झिलमिल ओढ़नी – New Episode
17th पन्ना
इंसान अक्सर बेनियत कि जीवन जीता हैं, चाहे वो कोई किसान हौ याँ कोईबड़ा अफसर। उसके लक्ष्य धुंधले प्रतीत होते हैं इस उधार कि जीवन मे औऱ बेमानी मौत कि औऱ बढ़ताचला जाता हैं। भानु कि अब तक कि जीवन भि इसीतरह कि रही, नां उसेचैन मिला नाँ हि कोई लक्ष्य थां, थां तोँ बस विडंबनाओ सें भराहुआ सागर, जिसकी लहरों कि उठापटक नें उसकी साँसो कों उखाड़ फेंका थां। पऱ तक़दीर कां क्याँ कह सकते हैं, आज हिंसक हौ औऱ कल उदार।
सुचेता केँ चले जाने केँ बाद भानु सुषमा केँ कमरे मे जाता हैं औऱ देखता हैं कि उसकी मां नाराज हुएबेड केँ किनारे पर्र बैठी हैं।
“लगता हैं मेरी मम्मी मुझसे नाराज हैं”सुषमा केँ पास बैठते हुए भानु बोला।
“मे क्यूं नाराज होनेलगी। तूँ मेरीबात माने याँ नां माने मुझे क्याँ?” सुषमा नें थोड़े गुस्से औऱ थोड़े भोलेपन केँ संगकहा जिसपर भानु मुस्कुराता हैं।
“मुझे निचेआने कों मना किया क्यूंकि तूँ मुझे अनजान लोगों सें दूर रखना चाहती हैं। तोँ क्याँ मुझे तेरा अनजान लोगों सें मिलना डराएगा नहि?”भानु नें सुषमा केँ कंधेपकड़ कर उसका चेहरा अपनीतरफ किया। सुषमा नें चेहरा झुका लिया जिसपर भानु कों बहोत प्रेम आया औऱ उसने सुषमा कि ठुड्डी केँ निचे ऊँगली लगाकर ऊपर उठाया
“तूँ जब क्रोध करती हैं तौ बहोत सुन्दर लगती हैं”औऱ उसकेगाल कां चुम्मा लें लेता हैं। सुषमा मुंह दूसरी औऱ घुमाती हैं औऱ नखरे सें कहती हैं
“उस समाचार वाली कों कर लेतालाड, बड़ीगौर सें देखरहा थां”इस बात पर्र भानु फिरसे मुस्कुराता हैं
“क्यूं? तुम्हारी तरफडर हैं वोँ मुझे तुझसे छीन लेगी?”भानु कहता हैं औऱ उसीसमय सुषमा उसके मुंह पऱ हाथरख देती हैं
“चुपकर। दोबारा ऐसीबात कि तोँ थप्पड़ मारुंगी”भानु उसकाहाथ अपनेहाथ मे लेता हैं औऱ उसकी आँखों मे देखता हैं
“देख मां, हम् यूंडर डर केँ नहि जी सकते, आज एक् गुंडा हैं कलदस होंगे। हम् जीना तौ नहि छोड़ सकते नां”
“जानती हूं लल्ला, पर्र मेरामन नहि मानता। हर टाइमयह डर रहता हैं कि तुम्हें कुछ हौ गय़ा तोँ? किसी नें तुम्हे कोई नुकसान पहुँचा दिया तौ मे मर हि जाउंगी”सुषमा सचकहरही थि पर्र भानु कों अपनी मम्मी कि चिंता दूर करना अच्छी तरहआता हैं।
“तेरे लल्ला मे बहोत ताकत हैं, ऐसे केसेकोई कुछकर देगा मुझे, यह देख.”औऱ भानु सुषमा कों गोद मे उठा लेता हैं।
“लल्ला नहि। लल्ला नहि, उतार मुझे, गिर जाउंगी गधे”जोर सें घुमाने केँ बाद भानुउसे निचे उतार देता हैं।
“ओहराम। ”सुषमा अपने कलेजे पऱ हाथ रखती हैं। भानु वापिस बैठ जाता हैं औऱ सुषमा कों भि अपनेपास बैठा लेता हैं।
“क्याँ पूछरही थि वोँ लड़की?”सामान्य होकर सुषमा पूछती हैं।
“वही प्रश्न जोँ डीएसपी प्रताप नें पूछे थें। ऐसालग रहा थां जैसे वोँ रिपोर्टर नां होकरकोई पुलिस वाली होँ”
“यहकब तक चलेगा लल्ला?”
