झिलमिल ओढ़नी – New Episode
23rd पन्ना
क्याँ पहना जायेकुछ समझ नहि आँ रहा। तौलिया बांधकर अलमारी केँ सामने खड़ा भानुसोच मे डूबा थां। सुषमा नें जौ कपड़े भानु केँ लिए खरीदे थें वोँ उस भानु केँ लिए थें जोँ पतला, कमज़ोर औऱ मरियल सां थां, जौ भानु बाहर् आया उसकावजन करीब दोगुना होँ गय़ा थां, छाती पहलवानो सि थि औऱ कोई भि कमीज याँ पतलून पहन पाना असंभव थां। मुश्किल सें एक् जोड़ी मिली जौ स्ट्रेचेबल थि थोड़ी, सौभाग्य सें उसकेसंग कां कोट भि मिल गय़ा। सुषमा कि सख्त हिदायत थि कि आज जोँ इंसान बिज़नेस सँभालने जारहा हैं वो ठाकुर खानदान कां इकलौता चिराग हैं इसलिये लगना भि चाहिए। बालबना लिए पऱ एक् चीज कि कमीलग रही थि, भानु कों समझ नहि आँ रहा थां कि वो क्याँ हैं तभी अचानक दिमाग़ मे आता हैं कि टाई नहि बाँधी हैं। वहांरखी 5-7 टाईयों मे सें एक् कपड़ो पर्र जचने वाली मिलती हैं पर्र समस्या थि कि उसे पहना केसे जाये, भानु नें जिंदगी मे कभी नहि पहनी थि। थकहार कर अपनी मां कों आवाज़ देता हैं जौ बड़ाघऱ होने केँ कारण गूंजकर पहुंच जाती हैं सुषमा केँ पास, वो भागी भागीआती हैं क्यूंकि सुषमा केँ पांवआज ज़मीन पऱ नहि लगरहे थें, बेटे द्वारा सुभह सुभह इतना प्रेम दर्शाने कां नतीजा थां जौ कि वो गाने गुनगुनाते कामकर रही थि औऱ जब भानु केँ कमरे मे पहुँचती हैं तोँ अपने लाडले कों एक् छोटी सि टाई केँ संग माथापच्ची करतेहुए पाती हैं।
मुस्कुराते हुए वो भानु केँ पास पहुँचती हैं औऱ उसकेहाथ हटा देती हैं तथा स्वयं बाँधने लगती हैं। एक् मिनट सें भि कम वक़्त मे टाई बांधकर उसेसही करती हैं। यूँ अपने लाडले केँ सामने ख़डी होनाउसे याद दिलाता हैं केसे वो अपने पति कों रेडी करती थि। भानुटाई बंधते हि अपनेहाथ सुषमा कि नाजुक कमर पऱ रखता हैं औऱ माथे पर्र चूमता हैं।
“अबलगरहा हैं भानेश्वर ठाकुर” कहतेहुए सुषमा कि आँखों मे गर्व थां, “लगता हैं तेरे सारे कपड़े छोटे लें आई” सुषमा कहती हैं तोँ भानु मुस्कुराता हैं
“हां मां, बसयह एक् जोड़ी हि स्लिम आई हैं”
“मुझे क्याँ पता थां मेरा लल्ला इतना लम्बा चौड़ा होकर बाहर् आएगा” सुषमा हंसती हैं तोँ भानु भि हंस देता हैं
“हाँ जैसे तूँ एकदम पतली हैं” जवाब मे भानु सुषमा कों गुदगुदी करती हैं तोँ वो बहोत जोर सें हंसती हैं औऱ भानु केँ हाथ झटकती हैं
“मामाजी कि हरबात मानना, लोगों कां ध्यान रखना” सुषमा चिंता व्यक्त करती हैं
“हम्म, तुँ चिंता मतकर, जैसाभेज रही हैं वैसा हि वापिस आऊंगा”
“चुपकर गधे, कुछ भि बोलता हैं” भानु हँसता हैं औऱ फिन अंतिम बार सुषमा कां माथा चूमता हैं। ब्रेकफास्ट करके गाड़ी मे बैठता हैं औऱ चल पड़ता हैं।
बिल्डिंग केँ सामने पहुंच कर देखता हैं कि वंहा काफ़ीभीड़ हैं। अनेक मीडिया वाले भि आयेहुए थें। गाड़ी रुकते हि भानु ओमकार सें यंही रहने कां बोलता हैं तभी पर्वत सिंहदो सिक्योरिटी गार्ड केँ संग गाड़ी केँ पास पहुंचता हैं। भानु निचे उतरकर पर्वत केँ पेर छूता हैं। मीडिया वाले भागकर उनकेपास आते हैं औऱ बिनाकोई समय गवाएं सवालों कि झड़ीलगा देते हैं जिनमे ऐसे प्रश्न भि थें जोँ भानु कों दुविधा मे डाल देते हें, जैसे उससे पूछाजा रहा थां कि उसके पिता कों गुजरे हुए 2 हफ्ते भि नाँ हुए औऱ वो बिज़नेस संभाल रहा हैं, फिरभी पर्वत सिंह केँ आदेश पऱ सिक्योरिटी नें धक्के मारकर उन्हें दूर किया औऱ बिल्डिंग केँ अंदर प्रवेश करवा दिया जहांसेठ गिरिराज औऱ अन्य नामचीन हस्तियाँ मौजूद थि। पर्वत नें सब कां परिचय भानु सें करवाया औऱ गिरिराज सें विशेष तौर पऱ मिलवाया चुंकि वे उसके पिता औऱ पर्वत केँ खास दोस्त थें।
टेलीविज़न पऱ जल्द हि खबरफ़ैल गई, कि ठाकुर रामकिशन केँ वंसज नें उनकाकाम संभाल लिया हैं जिससे मुबीर गैंग औऱ आदिल गैंग भि सकते मे आँ गए क्यूंकि उन्होंने उम्मीद नहि कि थि। सुचेता भि अपनी मां केँ संगघऱ मे थि जब उसने समाचार सुना। शायद इसीलिए भानु नें उसे दफ़्तर मे मिलने बुलाया होगा।
