Doctor मां – New Episode
दोपहर केँ 2:15 बजरहे थें। कमरे मे पसरा सन्नाटा अंजलि केँ मन मे चलरहे युद्ध कों औऱ गहराकर रहा थां। आर्यन कि गोद मे उसकासिर थां, औऱ हाथउस 7 इंच केँ कड़क फौलाद पर्र टिका थां जोँ नेकर केँ ऊपर सें हि अपनी मौजूदगी दर्जकरा रहा थां। अंजलि इस वक़्त एक् ऐसी ऊहापोह मे थि जहाँ संस्कार, ममता, हवस औऱ सहानुभूति कां एक् अजीब मिश्रण बन चुका थां।
अंजलि कि मानसिकता कों अगर गहराई सें समझाजाए, तोँ वो इस टाइमतीन रास्तों केँ चौराहे पऱ खड़ी थि:
अंजलि एक् ऐसी महिला थि जिसने अपनी मर्यादाएँ पहले हि आर्यन केँ कदमों मे ढेरकर दि थीं। उसकेमन केँ एक् कोने मे ये 'गंदी फंतासी' हिलोरे लें रही थि कि जोँ सुख वो भोगरही हैं, उसमें उसकीसगी बेहन भि शामिल होँ। वो कल्पना कररही थि कि जब उसका जवान बेटा उसकी बेहन (कंचन) कों अपनी मर्दानगी केँ नीचे कुचलेगा औऱ वो स्वयं उस दृश्य कों देखेगी, तोँ वो सुख कैसा होगा। उसे लगरहा थां कि अगर उसने कंचन कों शामिल नहि किया, तौ उसकीये 'त्रिकोणीय हवस' हमेशा केँ लिए अधूरी रह जाएगी।
अंजलि कंचन सें प्रेम करती थि। उसे अपनी बेहन कि 'सूनीकोख' कां दर्द चुभता थां। एक् स्त्री होने केँ नाते वो जानती थि कि बांझपन कां दंश एक् औरत कों अंदर हि अंदरमार देता हैं। उसकेमन मे ये विचार आया कि— "क्याँ पता, आर्यन कि इस फौलादी मर्दानगी मे वोँ दम होँ जोँ कंचन केँ पति केँ ठंडेबदन मे नहि हैं?" उसेलगा कि ये मात्र हवस नहि, बल्कि अपनी बेहन कि सहायता करने कां एक् 'अजीब' तरीका भि हौ सकता हैं। वो कंचन कों उस भक्ति केँ नीरस जिंदगी सें निकालकर फिन सें एक् 'औरत' कि तरह जीवंत देख्ना चाहती थि।
मगर वहीं, उसका एक् हिस्सा कांप भि रहा थां। कंचनअब 'पवित्रता' कां चोलाओढ़ चुकी हैं। अगर आर्यन नें उसेहाथ लगाया औऱ उसने विद्रोह कर दिया, तोँ पूरा परिवार तबाह होँ जाएगा। अंजलि डररही थि कि कहीं वो अपनी बेहन कों एक् ऐसेनरक मे न् धकेलदे जहाँ सें वापसी मुमकिन न् हौ।
एक् स्त्री कि मानसिकता मे जब 'सहानुभूति' औऱ 'वासना' हाथ मिला लेती हें, तौ वो बड़े सें बड़ा जोखिम उठाने कों रेडी होँ जाती हैं। अंजलि नें महसूस किया कि कंचन कि भक्ति असल मे उसकी अतृप्ति कां हि दूसरा नाम हैं। वो सोचने लगी कि अगर वो कंचन कों आर्यन केँ लगभग लाती हैं, तौ वो एक् संगदो काम करेगी—अपनी बेहन कि प्यास बुझाएगी औऱ अपनी स्वयं कि फंतासी कों हकीकत मे बदलेगी।
"आर्यन." अंजलि नें धीरे-धीरे सें उसकाहाथ दबाते हुएकहा, उसकी आँखों मे एक् अजीब सि चमक औऱ डर एक् संग थां। "तुँ जानता हैं तुँ आग सें खेलरहा हैं। कंचन वैसी नहि हैं जैसी मे हूं। वोँ मंदिर कि चौखट छोड़कर तेरे पलंग तक आसानी सें नहि आएगी। मगर। मगर मे उसे तड़पते हुए भि नहि देख सकती। उसकीकोख कों भरने केँ लिएअगर यह गुनाह भि करनापड़े, तौ शायद मे सजधजकर हूं। "
अंजलि नें अपने होंठ भींचे औऱ आर्यन कि आँखों मे झाँका। उसनेतय कर लिया थां कि वो कंचन कों बुलाएगी। उसे यकीन थां कि आर्यन कां ये 7 इंच कां चमत्कार जब कंचन केँ सामने होगा, तौ उसकी सारी भक्ति औऱ पूजा-पाठ धरे केँ धरेरह जाएंगे।
"ठीक हैं। मे उसे मोबाइल करती हूं। पर्र याद रखना, आज केवलउसे 'आमंत्रण' देना हैं, उसे डराना नहि। " अंजलि नें कांपते हाथों सें अपना मोबाइल उठाया।
अंजलि नें गहरी साँसली औऱ अपने थरथराते हाथों सें मोबाइल कां डायलपैड खोला। पास हि लेटा आर्यन अपनी शिकारी नज़रों सें अपनी मां केँ चेहरे केँ बदलते हाव-भाव देखरहा थां। उसेपता थां कि ये एक् मोबाइल कॉलआई उनकेइस 'वर्जित खेल' मे एक् नया औऱ बड़ा अध्याय जोड़ने वाला हैं।
मोबाइल कि घंटी बजते हि अंजलि कां दिल ज़ोर-ज़ोर सें धड़कने लगा। दूसरी तरफ सें एक् शांत औऱ सौम्य आवाज़ आई— "हेलो, जीजी?जय XXXXXX!"
