Beti Bani Sahara – New Episode
Update 52 : (चरमसुख कि शिक्षा- भाग१)
दादीमा प्रज्ञा कि गोरे गोरे मखमली रसीले टांगों पे तेल कि कुछ बूंदे टपका केँ, उसके टांगों कों हल्के हाथों सें रगड़ने लगी। प्रज्ञा कां घाघरा उस वक्त घुटने तक उठाहुआ थां।
दादीमा नें प्रज्ञा सें बोला : क्याँ जानना चाहरही हैं तूँ ?
प्रज्ञा : दादीमा यही कि दिदी कों जबमै मालिश कररही थि तौ इतना जायदा पानी क्यूं निकला उनके गुगु सें।
दादीमा : अच्छा, बेटी देख, इंसान कों कईतरह कि जरूरतें होती हैं। जैसे कि हवा, पानी, कपड़े, खानां इत्यादि। मगर एक् औऱ जरूरत हैं जौ कि हैं, सेक्स। जिसके बारे मे अब तक तूँ परिचित हौ चुकी हैं, बेशक अभि तक तूनेउसे महसूस नहि किया हैं। मगरसही वक्त पे तेरी भि वोँ एक् जरूरतों केँ सूची मे शामिल होँ होँ जाएगा, अभि तूँ छोटी हैं।
प्रज्ञा : ह्म्म्म। दादीमा मगरइन सभी सें दिदी केँ वहां सें जौ पानी निकला वोँ केसेपता चलता हैं ?
दादीमा : अरे तुँ तोँ हरबात लपक लेती हैं, मैने अपनीबात ख़त्म कहां किया थां। वही तोँ तुझेही बतारही हु।
प्रज्ञा : ओह। सॉरी दादीमा अबबीच मे नहि टोकूंगी।
दादीमा : ठीक हैं, दरअसल प्राची औऱ तेरे पिताजी केँ विवाह केँ बाद, प्राची कों सेक्स मिलना शुरुआत होँ गय़ा थां। इतना तोँ तेरी अच्छे सें पता हैं ?
प्रज्ञा : जी दादीमा, वोँ तोँ विवाह केँ पहलेदिन हि हुआ थां उन दोनों केँ बीच।
दादीमा : हाँ, बिलकुल सही, अबबात यह हैं कि प्राची प्रेग्नेंट हौ चुकी हैं, औऱ इस अवस्था मे प्राची कों सेक्स नहि करने कि सलाह डॉक्टर नें दिया हैं। इस हालत मे किसी भि महिला औऱ उसके बच्चे केँ लिए अच्छा नहि होता सेक्स करना। मगर उसकेवजह सें प्राची कां जौ सेक्स कां भूख थां, वोँ अब पूरा नहि हौ पारहा, यानि कि वोँ सेक्स नहि कररही औऱ उसे उसकीआदत हौ गई हैं। अबदेख तेरी अभि इसलिये सेक्स कि जरूरत उतनी नहि पड़ती क्यूं कि तूने अभि तक कभी भि उसको महसूस किया नहि हैं। मगर प्राची उसको महसूस कर चुकी हैं इतने दिनों बापू केँ संग। तौ अब वोँ उसकेलिए प्यासी हैं। आजजब तूनेउसे मालिश करते वक़्त छुआ होगा, तोँ उस बेचारी कां सबर कां बांधटूट सां गय़ा होगा, यानिजब इंसान काम केँ लिए प्यासा होँ तौ थोड़ी सि छुअन भि उसकेजोश कों भरका सकती हैं। तौ प्राची केँ संगयही हुआ। वोँ अपने उद्वेग पे काबू नहि रखसकी औऱ तेरे हाथों सें इसके पैरों कों सहलाने केँ कारण उसकाकाम संतुष्टि अनायास हि पूरी हौ गई। औऱ वोँ झर गई। इसलिये उसके योनि सें इतना सारा पानी निकला। जोँ तुम्हारी तरफ नहि निकलता अभि तक।
प्रज्ञा एकदमदंग रह गई दादीमा कि इसतरह कां जवाबसुन केँ। उसकी जिज्ञासा अब बढ़नेलगी थि।
प्रज्ञा : दादीमा, यहझर जानां क्याँ होता हैं। अपने पहले तोँ मुझे नहि बताया थां ?
दादीमा : नहि शायद मैने तुझेही यह बताया होगा, जब मे तुझेही उस, बापू औऱ दिदी, केँ सुहागरात वालेरात कों सभीबता रही थि। जब सेक्स करते वक्त इंसान चरमसुख पे पहुंच जाता हैं तौ उसकेयौन अंगों सें रस याँ पानी निकलता हैं। वोँ पेशाब नहि होता। वोँ होता हैं कामरस। वोँ औरत कों औऱ पुरुष दोनों कों निकलता हैं। पुरुष वहीकाम रसजबऔरत केँ बच्चेदानी मे भरता हैं तौ औरत कों सन्तान कि प्राप्ति होती हैं बेटी।
प्रज्ञा : अच्छा हां दादीमा, अपने तौ बताया थां। मगर दादीमा अपने एक् शब्दकहा, " चरमसुख ", वोँ क्याँ होता हैं दादीमा ?