दफ़्तर मे पहुंचकर भानुसब कर्मचारियों सें परिचय करता हैं जिनमे मुनीम, कुछेक बाबू औऱ 2 चपरासी शामिल थें। अपने विशाल केबिन मे प्रवेश करते हि भानु सरसरी निगाहों सें चारों औऱ देखता हैं। एक् बड़ा काउंटर टेबल, उसके पीछेलगी आरामदायक कुर्सी, कुर्सी केँ पीछे कि दिवार पऱ लगी उसके पूर्वजों कि तस्वीरें, एक् तरफ छोटी अलमारी जोँ पैसों सें भरी हुइ थि, टेबल पऱ एक् लैपटॉप औऱ कोने मे रखा एक् फ्रिज। पर्वत नें थोड़ा बहोत समझाकर उसे अकेला छोड़ दिया। भानु टेबल पऱ हाथ फेरते हुए कुर्सी पऱ आकरबैठ गय़ा। अंततः वो एक् आम लड़के सें करोड़ों कि सम्पति कां मालिक बन गय़ा थां। सर हेडरेस्ट पर्र रखते हि उसकी आँखेछत कों घूरने लगती हैं औऱ भानु बीते दिनों कि घटनाओ केँ बारे मे सोचने लगता हैं।
किसी फ़िल्म कि भांति हर एक् घटना उसके मस्तीष्क मे चलने लगती हैं। किस प्रकार वो विद्यालय केँ बाद अपराध कि दुनिया मे उतरा, किस प्रकार वो जैल पहुँचा, बलदेव सें दोस्ती, फिन आतिफ़ सें मुलाक़ात, बाप कां क़त्ल, मम्मी केँ आंसू, फिन सेखु सें मिलना, बाप कां बदला, जैल सें रिहाई इत्यादि घटनाएं लगातार याद आँ रही थि। इन सबकेसंग उसे अपनेबड़े भइया कि भि यादआती हैं जौ बाप कि मय्यत मे भि नहि आया, नाँ हि कोईअता पता हैं उसका, क्याँ वो इतना पराया मानता हैं हमें?सोच सें बाहर् निकला हि थां कि PA चंद्रभान दफ़्तर मे प्रवेश करता हैं
“रामराम अंकल” भानुखड़ा होकर प्रणाम करता हैं
“खुशरहो बेटा” भानु कों आशीर्वाद देकर चंद्रभान हाथ जोड़ता हैं “एक् विनती हैं आपसे, आज केँ बाद आप् मेरेपेर नां छुए”
भानु कुर्सी पर्र वापिस बैठता हैं औऱ कहता हैं
“वोँ क्यूं अंकल? औऱ आप् मुझे आप् कहके सम्बोधित क्यूं कर रहें हें?”
“क्यूंकि पहले मे बस आपके पापा कां PA औऱ मित्र थां पऱ अब आपका PA हूं, यदि आप् कहके सम्बोधित नां किया तोँ यह आपका अपमान होगा”
“इन बातों सें मुझेकोई फर्क नहि पड़ता अंकल, बाकि आपकी मर्जी हैं, बताइये, क्याँ काम हैं”
“काम तौ मुझे आप् बताएंगे, मेरा कार्य होगा आपकी दिनचर्या औऱ मुलाकातों कों संभालना, इसकेसंग हि यह फेहरिश्त हैं जिसमे हर एक् दिन केँ नियम औऱ मेहमानों केँ नाम हैं, जोँ आपसेमिल सकते हैं, यदि आपकेपास वक्त हैं तोँ मे आपको समझाना चाहता हूं”
यहसभी सुनकर भानु कों मिलने वालों मे सबसे पहले सुचेता कां ख्याल आता हैं
“ठीक हैं, बता दीजिये, मगर उससे पहले एक् नामआज मिलने वालों कि सूची मे डाल दीजिये”
भानु कों इतनीसमझ हैं इसबात सें चंद्रभान खुशहुआ
“जी बताइये”
“राज न्यूज़ सें सुचेता वर्मा” नाम लिखवाकर भानु चंद्रभान सें सबकुछ समझने लगता हैं। उनका क्याँ काम थां, किस प्रकार विभिन्न क्षेत्रो मे ठेके चलते हैं, कबकबअमल कां ठेका लिया गय़ा हैं, कँहा कँहा कितनी ज़मीन हैं यहसभी समझते समझते डेढ़ घंटे सें भि ज्यादा वक़्त लगता हैं भानु कों। दफ़्तर केँ सभी लोगों सें व्यक्तिगत तौर पऱ मिलने कां कार्य भि काफ़ी लम्बा चला, दोपहर ढलनेलगी थि औऱ साम कां आवाहन होँ गय़ा थां।
सुचेता अपनी मम्मी कों अकेला नहि छोड़ सकती थि इसलिये अपनी एक् सहेली कों उनकेपास बुला लियातथा अपनी गाड़ी सें भानु केँ दफ़्तर पहुंच गई,। दरवाजे पऱ गार्ड्स द्वारा रोका गय़ा कि तभी पर्वत सिंह वंहा आँ गय़ा। वो सुचेता कों पहचान गय़ा थां चुंकि वो एक् प्रसिद्ध औरत थि परन्तु सुचेता नां पहचान पायी। पर्वत नें स्वयं कां परिचय दियातथा उसे बाहर् रोके जाने कां कारण भि बताया
“आप् एक् बार अपने भांजे सें बात कीजिये, मेरा उनसे मिलना बहोत आवश्यक हैं” चाहे सिक्योरिटी कितनी भि कड़ी होँ, सुचेता जैसी पत्रकार कां यंहा आनां बेवजह नहि हौ सकता, अतः पर्वत भानु केँ पास जाता हैं
“मामू उन्हें अंदरभेज दीजिये” भानु नें सुचेता कां नाम सुनते हि बोला
“क्याँ मे जान सकता हूं वो किस सिलसिले मे यंहाआयी हैं?”