अंजलि नें अपनी आवाज़ कों सामान्य किया औऱ बड़ी चतुराई सें बातचीत शुरुआत कि। "जय XXXXX कंचन! कैसी हैं तूँ? बसआज सुभह सें तेरी बहोत याद आँ रही थि। मन बहोत भारी-भारी सां लगरहा थां, सोचा तुझसे बातकर लूँ। " कंचन नें अपनी आदतन मिठास सें जवाब दिया औऱ अपने घऱ-परिवार औऱ पूजा-पाठ कि बातें करनेलगी।
अंजलि नें धीरे-धीरे सें अपनीचाल चली। "कंचन, मेरा बहोत मन थां कि मे तेरेपास कुछदिन केँ लिए आँ जाऊँ, पऱ देख नाँ। आर्यन कां कॉलेज चलरहा हैं। घऱ पर्र वोँ अकेला हैं, उसे छोड़कर मे कहींजा नहि सकती। पर्र सच कहूँ तोँ आज अकेली हूं औऱ मन बहोत दुःखी हैं। " अंजलि कि आवाज़ मे जौ 'अकेलेपन' कां दर्द थां, उसने कंचन केँ ममतामयी औऱ कोमलदिल पऱ असर किया।
जब अंजलि नें उसेघऱ आने कों कहा, तौ कंचन नें पहले हिचकिचाते हुएमना किया। "जीजी, आप् जानती हें मंदिर मे आज विशेष पाठ हैं, औऱ फिनघऱ पऱ भि.। " मगर अंजलि नें हार नहि मानी। उसने थोडा ज़ोर देतेहुए कहा, "क्याँ अपनी बेहन केँ लिए एक् दिन नहि निकाल सकती? क्याँ पताफिन कब मौका मिले। "
अंजलि कि ज़िद केँ आगे कंचन पिघल गई। उसने एक् ठंडी साँसभरी औऱ कहा, "ठीक हैं जीजी, आप् इतनाकह रही हें तोँ मे आजसाम कों आती हूं। पऱ मात्र एक् रात केँ लिए.कल सुभह मुझे जल्द वापस निकलना होगा। "
यहा कंचन कि मानसिकता कों समझना बहोत दिलचस्प हैं। वो जोँ 'केवल एक् रात' कि शर्तरख रही हैं, वो असल मे उसके अपनेडर कां बचाव हैं। वो जानती हैं कि अंजलि केँ घऱ जाने कां मतलब हैं पुरानी यादों कां ताज़ा होना। उसके अवचेतन मन मे कहीं न् कहींउस 'पुरानी आग' कां खौफ हैं, इसलिये वो स्वयं कों यकीन दिलारही हैं कि वो जल्दलौट आएगी। उसे ज़रा भि अंदाज़ा नहि हैं कि अंजलि कां 'अकेलापन' महज़ एक् जाल हैं औऱ उसका जवान भतीजा उसके स्वागत केँ लिए अपने 7 इंच केँ हथियार केँ संग रेडीखड़ा हैं।
जैसे हि अंजलि नें मोबाइल काटा, आर्यन नें झटके सें उसे अपनी बाहों मे भर लिया। "मान गई नाँ वोँ? देखा मां। आपकी आवाज़ मे जौ चमत्कार हैं, उससे वोँ बच नहि पाई। "
अंजलि कां चेहरा अब पसीने सें भीग चुका थां। उसने आर्यन कि आँखों मे देखा औऱ फुसफुसाते हुएकहा, "वोँ आँ रही हैं आर्यन। पर्र याद रखना, वोँ मेरी बेहन हैं। उसकेसंग जोँ भि होगा, उसकी ज़िम्मेदारी तेरी हैं। तूनेउसे 'एक् रात' केँ लिए बुलाया हैं, पऱ मुझेडर हैं कि यहरात हम् तीनों कि ज़िंदगी बदल देगी। "
दोपहर केँ 3 बजरहे थें। बाहर् सूरज अपनी पूरी तपिश पर्र थां, मगर कमरे केँ अंदर कां माहौल अबउस 'एक् रात' कि कल्पना सें औऱ भि अधिकगरम औऱ भारी हौ चुका थां। कंचन मासी कां मोबाइल कटते हि आर्यन केँ अंदर कां शिकारी पूरीतरह जागउठा। उसनेअब कोई ढोंग याँ मर्यादा बनाए रखने कि ज़रूरत नहि समझी।
अंजलि अभि मोबाइल हाथ मे लिएसोच हि रही थि कि उसने क्याँ कर दिया हैं, तभी आर्यन नें एक् झटके सें अपना नेकर नीचे उतार दिया।
अंजलि कि नज़रें जैसे हि नीचेगईं, उसकेगले मे थूकसूख गय़ा। आर्यन कां 7 इंच कां काला फौलाद किसी खूंखार जानवर कि तरह आज़ाद होकर उसके चेहरे केँ ठीक सामने लहरारहा थां। उसकी नसें उभरी हुई थीं औऱ वो उत्तेजना केँ मारे फड़करहा थां।
आर्यन इस वक़्त पूरीतरह 'डोमिनेंट' मानसिकता मे थां। वो अपनी मां कों ये एहसास कराना चाहता थां कि अब वो उस मोड़ पर्र हैं जहाँ सें वापसी कां कोई मार्ग नहि हैं। नेकर उतारकर उसनेये साफकर दिया कि कंचन मासी कां आनां महज़ एक् मुलाकात नहि, बल्कि एक् 'शिकार' कि शुरुआत हैं। वो अपनी मां कि आँखों मे उस७इंच केँ प्रति 'खौफ' औऱ 'हवस' कां मिला-जुला भाव देख्ना चाहता थां।
अंजलि कि स्थिति बहोत जटिल थि। एक् तरफ वो अपनीसगी बेहन केँ लिए चिंतित थि, मगर दूसरी तरफ अपने सामने उस नंगे, कड़क औऱ विशाल अंग कों देखकर उसकाबदन फिन सें जवाब देनेलगा थां। एक् महिला कि मानसिकता मे जब'भय' औऱ 'कामुकता' कां मिलन होता हैं, तोँ वो औऱ भि अधिक उत्तेजित हौ जाती हैं। उसेलग रहा थां कि उसका बेटा अब एक् ऐसा'नर' बन चुका हैं जौ उसकी पूरी नस्ल पऱ कब्ज़ा करने कि ताकत रखता हैं।
जब एक् स्त्री अपने सामने उस पुरुष अंग कों इतना कड़क औऱ बेबाक देखती हैं, जिसे उसने स्वयं पैदा किया हौ, तोँ उसके अंदर 'नैतिकता' औऱ 'प्रकृति' केँ बीच एक् भीषण युद्ध छिड़ जाता हैं।
अंजलि कों उस७इंच केँ लोहे कों देखकर ये यकीन होँ गय़ा कि कंचन कि बरसों कि तपस्या औऱ 'बांझपन' कां सन्नाटा इस प्रहार केँ सामने टिक नहि पाएगा। उसेलगा कि येअंग मात्र हवस कां साधन नहि, बल्कि एक् 'विनाशकारी शक्ति' हैं।
