनी टांगें यादआने लगीं, सुप्रिया दि कां वोँ गीला जिस्म यादआने लगा, मधु कां उसके कंधे सें टकराना औऱ स्नेहा दि केँ होंठ.
आरव नें वहीं दीवार कां सहारा लिया। उसकाबदन उत्तेजना सें पागल हौ रहा थां। उसने अपनी पैंट कि ज़िप नीचे कि। वोँ किसी कों बताना नहि चाहता थां, वोँ बसइस एहसास कों जी लेना चाहता थां। "दि." उसके मुँह सें हल्की सि कराह निकली। वोँ अपनी बहनों केँ उन हसीन जिस्मों कों अपने ख्यालों मे महसूस करतेहुए लंड कों सहलाने लगा।
कुछ हि मिनटों केँ बाद, आरव कां बदन झनझना उठा औऱ उसने अपना वोँ गरम पानी वहीं फर्श पऱ बहा दिया।
अगलेकुछ सेकंड तक वोँ बस हाँफता रहा। फिन गिल्ट केँ संग उसने जल्द सें फर्शसाफ किया। सोनिया दि केँ उस कपड़े कों बड़ी हि हिफाज़त सें वापसउसी हुक पर्र वैसे हि टांग दिया, ताकि किसी कों ज़रा सां भि शक नाँ हौ।
दस मिनटबाद आरवनहा कर एक् नॉर्मल, हैंडसम औऱ समझदार भइया कि तरह डाइनिंग टेबल पर्र बैठा थां। बाहर् सें देखकर कोई अंदाज़ा भि नहि लगा सकता थां कि इस शांत चेहरे केँ पीछे कैसा ज्वालामुखी उबलरहा हैं।
सुप्रिया नें गरमा-गर्म पराठे औऱ गरमचाय टेबल पर्र रखी।
मधु पूरे पुलिस यूनिफॉर्म मे थि, मगर उसने अपनी टोपी (Cap) उल्टी पहनी हुई थि। "दोस्त सुप्रिया दि, यह पराठे थोड़े औऱ क्रिस्पी क्यूं नहि किए? मेरे थाने कां हवलदार मुझसे अच्छी गरमचाय बनाता हैं!" मधु नें मुँह बनाते हुएकहा।
"तेरी खानी हैं तौ खा, वरनाउसी हवलदार केँ पास जाकर ब्रेकफास्ट कर लेना। वैसे भि तुम्हारी तरफ तोँ रास्ते मे मोमोज़ ठूंसने हि हें, " सुप्रिया नें प्रेम सें डांटते हुएमधु कि उल्टी टोपी कों सीधा किया। "एक् क्रिमिनल नहि पकड़ा गय़ा तुझसे आज तक, औऱ नखरे आईजी वाले हें इसके। "
पूरी टेबल पर्र ठहाके गूंजउठे। मधु नें चिढ़कर अपना मुँह फुला लिया औऱ आरव कि प्लेट सें एक् पराठा छीन लिया। "तुँ हंसमत आरव! किसीदिन तुझेही हि अरेस्ट करके लॉकअप मे डाल दूँगी। "
सोनिया नें अपनेबाल सुखाते हुएआरव केँ कंधे पऱ हाथरखा औऱ उसकीतरफ झुक गई। उसकी क्लीवेज आरव कि आँखों केँ ठीक सामने थि। "अरे मेरी पुलिस वाली दिदी, मेरेआरव कों कुछमत कहना। यह तोँ मेरा हीरो हैं। हैं नां आरव? वैसे.आज बाथरूम मे कुछ अधिक हि वक्त नहि लगा दिया तूने? क्याँ कररहा थां अंदर?" सोनिया नें शरारत सें आँख मारते हुए पूछा।
आरव केँ हाथ सें पानी कां गिलास छलकते-छलकते बचा। "कु-कुछ नहि सोनिया दि। वोँ बस। पानी बहोत गरम थां आज."
स्नेहा नें पुस्तक सें सिर उठाया। "लड़कों मे इस उम्र मे टेस्टोस्टेरोन पीक पर्र होता हैं। बाथरूम मे अधिक वक़्त बिताना एक् बायोलॉजिकल प्रक्रिया कां हिस्सा होँ सकता हैं."