“सच बताऊ तोँ मुझे भि पता नहि हैं मम्मी। मेरे ख्याल सें जब तक पिताजी केँ कातिलों कों पकड़ नहि लिया जाता हमसे पूछताछ होती रहेगी। चाहेवे पुलिस वाले होँ याँ यह न्यूज़ वाले”
“एक् बात पुछु मम्मी?”
“पूछ नाँ”सुषमा भानु केँ कंधे पऱ सर टिकाती हैं।
“जबकोई चला जाता हैं तौ 12 दिनलोग आते हें उनके यंहा, पिताजी कों गएहुए हफ्ता मुश्किल सें हुआ हैं, पर्र कोई नहि आता, ऐसा क्यूं?”
“पर्वत भाईजी नें सबकोमना कर दिया थां। उन्हें डर थां कि भीड़ कां फायदा उठाकर कोई मुझे भि नाँ मारदे, पता नहि कोनसा पापहुआ हैं हमसे जौ यहदिन देखने पड़ रहें हें”
“पाप हमसे नहि हुए हें मां। ”भानुचुप होँ जाता हैं, जैसे वो कुछ बताना चाहरहा हौ जिसका भान सुषमा कों हौ जाता हैं
“क्याँ मतलब हैं तेरा?”
“मे तेरीकुछ बताना चाहरहा थां कुछ दिनों सें, शायदयह सही टाइम हैं ”
“ऐसी क्याँ बात हैं लल्ला”सुषमा कि उत्सुकता बढ़ जाती हैं।
“वादाकर तूँ दुःखी नहि होगी”भानु सुषमा कां चेहरा पढ़ने कि कोशिश करता हैं।
“ठीक हैं, वादारहा, अबबता। ”नारी स्वभाव भि गजब होता हैं, बात जानने कां।
“मंडोर मे जितने भि सेठ औऱ जागीरदार हें, सभी रुपया देते थें उस गुंडे आतिफ़ औऱ उसके भइया आदिल कों”
“मुझेपता हैं लल्ला, उन्होंने बताया थां मुझेइस सभी केँ बारे मे, कहते थें यह करना पड़ता हैं”
“तौ यह भि बताया होगा कि आतिफ़ कों मारने कि योजना बनाई थि उन सबने.”इस बात पऱ सुषमा सर उठाकर भानु कि औऱ देखती हैं।
“यह क्याँ कहरहा हैं तुँ? किसने कहा तुझसे?”
“एक् व्यक्ति मिला थां मुझेजैल मे”भानु सेखु कां नाम नहि लेना चाहता थां इसलिये झूठ बोलता हैं।
“औऱ क्याँ बताया उसने?”
“आतिफ़ तोँ नहि मरा पर्र उसके भइया आदिल कों इसबात पर्र बहोत क्रोध आया थां, हौ सकता हैं उसीने पिताजी कों मारा हौ”भानु जानता थां कि हकीकत क्याँ हैं पऱ सुषमा केँ सामने यह नाटक जरूरी थां ताकिकल कोईबात उजागर होँ तोँ सुषमा कों पहले सें कुछ नां कुछ अंदाजा हौ।
“तूने पहले क्यूं नहि बताईयह बात?”