अंजलि नें अनजाने मे हि अपनीजीभ अपने सूखे होंठों पऱ फेरी। आर्यन कां जान-बूझकर नंगा होना उसकेलिए एक् मेसेज थां— "अब तूँ केवल मेरी मम्मी नहि, मेरीइस योजना कि साझीदार हैं। " वो उस नग्नता कों ठुकरा नहि सकी, बल्कि उसे एक् अजीब सि 'प्रशंसा' केँ संग देखती रही।
आर्यन नें बिनाकुछ बोले अपनी मां केँ चेहरे कों अपनीओर मोड़ा औऱ अपना वोँ दहकता हुआअंग उसके गालों सें छुआ दिया। "देख रही होँ मम्मी? यह कंचन मासी केँ स्वागत केँ लिए रेडी हैं। 12 साल कां सूखाअब इसी सें समाप्त होगा। "
अंजलि कां बदन थरथरा उठा। उसने महसूस किया कि आर्यन अब किसी कि नहि सुनेगा। "तूँ। तुँ पागल हौ गय़ा हैं आर्यन। वोँ तेरी मासी हैं, " अंजलि नें फुसफुसाते हुएकहा, मगर उसकेहाथ अनजाने मे हि उस७इंच केँ फौलाद कि ओरबढ़ रहे थें।
दोपहर केँ 3:15 बजरहे थें। कमरे मे सन्नाटा इतना गहरा थां कि अंजलि केँ दिल कि धड़कनें साफ सुनीजा सकतीथीं। आर्यन अबखाट केँ किनारे पऱ किसी सिंहासन पर्र बैठे सम्राट कि तरहबैठ गय़ा। उसकी टांगें फैली हुइ थीं औऱ उसकेबीच सें निकलता वो 7 इंच कां फौलादी मूसलऊपर कि ओरसिर उठाए अंजलि कों चुनौती देरहा थां।
आर्यन नें अपनी आँखों सें एक् तीखा औऱ अधिकारपूर्ण इशारा नीचे कि ओर किया। वो इशारा एक् बेटे कां नहि, बल्कि एक् स्वामी कां थां। अंजलि, जोँ अब तक कांपरही थि, उस इशारे केँ सम्मोहन मे ऐसी बंधी कि उसके घुटने अपने आप् ज़मीन पर्र टिकगए।
ज़मीन पऱ घुटनों केँ बल बैठी अंजलि कि नज़रें ठीकउस विशाल अंग पऱ थीं। इस दृश्य कों अगर एक् महिला कि मानसिकता सें समझाजाए, तोँ ये पूर्ण समर्पण कां क्षण थां।
अंजलि केँ सामने वहीअंग थां जिसने सुभहउसे बेदमकर दिया थां। अब वो उसे अपनी आँखों केँ इतना लगभग पाकर मंत्रमुग्ध थि। उसने अपनी कांपती उंगलियों सें उस मूसल कों छुआ। वो आग कि तरहगरम थां औऱ उसकी नसें किसी जीवित साँप कि तरह फड़करही थीं।
अंजलि नें धीरे धीरे अपना मुँह खोला। उसने अपनी नज़रों कों ऊपर उठाकर एक् बार आर्यन कों देखा, जैसे वो आखिरी अनुमति माँगरही होँ। आर्यन नें उसके बालों कों मुट्ठी मे जकड़ा औऱ उसेआगे कि ओर धकेला। जैसे हि अंजलि नें उस७इंच केँ गरम फौलाद कां 'टोपा' अपने मुँह मे लिया, उसके पूरे जिस्म मे करंट दौड़ गय़ा।
एक् स्त्री केँ लिएये क्रिया सिर्फ हवस नहि, बल्कि भक्ति बन जाती हैं। उसे आर्यन केँ पसीने औऱ मर्दानगी कि वो सोंधी गंध मदहोश कररही थि। वो अपनी ज़ुबान सें उस सुपारी कों सहलाने लगी। उसकीलार नें उसअंग कों औऱ भि चमकीला औऱ चिकना बना दिया थां।
जब अंजलि उसअंग कों अपने मुँह केँ अंदर लें रही थि, तौ उसकेमन मे एक् संगकई भावनाएं चलरही थीं:
वो कल्पना कररही थि कि कुछ घंटों बाद उसकी बेहन कंचन, जोँ अभि मंदिर मे पूजाकर रही हैं, उसे भि इसीतरह घुटनों केँ बल बैठकर इस 'दिव्य अंग' कि सेवा करनी होगी। ये सोचकर अंजलि केँ मुँह मे औऱ भि रसभरआया।
उसे महसूस हौ रहा थां कि उसका मुँहउस विशाल अंग कों पूरा समाने मे छोटापड़ रहा हैं। ये अहसास उसे एक् 'मादा' होने कां गौरवदे रहा थां कि वो इतने विशाल 'नर' कों तृप्त कररही हैं।
अब उसके अंदर कि 'मां' पूरीतरह मर चुकी थि। वो मात्र एक् प्यासी महिला थि, जोँ अपने बेटे कि मर्दानगी कों अपना परमेश्वर मान चुकी थि।
आर्यन नें अंजलि केँ सिर कों पकड़कर अपनीकमर केँ झटके शुरुआत किए। अंजलि कां गलाउस गहराई कों सहने कि कोशिश कररहा थां। 'गप-गप' कि आवाज़ें कमरे कि खामोशी कों चीररही थीं। अंजलि कि आँखों सें पानी निकलआया थां, पऱ वो हटना नहि चाहती थि। वो उस७इंच केँ ज़हर कों अपनीरूह तक उतार लेना चाहती थि।
वो जानती थि कि ये 'तैयारी' मात्र उसकेलिए नहि हैं। वो आर्यन कों उस 'शिकार' केँ लिए सजधजकर कररही थि जोँ साम कों इसघऱ मे कदम रखने वाली थि।
दोपहर कि उस मदहोश खामोशी मे आर्यन अब किसी औऱ हि लोक मे पहुँच चुका थां। खाट पऱ पेर फैलाकर बैठे आर्यन केँ चेहरे पर्र एक् ऐसी विजयी मुस्कान थि, जोँ सिर्फ उस पुरुष केँ चेहरे पर्र आती हैं जिसने अपनी सबसे बड़ी चुनौती (अपनी मम्मी) कों अपनी दासीबना लिया होँ।
अंजलि आजजिस शिद्दत औऱ कलाकारी सें उस 7 इंच केँ फौलाद कों चूसरही थि, वो आर्यन कि कल्पना सें भि परे थां। शायद मासी केँ आने कि खबर औऱ अपने अतीत केँ राज़उगल देने केँ बाद अंजलि केँ अंदर कि सारी हिचक ख़त्म हौ चुकी थि।
कमरे मे सिर्फ 'गप-गप' औऱ अंजलि कि भारी साँसों कि आवाज़ें गूँजरही थीं। इस दृश्य कों यदि गहराई सें देखाजाए, तौ ये मात्र एक् शारीरिक क्रिया नहि, बल्कि अंजलि कां आर्यन कि मर्दानगी केँ प्रति पूर्ण समर्पण थां।