"स्नेहा!!!" सुप्रिया, मधु औऱ सोनिया तीनों एक् संग चिल्लाईं।
स्नेहा नें कंधे उचकाए, चश्मा ठीक किया औऱ वापस अपनी एनाटॉमी कि पुस्तक मे घुस गई।
सुप्रिया हँसते हुएआरव केँ पासआई। उसनेआरव केँ बालों मे हाथ फेरा औऱ अपने हाथों सें एक् पराठे कां टुकड़ा तोड़कर आरव केँ मुँह मे खिलाया। "तूँ इन पागलों कि बातमत सुन। आहिस्ता खा। "
आरव नें सुप्रिया कि उंगलियों कों अपने होठों सें छूतेहुए वोँ निवाला खाया।
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Part 2
नाश्ते कि टेबल कां वोँ खुशनुमा माहौल आहिस्ता अपने-अपने कामों कि भागदौड़ मे बदल गय़ा। बाहर् सें आती सर्द हवाएँ कोठी कि पुरानी खिड़कियों सें टकराकर एक् अजीब सि सीटीबजा रहीथीं। वोँ वक़्त जब ज़िन्दगी आज कि तरह स्मार्टफोन्स मे नहि उलझी थि। घऱ केँ दालान मे रखा काला रोटरी डायलर वाला लैंडलाइन मोबाइल अचानक बजनेलगा, पऱ किसी केँ पासउसे उठाने कि फुर्सत नहि थि।
"आरव!देख नां किसका मोबाइल हैं!" मधु अपने भारी पुलिस वाले जूते (बूट्स) पहनते हुएहॉल मे फुदकरही थि। एक् पेर मे जूता थां औऱ दूसरे पेर कां फीता वोँ खड़े-खड़े बांधने कि कोशिश कररही।
आरव नें मोबाइल कां रिसीवर उठाया। "हेलो?जी। नहि, शर्मा जी कां घऱ नहि हैं। रॉंग नंबर। " उसने रिसीवर वापसरखा औऱ मुड़कर देखा तौ मधु अपना बैलेंस खो चुकी थि।
"अरे दि!" आरव तेजी सें लपका औऱ मधु केँ फर्श पऱ गिरने सें ठीक एक् सेकंड पहले उसनेउसे अपनी बाहों मे थाम लिया।
इस हड़बड़ाहट मे मधु कां पूरावजन आरव कि छाती पर्र आँ गय़ा। उसकी पुलिस कि खाकी वर्दी कि वोँ कड़क शर्ट, आरव कि पतली टी-शर्ट केँ पार सें उसके सीने पऱ रगड़खा गई। मधु कि साँसें तेज़थीं। घबराहट मे उसनेआरव केँ कंधों कों कसकर पकड़ लिया थां। आरव कि नज़रें अचानक नीचे झुकीं। वर्दी कि शर्ट केँ ऊपरीदो बटन खुले थें औऱ वहा सें झांकती मधु कि गहरी, नर्म घाटी नें आरव केँ मन कि नसें जैसे झनझना दीं। मधु केँ शरीर सें आने वालीगंध आरव केँ नथुनों सें होतेहुए सीधे उसकेखून मे घुलने लगी।
"बच गई." मधु नें एक् गहरी साँस छोड़ी औऱ आरव कि आँखों मे देखहँस दि।
"तूँ नहि होता नाँ आरव, तौ आज मेरीकमर टूट जाती।
आरव कां गलासूख रहा थां। वोँ मधु केँ उस गदराए शरीर कि छुअन सें अभि भि सुन्न थां। उसने किसीतरह अपनी आवाज़ कों सामान्य रखा औऱ उसे सीधा खड़ा किया। "दि। आप् नाँ सच मे एक् दिन स्वयं कां हि एनकाउंटर कर लोगी। बैठोयहा, मे बांधता हूं फीते। "
आरव घुटनों केँ बलबैठ गय़ा औऱ मधु केँ जूतों केँ फीते बांधने लगा। मधु प्रेम सें अपने छोटे भइया केँ बालों मे उंगलियां फेररही थि। "थैंकयू मेरा बच्चा। अच्छा सुन, अगर सुप्रिया दि पूछे नाँ कि मैंने लञ्च बॉक्स क्यूं नहि लिया, तोँ कह देना मे भूल गई। आज मेरी ड्यूटी दिघलीपुखुरी केँ पास हैं, वहां मुझे वोँ स्पेशल वाले मोमोज़ खाने हें। "
फीते बांधते हुएआरव कि उंगलियां 'गलती सें' मधु कि पिंडलियों सें छूगईं। खाकी पैंट केँ नीचे सें महसूस होतीउस सख्तमगर गुदाज़ स्किन नें आरव केँ हाथों मे जैसेआग लगा दि। उसने अपनाहोठ जोर सें काटा ताकि उसकीकोई भि फीलिंग उसके चेहरे पर्र नां आँ पाए। "ठीक हैं दि। नहि बताऊंगा। पर्र आप् अपना ध्यान रखना। "
मधु नें जाते-जाते आरव कां गाल खींचा औऱ अपनी पुलिस कैप कों एक् बारफिन सें गलत एंगल पऱ पहनकर बाहर् निकल गई।
कुछ हि देर मे सोनिया भि कॉलेज केँ लिए निकल गई। उसने एक् डार्क ब्लूरंग कि बूट-कट जींस औऱ एक् बेहद टाइट क्रॉप टॉप पहना थां, जिस पर्र 'Angel' लिखा थां।
जातेहुए उसने परफ्यूम कि जोँ भारी स्प्रे स्वयं पर्र कि थि, उसकी खुशबू पूरे दालान मे घंटों तक तैरती रही। आरव उस खुशबू कों अपने अंदर भरतारहा।
घऱअब शांत थां।
दोपहर ढलनेलगी थि। गुवाहाटी कि सर्दियों कि शामें बहोत जल्दगिर आती हें। पांच बेडरूम वाली वोँ पुरानी कोठीअब एक् अजीब सें सन्नाटे मे डूब गई थि। आरव अपने कमरे मे लेटाछत केँ पंखे कों देखरहा थां। उसकी आँखें खुलीथीं, मगर दिमाग़ मे बस एक् हि फिल्म चलरही थि—उसकी चारों बहनें।
वोँ सोचरहा थां कि केसे दुनिया उसे एक् सीधा-साधा, अपनी बहनों कां ख्याल रखने वाला छोटा भइया मानती हैं। मगरकोई नहि जानता थां कि उसके सीने मे कैसा तूफान पलता। उसे स्वयं पर्र कभी-कभी क्रोध आता थां, मगरयह अट्रैक्शन इतना गहरा, इतना मादक थां कि वोँ चाहकर भि इसेरोक नहि पाता थां। वोँ उन्हें किसी औऱ केँ संग देखने कि कल्पना सें हि पागल होने लगता थां।
"आरव.गरम चाय पिएगा?"