“वोँ मे नहि बता सकता, फिलहाल मेरा उससे मिलना अहम हैं, आप् जाइए औऱ इज़्ज़त केँ संग अंदर भेजिए उन्हें” पर्वत सिंहकुछ नहि बोलता औऱ बाहर् आकर सुचेता कों प्रवेश कि इज़ाज़त दे देता हैं। दरवाजे केँ बाहर् ख़डी सुचेता नॉक करती हैं
“आँ जाइये” भानु वंही सें आवाज़ देता हैं। सुचेता कुर्सीयों केँ पासआकर ख़डी होती हैं तोँ भानु उसकीतरफ हाथ बढ़ाता हैं।
“बैठिये” हाथ मिलाकर भानु सामने लगी कुर्सीयों कि तरफ इशारा करता हैं तौ सुचेता तीन कुर्सीयों मे सें बीच वाली पर्र बैठ जाती हैं। चपरासी पानी लें आता हैं औऱ टेबल पऱ रख देता हैं
“गरमचाय याँ कॉफ़ी?”
“कॉफ़ी”
चपरासी आदेश पाकरचला जाता हैं। कमरे कां वातावरण गंभीर थां, गर्मी नहि थि पर्र AC चलरही थि। आत्मीयता सें भरी हुईँ इस प्यारी सि लड़की पऱ क्याँ जुल्म होँ रहा थां यहसोच सोचकर भानु परेशान हौ रहा थां। दूसरों केँ लिए दयाभाव सदा सें रहे थें भानु केँ मन मे, फिन चाहे वो कोई अपना हौ याँ कोई पराया। आखिर सुचेता केँ सब्र कां बांधटूट जाता हैं
“कृपाअब बताइये किसने करवाया थां हम् पर्र हमला” अचानक दागेगए सवाल सें भानु ख्यालो कि दुनिया सें बाहर् आता हैं, सामने रखे गिलास मे जोँ पानीबचा थां उसे पिने लगता हैं, फिन सुचेता सें नजर मिलाता हैं
“मेनेकह तौ दिया थां पऱ अब मे दुविधा मे हूं कि आपको बताना चाहिए याँ नहि” भानु केँ कथन पर्र सुचेता भोंहे सिकोड़ती हैं
“औऱ मे इतनीदूर इसलिये नहि आयी कि आप् अंत मे मुझे उदास करें, जौ मेरेसंग हुआ हैं वो कोईआम घटना नहि हैं। जिन लोगों केँ बारे मे आप् बताने सें कतरा रहें हैं कल कों वोँ आपकेघऱ भि पहुंच सकते हैं” सुचेता कों बोलने केँ बाद एहसास होता हैं कि वो भावनाओं मे बहकरकुछ ज़्यादा हि बोल गई, हैं, “माफ़ कीजियेगा, मेरा वोँ मतलब नहि थां”
“नहि नहि, आप् सहीकह रही हैं, फिरभी मुझे किसी सें डर नहि लगता, मे बस आपको इसलिये नहि बताना चाहरहा क्यूंकि मे जानता हूं कि पता लगते हि आप् फिरसे स्वयं कों मुसीबत मे फंसा लेंगी”
“मे पहले सें हि मुसीबत मे हूं, इस मुसीबत सें निकलने केँ लिए हि यंहाआयी हूं”
“ठीक हैं, मुझे यकीन हैं आप् अक्लमंदी सें फैसला लेंगी” रुकने केँ पश्चात भानुफिन बोलता हैं, “जिन गुंडों नें आपकेघऱ पऱ गोलियां चलाईवे आदिल केँ व्यक्ति थें” आदिल कां नाम सुनकर सुचेता कों आश्चर्य नहि हुआ, शायदइस बात कां अंदाजा उसे पहले सें थां। जिस हिसाब सें वो आदिल औऱ मुबीर केँ पीछेपड़ी हुइ थि, जाहिर हैं उन दोनों मे सें हि किसी कां काम थां यह, बाकि जौ चिन्दी गुंडे शहर मे थें उनकी इतनी हिम्मत नहि थि।
“क्याँ हुआ सुचेता जी? मुझेलगा आपको आश्चर्य होगा”
“नहि, क्यूंकि कुछहद तक मुझेपता थां पर्र जहां तक मेरे विचार हैं आपकेपास औऱ भि जानकारी होगी” सुचेता कि बात सुनकर भानु कों एहसास होता हैं कि यदि वो सहायता कर हि रहा हैं तौ क्यूं नां पूरीतरह कि जाये। एक् गहरीसोच मे जाने केँ पश्चात
“भानुजी?” सुचेता आवाज़ देती हैं
“जी” भानु जैसे नींद सें जगा होँ
“आप् ठीक हैं?”
“हम्म.अगर आप् चाहती हें कि मे आपकी सहायता करू तौ मुझे 1 घंटे कां समय चाहिए” भानु केँ प्रस्ताव कों ठुकराया नहि जा सकता थां फिरभी सुचेता कों अकेले लड़नाआता हैं पर्र जहां सें भि जानकारी मिले, लेना बुरीबात नहि हैं।
“ठीक हैं, मे इंतज़ार करुँगी” औऱ वो चली जाती हैं। इतनाकुछ होने केँ बाद भि चेहरे पर्र इतना आत्मविश्वास औऱ निडरता देखकर भानुमन हि मन सुचेता कि तारीफ करने लगता हैं। जिंदगी मे पहलीबार उसे अपने जैसाकोई इंसान मिला हैं। टेबल पर्र रखी घंटी बजाकर चपरासी कों बुलाता हैं
“मामु कों अंदर भेजो”कुछ देर मे पर्वत सिंह दफ़्तर केँ अंदर पहुंच जाता हैं
“तूने बुलाया मुझे?”