दादीमा कां हाथ प्रज्ञा केँ पैरों पे तेल कि चिकनाई पा केँ अच्छे सें फिसलरहा थां। प्रज्ञा कि बेहदचैन कि अनुभूति होँ रही थि।
दादीमा : अब तेरी मे चरमसुख केसे समझाऊं बेटी? वोँ तौ महसूस करने कि चीज़ हैं। वोँ एक् ऐसा अनुभव हैं, कि जब एक् इंसान यौन क्रिया कों करताहुआ उसकेअंत तक पहुंचता हैं, औऱ उसके जिस्म एक् अलग सां चैन याँ आनंद सें भर जाता हैं। जिस्म मे अकड़न सि आँ जाती हैं। औऱ यौन अंगों सें रस कि धार निकलने लगती हैं। तोँ उसे जोँ मजा कि अनुभूति होती हैं, वहीचरम सुख होता हैं बेटी। शायदजब तूँ अपने आप् कों कभी योनि पे हाथों याँ अंगुली सें रगड़ती होगी, तोँ जौ तुँ महसूस करती होगीवही चरमसुख होता हैं।
प्रज्ञा केँ लिएयह बातनई थि। दिक्कत यह थां कि आज तक उसनेकभी भि चरमसुख महसूस हि नहि किया थां। जीहाँ, 18 साल कि होने केँ बावजूद भि, उसेचरम सुख कां खुशीआज तक नहि मिला थां। दादीमा कों लगरहा थां कि प्रज्ञा जवान हैं तौ उंगली कर केँ अपने आप् कों सन्तुष्ट तौ करती होगी, क्योंकि यह बहोत हि साधारण सि बात हैं एक् जवान लड़की याँ लड़के केँ लिए। मगर प्रज्ञा इतनी नादान हैं, यह दादीमा कों नहि पता थां। इतने मे हि दादीमा नें मालिश करतेहुए, प्रज्ञा केँ जांघों पे भि मालिश करनेलगी थि औऱ उसका घाघरा उसकेकमर तक चढ़ गय़ा थां यानी उसकी भि पैंटी अब दादीमा कि नज़र आनां शुरुआत होँ गय़ा थां।
प्रज्ञा : पर्र दादीमा मैने तौ कभी भि ऐसा नहि किया हैं। मैनेवहा केँ अपने हाथों याँ उंगली सें उसतरह सें नहि छुआ हैं। बस नहाने टाइम याँ शौच केँ बाद, साफ करने केँ टाइम हि हाथ लगती हूं।
दादीमा नें सोचा : क्या बात है रामयह लड़की कितना नादान औऱ भोली हैं, 18 कि तौ गई हैं, इसेइस अब कां पता तौ होना हौ चाहिए। जवान हौ गई औऱ अभि तक चरमसुख कां च भि भि जानती यह लड़की। मुझे इसकी दादीमा औऱ गार्डियन होने केँ नातेइसे यहसभी कां ज्ञान देना हि पड़ेगा, नहि तोँ कल कों इसकी विवाह होगी तोँ इसे तोँ कोई ज्ञान हि नहि होगा इन्सान केँ बारे मे, तौ यह पति कों खुश केसे करेगी।
दादीमा प्राची कि पैंटी पे गौर सें देखरही थि।
उसे ताजुब हौ रहा थां कि उसकी एक् पोती अब प्रेगनेंट हौ चुकी हैं जौ सिर्फ 19 साल कि हैं, औऱ एक् पोती 18 कि होँ गई औऱ वोँ अभि तक चरमसुख कां अनुभव भि नहि कि हैं। एक् साल कां कि तौ गैप हैं दोनों मे। दोनों कि जीवन अभि भि कितनी अलग हैं। एक् सेक्स खेल कि पारंगत खिलाड़ी बन चुकी हैं औऱ एक् तोँ अभि वोँ खेल याँ खेल कां मज़ा तक नहि जानती। प्रज्ञा केँ पैंटी केँ पतले कपड़ों केँ पीछे एक् ऐसाचुत थां जोँ अभि तक अन्छुई थि। उसेअब तक कोई पुरूष तोँ छोड़ो, स्वयं प्रज्ञा नें भि नहि छुआ थां।
दादीमा मालिश करती हुईँ : अरे मेरी बच्ची, तूँ तोँ बारी हि शरीफ औऱ भोली बच्ची हैं मेरी। तेरे चुलबुली स्वभाव कों देख केँ कोई नहि कहेगा कि तुँ इतनी अधिक हि भोली हैं। तेरी एक् बार तोँ अपने आप् कों वहाछू केँ चरमसुख स्वयं केँ केँ देख्ना चाहिए। उसकेबाद हि तौ तुम्हारी तरफपता चलेगा कि वोँ होता क्याँ हैं औऱ कितना आनंद मिलता हैं।
प्रज्ञा एकदम हि कन्फ्यूज होनेलगी थि : दादीमा, मै वहांछू लूँ तौ मुझेचरम सुख केसे मिलेगा ? वहा तौ मे रोज़ छूती हि हु नहाने केँ वक्त। उस वक्त तोँ मुझेऐसा कुछअलग सां, याँ आनंदआने जैसा नहि लगता ?