दरवाजे पर्र सुप्रिया दि खड़ी थि। उसनेवही सुभह वाला सूतीसूट पहनाहुआ थां, मगरअब बाल बंधेहुए थें औऱ चेहरे पर्र दिनभर कि थकान थि। वोँ एक् हाथ सें अपनीकमर सहलारही थि।
आरव जल्दी खाट सें उठा। "दि, आप् रहनेदो। मे बना लाता हूं। "
"अरे नहि, मैंने पानी चढ़ा दिया हैं। तूँ बसआकर थोड़ी देर रसोई मे मेरेपास बैठजा। घऱ इतना शांत रहता हैं तौ मुझे अजीब सि घबराहट होने लगती हैं। " सुप्रिया कि आवाज़ मे एक् वोँ मां वाली फिक्र थि जोँ वोँ अपने माँ-बाप केँ जाने केँ बाद सें 17 साल कि उम्र सें ढोरही थि।
आरव रसोई केँ स्लैब केँ पास खड़े होकर सुप्रिया कों गरमचाय बनाते देखने लगा। चायपत्ती औऱ अदरक कि खुशबू पूरे रसोई मे फैलरही थि। सुप्रिया गैस केँ पास खड़ी थि औऱ गैस कि नीलीलौ कि रोशनी मे उसका साइड-प्रोफाइल किसी सुंदर पेंटिंग जैसालग रहा थां।। आरव कि आँखें उसबदन केँ एक्-एक् इंच कों पी जानां चाहती थीं।
"दि, आप् बहोत थक जाती हौ नाँ?" आरव नें भारी आवाज़ मे पूछा।
सुप्रिया नें मुड़कर उसे देखा औऱ एक् मीठी सि मुस्कान दि। उसनेगरम चाय केँ दोकप छाने औऱ एक् कपआरव कि तरफ बढ़ा दिया। "थकानकिस बात कि पागल? तुम् चारों हि तोँ मेरी जीवन होँ। जब तुम् लोगों कों खुश देखती हूं, तौ सारी थकानउतर जाती हैं। "
सुप्रिया आरव केँ बिल्कुल लगभग खड़ी थि। गरमचाय कि गर्माहट सें अधिकआरव कों सुप्रिया केँ शरीर कि गर्माहट महसूस होँ रही थि। वोँ स्वयं कों रोक नहि पाया औऱ उसने सुप्रिया केँ कंधे पऱ सिररख दिया। सुप्रिया नें बड़े प्रेम सें अपना एक् हाथआरव कि पीठ पऱ रख दिया औऱ उसे सहलाने लगी।
" भइया। क्याँ हुआ?आज इतना इमोशनल क्यूं होँ रहा हैं?" सुप्रिया नें आरव केँ माथे कों चूमा।
आरव नें अपनी आँखें बंदकर लीं। सुप्रिया केँ उस चुंबन नें उसके अंदरसोए हुएउस भूखे आशिक कों झकझोर कररख दिया थां। वोँ सुप्रिया कि कमर कों अपने हाथों सें जकड़ लेना चाहता थां, उसे अपनी बाहों मे भींच लेना चाहता थां, मगर उसने अपने हाथों कों अपनी पैंट कि जेब मे कसकर मुट्ठी बना लिया। "कुछ नहि दि। बस आप् लोग मुझेकभी छोड़कर मत जानां। "
सुप्रिया हँसी। "पागल लड़का! तुम को छोड़कर हम् कहां जाएंगे?"
रात केँ नौबज चुके थें। घऱ मे एक् बारफिन सें रौनकलौट आई थि। सोनिया अपने कमरे मे कोई कैसेट चलाकर 'बोलो नाँ प्रेम हैं' केँ गानों पर्र गुनगुना रही थि। स्नेहा डाइनिंग टेबल पर्र अपनी किताबों कां पहाड़ सजाए बैठी थि औऱ बीच-बीच मे चश्मा नाक केँ ऊपर खिसका रही थि।
तभीमेन डोर ज़ोर सें खुला। मधु करीब-करीब घिसटते हुए अंदरआई। उसकी वर्दी धूल सें सनी हुइ थि औऱ चेहरा थकावट सें उतराहुआ थां। उसने अपनी टोपी औऱ डंडा सोफे पर्र फेंका औऱ वहीं धड़ाम सें गिर गई।
"मे रिज़ाइन कररही हूं! मुझसे नहि होतीयह पुलिस कि जॉब!"मधु नें रोतलू शक्ल बनाते हुएहवा मे हाथपेर मारे।
सोनिया अपने कमरे सें बाहर् आँ गई। "क्याँ हुआ मेरी दिदी कों? किसी नें आजफिन तुम्हें.