“मुझे इसीवक्त एक् नयाफोन औऱ एक् सिमकार्ड चाहिए” भानु कि बात सुनकर पर्वत उसे देखने लगता हैं
“क्याँ मे जान सकता हूं यहसभी क्याँ होँ रहा हैं?”
“कुछ नहि होँ रहा हैं मामू, मुझेफोन चाहिए औऱ क्याँ?”
“बात छोटे सें फोन कि नहि हैं। तुझसे मिलने सुचेता वर्मा आयी थि, जिसके संग तूने क्याँ बात कि मुझेकोई खबर नहि हैं। बाई सां नें जोँ जिम्मेदारी मुझे दि हैं वोँ मे नहि निभा पाउँगा अगर तूँ इसीतरह मुझे बिना बताये यहसभी करतारहा तोँ, आज तेरा पहलादिन हैं, मेरी सलाह हैं कि बिना किसी घटना केँ इसदिन कों गुजर दिया जानां चाहिए” पर्वत एक् सांस मे बोलता हैं भानु कों एहसास होता हैं कि उसके मामाजी सच मे चिंतित हैं, इसलिये खड़ा होकर उनकेपास जाता हैं
“मामू, कृपामुझ पऱ भरोषा रखिये, मे आपकोवचन देता हूं कि सभीठीक होगा” भानु कि बात सुनकर पर्वत थोड़ा शांत होता हैं
“ठीक हैं मेरेशेर, पऱ क्याँ मे जान सकता हूं तेरे दिमाग़ मे क्याँ चलरहा हैं?”
“सही वक्त पर्र मे अपने आप् बता दूंगा, अभि केँ लिए मुझे एक् फोनला दीजिये”
“ठीक हैं, कुछ हि देर मे तेराफोन तुम कोमिल जायेगा, पऱ तेरे नंबर प्राइवेट होंगे”
“हम्म, जैसे पिताजी केँ पास थें?”
“सही समझा, एक् बातसमझ लें, तूने बहोत लम्बा टाइम काटा हैं आम इंसानों केँ बीच, पऱ यहमतभूल कि तूँ आम नहि हैं, इसीलिए प्राइवेट नंबर” इतना बोलकर पर्वत चला जाता हैं औऱ भानु फिरसे कुर्सी पर्र बैठ जाता हैं। पता नहि कितना अरसा होँ गय़ा उसेइस तरह सें एक् स्थान बैठके टाइम काटेहुए। पुरेदिन वो इस दफ़्तर सें बाहर् नहि निकला थां। जब सुचेता नें सहायता कि गुहार लगाई तौ भानु केँ मन मे बस एक् हि बात आँ रही थि, कि उसेअब अपने पुराने दोस्तों सें बात करनी हि पड़ेगी, जिनके बारे मे सुषमा कों बड़ी गलतफहमी थि। उसेयही लगता थां कि भानु केँ जैल जाने केँ पीछे उन्ही दोस्तों कां हाथ थां पऱ वो नहि जानती थि कि वे भानु कि पैसों कि लालसा कि वजह सें जैल जाने वाले थें। भानु केँ जिंदगी मे तीन साथीबने वोँ भि एक् दूसरे कि खातिर जान देने वाले, इसीलिए उसकी बनाई योजना मे शामिल होँ गए थें यह जानते हुए कि ये मार्ग वापिस नहि मुड़ता।
“भइयाबड़ा लफड़ा हैं इसका, वोँ न्यूज़ वाली मिलने आयी थि” ज़ुबैर कां खबरी भानु केँ हरकदम पर्र नजररख रहा थां औऱ हर एक् लम्हा कि खबरदे रहा थां।
“मानना पड़ेगा, साली डरने वालों मे सें नहि हैं”
“हाँ भइया, आप् कहो तोँ उसकीखबर भि लेँ आता हूं”
“नहि, अभि केँ लिएइस लड़के पऱ हि नजररख, औऱ कौनआता हैं इसकेपास उन सबकानाम चाहिए मुझे” इतना बोलकर ज़ुबैर फ़ोनकाट देता हैं।
“भइया, वोँ न्यूज़ वाली मिलने गई, थि उस भानु सें” ज़ुबैर जाकर आदिल कों खबर देता हैं।
“छिनार बहोत उछलरही हैं, दोनों कों एकसाथ ऊपरभेज देंगे”
“क्याँ सोचा हैं भइया?”
“डीएसपी कां पताकर, जरूरत पड़े तोँ ट्रांसफर करवा उसका, जबतक वोँ हैं, हम् औऱ रिस्क नहि लेगे”
“वोँ भि हाथ धोके पीछेपड़ा हैं रामकिशन वालेकेस मे”
“कुछहाथ नहि लगने वाला उसके, भानु कों तभी मारेंगे जब डीएसपी यंहा नहि होगा, उसकी स्थान जोँ आएगाउसे खरीद लेंगे”
“मगर भइया वोँ सुचेता?”
“उसका क्याँ?”
“आपकी गोलियों सें डरने वाली नहि हैं वोँ। उसकी मम्मी कों उठालें?”