दादीमा : अरे मेरी भोली पोती रानी, छूने कां मतलबउसे तेरी अच्छे सें मलना होगा, उंगलियों सें अपने योनि केँ दाने कों छेड़ना होगा। अपने योनि केँ पंखुड़ियों कों तब तक सहलाना होगा, जब तक तौ उत्तेजना केँ सीमा पे नां पारकर लेँ।
प्रज्ञा केँ पल्ले यहसभी कुछ क्लियर रूप सें नहि पऱ रहा थां। वोँ बहोत कन्फ्यूज हौ गई थि कि दादीमा कहना क्याँ चाहरही थि। दादीमा नें भि उसके चेहरे केँ हाओ-भाव सें यहपढ़ लिया थां कि प्रज्ञा कों कुछसमझ नहि आया।
दादीमा : बेटी एक् बार मेरेकहे अनुसार करेगी तौ सभीसमझ आँ जाएगा। जब भि अपने कमरे मे अकेली रहोगी ट्राई करना।
प्रज्ञा : दादीमा, मुझे तौ पता हि नहि चलरहा हैं कि किसतरह सें मुझे अपने चूत कों छूना हैं।
दादीमा मन मे : अरे क्याँ वला हैं यह लड़की भि, इतनी नादान हैं कि कुछसमझ हि नहि रही। लगता हैं इसकोआज सबकुछ मुझे हि सीखना पड़ेगा।
दादीमा : ठीक हैं, तुँ टेंशन मत लेँ। एक् बातबता, तुम्हे मुझ सें किसीतरह कि शरम तौ नहि हैं नाँ?
प्रज्ञा : आपसे कैसाशरम दादीमा ?
दादीमा : ठीक हैं, तोँ एक् कामकर, आज तुम्हें मे स्वयं सिखा देतीहु कि चरमसुख कां मजा क्याँ होता हैं।
प्रज्ञा एकदम एक्साइड हौ गई : जी दादीमा, थैंक्यू।
दादीमा : चलठीक हैं, एक् कामयह कर कि अपनीयह पैंटी खोल।
प्रज्ञा सहम सि गई : दादीमा, यह क्यूं ?
दादीमा : इसीलिए पूछा थां न् कि तुम कोमुझ सें शरम तौ नहि आती, तूने बोला थां नहि आती, तब हि मैनेयह बोला तुमसे करने कों। मैने वैसे भि तेरा सबकुछ बच्चे सें हि देखाहुआ हैं, औऱ 14 साल कि जब तुँ थि, तब तक तोँ मे हि नहलाती थि तेरी, उस टाइम तक सभी देखती थि मे तेरा, तेरे योनि पे जब पहलीबार वोँ छोटे छोटेबाल आये थें, वोँ भि मैने देखेहुए हैं, अब तुझेही शरम आँ रही, तौ छोड़दे।
प्रज्ञा : नहि नहि दादीमा, खोलती हूं मै, आप् नाराज़ मत होइए।
आपनेसही समझा, दादीमा आज प्रज्ञा कों चरमसुख कि ट्रेनिंग याँ सीख, जौ भि कह लीजिए, देना चाहती थि।
प्रज्ञा नें दादीमा केँ कहे अनुसार अपनी पैंटी कों खींच केँ निकल केँ नीचेकर दिया।
दादीमा केँ सामने प्रज्ञा अबकमर सें नीचे नंगी पड़ी हुई थि। दादीमा प्रज्ञा कि अवलोकन करनेलगी।
दादीमा : प्रज्ञा, मेरी बच्ची, एक् कामकर, ऊपर कां भि उतारदे कपड़े, तब असली मज़ा मिलेगा तुझेही।
प्रज्ञा दादीमा केँ बातों कों टालना नहि चाहती थि तौ उसने दादीमा केँ कहे अनुसार अपनेटॉप औऱ ब्रा भि उतर केँ बगल मे रखदिए।
प्रज्ञा दादीमा केँ सामने पूरी कि पूरीनंग धरग हौ गई थि।