"चुपकर सोनिया!" मधु नें मुँह फुला लिया। "वोँ खड़ूस इंस्पेक्टर। उसनेआज मुझसे लगातार तीन घंटे चौराहे पऱ खड़े रहकर गाड़ियां चेक करवाईं। मेरे पैरों मे नाँ, ऐसालग रहा हैं जैसे किसी नें पत्थर बांधदिए हों। आरव। ओ मेरे प्यारे भइया। प्लीज दोस्त, पांच मिनट मेरे पांवदबा दे। "
आरव जोँ रसोई सें पानीला रहा थां, वोँ वहींरुक गय़ा। उसनेमधु दि कि तरफ देखा जोँ सोफे पऱ अधलेटी थि। उसकी खाकी पैंट जांघों केँ पास सें एकदमकसी हुईँ थि।
"तूँ क्यूं उसेतंग कररही हैं मधु?जा जाकर पहलेनहा लेँ, " सुप्रिया नें प्लेट्स लगाते हुएकहा।
"नहि सुप्रिया दि, मे दबा देता हूं। दिदी थक गई हैं। " आरव नें पानी कां गिलास रखा औऱ सोफे केँ पास ज़मीन पर्र बैठ गय़ा।
मधु नें अपने पांवआरव कि गोद मे रखदिए। आरव केँ हाथ जैसे हि मधु कि पिंडलियों पर्र पड़े, उसकेबदन मे एक् सिहरन दौड़ गई। वोँ आरामसे मधु कि टाइट पैंट केँ ऊपर सें हि उसकी मांसपेशियों कों दबाने लगा। मधु नें धीरे-धीरे अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ एक् लंबी'अहह' भरी। "आहह-आहह। आरव। जन्नत। बिल्कुल जन्नत मिल गई दोस्त। "
आरव केँ हाथ आहिस्ता ऊपर कि तरफ बढ़ने लगे। उसकी उंगलियां मधु कि भारी जांघों कों महसूस कररही थीं। कपड़े केँ ऊपर सें भि वोँ उस मांसल नरमी कों महसूस कर सकता थां।
"तुम्हें पता हैं." डाइनिंग टेबल सें स्नेहा कि बिना किसी इमोशन वाली सपाट आवाज़ आई, "पैरों कों इसतरह दबाने सें लैक्टिक एसिड कां ब्रेकडाउन तेज़ होता हैं। मगरमधु दि, अगर आप् रोज़ मोमोज़ कि स्थान प्रोटीन लेंगी, तौ आपके मसल्स अधिक मजबूत होंगे। "
मधु नें सोफे सें हि एक् कुशन उठाकर स्नेहा कि तरफ फेंका। "तुँ अपनी डिक्शनरी बंदकर लें चुड़ैल!"
पूरारूम ठहाकों सें गूंजउठा। आरव भि हँसरहा थां, मगर उसकेहाथ अभि भि मधु कि जांघों पर्र धीरे धीरेकाम कररहे थें। वोँ इससमय कों रोक लेना चाहता थां। उसे अपनी बहनों केँ आस-पास होने वालायह एहसास दुनिया कि हर दौलत सें ज़्यादा प्यारा थां।
खानां खाने केँ बाद औऱ थोड़ी देर टेलीविज़न पर्र कोई पुरानां सीरियल देखने केँ बाद, रात केँ बारहबजे तक पूराघऱ सोने कि तैयारी मे लग गय़ा।
कोठी मे पांच बेडरूम थें। सुप्रिया कां रूम सबसे बड़ा थां, जौ कि पहले मां-पिताजी कां हुआ करता थां। उसकेबाद लाइन सें सोनिया, स्नेहा औऱ मधु केँ कमरे थें। दालान केँ एकदम आखिर मे आरव कां रूम थां।
रात केँ 2 बज चुके थें। बाहर् एकदम सन्नाटा थां, केवल झींगुरों कि आवाज़ औऱ दूर कहीं किसी कुत्ते केँ भौंकने कि आवाज़ आँ रही थि। सर्दी बढ़ गई थि।
आरव कि आँखों मे नींद कां एक् कतरा भि नहि थां। वोँ अपनेबैड पर्र करवटें बदलरहा थां। उसका जिस्म किसी भट्टी कि तरहतप रहा थां। दिनभर अपनी बहनों केँ उन मादक जिस्मों, उनकी खुशबू, उनकी छुअन कों महसूस करने केँ बाद, रात कां यह अकेलापन उसकेलिए जानलेवा होँ जाता थां।
वोँ पलंग सें उठा। उसने पैरों मे कुछ नहि पहना थां ताकि उसकीआहट किसी कों नां सुनाई दे। वोँ दबे पाँव दालान मे आया। पूरेघऱ मे घुप्प अंधेरा थां, बस खिड़की सें छनकरआती चांद कि हल्की रोशनी फर्श पर्र पड़रही थि।
वोँ आहिस्ता सुप्रिया दि केँ कमरे कि तरफ बढ़ा। द्वार (दरवाज़ा) हमेशा कि तरहबस सटाहुआ थां, लॉक नहि थां। सुप्रिया कभी द्वार (दरवाज़ा) लॉक नहि करती थि ताकि रात-बिरात किसी कों कोई ज़रूरत होँ तौ वोँ जल्दी उठसके।
आरव नें बहोत धीरे-धीरे सें दरवाज़े कों धक्का दिया। कोई आवाज़ नहि हुईँ। वोँ कमरे केँ अंदर दाखिल होँ गय़ा।
कमरे केँ अंदर सुप्रिया कगंध कां थां। आरव नें एक् गहरी साँसली औऱ हवा कों अपने फेफड़ों मे भर लिया। उसकानशा अब अपनेचरम पऱ थां।
वोँ दबे पाँव सुप्रिया केँ बैड केँ पास गय़ा। सुप्रिया गहरी नींद मे थि। रजाईआधी नीचे खिसक गई थि। उसनेवही रात वाला ढीला-ढाला नाइटसूट पहनाहुआ थां। नींद मे करवट लेने कि वजह सें नाइटसूट कां ऊपरी हिस्सा थोडा अस्त-व्यस्त होँ गय़ा थां, जिससे उसके भारी, गोरे सीने कां कुछ हिस्सा औऱ उसकी गहरी नाभि कि झलक साफ़ नज़र आँ रही थि। उसकी साँसों केँ संग उसका वोँ भराहुआ सीना ऊपर-नीचे हौ रहा थां।
आरव वहीं ज़मीन पऱ घुटनों केँ बलबैठ गय़ा। उसका चेहरा सुप्रिया केँ चेहरे सें महज़कुछ इंच कि दूरी पऱ थां। वोँ सुप्रिया कि साँसों कि वोँ गरमआंच अपने चेहरे पऱ महसूस कररहा थां।
*"दि."* आरव केँ होंठ बिनाकोई आवाज़ किए हिले।
उसने अपनाहाथ बहोत धीरे-धीरे सें आगे बढ़ाया, उसके शरीर कि आउटलाइन केँ ऊपर अपनाहाथ फेरने लगा। उसके चेहरे सें लेकर, उसकेगले, उसके उभरेहुए सीने औऱ उसकी पतलीकमर तक। वोँ बिनाउसे छुएउसे महसूस कररहा थां।
उसकी साँसें अब भारी होनेलगी थीं। उसने अपने कांपते हुएहाथ सें अपने पजामे केँ अंदरहाथ डाला। अपनी बड़ी बेहन केँ उस बेसुध, सोएहुए मगर बेहद कामुक शरीर कों देखते हुए, औऱ कमरे मे फैली उसकीउस मदहोश कर देने वाली खुशबू कों सूंघते हुएआरव स्वयं कों सहलाने लगा।
कमरे मे मात्र सुप्रिया केँ सोने कि हल्की आवाज़ थि औऱ आरव कि रुकी-रुकी, भारी होती साँसें। उसकाहर एक् स्ट्रोक उसकेउस पागलपन, उस जुनून कों बयानकर रहा थां जिसे वोँ दुनिया कि नज़रों सें छिपाकर रखता थां। वोँ सुप्रिया केँ चेहरे कों देखरहा थां। उसके माथे पऱ गिरी वोँ बालों कि लट, उसके हल्के खुलेहुए होंठ.
आरव कि स्पीड बढ़ने लगी। वोँ अपनी आँखें बंदकर रहा थां औऱ खोलरहा थां। वोँ कल्पना कररहा थां कि सुप्रिया दि उसे अपने सीने सें लगारही हें, वोँ सोचरहा थां कि सोनिया दि उसेचूम रही हें, कि दि कि बाहों मे वोँ कैद हैं। उसकामन उन ख्यालों केँ बवंडर मे फंस चुका थां।
कुछ हि मिनटों कि उस खामोश औऱ तीव्र यातना केँ बाद, आरव कां बदन पूरीतरह सें अकड़ गय़ा। उसने अपने मुँह पऱ अपना हि दूसरा हाथ कसकररख लिया ताकि उसके मुँह सें कोई भि आवाज़ नां निकले। उसकाबदन झटके खानेलगा औऱ उसने अपना सारागरम लावा वहीं ज़मीन पऱ, सुप्रिया केँ पलंग सें ठीक नीचे, अपने हि हाथों मे निकाल दिया।
अगलेकई पलों तक वोँ वहीं फर्श पर्र माथा टेके हाँफता रहा। उसकादिल पसलियां तोड़कर बाहर् आनां चाहता थां। जब उसकी साँसें थोड़ी नॉर्मल हुईं, तौ उसने अपनेपास रखे एक् टिश्यू सें अपनेहाथ साफकिए। वोँ अपनी किसी भि हरकत कां कोई भि निशान इस कमरे मे नहि छोड़ना चाहता थां। वोँ अपनी बहनों कों कोई नुकसान याँ कोईदुख नहि देना चाहता थां, वोँ बस उन्हें इसहद तक चाहता थां कि उसके बिना वोँ जी नहि सकता थां।
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उसने उठने सें पहले एक् अंतिम बार सुप्रिया कों देखा। बहोत हिम्मत करके उसने अपनी एक् उंगली सुप्रिया केँ माथे पऱ रखेउन बालों पर्र फेरी औऱ उन्हें पीछेकर दिया।
सुप्रिया नें नींद मे हल्की सि 'हम्म' कि आवाज़ निकाली औऱ करवटबदल ली।
आरव कां दिलधक सें रह गय़ा। वोँ कुछ सेकंड मूर्ति कि तरह खड़ारहा, औऱ जबउसे यकीन हौ गय़ा कि सुप्रिया सोरही हैं, तोँ वोँ चुपचाप कमरे सें बाहर् निकल गय़ा औऱ अपने कमरे मे जाकर पलंग पर्र गिर पड़ा।
woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
PART 3
रविवार कि सुभह गुवाहाटी मे कुछअलग हि होती हैं। सर्दियों कि वोँ हल्की-हल्की मीठीधूप कोठी केँ पीछे वाले पुराने स्विमिंग पूल केँ पानी पऱ चमकरही थि।
आजकोई अलार्म नहि बजा थां, मगरफिन भि घऱ मे हमेशा कि तरह हंगामा मच चुका थां। औऱ मुद्दा फिन सें वही थां—एक् बाथरूम औऱ पाँचलोग।