अंजलि अपनी ज़ुबान कां इस्तेमाल किसी कलाकार कि तरहकर रही थि। वो कभीउस सुपारी केँ चारों ओर अपनी ज़ुबान फिराती, तौ कभी पूरे७ इंच केँ लट्ठ कों अपनेगले कि गहराई तक उतार लेती। उसकी आँखें बंदथीं औऱ वो उसअंग केँ एक्-एक् रेशे कों अपनीजीभ सें महसूस कररही थि। उसेपता थां कि आर्यन कों कहां औऱ केसे सबसे ज्यादा सुख मिलता हैं।
आर्यन नें अपनासिर पीछे कि ओर झुका लिया। उसकी आँखें आधीबंद थीं औऱ उसकेहाथ अंजलि केँ बालों मे मजबूती सें धंसेहुए थें। उसेऐसा महसूस हौ रहा थां जैसे अंजलि कि गरम औऱ गीली गुफा उसके पूरे अस्तित्व कों सोखरही होँ। अंजलि कि लार नें उसअंग कों इतना चिकना बना दिया थां कि वो बिना किसी घर्षण केँ उसके मुँह केँ अंदर-बाहर् हौ रहा थां।
आर्यन केँ लिए सबसे बड़ा खुशी शारीरिक नहि, बल्कि मानसिक थां। वो देखरहा थां कि वो स्त्री, जौ कल तक उसे नैतिकता कां पाठ पढ़ाती थि, आज उसके पैरों केँ बीच घुटनों केँ बल बैठकर उसके पसीने औऱ उसकीमहक कां स्वाद लें रही हैं। ये अहसास उसे एक् अजेय पुरुष बनारहा थां।
अंजलि आज अपनी पूरी 'औरतियत' कों झोंकरही थि। उसकी मानसिकता अब एक् ऐसी प्रेमिका कि थि जोँ अपने प्रेमी कों उस शिखर पऱ पहुंचा देना चाहती हैं जहाँ सें उसे दुनिया कि कोई औऱ चीज़ नज़र न् आए।
अंजलि केँ मन मे कहीं न् कहींये बात भि थि कि साम कों कंचनआने वाली हैं। वो चाहती थि कि आर्यन कों वो इतनासुख देदे कि जब कंचनआए, तोँ आर्यन उसकी तुलना अंजलि सें करे औऱ अंजलि कों हि 'श्रेष्ठ' पाए।
वो आर्यन केँ अंदर केँ उस 'ज्वालामुखी' कों शांत करने केँ बजायउसे औऱ भड़का रही थि। वो चाहती थि कि जब कंचनइस कमरे मे कदमरखे, तौ आर्यन कि भूख इतनी प्रबल हौ कि वो कंचन कों कच्चा चबाजाए।
आर्यन कि कमरअब अपने आप् झटके मारने लगी थि। अंजलि केँ मुँह कां दबाव औऱ उसकी ज़ुबान कि गर्मी नें आर्यन केँ धैर्य कि परीक्षा लेनी शुरुआत कर दि थि। आर्यन कां बदनअब अकड़ने लगा थां औऱ उसकी सांसें उखड़ने लगीथीं।
"उफ़्फ़। मम्मी। आज तौ तूने कमालकर दिया.बस। ऐसे हि। कंचन मासी कों भि यही सिखाना हैं तेरी." आर्यन नें हांफते हुए फुसफुसाया।
दोपहर कि उस तपती औऱ उमसभरी खामोशी मे अंजलि नें अब अपना सबसे शातिराना औऱ कामुक दांवचला। आर्यन अपने परमानंद केँ शिखर पर्र थां, उसकी आँखें बंदथीं औऱ वो बस फटने हि वाला थां कि तभी अचानक। अंजलि नें अपना मुँह पीछे खींच लिया।
वो 'गप-गप' कां म्यूज़िक अचानक रुक गय़ा। आर्यन नें एक् झटके मे अपनी आँखें खोलीं, उसका७ इंच कां फौलाद हवा मे बिना किसी सहारे केँ थरथरा रहा थां—पूरी तरह गीला, चमकीला औऱ प्यासा।
अंजलि केँ चेहरे पर्र एक् ऐसी मुस्कान थि जौ किसी देवी कि नहि, बल्कि एक् छल करने वाली अप्सरा कि थि। उसने अपने होंठों केँ कोनों पऱ लगी आर्यन कि मर्दानगी कि बूंदों कों अपनी उंगली सें साफ किया औऱ घुटनों केँ बल बैठी-बैठी हि आर्यन कि आँखों मे आँखें डालकर उसेऊपर आने कां इशारा किया।
अंजलि भूली नहि थि कि सुभह आर्यन नें उसे तड़पाया थां, उसे 'टीज़' किया थां औऱ उससे ज़बरदस्ती राज़ उगलवाए थें। वो चाहती थि कि आर्यन कों भि उस अधूरेपन कां अहसास हौ। मगर उसका बदला नफरतभरा नहि, बल्कि औऱ भि ज्यादा उत्तेजक थां। वो चाहती थि कि आर्यन स्वयं अपनेउस 'अंग' कां स्वाद लेँ जोँ अभि-अभि उसकी मां केँ मुँह कि गहराई सें बाहर् आया हैं।
आर्यन हक्का-बक्का रह गय़ा। उसका जिस्म स्खलन केँ कगार पर्र थां औऱ अंजलि नें उसेबीच मँझधार मे छोड़ दिया थां। मगरजब उसने अंजलि कां वोँ 'किस' वाला इशारा देखा, तौ उसकी रगों मे दौड़ता खूनखौल उठा। उसे समझ आँ गय़ा कि उसकी मम्मी अब मात्र एक् 'दासी' नहि रही, वो इसखेल कि 'डायरेक्टर' बनरही हैं।
आर्यन पलंग सें नीचे उतरा औऱ अंजलि केँ सामने घुटनों केँ बलबैठ गय़ा। अंजलि नें अपनी गर्दन आगे बढ़ाई औऱ आर्यन केँ होंठों कों अपने होंठों कि गिरफ्त मे लें लिया।
जैसे हि आर्यन कि ज़ुबान अंजलि केँ मुँह केँ अंदर गई, उसे अपना हि वोँ 'खारा औऱ गाढ़ा' स्वाद महसूस हुआ जौ अभि-अभि उसके७ इंच केँ लोहे सें अंजलि केँ मुँह मे लगा थां। ये एक् महिला कि मानसिकता कि पराकाष्ठा हैं—अपने प्रेमी कों उसका अपना हि अर्क चखाना।
आर्यन केँ लिएये अनुभव बिजली केँ झटके जैसा थां। अपनी हि मर्दानगी कां स्वाद अपनी मम्मी केँ लार केँ संग मिलाकर पीना.इस विचार नें उसके अंदर कि हवस कों १० गुना बढ़ा दिया। अंजलि नें उसके होंठों कों ऐसे चूसा जैसे वो उसे चिढ़ा रही हौ कि देखो, "जौ तुमने मेरेसंग किया, मे उसे तुम्हारे अंदर वापसडाल रही हूं। "
चुंबन केँ दौरान अंजलि नें एक् समय केँ लिए अपनी आँखें खोलीं। उसकी नज़रों मे एक् चुनौती थि— "क्याँ अब भि तुम्हें लगता हैं कि तुम् मुझे कंट्रोल कररहे हौ?"