दादीमा : जरा अपनी योनि मेरेतरफ कर, जरा देखूं तेरी कुंवारी योनि कों। प्रज्ञा दादीमा केँ सामने अपने चारों पैरों पे डॉगी स्टाइल मे आँ गई औऱ दादीमा केँ सामने अपने खुली जवानी कों परोस दिया।
प्रज्ञा कों अपने खुलेपन कां एहसास होँ रहा थां। दादीमा प्राची कि बुर कां अवलोकन करनेलगी।
प्रज्ञा कि योनि एकदमकसी हुईँ थि। लंबी सि बुर कां मुहाना जौ सीप कि तरह एक् दूसरे पंखुड़ियों सें चिपकी हुइ थि। बुर प्रज्ञा कां, झांटो सें युक्त थां, मतलबसाफ थां उसने अभि तक चुत केँ बालों कि सफ़ाईअब तक नहि कि थि। दरअसल अभि तक उसेऐसा करने कि जरूरत हि नहि थि। उसेकिन साल पुरूष देखने याँ भोगने वाला थां। योनि केँ ठीकऊपर, गांड कां टाइटछेद कसावट सें आसपास कि चमड़ी कों अंदर कि तरफ खींचे हुए थां, जैसे उसके गांड़ कां छेद अपनेअगल बगल केँ चमारी कों अपने अंदर ब्लैक होल केँ तरह खींच लेना चाहता हौ।
दादीमा नें प्राची सें बोला : बेटी, ऐसे नहि, तुँ चित्त हौ केँ लेटजा नां।
प्रज्ञा नें बिल्कुल ऐसा हि किया औऱ उठ केँ पीठ केँ बललेट गई।
प्रज्ञा हल्का छिछक, थोडा शरम औऱ थोडा घबराहट केँ संग, अपने दादीमा केँ सामने एक् शिष्या कि तरह, चरमसुख कि शिक्षा लेने केँ लिए लेती हुइ थि।
दादीमा : ह्म्म्म.बेटी तुँ तौ अब बहुत जवान हौ गई हैं। देख तेरा यौवन कैसाखिल गय़ा हैं। तेरे मम्मों भि ठीकठाक साइज केँ हौ गए हैं, मतलब किसी पुरुष केँ दबाने लायक हौ चुके हैं। तेरे चूचक भि उभर केँ बाहर् निकलगए हैं। तेरी योनि पे यह बारे बारे रेशमी बाल भि तेरी जवानी केँ दहलीज कों छूने कि गवाही देरहे हैं। चलअब अपना उंगली सें अपने योनि पे रख केँ उसे सहला आराम आहिस्ता।
प्रज्ञा : केसे सहलाना हैं दादीमा, आप् एक् बारबता दो नाँ।
दादीमा कों आज एक् अच्छी शिक्षिका बनाना थां।
दादीमा : ठीक हैं, मै तेरे योनि कों एक् बार सहला केँ दिखाती हु कि तुम्हें इससे केसे सहलाना हैं।
प्रज्ञा : ओके दादीमा।
दादीमा प्रज्ञा केँ योनि पे अपने उँगली कों हल्के सें छुआ। प्रज्ञा एकदम सें दादीमा केँ उंगलियों कां स्पर्स पा केँ चिहुक गई। उसके मुंह सें एक् अहह निकल गई।
यह एहसास उसकेलिए नया थां।
दादीमा : एक् कामकर जब तक मे ये तेरे योनि कों सहलारही हिल, तूँ अपने दोनों अंजुलियों सें अपने दोनों चूचों कों भींच केँ पकड़ लेँ औऱ हल्के हल्के दवाएं कां कोशिश कर मेरी बच्ची।
प्रज्ञा नें वैसे हि किया। स्वयं सें हि अपनी चूंचीयो कों अपने हथेली मे भर लिया औऱ हल्के हल्के दबाने लगी।
too be continued.