“मे नहि चाहता थां तूँ बेवजह कि चिंता करे”
“उन्होंने कभी मेरेलिए वक़्त नहि निकाला, नाँ कभीकोई बात साझा करते थें मुझसे, इतनासभी हौ गय़ा औऱ मे अनजान हि रही”
“तूने वादा किया थां दुःखी नहि होगी”
“मे ठीक हूं लल्ला, बस डरती हूं कंही तुँ भि उनके नक़्शे कदम पऱ नाँ चल पड़े”सुषमा कि बात सुनकर भानुउसे अपने सीने सें लगा लेता हैं। सुषमा भि भानु कि कमर पर्र हाथकस देती हैं।
“इस दुनिया मे तुझसे प्यारा मुझेकोई नहि हैं मम्मी। मे तुम्हे हरबात बताउगा, हरराज साझा करूंगा, सहीसमय आने पऱ”दोनों मे सें कोईकुछ नहि बोलता। एक् गहरी शांति फैली हुईँ थि कमरे मे। सुषमा कों अपने बेटे पर्र गर्व होता हैं औऱ भानु कों एहसास होता हैं कि उसकी प्यारी मां कितनी वंचित रही थि प्यार सें। वो कभी अपने बाप जैसा नहि बनेगा इसबात कां प्रण लेता हैं। तभी एक् औऱ बारघऱ कि घंटी बजती हैं तोँ दोनों एक् दूसरे कि औऱ देखते हैं। अबकौन होँ सकता हैं?
“तुँ बैठ, मे देखता हूं। ”
“नहि, मे देखती हूं। ”
“मम्मी। ”औऱ भानु कि बातमान ली जाती हैं। भानुगेट खोलने बाहर् जाता हैं तौ देखता हैं कि उसके मामाजी पर्वत सिँहआये हुए हैं।
“मामाजी सां आप्”भानु पाँव छूता हैं। पर्वत उसेऊपर उठाता हैं औऱ फिनगले लगाता हैं।
“आओ मामु, अंदरचले, मां। देखो मामाजी आये हें ”भानु सुषमा कों आवाज़ लगाता हैं तौ वो कमरे सें बाहर् आती हैं।
“रामराम भाईजी”
“रामराम बाईसा”पर्वत सुषमा कों प्रणाम करता हैं।
“तुम् दोनों बैठो, मे पानी लाती हूं”सुषमा किचन कि औऱ जाती हैं औऱ भानुतथा पर्वत सोफे पर्र बैठ जाते हैं।
“माफ़ करना भानु। मे तुम्हे लेने नहि आँ सकाजैल सें”
“चिंता काहे करते होँ मामू, मेने वैसे भि मम्मी कों कहा थां कि वोँ अकेली हि आँ जाये। हालात खराब हें”
“वोँ तोँ हैं। सुना हैं तूने जेलर कों पीट दिया थां”पर्वत सिंह हँसते हुए कहता हैं।
“साला मम्मी केँ बारे मे बकवास कररहा थां। मेने भि लगादिए एक् दो”
“तेरा क्रोध अभि भि कम नहि हुआ.”पर्वत सिंह बोला तबतक सुषमा पानी लेकर आँ गयीँ,।
“क्याँ बातें हौ रही हैं?”सुषमा पूछती हैं जिसपर भानु पर्वत कों नां बताने कां इशारा करता हैं।
“बसऐसे हि हालचाल पूछरहा हूं अपनेशेर कों”सुषमा दूसरी तरफबैठ जाती हैं।
“भाभी औऱ बच्चे केसे हैं भाईजी?”