कमरे कि हवाअब इतनी भारी होँ चुकी थि कि सांस लेना मुश्किल थां। आर्यन कां वोँ ७इंच कां फौलाद अब अंजलि केँ पेट सें सटकर खड़ा थां। अंजलि नें चुंबन तोड़ते हुए आर्यन केँ कान मे फुसफुसाया:
"कैसालगा अपना हि स्वाद, आर्यन? सुभह मुझे बहोत नचाया थां नाँ। अबसमझ आया कि अधूरा रहने कि प्यास क्याँ होती हैं?"
आर्यन केँ चेहरे पर्र एक् पागलपन छा गय़ा। उसने अंजलि केँ कंधों कों दबोच लिया। "मम्मी। तुँ सच मे बहोत खतरनाक होतीजा रही हैं। "
उस चुंबन केँ बाद कमरे कां तापमान जैसे उबलने लगा थां। अंजलि कि आँखों मे वोँ शरारती चमकअब एक् गहरी, आदिम प्यास मे बदल चुकी थि। आर्यन केँ होंठों पऱ अपना हि स्वाद छोड़कर अंजलि नें उसे पूरीतरह सें अपनेवश मे कर लिया थां। आर्यन कां जिस्म अब एक् ऐसे ज्वालामुखी कि तरह कांपरहा थां जोँ फटने केँ लिए छटपटा रहा हैं।
अंजलि नें देखा कि आर्यन कि सांसें उखड़रही हें औऱ उसका 7 इंच कां फौलाद अब पहले सें भि अधिक सख्त औऱ गहरालाल पड़ चुका हैं, जैसे वो खून केँ दबाव सें फट जाएगा। अंजलि नें एक् समय कि भि देरी नहि कि औऱ अपनी गर्दन झुकाकर वही वर्जित क्रिया फिन सें शुरुआत कर दि।
जैसे हि अंजलि केँ गरम होंठों नें उस दहकते हुएअंग कों दोबारा छुआ, आर्यन केँ मुँह सें एक् दबी हुई चीख निकल गई। इसबार अंजलि कां अंदाज़ बदलाहुआ थां। अब उसमें 'बदला' नहि, बल्कि एक् ऐसी 'दीवानगी' थि जैसे वो उसअंग कों अपने वजूद कां हिस्सा बना लेना चाहती होँ।
यहा अंजलि एक् ऐसी महिला कि भूमिका मे थि जौ अपने पुरुष कि मर्दानगी कों पूरीतरह सोख लेना चाहती हैं। वो अब धीरे धीरे नहि, बल्कि तेज़ी सें अपनी गर्दन हिलारही थि। उसकागला उस७इंच कि गहराई कों चुनौती देरहा थां। आर्यन कि जांघें थरथरा रहीथीं औऱ उसकेहाथ अंजलि केँ बालों कों पलंग कि चादर कि तरह भींचरहे थें।
अंजलि जानती थि कि आर्यन अब अंतिम सीमा पऱ हैं। वो अपनीजीभ सें उस सुपारी केँ निचले हिस्से कों सहलारही थि, जहाँ सें उत्तेजना कां करंट सीधा आर्यन कि रीढ़ कि हड्डी तक पहुँच रहा थां। वो चाहती थि कि आर्यन कां वोँ 'अभिषेक' सीधा उसकेहलक मे होँ, ताकि वो उसजीत कों निगलसके।
आर्यन, जौ अब तक स्वयं कों 'शिकारी' समझरहा थां, अपनी मां कि इस कलाकारी केँ सामने पूरीतरह असहाय हौ गय़ा। उसकी आँखों केँ सामने अंधेरा छानेलगा थां। उसेलग रहा थां कि अंजलि कां मुँहकोई जन्नत हैं जहाँ पहुँचकर उसकी सारीअकड़, सारा अहंकार पिघलकर बहने वाला हैं।
कमरे मे अब सिर्फ 'गप-गप-गप' कि तेज़ आवाज़ें आँ रहीथीं, जौ अंजलि कि सिसकियों औऱ आर्यन कि भारी आहों केँ संगमिल गई थीं। अंजलि केँ पसीने कि बूंदें आर्यन कि जांघों पर्र गिररही थीं।
अंजलि अब अपनी आँखें ऊपर उठाकर आर्यन कि ओरदेख रही थि—वो नज़ारा किसी भि पुरुष कों पागल करने केँ लिए बहुत थां। एक् मम्मी कां अपने बेटे केँ सामने घुटनों पऱ होना, उसकी आँखों मे हवस कां वोँ नंगानाच, औऱ मुँह मे उस विशाल अंग कि जकड़.ये दृश्य उस 'एक् रात' केँ लिए आर्यन कों पूरीतरह चार्ज कर चुका थां जौ कंचन मासी केँ संग गुज़रने वाली थि।
दोपहर केँ 4:20 बजरहे थें। कमरे कि हवा इतनी बोझिल हौ चुकी थि कि सांस लेना भि भारीलग रहा थां। अंजलि घुटनों केँ बल बैठी आर्यन केँ 7 इंच केँ फौलाद कों अपनी आत्मा तक उताररही थि। आर्यन कां जिस्म अब लकड़ी कि तरह सख्त होँ चुका थां, उसके पांवखाट पऱ कांपरहे थें।
जैसे हि अंजलि नें अपनी रेशमी हथेलियों कों नीचे लेँ जाकर आर्यन केँ Testicles कों अपनी उंगलियों सें हल्का सां सहलाया, आर्यन कि बर्दाश्त कां बांधटूट गय़ा।
अंजलि कि उस जादुई छुअन नें आर्यन केँ रीढ़ कि हड्डी मे बिजली कां ऐसा झटका दिया कि उसके मुँह सें एक् लंबीअहह निकली। उसके७ इंच केँ मूसल नें झटके मारे औऱ वीर्य कि पहली तेज़धार अंजलि केँ हलक मे जा गिरी। आर्यन नें अपनी आँखें कसकरबंद करलीं, उसका जिस्म ढीला पड़ने लगा औऱ वो परमानंद कि उस अवस्था मे पहुँच गय़ा जहाँ दुनिया धुंधली हौ जाती हैं।