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Update:53 (चरमसुख कि शिक्षा - भाग२)
दादीमा केँ आदेशानुसार, प्रज्ञा केँ दोनों हाथ उसके नंगी उभारों पे अठखेलिया कररहे थें। आजउसे पहलीबार अपने आप् सें हि लज्जा आँ रहीं थि। उसने तौ कईकईबार अपने उभरते स्तनों कों छुआ थां, जैसे कि नहाते टाइम, याँ कपड़े पहनते वक्त, पर्र आज तक ऐसा एहसास शायदउसे मिला नहि थां। उसे उसके उभार अपने छूने सें हि ऐसेतने हुए महसूस हुए, जैसेनया यौवन केँ दोफुल उसके छाती पे खिल गय़ा होँ।
दादीमा नें अपने छोटी पोती कि योनि कों देखा।
दादीमा कां मुँह खुलारह गय़ा। बला कि हसीन। प्रज्ञा अपने बेहन प्राची सें भि सुन्दर थि यह तौ सबकोपता थां, मगर प्राची केँ बदन केँ मुकाबले प्रज्ञा कां कच्ची काली जैसाबदन, प्राची सें बहोत अधिक मादक थां। उसे मादक तौ यह भि बनाता हैं नां कि अभि तक कोई भँवरे नें प्रज्ञा जैसेकली पे बैठ केँ इसकारस नहि चूसा थां।
दादीमा नें तौ प्राची कि भि योनि दर्शन, विवाह करवाने सें पहले औऱ सुहागरात मे लिंग द्वारा चिथारे जाने केँ बाद कि थि, औऱ आज दादीमा अपनी छोटी पोती कां योनिदेख रही थि। योनि कि बातकरे तौ प्रज्ञा कि योनि एकदमकसी हुइ थि। प्रज्ञा केँ योनि कों, उसकेझाट केँ बालों नें, पूरी कोशिश केँ संग, अपने काले औऱ घने जंगलों मे, छुपाई हुइ थि। बसचुत केँ चिरान केँ कुछभाग, उनघने जंगलों केँ बीच सें, छिपाहुआ, बाहर् झाँकपा रहा थां। दादीमा नें प्रज्ञा केँ झांटो कों अपने हिलती हुईँ हाथों सें हटा केँ, प्रज्ञा केँ नव यौवन योनि कां नजारा देख्ना तय किया।
दादीमा नें ऊपर देखा तोँ प्रज्ञा कि आँखेबंद होँ चुकी थि, औऱ उसके दोनों हाथ, उसके स्तनों पे इधर सें उधर फिसलरहे थें। दादीमा नें प्रज्ञा केँ झाटो कों अपने हाथों सें थोडा हटाया औऱ फिनजा केँ दादीमा कों अपने प्यारी छोटी पोती कां चुत देखने कों मिला।
दादीमा एक् सुंदर लड़की कि हसीन योनि दरवाज़ा देखरही थि, जौ लड़की उनकी छोटी पोती थि। दादीमा नें प्रज्ञा कां योनि दरवाज़ा केँ अंदर कां नज़ारा देख्ना चाहा। दादीमा इसतरह सें यह भि देख्ना चाहरही थि कि प्रज्ञा कॉलेज मे कहीं बुरी संगत मे आँ केँ अपना कौमार्य तौ भंग नहि करआई। दादीमा नें देखा कि प्रज्ञा केँ योनि दरवाज़ा केँ योनो पाटेआपस मे चिपके हुए थें। दादीमा नें अपनेहाथ सें हि होनी पंखुड़ियों कों अलगकर केँ फुल कां दीदार करने कां सो हैं, मगर एक् जवान लड़की कां चुत इतना टाइट कि वोँ हलके सें प्रैशर सें खुल हि नहि पाया। दादीमा नें प्राची केँ झांटो कों पकड़ केँ जोर सें खींचा औऱ तबजा केँ कही उनको प्रज्ञा केँ सीलपैक अंदुरूनी योनि कां दर्शन नसीबहुआ।
योनि किसी खिलाहुआ फ़ूल कां गुलदस्ता जैसालग रहा थां। योनि केँ ऊपर केँ भाग मे, घनेबाल, बालों केँ बीच सें झांकती हुई चुत, चुत कां बाहरी हिस्सा हल्का सां भूरे औऱ कालीरंग कां मिश्रण लिएहुए थां। उसी भूरे थरथरे हुए योनि दरवाज़ा केँ बीच, गुलाबी रंग कि सिलपैक चुत कां मुहाना। वाउ, अदभुत। प्राची केँ मुकाबले प्रज्ञा वाक़ई सुन्दर थि।