“सभी बढ़िया हैं बाई सां”
“हम्म.पता हैं भानु? तेरे मामू हमेसा 5 मिनट केँ लिए हि आते हें, आज आपको खानां खाये बगैर जाने नहि दूंगी बोल देती हूं”
“यह तोँ गलतबात हैं मामू”
“ठीक हैं बाईसा, आज खानां खाकर हि जाऊंगा, इस बहाने अपने भांजे सें थोड़ी बातें भि कर लूंगा”
साम होने वाली थि औऱ नौकरानी आँ गयीँ, थि काम करने। सुषमा नें ओमकार कों खाने कां सामान लानेभेज दिया औऱ कविता कों बोल दिया कि आजउसे खानां बनाने मे सहायता करनी होगी। पर्वत सिंह भानु कों शराब केँ लिए आग्रह करता हैं। राजपूत परिवारों मे शराब कां शोक केँ तौर पऱ पिया जाता हैं। भानु सुषमा कों बताता हैं तोँ सुषमा उन्हें छत पर्र जाने कों कहती हैं औऱ बताती हैं कि वोँ वंही सारा सामान ला देगी। कुछ देर निचे बातें करने केँ बाद दोनों ऊपरचले जाते हें। साम होँ चुकी थि औऱ ठंडीहवा बहरही थि। दुखों सें भरेघऱ मे थोड़ाचैन आया थां.
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पुरानां खेल शुरुआत होनेजा रहा हैं, जौ कानून मानता हैं उसकेलिए कानूनी मदद नहि बन्दिशें हें औऱ जोँ कानून तोड़ता हैं उसके खिलाफ जाने कि कानून मे हिम्मत नहि
मगर भानु नें संतुलन बनाना शुरुआत कर दिया हैं, अगलेकदम केँ इन्तजार मे
पत्रकार महोदया कां रोल भि दिलचस्प होने वाला हैं लगता हैं
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18th पन्ना
“आओ डीएसपी, बैठो हमारे संग, लाल रंग कि इस शराब कों वाइन कहते हें साले अंग्रेज, तुमने बहोत पी होगी अपने जिंदगी मे, आज हमारे संग हौ जाये”सेठ गिरीराज केँ घऱ पर्र हलचल थि। वे मंडोर कों छोड़रहे थें इन क़त्लेआमो केँ बीचफिर भीयह उनकी अनिच्छा थि पऱ वेकर भि क्याँ सकते हें।
“शुक्रिया सेठजी, इतना ओहदा नहि हें जोँ आपकेसंग बैठ पांउ, आप् बस मेरे सवालों कां जवाबदे दीजिये”प्रताप पूर्ण वर्दी मे थें। इनकाअलग हि अंदाज रहता हैं जमाने मे। छोटी सि उम्र मे इतनेकेस हल किये थें कि गिनती मुश्किल होँ जाये। इन्हे नां तौ खरीदा जा सकता हैं नाँ हि डराया जा सकता हैं। काफिलों कि जरूरत नहि पड़तीजब चलते हें।
“कम सें कमबैठ तौ जाओ, याँ खड़ेखड़े हि पूछताछ करोगे भइया" डीएसपी प्रताप बैठ जाते हें, “ऐ, साहब केँ लिए ठंडा लेँ आओ” प्रताप गिरिराज कि तरफ देखता हैं, “इतना तोँ करनेदो डीएसपी”
नौकर ठन्डे कि बोतल औऱ गिलास लाकर सामने रख देता हैं औऱ फिन गिलास कों भर देता हैं।
“अब पूछो, क्याँ पूछना हैं, साला सोचा नहि थां हम् भि कभी कढ़घरे मे खड़े हौ जाएंगे, हीहीही”पेग ख़तम करतेहुए गिरिराज कहता हैं।
“ऐसीबात नहि हें ताऊजी, आपकी बहोत इज़्ज़त हैं शहर मे, पऱ यहकाम हैं मेरा”सेठ गिरिराज एक् नामित इंसान हैं औऱ हरकोई इज़्ज़त करता हैं उनकी। भानु केँ मामाजी पर्वत सिंह केँ बहोत अच्छे साथी हें यह।
“अरे औपचारिकता छोडो भइयाअब, तुम् बेधढाक पूछो”शराब कां असरबोल रहा थां उनके मुंह सें।
“क्याँ आप् रामकिशन जी केँ मित्र थें?”