“भोसड़ी केँ, इतनेसाल हौ गए तुम को मेरेसंग, फिन भि गांडु आईडिया देता हैं, नहि। उछलने दे साली कों, मे भि देखु क्याँ बिगाड़ती हैं हैं वोँ मेरा” आदिल अपने जमाये खौफ केँ दम मे अंधा हौ चूका थां। फिरभी भरत सिंह नें दलबदल लिया थां पऱ अपने भइया आतिफ़ केँ बनायी हुई जुर्म कि दुनिया कां बेताज बादशाह बन चूका थां आदिल।
भानु कों चारों तरफ सें घेरने कि तैयारी चलरही थि, जहां एक् तरफ आदिल पीछेपड़ा थां औऱ अपने खबरीछोड़ रखे थें वंही मुबीर केँ कान सेखुभर रहा थां भानु कों रास्ते सें हटाने केँ लिए ताकि गैंगवार सें बचसके। भानु कों इन सबकीकोई खबर नहि थि। पर्वत सिंह केँ जाने केँ कुछदेर बाद चंद्रभान भानु कों एक् डिब्बा लाकर देता हैं जोँ देखने मे विशेष नहि लगता। जब भानुउस डिब्बे कों खोलता हैं तौ सामने एक् फोनरखा हुआ पाता हैं। उसे उम्मीद नहि थि कि पर्वत उसकाकहा मान जायेगा, खैर जोँ भि होँ, अब भानु केँ पास भि अपनाफोन थां, मगर क्याँ प्रयोग कियाजाए इसका, नाँ कोई नंबर थां नां हि किसी प्रकार कि सहायता लीजा सकती थि। अगर सुचेता कों मुसीबत सें निकालना हैं तौ उसेखुद हि कुछ करना होगा। फिरसे टेबल पर्र रखी घंटी बजाता हैं तोँ चपरासी अंदरआता हैं।
“जी साहब”
“क्याँ नाम हैं तुम्हारा?”
“जीवनराम नाम हैं मेरा साहब”नाम सुनते हि भानुखड़ा होता हैं औऱ अलमारी मे सें पांच हजार रूपये निकालता हैं
“कबसे होँ यंहा?” रुपया देखकर जिंदगी कि आँखों मे चमक आँ जाती हैं
“जी 3 साल सें”
“आज सें मे तुम्हे कोईकाम दूँ, उसकापता नाँ तोँ चंद्रभान अंकल, नां हि पर्वत मामाजी कों चलना चाहिए” बोलते हुए भानु पैसे उसकीतरफ बढ़ा देता हैं।
“मरतेदम तक नहि चलेगा साहब, बहोत बहोत शुक्रिया” औऱ वो पैसे लें लेता हैं जिससे भानुसमझ जाता हैं कि पैसों सें इस इंसान सें कुछ भि करवाया जा सकता हैं
“अब एक् कामकरो, रिक्शा पकड़ो, भगत सिंहचौक पर्र जाओ, वंहा एक् लड़का पान कि दुकान लगाता हैं, मेरी हि उम्र कां हैं, पतला सां, उसेकहो भानु नें फ़ोन नंबर मांगे हैं तुम्हारे”
बिना किसी देरी केँ जिंदगी बिजली कि फुर्ती सें वंहा सें चला जाता हैं। आखिर पुराने यारों सें दुबारा मिलने कां वक़्त आँ गय़ा थां जौ क्याँ क्याँ मोड़ लाएंगे यह वक़्त हि बताएगा, फिलहाल सभीउथल पुथल होँ रहा हैं, किसकी नय्या पार लगती हैं इस संसय केँ संग सलाम.
बहोत हि शानदार औऱ बेहतरीन एपसोड दिया हैं ! भानु भि अब फॉर्म मे आँ गय़ा हैं !
झिलमिल ओढ़नी – New Episode
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झिलमिल ओढ़नी – New Episode
24th पन्ना
“ज़ुबैर बेटे, हम् राजनीती मे तबसे हें ज़ब तेरे बाप नें तेराबीज भि नहि डाला थां, औऱ तेरेबॉस आदिल कों भि समझादे, आतिफ़ केँ बाद वोँ बात नहि रही” आदिल केँ कहने पर्र ज़ुबैर पूर्व जोधपुर MLA अहमद हुसैन सें डीएसपी प्रताप केँ ट्रांसफर कि बातकर रहा थां उसकेघऱ आकर। अपनी बेईमानी सें अहमद नें बहोत रुपया कमाया औऱ आतिफ़ नें भि कोईकसर नहि छोडी उसकेलिए हर मुश्किल हल करने मे।
“देखलो चाचा, आदिल भइया थोड़े पागल हैं, उन्हें पसन्द नहि आएगी आपकीयह बात” ज़ुबैर अहमद कों धमकाता हैं।
“तोँ क्याँ मार देगा वोँ मुझे?” अहमद कों क्रोध आता हैं, “एक् तोँ उसभरत सिंह नें मेरी कुर्सी छीनली, तब कहां थां आदिल?” सिगार कां धुंआ छोड़ते हुए अहमदआगे बोलता हैं, “चलठीक हैं, मे करता हूं कुछ, पर्र वोँ डीएसपी हैं, नां कि कोई कांस्टेबल, आदिल कों बोल गारंटी नहि हैं उसके ट्रांसफर कि औऱ यह भि बोल कि पागलपन मे उसेकुछ कर नां दे, प्रशासन गांडफाड़ देगा” ज़ुबैर चला जाता हैं वंहा सें औऱ गाड़ी मे बैठकर आदिल कों सारीबात बताता हैं।
उधर जिंदगी नंबर लेकर पहुंच गय़ा थां औऱ पर्वत कि निगाहों सें बचतेहुए भानु केँ दफ़्तर मे चला जाता हैं। नंबर मिलते हि भानु जिंदगी कों बाहर् भेज देता हैं तथागेट लॉककर लेता हैं। फोन मे नंबर डायल करता हैं तौ पहलीबार मे कोई जवाब नहि देता परन्तु दूसरी बार सामने सें आवाज़ आती हैं
“हेलो”
“श्याम?”
“हाँ भइया श्याम। कौनबोल रहा हैं?”
“अपने बाप कि आवाज़ नहि पहचानता क्याँ?” श्याम कों देरलगी पर्र आखिर दिमाग़ कामकर गय़ा
“ओ बहनचोद। भानु तूँ?” श्याम केँ आश्चर्य कि कोई सीमा नहि थि। दिनरात जिसके संगरहा उसकी आवाज़ 5 सालबाद सुनरहा थां।
“हाँ भइया मे”
“भइया कहां हैं तुँ? मे आता हूं दोस्त। बहोत बाते करनी हैं”
“दफ़्तर आजा”
“कोनसे दफ़्तर भइया?”