आर्यन कों लगा कि अब शांति मिलेगी, मगर अंजलि आजकुछ औऱ हि तय करके बैठी थि। उसने वो सारा गाढ़ा औऱ गरम लावा अपने मुँह मे हि रोक लिया। उसनेउसे निगला नहि। जैसे हि आर्यन नें शांत होकर गहरी सांस लेनी चाही, अंजलि झपटकर उसकेऊपर चढ़ गई औऱ अपनी बाहें उसकी गर्दन मे डालदीं।
इससे पहले कि आर्यन कुछसमझ पाता, अंजलि नें अपने होंठ उसके होंठों पर्र चिपका दिए औऱ अपनी ज़ुबान उसके मुँह केँ अंदर धकेल दि। आर्यन कि अपनी हि मर्दानगी कां वोँ गरम, खारा औऱ चिपचिपा अर्क अंजलि कि ज़ुबान केँ ज़रिए उसके अपने मुँह मे वापस आँ गय़ा।
आर्यन कां जी बुरीतरह मितला उठा। स्वयं कां वीर्य अपनी हि मम्मी केँ मुँह सें वापस अपने मुँह मे लेना.ये उसकेलिए 'घिनौना' थां। उसे एक् समय केँ लिएघिन आई, उसकीरूह कांप गई। मगरइसी घृणा केँ पीछे एक् बहोत हि गहरा कामुक मनोविज्ञान थां। उसे महसूस हुआ कि उसकी मां नें उसे पूरीतरह सें अपना 'गुलाम' बना लिया हैं—जहाँ उसकी मर्दानगी भि उसकी अपनी नहि रही, वो भि अंजलि कि मर्ज़ी सें उसके अंदर वापसजा रही थि।
अंजलि इस टाइम अपनीजीत कां खुशी लें रही थि। एक् स्त्री केँ लिए अपने पुरुष कों उसका अपना हि 'अर्क' पिलाना Ultimate Dominance कि निशानी होती हैं।
अंजलि चाहती थि कि आर्यन कों पताचले कि वो उससेअलग नहि हैं। जोँ आर्यन केँ अंदर हैं, वो अंजलि कां हैं, औऱ जौ अंजलि केँ अंदर हैं, वो अब आर्यन कां स्वाद बन चुका हैं।
अंजलि मन हि मनसोच रही थि— "जब तुँ अपनी मम्मी केँ संगये सभीकर सकता हैं, तोँ कंचन केँ संग तुम्हे कोई झिझक नहि होनी चाहिए। " वो आर्यन कि 'घिन' कों समाप्त करकेउसे एक् ऐसे स्तर पर्र लेँ जारही थि जहाँकोई भि चीज़ 'गंदी' नं रहे।
आर्यन नें अंजलि कों स्वयं सें थोडा दूर ढकेला, उसके होंठों पऱ अब भि उस गाढ़े सफेद द्रव्य कि लकीरें थीं। उसने अपनीथूक गटकते हुए अंजलि कों देखा। उसकी नज़रों मे अब भि घिन थि, पर्र जिस्म उस अपमानजनक सुख सें बुरीतरह कांपरहा थां।
"मम्मी। तूँ। तूँ पागल होँ गई हैं। यह क्याँ किया तूने?" आर्यन नें हांफते हुए अपना मुँहसाफ किया।
अंजलि नें अपने होंठों कों अपनी ज़ुबान सें चाटा औऱ मुस्कुराते हुए बोलीं, "स्वाद कड़वा हैं, पऱ यही तोँ असली सच्चाई हैं आर्यन। अबजा, नहा लेँ। साम कों कंचन आँ रही हैं। उसे तौ तूँ इससे भि कड़वा स्वाद चखाएगा नां?"
आर्यन कां मनइस टाइम किसी तेज़ घूमने वाले चक्रवात कि तरह थां। वो हक्का-बक्का होकर अंजलि कों देखरहा थां, जोँ पलंग पऱ बिखरे हुए बालों औऱ चेहरे पऱ एक् विजयी मुस्कान लिए बैठी थि। आर्यन केँ मुँह केँ अंदरअब भि वो अपनी हि मर्दानगी कां खारा औऱ चिपचिपा स्वाद महसूस कररहा थां, जोँ अंजलि नें एक् 'वर्जित चुंबन' केँ ज़रिए उसके अंदर वापस धकेल दिया थां।
आर्यन केँ लिएये अनुभव 'कामुक रोमांच' औऱ 'असहज घृणा' कां एक् ऐसामेल थां जिसे वो समझ नहि पारहा थां। वो इसबात सें पूरीतरह कन्फ्यूज़ थां कि उसकी 'भोली' दिखने वाली मां अचानक इतनी शातिर औऱ शिकारी केसे हौ गई।
आर्यन लड़खड़ाते कदमों सें बाथरूम कि ओर भागा। उसने बेसिन कां नल पूरी रफ्तार सें खोल दिया औऱ अंजलि केँ उस 'गंदे प्रेम' कों मुँह सें बाहर् निकालने केँ लिए कुल्ला करनेलगा।
आर्यन जब बार-बार कुल्ला कररहा थां, तोँ उसे महसूस हुआ कि ये केवल मुँहसाफ करना नहि थां, बल्कि वो उस 'अधीनता' कों धोने कि कोशिश कररहा थां जोँ अंजलि नें उस पऱ थोप दि थि। अब तक आर्यन स्वयं कों इसखेल कां खिलाड़ी समझरहा थां, मगरआज अंजलि नें साबित कर दिया कि वो केवल एक् मोहरा नहि हैं—वो शतरंज कि बिसात बिछाने वाली असली 'क्वीन' हैं।
बाथरूम केँ बाहर् पलंग पऱ बैठी अंजलि आर्यन कि हरकतों कों सुनरही थि। वो जानती थि कि आर्यन कों घिन आँ रही हैं, औऱ यही उसका असली 'मास्टरस्ट्रोक' थां। वो चाहती थि कि आर्यन कां अहंकार थोडा टूटे, ताकि वो कंचन मासी केँ आने पर्र औऱ भि अधिक सावधानी औऱ शिद्दत सें कामकरे।
अंजलि धीरे-धीरे सें उठी औऱ बाथरूम केँ दरवाज़े पर्र आकर खड़ी हौ गई। उसने देखा कि आर्यन आईने मे स्वयं कों देखरहा हैं, उसके होंठ कुल्ला करने केँ कारणलाल हौ चुके थें।