“पहले मे उनके साले पर्वत कां यार थां। बाद मे उसके बेटे केँ बर्थडे पऱ रामकिशन सें मुलाकात हुइ थि, औऱ फिन उनसे भि दोस्ती हौ गई, ”
“क्याँ आपकीकभी अनबन हुई थि उनसे?”
“हाहाहा, क्याँ डीएसपी, बहोत जल्द मुद्दे पऱ आगये, नहि भइयाऐसा कुछ भि नहि हुआ थां कभी”
“मे जान सकता हूं 8 अक्टूबर कों कँहा थें आप्?”
“अपने दफ़्तर मे, 20 साल सें कभीऐसा नहि हुआजब मे दिन कों अपने दफ़्तर मे औऱ रात कों घऱ पर्र नां होऊं”
“क्याँ आपकोखबर थि उन हमलों कि जौ आतिफ़ गैंग नें पहले भि करवाए थें?”
“थि तौ। पऱ उसकी गोलियां हमतककभी नां आयी थि, रामकिशन कों बोला थां मेनेकोई सख्तकदम उठाने कों, पर्र साला राजनीती किसकी बस मे हुई हैं आजतक?”
“राजनीती सें क्याँ मतलब हैं आपका?”
“अनजान काहेबन रहे हौ डीएसपी? तुम्हारा विभाग अगर हमारा संग देता, तौ यहदिन देखने नाँ पड़ते। माना कि हमनेकभी भरोसा नहि किया पऱ तुम् लोगों कां तोँ फर्ज़ थां”
“कर्ज औऱ फ़र्ज कि बातें बाद मे करेंगे ताऊजी, मे बसइस पहेली कों सुलझाना चाहता हूं, बिना किसी घुमाव केँ मे आपसे प्रश्न करूंगा अब”
“जरूर भइया, पूछो”
“क्याँ उनके क़त्ल मे आपकेसंग वालों मे सें किसी कां हाथ हैं?”
इसबात पर्र गिरीराज मुस्कुरा देते हें। वे हैरान थें इस नौजवान केँ हौसले पर्र, उनके सामने किसी कि हिम्मत नहि होती थि ऐसाकुछ बोलने कि औऱ यह धड्डले सें बोलेजा रहा थां
“अगर रामकिशन कों मरवाने मे मेरेसंग वालों मे सें किसी कां हाथ हौ तोँ उसे हम् स्वयं पकड़कर फांसी चढ़वा देते, वोँ सेठ रामकिशन थें, ठेले पऱ सब्जी नहि बेचते थें, मंडोर केँ मालिक थें वोँ”
सवालों औऱ जवाबो कां सिलसिला काफ़ीदेर तक चला, पर्र समस्या यह थि कि आदिल केँ खिलाफ किसी भि प्रकार कां कोई सबूत नहि मिलपा रहा थां। आखिर डीएसपी प्रताप वहां सें बिनाकोई ज़्यादा ड्रामा किये निकल जाते हें।
एक् महफ़िल भानु केँ घऱ पऱ भि लगी हुइ थि। पर्वत सिंह औऱ भानुपेग पऱ पेगलगा रहे थें। भानु कों बच्चा समझने वाले पर्वत कों एहसास होता हैं कि पिने केँ मामले मे वो स्वयं भि कम थां भानु केँ सामने। सुषमा एक् केँ बाद एक् जाम बनाती औऱ कुछ हि देर मे दूसरा बनाने कि नौबत आँ जाती।
“मानना पड़ेगा बाईसा, अपना भानु तौ खान हैं शराब कि”
“तारीफ मत कीजिये भाईजी, वरनायह रोज पिने लगेगा”
“तौ काहे इजाजत दि हैं इसे पिने कि?”भानु उन दोनों कि बातें सुनरहा थां पर्र बोलकुछ नहि रहा थां।
“उनके जाने केँ बादघऱ मे एक् हि तोँ मर्दबचा हैं भाईजी। केसे रोकती? शराब सें हि सही, कम सें कमदुख तोँ कम होगा”भानु सुषमा केँ हाथ पर्र हाथ रखकर दिलासा देता हैं।