माफ़ चाहता हु.एपसोड शुरुआत करते हि। लिखने कां मूडचला गय़ा। औऱ भाग बहोत हि छोटारह गय़ा.अब बिनामन कां लिखना सही नहि रहेगा.जब तक मैऐसा स्वयं, महसूस कर केँ, नां लिखूं, तबतक तौ आपको भि मज़ा नहि आने वाला.वादा करता हूं, कि अगलानया एपसोड बहोत जल्द आपको दूंगा।
शुक्रिया।
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Update :54(चरमसुख कि शिक्षा - भाग३)
प्रज्ञा, दादीमा केँ द्वारा यूँ उसके झांटो कों कस केँ खींचे जाने सें चीत्कार भरउठी। उसकारोम रोम एक् बहोत हि नया एहसास सें भर गय़ा, जिसे शायद उसनेआज तक कभी महसूस हि नहि किया थां। दादीमा नें प्रज्ञा केँ योनि कां अवलोकन बहोत हि अच्छा सें किया, औऱ दादीमा अपने आप् कों आश्वस्त कर चुकी थि कि उसकी छोटी पोती कां कौमार्य एकदम सुरक्षित हैं, ओरउसे अभि तक किसी नें भंग नहि किया हैं। आपको तोँ याद हि होगा कि दादीमा नें प्राची कि विवाह सें पहले भि यह देखा थां कि वोँ असली कुँवारी हैं याँ नहि औऱ उसने भि अपने दादीमा कों उदास नहि किया थां।
दरअसल दादीमा मानती हैं कि लड़कियों कां सबसे बड़ा तौफा, जौ वोँ अपने पति कों दे सकती हैं, वोँ हैं उनका कौमार्य कां भेंट। वोँ लड़कियों कि पवित्रता कि निशानी जैसा थां उनकेलिए। दादीमा कों दोनों पोती पे पूरा विश्वास थां, कि उनकी पोतियां बाहर् कभी भि ऐसाकाम नहि करेगी, जिससे घऱ कि बदनामी होँ जाए। औऱ दोनों पोती उनकेइस विचार पे खरे उतरी थि।
दादीमा अभि अपने छोटी पोती कि मालिश कररही थि, जोँ कि अब उनके सामने पूरी नंगी तोँ होँ हि चुकी थि। प्रज्ञा कां जिस्म दमकरहा थां। दादीमा कां मानना थां कि यहदमक एक् कुंआरी लड़की कां हि हौ सकता हैं। जौ लड़कियां सेक्स करने लगती हैं, उनमें यह नयापन औऱ यह दमकदार अंदाज कम हौ जाता हैं।
दादीमा प्रज्ञा केँ जननांग केँ पाटों कों अब ढीला छोड़ दि थि। दादीमा नें जैसे हि प्राची केँ झांटो कों छोड़ा, उसके बुर कि पंखुड़ियां आपस मे फिन सें मिल गई औऱ पाटाबंद होँ गय़ा। दादीमा नें अबतेल अपने हथेली मे सीसी सें थोडा सां उड़ेला औऱ प्राची केँ योनि केँ अगलबगल केँ केँ अंदरूनी अंगो मे लगाने लगी, उसके जांघों सें लेँ कर, प्रज्ञा केँ नाभि तक, दादीमा नें प्रज्ञा कि जम केँ मालिश किया। बीचबीच मे दादीमा कि उंगलियां भि प्राची केँ घने काले झांटो मे फंसजा रहे थें।
दादीमा नें प्रज्ञा सें बोला : मेरी बच्ची, कैसा लगरहा हैं ?
प्रज्ञा: ( आँखे मूंदे हुए ) : दादीमा, आपके हाथों मे चमत्कार हैं। बहोत आनंद औऱ चैनमिल रहा हैं दादीमा।
दादीमा : अच्छा मेरी बच्ची, इन बड़े बालों कों क्यूं नहि काटती तूँ ? यह तुझेही बर्दाश्त केसे होते हैं ? गर्मी मे तोँ इतना खुजली देता हैं यह, कि पूछोमत, फिन भि तेरे योनि पे इतनेबाल, क्यूं बेटी ?
प्रज्ञा केँ लिएयह प्रश्न थोडा उसके चेहरे पे सावलिया निशान हि दे गय़ा : क्यूं दादीमा, इसे कटनी भि परति हैं क्याँ ? मुझे तौ पता हि नहि थां।
दादीमा : हाँ, बेटी यह अपनी अपनी चॉयस हैं। कई लड़कियां काट भि लेती हैं, औऱ कई नहि भि, मगर मेरे हिसाब सें तौ, यह स्थान तुँ जितना साफ रखेगी उतना हि अच्छा रहेगा नां। अपना हाइजिन भि तोँ कोईचीज होती हैं नां। औऱ तोँ औऱ, यह अधिकतर मर्दो कों साफ़ सुथरी हि मनपसंद होती हैं।
प्रज्ञा : ओहओक दादीमा, फिनमै इसेसाफ कर लूंगी।
दादीमा : ठीक हैं बेटी।