“साले मेरे दफ़्तर। न्यूज़ नहि देखता क्याँ?”
“अरेहाँ भइया, देखा मेने, सारेशहर मे चर्चे हें तेरे। तूनेकभी नाँ मिलने कि शपथ खिलाई थि वरना मे पहले हि आँ जाता”
“उस टाइम हालात खराब थें भइया। पहले तुँ आँ यंहा। आहिस्ता बात करेंगे”
“मे अभि निकलता हूं भइया” औऱ श्याम फ़ोनकाट देता हैं। भानु बहोत खुश थां अपने जिगरी दोस्त कि आवाज़ सुनकर। भानु, मजा, श्याम औऱ विनय, यह चार जिगरी साथी थें, नाँ कभीकोई अनबन औऱ नां हि कोई गिला शिकवा। चारों एक् दूसरे केँ लिएजान दे भि सकते थें औऱ लेँ भि सकते थें। फिरभी नकली स्टाम्प औऱ मारपीट कां एक् बड़ा कांड करने केँ बाद भानु नें सब कों एक् दूसरे सें दूर रहने कि सलाह दि थि औऱ स्वयं जैलचला गय़ा थां क्यूंकि यहसभी भानु कि हि योजना थि औऱ भानु नहि चाहता थां कि उसकी गलती कि सजा उसके मित्र भुगते। अबजब श्याम सें बात हुई तोँ भानु कों पता थां कि दफ़्तर पहुंचते पहुंचते श्याम कों टाइम लगेगा। इस दौरान उसे ख्याल आता हैं कि क्यूं नां मां सें बात कि जाये
“हेलो” सुषमा नें स्क्रीन देखी तौ उसेकोई नंबर नहि दिखा जिससे उसका दिमाग़ चकरा गय़ा क्यूंकि इससे पहले रामकिशन केँ पास भि प्राइवेट नंबर थां।
“मम्मी मे। ” भानु अपनीबात पूरी करता उससे पहले हि सुषमा बोल पड़ती हैं
“ओह लल्ला तूँ? तभी मे सोचु नंबर क्यूं नहि दिखा”
“हाँ मम्मी, मामू नें फ़ोन दिया हैं। बोलरहे थें अब जरूरी होगा”
“औऱ तुम्हें अबयाद आयी हैं मेरी, पूरादिन निकल गय़ा” सुषमा नाराजगी व्यक्त करती हैं जोँ कागजी थि क्यूंकि वोँ भानु सें कभी नाराज नहि होँ सकती।
“याद तोँ बहोत आयी मां पर्र आज पहलादिन थां तोँ साराकाम समझने मे बहोत टाइमलगा। ” भानुसच बोलरहा थां पर्र स्वयं पऱ क्रोध भि आँ रहा थां उसे अपनी मम्मी कों यूँ अकेला छोड़ने पऱ
“जानती हूं, मुझे अच्छा हि लगायह जानकर कि तूने पुरेदिन काम किया” इसबार सुषमा झूठबोल रही थि क्यूंकि यहीआदत रामकिशन कि थि, क्याँ पता भानु भि उसके क़दमों पर्र चलनेलगे।
“हम्म। क्याँ कररही थि?” आखिर भानु सामान्य बात छेड़ता हैं
“कुछ नहि, तेरी दादीमा कां सरदबा रही थि” जब सुषमा कों पता लगता हैं कि फ़ोन पऱ भानु थां तौ अपनी सासू माँ कां सर दबाना बंद करके एक् तरफ आँ जाती हैं
“अच्छा.”
“हाँ, तेरी आवाज़ कों क्याँ हुआ?थक गय़ा?” अपने लाडले कि सांस भि पहचान लेती हैं सुषमा
“हाँ मां, कंधे दर्दकर रहें हैं”
“मे पर्वत भाईजी कों बोलती हूं तुम्हे घऱ भेजनें कों”
“नहि मां, आज पहलेदिन हि जल्द नहि आनां मुझे। वैसे एक् कामकर सकते हें” भानु कां मन थां शराब पिने कां
“क्याँ लल्ला?”
“पेग लगाएं?” आखिर अपनी ख़्वाहिश बता हि देता हैं
“चुपकर बदमाश। उसदिन भि मेरी हालत खराब हौ गयीँ, थि। मे तोँ सोचती हूं मेने तेरेसंग पी हि क्यूं थि?” सुषमा बसऊपर ऊपर सें मनाकर रही थि जबकि अंदर सें शराब कां सेवनउसे भि पसन्द थां। एक् बारजब रामकिशन कि पीठ पीछे उसकी बोतल सें भानुपेग माररहा थां तौ सुषमा कों भि थोड़ी पीला दि थि जौ कि उसका प्रथम गिलास थां जिंदगी कां। उसकेबाद जोँ सुरूर बना उसने सुषमा केँ तन शरीर मे इतना आराम पहुंचाया कि आगे सें वोँ भि कभीकभी भानु कां संग देती। चुंकि रामकिशन दफ़्तर सें आते हि शराब पीकर औऱ खानां खाकरसो जाता औऱ दादीमा भि सो जाती तौ भानु औऱ सुषमा भि शराब कां सेवनकर लेते। जिंदगी केँ थपेड़ो सें परेशान सुषमा कों यह शरारत बड़ी राहत प्रदान करती थि।
“कोनसा ब्रांड लाऊ?” भानु कों पता थां उसकी मां नखरेकर रही थि इसलिये सीधा पूछता हैं जिससे सुषमा भि समझ जाती हैं
“magic moment। ”
“हीहीही। ”
“अगर हँसेगा तोँ नहि पियूँगी” सुषमा फिन नखरे करती हैं। उसकादिल बाग़बाग़ होँ जाता हैं फिरसे पुराने दिनों कि तरह अपने लाडले कि शरारतों मे शामिल होकर।
“मुझेपता थां तूँ यही बोलेगी। चलठीक हैं, आज मे भि यह लड़कियो वाली दारू पियूँगा”
“हम्म। चखने मे कुछ बनाऊं?”