“मेने तुम्हें कहा थां तूँ दुःखी नहि होगी, मामू समझाओ नाँ मम्मी कों”
“हां बाईसा, किसी केँ जाने सें जीवन नहि रूकती, अब उनके बिना जीना सीखना हि पड़ेगा”पर्वत सिंह भि भानु कि बात सें सहमत थां।
“सहीकहा भाईजी, कोशिश कररही हूं”सुषमा कह तौ रही थि पर्र ऊर्जा नहि थि उसके शब्दो मे, भानु कों एहसास होता हैं कि शायदयही सही मौका हैं माहौल कों हल्का करने कां। वो अपना गिलास खाली करता हैं औऱ फिनउसी मे एक् हल्का सां जाम बनाता हैं, फिनउसे सुषमा केँ हाथ मे थमा देता हैं।
“मुझे क्यूं देरहा हैं?”सुषमा पूछती हैं पऱ भानुबस उसकी औऱ देखता हैं। पर्वत सिंहसमझ जाता हैं औऱ हँसने लगता हैं
“ख़तम कीजिये बाईसा, महफ़िल मे बैठकर पूछा नहि करते”
सुषमा कों माजरा समझ मे आता हैं तोँ वो आनाकानी करने लगती हें
“नहि लल्ला, मेनेकभी नहि पी”साफ थां कि मामाजी भांजा जानते हें कि येझूठ थां। पहले भि कईबार जब भानु रामकिशन कि बोतल सें चोरी चुपके पिया करता थां तौ सुषमा हि उसकेलिए निगरानी रखती थि एक् यार कि तरह। भानुउसे भि पीला देता थां एक् दोपेग, औऱ यहबात पर्वत सिंह कों सुषमा नें हि बताई थि।
“इतनी भि नहि चढ़ी कि हमेंपता नहि चलेगा मम्मी”औऱ भानु सुषमा केँ हाथ मे रखापेग उठाकर उसके होठों सें लगा देता हैं। तभी पर्वत कां फ़ोनबज उठता हैं। पर्वत फ़ोन पर्र बात करता हैं तबतक भानु दूसरा पेग भि पीला देता हैं सुषमा कों।
“बाईसा अब इज़ाज़त दीजिये मुझे, थोड़ाकाम आँ गय़ा हैं”
“मेनेकहा थां नां लल्ला, तेरे मामासा ऐसा हि करते हें हमेसा”
“मामू खानां खाये बगैर नहि जानेदे सकता मे आपको”
“गिरिराज सें पूछताछ करनेआया थां डीएसपी प्रताप। वे चिंतित हें”
“उन जैसेभले इंसान सें भि पूछताछ करते हें यह पुलिस वाले”
“ऐसी बात नहि हैं बाईसा, पूछताछ सबसे होगी, औऱ प्रताप कों मे जानता हूं, वो बिनावजह किसी कों परेशान नहि करताकभी, भानु, तुझेही तेरा ड्रिंकिंग पार्टनर मिल गय़ा हैं, हम् बाद मे खानां खाएंगे कभी”मजाक करतेहुए पर्वत सिंहचला जाता हैं। भानुउसे दरवाजे तक छोड़ने जाता हैं औऱ दरवाजे पर्र हि उससेकुछ पूछता हैं। सुषमा छत पऱ अकेली बैठी थि औऱ उसके सामने शराब कि बोतलपड़ी थि। संस्कार औऱ आदर सम्मान सें भरी हुईँ सुषमा अंदर सें एक् बच्ची थि। रामकिशन कां परिवार औऱ सुषमा केँ मायके वाले, दोनों हि राजघराने सें थें। दोनों परिवारों कां मिलन भि पहले सें तय थां। भानु केँ दादाजी सां औऱ नानाजी सां बहोत तगड़े साथी थें औऱ यह मित्रता पीढ़ियों सें चली आँ रही थि। इस मित्रता कों रिश्तेदारी मे बदला थां भानु केँ दादाजी औऱ नानाजी नें। छोटी हि उम्र मे नाता हौ गय़ा थां सुषमा तथा रामकिशन कां औऱ फिनकुछ हि महीनों मे विवाह। बचपन मे सुषमा बहोत शरारती थि पर्र जैसे जैसेबड़ी हुई उसेसमझ मे आँ गय़ा थां कि पारिवारिक इज़्ज़त सें बढ़करकुछ भि नहि थां। विवाह केँ बाद उसकी शरारते जैसे कहींखो गई, औऱ फिन 1 सालबाद हि भानु कां जन्महुआ तथा उसके 3 सालबाद भानु कि बेहन राणो कां जन्महुआ जिसे भानु रानी कहता थां औऱ वैसे मोहिनी नाम थां। भानु उसकी आँखों कां तारा थां। जैसे जैसे बच्चे बड़ेहुए रामकिशन औऱ सुषमा केँ बीच लगावकम हौ गय़ा जिसका कारण थां रामकिशन कां पैसे कमाने कां अंधा लालच। वो हमेसा काम केँ सिलसिले मे व्यस्त रहता थां।
ऐसाकुछ वक़्त तक चला औऱ फिन एक् ऐसी घटना हुईँ जिसने उनके रिश्ते कों तारतार कर दिया। भानु औऱ राणोजिस पाठशाला मे पढ़ते थें उसकी एक् अध्यापिका केँ संग रामकिशन कां चक्कर चलनेलगा थां। बात फैलने मे वक़्त नहि लगा औऱ सुषमा तक भि पहुंची। उसदिन बहोत भयंकर तूफान आया औऱ सुषमा अपने मायके चली गई, थि दोनों बच्चो कों लेकर। भानु केँ दादाजी चलबसे थें काफ़ीदिन पहले इसलिये भानु केँ नानाजी नें दोनों केँ बीच सुलह करवाई तथा रामकिशन सें बच्चों कि शपथ खिलवाई गयीँ, कि वो कभीऐसा कोईकाम नां करे पर्र सुषमा केँ मन मे नफरत कां बीज बोयाजा चूका थां। नारी कों सबकुछ बर्दास्त होँ जाता हैं सिवाय इसबात केँ कि उसकापती उसे धोखादे रहा हैं। उसकेबाद इस रिश्ते मे खटास आँ गयीँ, थि। सुषमा नें फिनकभी रामकिशन कों अपने लगभग नहि आने दिया औऱ अपने बच्चो मे हि अपनी दुनिया बनाली। इस घटना कि वजह सें भानु कि दादीमा कों भि सुषमा पर्र बहोत दयाआयी औऱ जोँ थोड़ी बहोत सख़्ती वो कभीकभी दिखा देती थि उसे भि छोड़ दिया। दोनों सासू माँ बहु बहोत प्रेम सें रहनेलगी।
पर्वत कों विदा करने केँ बादजब भानुऊपर आता हैं तौ देखता हैं कि उसकी मां नें गिलास कों होठों सें लगारखा थां। वो फुर्ती सें आकर बैठता हैं औऱ सुषमा कों देखने लगता हैं। सुषमा उसे देखकर जल्द सें गिलास निचे रखती हैं परन्तु तबतकदेर हौ चुकी थि, भानु नें देख लिया थां कि उसकी मम्मी भि उसके जैसी हि हैं। सुषमा लज्जा केँ मारे अपने हाथों सें अपना चेहरा छुपाती हैं औऱ भानु हँसते हुए उसकेहाथ हटाता हैं
“देखूं तोँ, तूँ तोँ कहती हैं मुझे शराब अच्छी नहि लगती”
सुषमा भानु कां हाथ झटकती हैं फिन उसकेसर पर्र धीरे-धीरे सें चपत लगाती हैं
“ज़्यादा स्याना नां बन, तूने हि सिखाई थि मुझेयाद हैं?”सुषमा केँ चेहरे पर्र शराब कां सुरूर दिखना शुरुआत हौ गय़ा थां औऱ थोड़ी बेबाकी आँ गई, थि। गालों मे लाली उतरना शुरुआत हौ गई, थि। भानु बोतल उठाता हैं औऱ दोपेग बनाता हैं