प्रज्ञा : पऱ दादीमा यहसाफ केसे करना होगा ? कैंची सें, तौ एक् एक् कर केँ, इतनाघना बाल काटने मे तोँ कितना वक्त जाएगा।
दादीमा : अरे बाबू, तुँ चिंता मतकर, यह तोँ रेजर सें २ मिनट मे साफ हि जाएंगे।
प्रज्ञा : ओह, वोँ बापू जौ दाढ़ी बनाने केँ लिए इस्तेमाल करते हैं।
दादीमा : हां वैसा हि, तेरे दिदी कों भि मैने विवाह सें पहले एक् दिलवाया थां। उसे तेरे पिताजी केँ लिए अपनी योनिसाफ रखनी होती हैं नां, ताकि पिताजी औऱ दिदी केँ संभोग केँ वक्त, उन्हें कोई तकलीफ़ नाँ हौ, लड़के कों योनि चाटना बहोत पसन्द होता हैं, अगर योनिसाफ नहि रहेगी तौ वोँ केसे चाटेंगे।
प्राची : ओहओक दादीमा, फिनमै दिदी सें रेज़र लेकेसाफ कर लूंगी। औऱ दादीमा क्याँ बापू नें भि दिदी कि योनि चाटी होगी।
दादीमा : ठीक हैं, मगर पहलीबार किसी सें सहायता जरूर लेना, दिदी सें याँ मुझसे भि केँ सकती हैं, एक् बार मे बता दूंगी तोँ फिन आसानी सें तूँ स्वयं कर पाएगी। औऱ शायद तेरे बापू नें जरूर हि तेरे दिदी कि योनि चाटी तौ होगी, ३ महीने सें संभोग हौ रहा थां दोनों केँ बीच, तोँ यह तौ जरूरहुआ होगा।
प्रज्ञा : वाउ दादीमा तब तोँ दिदी बहोत लक्की हैं नां, ठीक हैं मे बालों कि सफाई आपसे कि करवा लूंगी, लेकेआऊं क्याँ रेजर ?
दादीमा : अरे नहि नहि, मैने तोँ तुझेही बाद मे करने केँ लिए बोला हैं। अभि तोँ तेरी मालिश कर देतीहु।
प्रज्ञा : जी दादीमा, जैसा आप् ठीक समझे।
दादीमा दुवारा अपनेकाम मे लग गई औऱ दादीमा केँ हाथ प्रज्ञा केँ जांघों सें फिसलते हुईँ उसकी योनि केँ तरफ जानेलगी।
दादीमा नें पहलीबार प्रज्ञा केँ चुत कों एक् हल्का सां स्पर्श किया। प्रज्ञा तोँ मानोइस तरह किसी दूसरे कां हाथ अपने बुर पे महसूस कर केँ गिनगिना सि गई। उसके मुंह सें एक् अहह। निकल गय़ा।
अबजा केँ प्रज्ञा समझ गई थां कि, जब वोँ दिदी कि मालिश कररही थि, तौ कैसा अनुभव हुआ होगा उन्हें। वोँ एकदमठीक वैसा हि महसूस कररही थि। उधर दादीमा अपने पोती कों आज एक् नए ज्ञान सें अवगत करने कां कोईकसर नहि छोड़ने वाली थि।
दादीमा नें अब प्रज्ञा केँ योनि केँ, ऊपरउठे फूलान पे, अपनेहाथ पहुँचा दिये औऱ उसेतेल सें हल्का सां तरकर केँ, एकदम मद्धम मद्धम मसाज़ करनेलगी।
प्रज्ञा एकदम हि बावरी सि होँ गई थि। उसकामन एक् अलग मादकनसे सें भर गय़ा थां, औऱ उसके आंखों मे लाल डोरेउभर आए थें। सांसे भि अनियंत्रित होँ गए थें औऱ उसके छाती पे उगे नए-नए, फुले-फुले, गोल-गोल दोफूल, हर गहरी सांसों केँ संग हि ऊपर-नीचे होनेलगे। दादीमा प्रज्ञा कां जोश महसूस करपारही थि। दादीमा नें देखा कि प्रज्ञा केँ योनि दरवाज़ा फड़कने लगे थें। अब दादीमा नें पोती कों चरमसुख कां मजा देने कां पूरामन बना लिया थां।
दादीमा प्रज्ञा केँ योनि केँ दाने पे अपनेहाथ लेँ गई औऱ उसे अपने चुटकी मे भर केँ, दादीमा नें थोडा दबाया। इससे प्राची एकदम चीत्कार उठी। एक् सि। सि सिसकी उसके मुंह सें निकली जौ पूरे कमरे मे गूंज गई। दादीमा प्रज्ञा केँ सारे हाव-भाव देखरही थि। शायद दूसरी कोईऔरत होती, औऱ वोँ लेस्बियन नहि भि होती, फिन भि वोँ प्रज्ञा केँ हुस्न मे फिसल जरूर जाती। मगर दादीमा इतना संयम रखनाअब सीख गई थि। वैसे भि अब उसकी उम्र मे यहसभी उसे शोभा भि नहि देता।