"दि! मेरा संडे हैं आज, मुझे धीरे-धीरे नहाने दो नाँ!" अंदर सें मधु कि आवाज़ आँ रही थि।
"तुम्हें आहिस्ता नहाना हैं तौ पूल मे जा नाँ! मुझे कपड़े धोने हें, वाशिंग मशीन लगानी हैं। बाहर् निकल जल्द!" सुप्रिया बाथरूम केँ दरवाज़े केँ पास खड़ी हाथों मे गंदे कपड़ों कि बाल्टी लिए झल्ला रही थि।
आरव दालान मे रखी चारपाई पर्र बैठायह सभीदेख रहा थां। उसकेहाथ मे गरमचाय कां कप थां, जिससे भापउठ रही थि। रविवार कों आरव कों बस अपनी बहनों कों इसतरह लड़ते-झगड़ते, घऱ मे बेफिक्र घूमते देख्ना पसन्द थां।
तभी सोनिया अपने कमरे सें बाहर् निकली। उसने एक् बेहद लूज़ सां सफेद मेन्स टी-शर्ट पहनाहुआ थां, जोँ शायदआरव कां हि थां, औऱ नीचे घुटनों तक कां एक् सूती पजामा। उसकेबाल बिखरे हुए थें औऱ वोँ आँखें मलतेहुए सीधाआरव केँ पासआई औऱ धड़ाम सें चारपाई पर्र उसकेबगल मे गिर गई।
गिरते हि उसकासिर आरव केँ कंधे पर्र टिक गय़ा। "गुड मॉर्निंग." उसने नींदभरी आवाज़ मे कहा औऱ बिनाकुछ सोचेआरव केँ हाथ सें गरमचाय कां कप लेकर स्वयं एक् घूंटपी लिया।
आरव कि साँसें वहींथम गईं। सोनिया दि केँ इस बेपरवाह अंदाज़ नें हमेशा कि तरह उसके अंदर एक् खलबली मचा दि थि। उस ढीली टी-शर्ट केँ गले सें सोनिया कि वोँ हल्की सि क्लीवेज औऱ उसके शरीर कि वोँ गंधआरव केँ चेहरे सें टकरारही थि। उसनेगरम चाय कां वोँ कप जहाँ सें सोनिया नें जूठा किया थां, उसे वापस लिया औऱ उसी स्थान सें अपने होंठलगा दिए। यह एक् छोटी सि बात थि, पर्र आरव केँ लिएयह किसी जन्नत सें कम नहि थां।
"कपड़े छांटने मे मेरी सहायता कौन करेगा? याँ सभी मुझे हि करना हैं इसघऱ मे?" सुप्रिया नें बाल्टी ज़मीन पर्र रखतेहुए कहा।
"मे करता हूं दि, " आरव जल्दी उठ खड़ाहुआ। वोँ हमेशा घऱ केँ कामों मे सहायता करता थां।
आरव दालान केँ कोने मे बैठ गय़ा औऱ बाल्टी सें कपड़े निकाल कर अलग-अलग करनेलगा। सुप्रिया मशीन मे पानीभर रही थि। आरव केँ हाथों मे अचानक मधु दि कि खाकी पैंटआई, फिन स्नेहा दि कां एक् सादा सां सूट, औऱ फिन। सुप्रिया दि कां वोँ हल्का नीला ब्रा औऱ सोनिया दि कि एक् पहनी हुइ लेगिंग।
आरव केँ हाथरुक गए। वोँ उन कपड़ों कों ऐसे पकड़े हुए थां जैसे वोँ कपड़े नहि, सीधे उनकेबदन कां कोई हिस्सा हों। सुप्रिया कां ध्यान मशीन कि तरफ थां। आरव नें उस नीले कपड़े कों अपनी उंगलियों सें सहलाया। उसेयाद थां कि कल सुप्रिया दि नें यही पहना थां। उसने बहोत हि सफाई सें, नज़रें बचाकर उस कपड़े कों हल्का सां अपने चेहरे केँ लगभग किया। कपड़े सें आँ रही पसीने औऱ उनके परफ्यूम कि हल्की सि वोँ महकआरव केँ मन कि नसों कों खींचने लगी। उसने जल्दी स्वयं कों कंट्रोल किया औऱ कपड़ों अलग करनेलगा।
"आरव, वोँ लाल वाली कुर्ती अलग रखना, उसकारंग निकलता हैं, " सुप्रिया नें कहा औऱ उसकेपास आकरबैठ गई।
सुप्रिया नें आज एक् सिंपल सां मैक्सी गाउन पहनाहुआ थां। ज़मीन पर्र उकड़ू बैठते हुए उसका गाउन थोडा सां ऊपर खिसक गय़ा, जिससे उसकी गोरी, चिकनी पिंडलियां दिखने लगीं। आरव नज़रें झुकाए कपड़े छांटरहा थां, मगर उसकी आँखों सुप्रिया केँ पैरों औऱ उस गाउन केँ घेरे मे हि अटका थां।
दोपहर होते-होते 'लोड शेडिंग' (पावरकट) होँ गई। गुवाहाटी मे लाइट जानां एक् आमबात थि।
पंखेबंद होते हि घऱ मे उमस बढ़ने लगी। सभी लोगहॉल मे आँ गए क्योंकि वहां खिड़कियों सें क्रॉस-वेंटिलेशन अच्छा होता थां।
"दोस्त यह बिजली वालों कों भि संडे कों हि मरम्मत करनी होती हैं, " मधु नें हाथ केँ पंखे सें हवा झलतेहुए कहा। उसनेअब एक् शॉर्ट्स औऱ स्लीवलेस टॉपपहन लिया थां, औऱ फर्श पऱ आहिस्ता टांगें फैलाए बैठी थि।
"चलो कैरम खेलते हें, " सोनिया नें सुझाव दिया। उसने कैरम बोर्ड निकाला औऱ टेलकम पाउडर छिड़कने लगी। पाउडर कि वोँ खुशबू पूरेहॉल मे फैल गई।