“नहि लल्ला, अब औऱ नहि, वरना मुझेचढ़ जाएगी”
“क्याँ मम्मी, डर क्यूं रही हैं, दादीमा सो चुकी हैं मे देखकर आया हूं, अब हमें भि खानां खाकर सोना हि तोँ हैं”ऐसा बोलकर वो एक् गिलास सुषमा कों देता हैं, फिन दोनों चियर्स करते हैं। यह भि भानु नें हि सिखाया थां उसे। नशा तीव्र हौ चूका थां दोनों कों। फिरभी सुषमा कि क्षमता किसी भि मामले मे कम नहि आँकीजा सकती थि। 4 पेग पिने केँ बाद तौ मर्दों केँ भि होशउड़ जाते हैं। भानु कां ये दसवां पेग थां इसलिये दोनों हि नशे मे झूमने लगे थें। आखिरहद तक आँ हि जाते हैं दोनों औऱ सुषमा कुर्सी पऱ डॉलने लगती हैं। भानु कों एहसास होता हैं कि अब शायद बिना खानां खाये हि सो जाएगी उसकी मम्मी। वो उसके कंधे पऱ हाथ रखता हैं
“मां.ठीक हैं तूँ?”जवाब मे सुषमा ऐसे हंसती हैं जैसेकोई शराबी हौ
“तेरी मां इतनी भि कमजोर नहि लल्ला”ऐसा बोलकर वो दोनों हाथ भानु केँ गालों पर्र रखती हैं, फिन उसकेपास आती हैं औऱ उसका माथा चूमती हैं। भानु कों हंसी आँ जाती हैं अपनी प्यारी मम्मी कों इस हालत मे देखकर। वो खड़ा होकर उसकेपास आता हैं
“अब खानां खांए?”भानु पूछता हैं पर्र सुषमा फिरसे चेहरा ऊपर उठाकर भानु कों देखती हैं। ऐसालग रहा थां कि उसका मस्तिष्क अब उसके काबू मे नहि हैं
“यंहाबैठ मेरे पास”भानु बैठ जाता हैं औऱ फिन सुषमा बोल्ना शुरुआत करती हैं। ये तौ स्पष्ट थां कि शराब चढने पऱ कोई भि इंसान बोलने लगता हैं, इसलिये भानु सुनता रहा औऱ वो बोलती रही। अंत मे सुषमा सें बोला भि नहि जारहा थां। भानु स्थिति कों समझकर उसे खाने कां कहता हैं पर्र निराशा हि हाथ लगती हैं। हारकर भानु सुषमा कों गोद मे उठा लेता हैं औऱ निचे आँ जाता हैं घऱ मे पर्याप्त रौशनी थि औऱ एक् गहरी शांति फैली हुई थि। भानु सुषमा कों उसके कमरे मे लेँ जाता हैं औऱ बेड पऱ सुला देता हैं। सोयी हुई अपनी मां पऱ भानु कों बहोत प्रेम आता हैं। वो निचे झुकता हैं औऱ उसकेगाल पऱ चूमता हैं फिन चादर ओढ़ाकर वापिस ऊपर आँ जाता हैं। उसकामन करता हैं कि वो कुछदेर औऱ वंहा बैठे परन्तु रात काफ़ी हौ चुकी थि। सारा सामान समेटकर सोनेचला जाता हैं.
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बहोत बहोत शुक्रिया मेरीजान, बससंग रहें, दिलचस्पी कि सीमा लाँघने केँ लिए
आप् केँ तोँ कहने हि क्याँ जनाब, हमेसा इंतज़ार मे रहते हें आप् मेरी update कों लेकर, इतने प्यार केँ लिए शुक्रिया जँहापनाह
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