दादीमा अब अपने पोती केँ योनि दरवाज़ा कों अच्छे सें तेललगा केँ ऊपर सें नीचे तक अपने उंगलियों सें छेड़रही थि। प्रज्ञा भाग्यशाली थि कि उसका पहला फिंगरिंग करना, उसे एक् बहोत हि अनुभवी हाथों सें होँ रहा थां। प्रज्ञा कां जीअब उसके काबू मे नहि थां औऱ अलगतरह सें मचलने लगा। यह एक् नया एहसास थां उसकेलिए। दादीमा अपनाकाम शिद्दत सें कररही थि। प्रज्ञा केँ घने काले झांटो केँ बीच छुपे योनि कों दादीमा नें ढूँढ निकल थां औऱ अब बुर केँ संपूर्ण चिरान पे दादीमा कां उंगली नाचने लगा थां। दादीमा कां वश चलता तोँ वोँ, प्रज्ञा केँ योनि मे अपना उंगली डाल केँ उसे चुदाई कां मजा याँ एक् टयूशन दे देतीमगर उन्होंने ऐसा नहि हैं क्योंकि वोँ जानती थि कि प्रज्ञा अभि सीलपैक लड़की हैं, औऱ उंगली भि उसके योनि मे घुसने सें उसका कौमार्य भंग नाँ होंजाए, इसलिये वोँ थोडा ध्यान रखरही थि।
दादीमा अपने अंगुलियों कों प्रज्ञा केँ योनि पे अब बहोत जोरों सें रगड़ने लगी। दादीमा थोडा थोडा योनि केँ मुहाने पे उंगली सें प्रेशर भि बनारही थि, ऐसेलग रहा थां जैसे प्रज्ञा कि चुदाई हौ रही हौ। हांमगर ध्यान भि रखरही कि उनके उंगली सें हि प्रज्ञा कि सील न् टूटजाए।
प्रज्ञा कों तोँ बस इतनापता थां, कि उसनेऐसा कभी महसूस नहि किया, औऱ अभि जौ वोँ महसूस कररही हैं, वोँ शायद दुनिया कां सबसे अच्छा एहसास होँ रहा थां उसकेलिए।
दादीमा अपने पोती केँ चेहरे पे बदलती हाव - भाव पढ़तीजा रही थि। वोँ करीब-करीब अब१० मिनट सें प्रज्ञा केँ गुप्तांग अच्छे सें मलमल केँ मालिश कररही थि। उसकाआँख अचानक हि आधाबंद औऱ आधा खुला जैसा हौ गय़ा, औऱ प्रज्ञा केँ आँखों केँ पुतलियां एकदमऊपर हौ गई। औऱ प्रज्ञा कां पूराबदन थरथराने लगा थां। दादीमा कों आशंका होँ रहा थां, कि अब प्रज्ञा अपने जिंदगी मे पहलीबार चरमसुख प्राप्त करने केँ कगार पे आँ चुकी हैं। प्रज्ञा नें अपने मुट्ठी सें बेड कों, अपने हथेली सें, भींच केँ ज़ोर सें पकड़ लिया थां। प्रज्ञा अचानक हि चिल्ला उठी औऱ एक् मूत केँ धार जैसा फव्वारा उसेचुत सें छूट पड़ा। वोँ प्रज्ञा कां कामरस थां। जीहाँ प्रज्ञा स्क्वाट कर सकती थि।
उसके योनि सें इतना अधिकरस निकला कि दादीमा कां साड़ी, उनकाबेड शीट औऱ यहा तक कि, कुछ बूंदे दादीमा केँ मुंह पे भि पऱ गय़ा। प्रज्ञा कमरउठा उठा केँ हिलकोरे खानेलगी। दादीमा कां पुराखाट हि गीला हौ गय़ा औऱ प्रज्ञा केँ योनि सें फचफ़चा केँ सफेदगढ़ा तरल भि निकला। प्रज्ञा इतना छटपटाने केँ बाद शांत होँ गई। पहलीबार आजउसे अपने गुप्तांग कां सही मतलब याँ उसका आनंदसमझ आया थां। प्रज्ञा केँ चेहरे पे एक् बहोत सकूनभरा शान्ति साफ़झलक रहा थां। प्रज्ञा, जीवन मे पहलीबार झड़ चुकी थि।
अगलाभाग जल्द हि.
Beti Bani Sahara - Next part miss mat karna
मे कोशिश करूंगा कि हरदिन एपसोड दु,मगर काम केँ वजह सें टाइम निकालना थोडा मुश्किल हैं , मगरजब भि वक्त मिलेगा , एपसोड जरूर दूंगा। आपका शुक्रिया।
मे कोशिश करूंगा कि हरदिन एपसोड दु,मगर काम केँ वजह सें वक्त निकालना थोडा मुश्किल हैं , मगरजब भि टाइम मिलेगा , भाग जरूर दूंगा। आपका शुक्रिया।
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