टीमें बनीं—एक् तरफ सुप्रिया औऱ मधु, दूसरी तरफ सोनिया औऱ आरव। स्नेहा दूर सोफे पऱ बैठी जर्नल पढ़रही थि, उसेइस दुनिया सें कोई मतलब नहि थां।
खेल शुरुआत हुआ। आरव कों गेम पऱ ध्यान देना मुश्किल होँ रहा थां। सोनिया जब भि स्ट्राइकर मारने केँ लिए बोर्ड पर्र झुकती, तोँ उसकी लूज़ टी-शर्ट केँ अंदर सें उसकाभरा हुआ, गदराया सीनाआरव कि आँखों केँ ठीक सामने आँ जाता। सोनिया इसबात सें बिल्कुल अनजान थि। उसकेलिए आरव उसका छोटा, प्यारा भइया थां। मगरआरव केँ लिएयह नज़ारे एक् मीठी सज़ा कि तरह थें।
"अरेमार नां आरव! क्याँ सोचरहा हैं?" सोनिया नें आरव कि जांघ पर्र ज़ोर सें थप्पड़ मारा।
"हाँ। हाँ दि, माररहा हूं, " उसने हड़बड़ाते हुए स्ट्राइकर चलाया, जौ सीधा जाकरमधु कि उंगली पर्र लग गय़ा।
"आउच! पागल हैं क्याँ? अंधा हैं?" मधु चिल्लाई।
"सॉरी दि!" आरव हँसने लगा। सुप्रिया भि हँसरही थि। उससमय, उस पुराने हॉल मे, बिना बिजली केँ भि जोँ चैन औऱ प्रेम थां, वोँ दुनिया कि किसी दौलत सें नहि खरीदा जा सकता थां। आरवउन चारों कों हँसते हुएदेख रहा थां।
साम ढलने केँ बाद लाइट वापस आँ गई।
रात केँ आठबजरहे थें। घऱ मे शांति थि, मात्र रसोई सें प्रेशर कुकर कि सीटी कि आवाज़ आँ रही थि। आरव अपने कमरे मे बैठकर नोट्स बनारहा थां, तभी अचानक स्नेहा केँ कमरे सें ज़ोर सें किसी चीज़ केँ टूटने कि आवाज़ आई।
आरव घबराकर जल्दी अपनी कुर्सी सें उठा औऱ स्नेहा केँ कमरे कि तरफ भागा। सुप्रिया भि रसोई सें दौड़ती हुईँ आई।
स्नेहा ज़मीन पऱ बैठी थि। उसके चश्मे कां एक् शीशाटूट गय़ा थां।
"क्याँ हुआ स्नेहा?" सुप्रिया जल्दी उसकेपास ज़मीन पऱ बैठ गई औऱ उसे अपनेगले सें लगा लिया।
स्नेहा, जोँ हमेशा बिना किसी इमोशन केँ बात करती थि, आज एक् छोटी बच्ची कि तरहरो रही थि। "मुझसे नहि होगा दि। यह एनाटॉमी केँ पेपर्स। मे फेल हौ जाऊंगी। मुझेकुछ समझ नहि आँ रहा। मेरामन फट जाएगा। "
सुप्रिया नें स्नेहा केँ बालों मे हाथ फेरना शुरुआत किया। "पागल लड़की! तुँ हमारी सबसे होशियार बच्ची हैं। एक् टेस्ट सें ज़िंदगी समाप्त नहि होँ जाती। रोनाबंद कर। "
मधु औऱ सोनिया भि आँ गईं। मधु नें स्नेहा कां टूटाहुआ चश्मा उठाया औऱ बड़े प्रेम सें उसके आँसू पोछे। "तुम कोपता हैं? जब मे पुलिस कि ट्रेनिंग मे थि नाँ, तोँ मे राइफल पकड़कर उल्टी दिशा मे दौड़ गई थि। सभीमुझ पर्र हँसे थें। पऱ देखआज, तेरी दिदी कॉप हैं। तूँ भि डॉक्टर बनेगी, देख लेना। "
आरव दरवाजे केँ पास खड़ायह सभीदेख रहा थां। उसे स्नेहा दि कि वोँ टूटी हुइ, कमज़ोर हालत देखकर अंदर सें बहोत तकलीफ हौ रही थि।। वोँ चुपचाप रसोई मे गय़ा औऱ स्नेहा केँ लिए एक् स्ट्रॉन्ग कप कॉफ़ी बनाकर लाया।
"स्नेहा दि। यहपीलो। सभीठीक होँ जाएगा, " आरव नें कप कॉफ़ी कां मग उसके हाथों मे थमाया।
स्नेहा नें लाल आँखों सें आरव कों देखा औऱ हल्का सां मुस्कुराई। "थैंकयू आरव। "
वोँ रात थोड़ी भारी थि। सभी जल्द अपने-अपने रूम मे चलेगए।
रात केँ 1:30 बजरहे थें।
आरव कि आँखें अभि भि खुलीथीं। आजरात उसे नींद नहि आँ रही थि। स्नेहा दि कां वोँ रोताहुआ चेहरा उसकेमन मे घूमरहा थां। तभी उसके कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुला।
आरव नें गर्दन घुमाकर देखा। दरवाज़े पऱ सोनिया दि खड़ी थि। वोँ अपना तकिया लेकरआई थि।
"आरव। तुँ सो गय़ा क्याँ?" सोनिया नें ए पूछा।
"नहि दि। क्याँ हुआ?"आरव जल्दी उठकरबैठ गय़ा।
सोनिया अंदरआई औऱ द्वार (दरवाज़ा) हल्का सां सटा दिया। "दोस्त, मुझे नींद नहि आँ रही। वोँ स्नेहा केँ कमरे कां शीशा टूटा नां, मुझे अचानक सें पुरानी बातें यादआने लगीं। माँ-बापू कां एक्सीडेंट.। मे यहासो जाऊं तेरेपास?"