“अभि तौ कहरही थि नहि पीनी, औऱ अब चखने कां पूछरही हैं, तूँ भि एक् नंबर कि बेवड़ी हैं मम्मी” भानु फिरसे मजाक करता हैं औऱ जोरसे हंसने लगता हैं
“तुँ नहि मानेगा नां?”
“हीहीही। मजाक थां मां, चलठीक हैं, जोँ तेरामन करे बनाले, अब रखता हूं”
“ठीक हैं, जल्द आँ जानां”
औऱ भानुफ़ोन काट देता हैं पऱ जब स्क्रीन पऱ वक्त देखता तौ उसेयाद आता हैं कि सुचेता कों गएहुए काफ़ीदेर होँ गई, थि जबकि उसे 1 घंटे कां बोला थां भानु नें। श्याम केँ आने सें पहलेकुछ नहि कियाजा सकता थां इसलिये उसका इंतज़ार करने लगता हैं।
कुछ हि समय बिता होगाजब श्याम बिल्डिंग केँ आगे पहुंचता हैं पऱ भानु कों फ़ोन केसे किया जाये?उसे डर थां कि उसे यंहाआया देखकर कोई प्रश्न नाँ पुछले। वो कुछदेर इंतज़ार करने कां सोचता हैं कि तभी भानु कां फ़ोनआता हैं
“कहां आया?”
“बाहर् खड़ा हूं भइया”
“ठीक हैं, तूँ वंहीरह औऱ ध्यान रख पर्वत मामाजी नां देखपाए तेरी”
बात करके भानु जिंदगी कों बुलाता हैं औऱ उससे पर्वत केँ बारे मे पूछता हैं तोँ जिंदगी उसे बताता हैं कि सेठ गिरिराज आये थें औऱ पर्वत कों अपनेसंग लेकरगए। ये सुनकर भानु कि चिंता दूर हौ जाती हैं।
“मे एक् काम जाके आँ रहा हूं, अगर मामाजी मेरे बारे मे पूछे तौ बोल देना क्लाइंट केँ संग गय़ा हूं” इतना बोलकर वो जिंदगी कों भेज देता हैं फिरसे श्याम कों फ़ोन करता हैं
“मे पीछे वालेगेट सें बाहर् आँ रहा हूं, आजा”
भानु निचे जाता हैं औऱ बिल्डिंग सें बाहर् आता हैं तोँ देखता हैं कि श्याम अपनी मोटर साइकिल पर्र बैठाहुआ थां। भानु कों देखते हि गले सें लगा लेता हैं
“केसा हैं मेरीजान?” श्याम भानु सें कहता हैं
“ठीक हूं भइया, तुम्हारी तरफ देखकर औऱ भि अच्छा होँ गय़ा”
“साले तूँ तौ पूरा बॉडी बिल्डर बन गय़ा बे” भानु औऱ श्याम करीब-करीब एक् जितनी लम्बाई केँ थें, भानु थोड़ा लम्बा थां उससे पऱ श्याम दुबला पतला थां औऱ भानु सांड जैसा
“बस भइयाजैल मे कुछ करने कों थां नहि तौ बॉडी हि बनाली थोड़ी”
“हम्म.दोस्त इतनासभी हौ गय़ा औऱ हम् मिल हि नहि पाए”
“अच्छा हुआअगर नहि मिले, तुम् तीनो तौ सुरक्षित रहे नां”
“फिन भि भइया। अंकल केँ बारे मे सुना तोँ बहोत दुखहुआ, यहसभी केसेहुआ दोस्त?”
“सभी बताऊंगा, अभि हमें बहोत कुछ करना हैं”
“बोल भइया, तुँ बसबोल, कानतरस गए थें तेरी आवाज़ सुनने कों, बोल क्याँ करना हैं”
“इतना उत्तेजित मत होँ, उन दोनों कों फ़ोनकर, कल दोपहर कों अपनी वाली स्थान मिलने कों बोल”
“ठीक हैं, मगर अभि क्याँ करें?”
“अभि केँ लिएकुछ नहि। तुझसे मिलने कां मन किया इसलिये बुलाया तुम्हारी तरफ”
“अच्छा। चलठीक हैं, कल मिलते हें फिन” दोनों फिरसे गले मिलते हें औऱ श्याम चला जाता हैं। भानुकुछ सोचके अपनीजेब सें सुचेता कां नंबर निकालता हैं औऱ फ़ोन करता हैं
“हेलो” पहली घंटी मे हि सुचेता फ़ोनउठा लेती हैं
“हेलो सुचेता जी, मे भानु”
“आपने 1 घंटे कां बोला थां”
“मे काम मे फसाहुआ थां। देखिये, जितनी जानकारी मुझे थि मेने आपकोबता दि हैं, इसके अलावा मे आपकोकुछ नहि बता सकता” भानु नें फैसला बदल लिया थां। अपने निजीराज बताने सें उसकी मम्मी पर्र खतरा आँ सकता हैं इसबात नें उसे मजबूर कर दिया थां कि वो सुचेता सें दुरी बनाये याँ कम सें कमजब तक उसके दोस्तों कि चौकड़ी इक्कठी नाँ हौ तबतक वो किसी भि मुसीबत सें दूर रहना चाहता थां फिरभी ऐसा नहि थां कि वो सुचेता कि सहायता नाँ करना चाहता होँ पर्र अभि केँ हालात उसके काबू मे नहि थें।
“मुझेलगा हि थां। खैर, मेरी गलती हैं जौ मेनेकुछ अधिक हि उम्मीद लगाली थि आपसे” इतना बोलकर सुचेता फ़ोनकाट देती हैं। बात करके भानु फिरसे अंदरआता हैं मगर पर्वत अभि भि नहि आया थां इसलिये बेफिक्र अपने केबिन मे चला जाता हैं। जिंदगी फिरसे अंदरआता हैं औऱ भानु सें कहता हैं कि दफ़्तर बंद करने कां टाइम होँ गय़ा हैं। भानु पर्वत कों फ़ोन मिलाता हैं
“हेलो”
“मामू मे.”