सोनिया कि आवाज़ मे आज वोँ रोज़ वाला बिंदासपन नहि थां। आज उसमें एक् डरी हुई छोटी बच्ची थि।
आरव कां दिल एक् तरफ तौ अपनी दिदी केँ उस दर्द कों देखकर पसीजरहा थां, पर्र दूसरी तरफ। सोनिया दि कां उसकेखाट पऱ उसकेसंग सोना.आरव केँ अंदर केँ उसदबे हुएक कों जगारहा थां।
"आँ जाओ दि, " आरव नें खिसककर पलंग पऱ स्थान बना दि।
सोनिया नें तकिया रखा औऱ लेट गई। उसने एक् पतला सां नाइट-शर्ट पहनाहुआ थां। लेटते हि उसने बिनाकुछ सोचे अपना एक् हाथआरव केँ सीने पर्र रख दिया औऱ अपना एक् पेरआरव केँ पैरों केँ ऊपरडाल दिया। बचपन सें उन भइया-बहनों कि यहीआदत थि, मगरअब आरव बच्चा नहि थां।
सोनिया कि वोँ गरम साँसें आरव कि गर्दन पऱ पड़रही थीं। उसके जिस्म कि गर्माहट औऱ वोँ खुशबू आरव केँ खून मे उबालला रही थि। वोँ सीधा लेटाहुआ थां, ताकि सोनिया कों ज़रा सां भि अंदाज़ा नाँ होँ कि उसके सीने मे कैसा तूफान चलरहा हैं।
कुछ हि देर मे सोनिया कि साँसें भारी होँ गईं। वोँ गहरी नींद मे जा चुकी थि।
अबउस अँधेरे कमरे मे मात्र आरवजाग रहा थां। उसने बहोत धीरे-धीरे सें अपनी गर्दन घुमाई। चाँद कि रोशनी मे सोनिया कां चेहरा बेहद हसीनलग रहा थां। नींद मे उसका नाइट-शर्ट थोडा सां खिसक गय़ा थां औऱ उसके गोरे, गदराए कंधे औऱ सीने कां आधा हिस्सा बाहर् झांकरहा थां।
आरव कि साँसें तेज़ होने लगीं। उसकागला सूखरहा थां। उसने बहोत हि सावधानी सें अपना दायां हाथ उठाया। वोँ सोनिया केँ कंधे कों छूना चाहता थां। उसका कांपता हुआहाथ धीरे धीरे सोनिया कि उस नंगी स्किन कि तरफ बढ़ा। उसनेबस अपनी उंगलियों केँ पोरों सें बहोत हि हल्के सें, जैसे किसी गुलाब कि पंखुड़ी कों छूते हें, सोनिया केँ कंधे कों छुआ।
वोँ रेशमी छुअनआरव केँ दिमाग़ मे बिजली कि तरह दौड़ी। उसने आँखें बंदकर लीं। उसका दूसरा हाथ स्वयं-ब-स्वयं उसके लन्ड चला गय़ा। सोनिया कां पेर अभि भि आरव केँ पैरों केँ ऊपर थां, औऱ उसकाहाथ आरव केँ सीने पऱ। इतनी करीबी, इतनी मादक उत्तेजना आरव नें पहलेकभी महसूस नहि कि थि।
वोँ सोनिया कि खुशबू कों गहरी साँसों सें अपने अंदर खींचरहा थां। वोँ बिनाकोई आवाज़ किए, बिना हिले-डुले, बस सोनिया कि गर्माहट कों महसूस करतेहुए लन्ड कों धीरे धीरे सहलाने लगा। उसे डर थां कि अगर उसने थोड़ी भि हरकत कि तोँ सोनिया दि जाग जाएंगी। वोँ अपनी साँसों कों रोककर, होठों कों कसकर दबाएहुए, एक् भयानक औऱ मीठे जुनून केँ बीचझूल रहा थां।
सोनिया नें अचानक नींद मे हल्का सां करवट लिया। उसका पांवआरव केँ थोडा औऱ लगभग आँ गय़ा औऱ उसकी जांघआरव केँ जांघ सें रगड़खा गई।
इस अचानक हुए स्पर्श नें आरव केँ बचे-खुचे कंट्रोल कों भि ख़त्म कर दिया। उसकाबदन अकड़ गय़ा। उसने अपनाहाथ कसकर मुट्ठी मे बांध लिया औऱ उसी लम्हा, सोनिया कि उस गहरी, बेखबर नींद केँ साये मे, आरव नें अपना वोँ गरम वीर्य अपने हि कपड़ों केँ अंदरबहा दिया।
अगलेकुछ मिनटों तक वोँ बसछत कों घूरता रहा। उसकी छाती तेज़ी सें ऊपर-नीचे होँ रही थि।
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