“हाँबोल बेटे”
“अचानक कहां चलेगए? ”
“गिरिराज सें कुछकाम थां। मुझे टाइमलग सकता हैं। बता”
“कुछ नहि वोँ मे पूछरहा थां कि दफ़्तर रात कों बंद कबसे रहनेलगा?”
“नियमबदल गए हैं भानु, जीजाजी कां हि फैसला थां। जब वोँ साम कों घऱचले जाते तौ कुछ कर्मचारी जानकारिया चुरा लेते थें। इसलिये तयहुआ कि 6 बजे केँ दफ़्तर बंद किया जायेगा आगे सें”
“ओह्ह”
“हाँ, तूँ एक् कामकर, चंद्रभान कों बोलके घऱचला जा, थक गय़ा होगा”
“हाँ मामू, ठीक हैं फिन”
“औऱ सुन, गार्ड्स तेरेसंग जाएंगे”
“अबघऱ पऱ भि यहसभी होगा?”
“तूने बोला थां मेरीबात मानेगा”
“हम्म.चलो ठीक हैं, औऱ आप्?”
“मे घऱ जाउगा दफ़्तर बंद करके, अब जा तूँ”
पर्वत सें बात करके भानु चंद्रभान कों बुलाता हैं औऱ सारीबात बतादेत हैं। बिल्डिंग करीब-करीब खाली होँ चुकी थि क्यूंकि सारे कर्मचारी चलेगए थें, दफ़्तर मे बस भानु, चंद्रभान औऱ जिंदगी बचे थें। वो बाहर् आता हैं औऱ ओमकार सें गाड़ी लाने कों कहता हैं। दोनों गार्ड्स भि उसकेपास आकरखड़े हौ जाते हें। ओमकार गाड़ी लें आता हैं तोँ भानुउसे शीशा निचे करने कां इशारा करता हैं
“काका एक् औऱ गाड़ी कां इंतज़ाम कीजिये” औऱ फिन गार्ड्स केँ सम्मुख होता हैं, “उम्मीद हैं तुम्हे गाड़ी चलानी आती हैं” गार्ड्स एक् दूसरे कां मुंह देखते हें, “मे औऱ काकाइस गाड़ी मे जा रहें हें, तुम् दूसरी मे आँ जानां”
“मगरसर नें हमें आपकेसंग रहने कों बोला हैं”
“तोँ मे कबबोल रहा हूं तुम् संगमत रहो, हम् आगेआगे चलेंगे औऱ तुम् पीछे”
तबतक ओमकार दूसरी गाड़ी लें आता हैं। फिन निचे उतरकर भानु केँ लिए पहली वाली गाड़ी कां दरवाजा खोलता हैं, भानु केँ बैठते हि दोनों गार्ड्स दूसरी गाड़ी मे बैठ जाते हें औऱ दोनों गाड़ीयां चल पड़ती हैं।
“काका ठेके पर्र रोकना गाड़ी”कुछ हि दूरगए होंगे ज़ब भानु कहता हैं औऱ मंडोर मे ठेकों कि कमी नहि थि तोँ जल्द हि एक् आँ जाता हैं। खासबात ये भि थि इसी ठेके सें रामकिशन भि दारू खरीदता थां फिरभी उसकी इतनी हैसियत थि कि शराब उसकेघऱ पऱ अपने आप् पहुंच सकती थि पऱ रामकिशन कों इसतरह खरीदने मे हि आंनद मिलता थां इसलिये ओमकार भि यंही रुकता हैं
“ठेका आँ गय़ा हैं भानु बेटे” ओमकार कि आवाज़ सुनकर ख्यालों कि दुनिया सें बाहर् आता हैं भानु।
“आप् लें आएंगे काका?”
“केसीबात कर रहें हें, आप् मालिक हैं मेरे। आपके पापा भि यंही सें लेना मनपसंद करते थें औऱ मे हि लाता थां” अपने पिता कां जिक्र आते हि भानु केँ मन मे वही प्यार औऱ नफरत केँ मिलेजुले भावआने लगते हें। उसकामन तौ किया कि यंहा सें चलना चाहिए पर्र फिन फैसला बदल लेता हैं
“आप् पीते हें काका?” भानु कि गाड़ी रुकते हि गार्ड्स भि गाड़ी रोककर बाहर् निकलकर खड़े होँ जातें हें
“कभीकभी पी लेता हूं”
“हम्म, तोँ एक् काम कीजिये, magic moment कि 2 बोतल औऱ अपनेलिए भि कुछ लेँ आइये, यह लीजिये पैसे”
“यंहा पैसेइस तरह नहि देने बेटे, ठेकेदार अच्छा मित्र थां आपके पिता कां, एक् संग हि हिसाब करते थें, वैसे भि आपके पापा कों महंगी शराब पिने कां शोक थां तोँ घऱ पऱ भि भिजवा देते थें”
“अच्छा, ठीक हैं लेँ आइये”
ओमकार बोतल लेँ आता हैं औऱ गाड़िया फिरसे घऱ कि औऱ चल पड़ती हैं। मौसम सुहाना थां पऱ हवा ठंडी थि। नई जिम्मेदारीयों सें लदा पहलादिन काटकर भानु कों थकावट केँ संगचैन महसूस हौ रहा थां.
झिलमिल ओढ़नी - Next part miss mat karna
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