अंजलि नें महसूस किया कि अब आर्यन उसकी मुट्ठी मे हैं। जब एक् स्त्री अपने पुरुष कों उसके अपने हि 'अर्क' कां स्वाद चखा देती हैं, तोँ वो उस पुरुष केँ मन सें हरतरह कि झिझक समाप्त कर देती हैं।
वो आर्यन केँ पास गई औऱ उसके पीछे खड़ी होकर आईने मे उसकी आँखों सें आँखें मिलाईं। "क्यूं? बहोत घिन आँ रही हैं? आर्यन, अगर तुँ अपनी हि चीज़ सें घिन करेगा, तोँ दुनिया कों केसेफतह करेगा? यादरख, साम कों जब कंचनयहा होगी, तोँ तेरीउसे भि इसी स्वाद तक पहुँचाना हैं। "
आर्यन नें तौलिए सें अपना मुँह पोंछा औऱ पलटकर अंजलि कों देखा। उसकी कन्फ्यूजन अब आरामसे एक् ठंडे इरादे मे बदलरही थि। अंजलि कि इस 'घिनौनी' हरकत नें उसे मानसिक रूप सें औऱ भि पत्थर बना दिया थां।
"मम्मी। आपने जोँ किया, वोँ मे कभी नहि भूलूँगा। पऱ अब मुझेसमझ आँ गय़ा कि आप् क्याँ चाहती हें। आप् चाहती हें कि मे पूरीतरह सें एक् जानवर बन जाऊँ। ठीक हैं। तौ साम कों कंचन मासी कां स्वागत एक् जानवर हि करेगा। "
Doctor मां – New Episode
बाथरूम कि उस ठंडी दीवार केँ सहारे आर्यन खड़ा थां, मुँह मे अब भि उस कड़वेपन कां अहसास बाकी थां, मगर अंजलि आज अपनी 'महारानी' वाली भूमिका कों आखिरी पड़ाव तक लें जाने पर्र आमादा थि। जैसे हि आर्यन नें तौलिए सें अपना मुँह पोंछा, अंजलि नें बिजली कि फुर्ती सें उसेफिन सें दीवार सें सटा दिया।
अंजलि कि आँखों मे इस टाइम एक् ऐसीचमक थि जोँ आर्यन नें पहलेकभी नहि देखी थि। ये एक् 'अल्फा फीमेल' कि चमक थि, जिसने अपनेशेर कों घुटनों पऱ ला दिया थां।
अंजलि नें बिना किसी चेतावनी केँ अपने होंठ आर्यन केँ होंठों पऱ फिन सें जड़दिए। वही वीर्य कां खारा औऱ गाढ़ा स्वाद, जोँ अब अंजलि कि लार केँ संग मिलकर औऱ भि तीव्र होँ चुका थां, फिन सें आर्यन केँ मुँह केँ अंदर घुसने लगा। आर्यन नें झटके सें अपनासिर पीछे हटाना चाहा, उसकेहाथ अंजलि केँ कंधों कों दूर धकेलने कि कोशिश करनेलगे। "नहि मां। प्लीज़। अभि नहि." वो बुदबुदाया, उसका चेहरा घिन केँ मारे सिकुड़ रहा थां।
मगर अंजलि हार मानने वालों मे सें नहि थि। उसने अपनीचाल चली—उसने अपना दाहिना हाथ नीचे लें जाकर आर्यन केँ ढीले पड़तेहुए Testicles कों अपनी मुट्ठी मे भर लिया। उसने उन्हें इतनीज़ोर सें औऱ इतनी चतुराई सें दबाया कि आर्यन केँ बदन मे दर्द औऱ एक् अजीब सि 'मजबूरी वाली उत्तेजना' कां करंटदौड़ गय़ा।
जैसे हि अंजलि नें नीचे सें दबाव बनाया, आर्यन कि गर्दन अपने आप् झुक गई औऱ उसका मुँहखुल गय़ा। अंजलि नें अपनी पूरी ज़ुबान उसकेहलक तक डाल दि। अब आर्यन चाहकर भि पीछे नहि हट सकता थां। उसे अपनी हि मर्दानगी कां वोँ अर्क, जोँ उसकी मम्मी केँ मुँह मे 'पवित्र' होँ चुका थां, वापस पीना हि पड़ा।
इस लम्हा मे दोनों कि मानसिकता कामुकता केँ एक् ऐसे अंधेरे मोड़ पर्र थि जहाँ सें आम इंसान कां सोचना बंद हौ जाता हैं:
आर्यन कों घिन तौ आँ रही थि, मगर जैसे-जैसे अंजलि कि उंगलियाँ उसके अंडकोषों सें खेलरही थीं, उसकाबदन फिन सें प्रतिक्रिया देनेलगा। उसे अपनी हि 'गंदगी' कां स्वाद अब एक् 'नशे' कि तरह लगनेलगा। एक् पुरुष कि मानसिकता मे जबउसे किसीऐसी चीज़ कों करने पऱ मजबूर किया जाता हैं जिससे उसे घृणा हौ, तौ वो 'अपमान' उसे औऱ भि भयानक तरीके सें उत्तेजित कर देता हैं। उसेलगा कि वो अब अपनी मां कां बेटा नहि, उसका खिलौना बन चुका हैं।
अंजलि कां मकसद सिर्फ बदला लेना नहि थां। वो आर्यन केँ दिमाग़ सें 'घिन' कां शब्द हि मिटा देना चाहती थि। वो चाहती थि कि साम कों जब कंचन मासीयहा हौ, तोँ आर्यन केँ अंदरकोई झिझक नं रहे। उसे पता थां कि जबकोई पुरुष अपनी मां कां वीर्य युक्त चुंबन लें सकता हैं, तौ वो दुनिया कां कोई भि 'पाप' बेहिचक कर सकता हैं। वो आर्यन कों 'परम-कामुक' बनारही थि।
अंजलि नें आखिरकार उसके होंठ छोड़े। आर्यन हाँफरहा थां, उसके होंठों पऱ लार औऱ वीर्य कि एक् गीलीपरत जमी थि। अंजलि नें अपनी उंगली सें उसके होंठसाफ किए औऱ उसे चखतेहुए बड़ी बेबाकी सें बोलि:
"अब कैसालगा? अब तौ घिन नहि आँ रही नां? यादरख आर्यन, कंचन केँ सामने तुम्हें इससे भि अधिक निडर होना होगा। वोँ पूजा करने वाली महिला हैं, उसे तुम्हें अपनीइस 'गंदी' दुनिया कां स्वाद चखाना हैं। "
आर्यन नें एक् गहरी सांसली। उसकी नज़रों मे अबघिन कि स्थान एक् 'ठंडा पागलपन' आँ चुका थां। वो समझ गय़ा थां कि अंजलि नें उसे एक् ऐसीआग मे झोंक दिया हैं जहाँअब मात्र तबाही औऱ चरमसुख हैं।
शावर सें गिरती ठंडी पानी कि बौछारें आर्यन केँ बदन पर्र पड़रही थीं, मगर उसके दिमाग़ केँ अंदर कि आग बुझने कां नाम नहि लेँ रही थि। आर्यन इस वक़्त एक् ऐसी 'सुन्न अवस्था' मे थां जहाँउसे होश औऱ मदहोशी केँ बीच कां अंतरसमझ नहि आँ रहा थां।
अंजलि केँ उस वीर्य युक्त 'फ्रेंच किस' नें आर्यन कि मर्दानगी केँ अहंकार कों भीतर तक झकझोर दिया थां। उसेलग रहा थां कि वो एक् शिकारी सें सिमटकर एक् 'शिकार' बन गय़ा हैं। मगरइसी टूटन मे उसे एक् ऐसामजा मिलरहा थां जौ उसनेकभी कल्पना मे भि नहि सोचा थां—अपनी हि मां केँ हाथों पूरीतरह 'बर्बाद' होने कां मजा।
शावर केँ नीचे दोनों केँ नग्नबदन पानी मे भीगरहे थें। पानी कि बूंदें अंजलि केँ गोरे औऱ भरेहुए शरीर सें फिसलकर नीचेगिर रहीथीं। आर्यन अभि भि थोड़ा खोया-खोया सां थां, अंजलि कि उस हरकत कां असर उसके दिमाग़ पऱ गहरा थां।
आर्यन कों महसूस होँ रहा थां कि अंजलि नें उसके होंठों औऱ मुँह केँ ज़रिए उसके पूरे वजूद पर्र अपना कब्ज़ा कर लिया हैं। एक् पुरुष कि मानसिकता मे उसका 'वीर्य' उसकी शक्ति कां प्रतीक होता हैं, औऱ अंजलि नें उसी शक्ति कों उसे 'वापस' पिलाकर ये साबित कर दिया कि आर्यन अब पूरीतरह उसके प्रभाव मे हैं। इस अहसास नें आर्यन कों थोड़ा कमज़ोर, मगर बहोत ज़्यादा कामुक बना दिया थां।
नहाते समय अंजलि नें बड़े प्रेम सें आर्यन केँ शरीर पऱ साबुन लगाया। उसने आर्यन केँ चेहरे कों सहलाया जैसे वो उसे चखने केँ बादअब उसे सहलारही होँ। "घबरामत मेरेशेर। यह तोँ बस शुरुआत थि। मैंने तुम्हें बसउस 'मर्यादा' केँ बोझ सें आज़ाद किया हैं जौ तुम्हे रोकरही थि। अब तुँ कंचन केँ सामने एक् नया आर्यन होगा। "
दोनों नें एक्-दूसरे कों अच्छे सें नहलाया। शावर केँ नीचे आर्यन कि कन्फ्यूजन आरामसे शांत हुइ औऱ उसकी स्थान एक् 'ठंडे औऱ हिंसक आत्मविश्वास' नें लेँ ली। उसनेसमझ लिया कि अगर वो अपनी मां केँ संगइस हद तक जा सकता हैं, तोँ कंचन मासी कां 'पवित्र' किला ढहाना उसकेलिए बच्चों कां खेल होगा।
बाथरूम सें बाहर् निकलकर दोनों नें स्वयं कों सुखाया। कमरे मे अब इत्र औऱ लोशन कि खुशबू फैल चुकी थि।
अंजलि नें अपनी अलमारी सें एक् ऐसी साड़ी निकाली जौ दिखने मे तौ सोबर थि, मगर उसका कपड़ा इतना बारीक थां कि रोशनी पड़ते हि उसके जिस्म कि बनावट साफ झलकती थि। उसने गहरा सिंदूर लगाया औऱ अपनी आँखों मे वहीचमक बरक़रार रखी।
आर्यन नें एक् फिटिंग वाली शर्ट औऱ ट्राउजर पहना। वो अब पहले सें कहीं ज्यादा शांत औऱ खतरनाक दिखरहा थां। उसकी आँखों मे अब वो 'घिन' नहि थि, बल्कि एक् ऐसीभूख थि जौ केवल कंचन मासी केँ आने पऱ हि शांत होने वाली थि।
ड्राइंग रूम कि लाइटें थोड़ी मद्धम कर दि गईं। अंजलि नें रसोई मे गरमचाय औऱ नाश्ते कि तैयारी शुरुआत कि, जबकि आर्यन सोफे पर्र बैठकर दरवाज़े कि तरफ देखने लगा। उसके मुँह मे अब भि अंजलि केँ उस चुंबन कि हल्की सि कड़वाहट औऱ खुशबू बाकी थि, जोँ उसेयाद दिलारही थि कि वो अब किसी भि हद कों पार करने केँ लिए रेडी हैं।
"जीजी। मे पहुँच गई हूं, बसऑटो सें उतररही हूं। "
अंजलि केँ मोबाइल पऱ कंचन मासी कां मैसेज फ्लैश हुआ।
ड्राइंग रूम मे मद्धम रोशनी औऱ इत्र कि खुशबू केँ बीच अंजलि नें आर्यन कों अपने लगभग बुलाया। उसकी आवाज़ मे अब एक् 'मास्टरमाइंड' कि गंभीरता थि। वो जानती थि कि कंचन जैसी 'पवित्र' औरत कों सीधे रास्ते पर्र लाना मुमकिन नहि हैं, इसकेलिए शतरंज कि चालें बहोत हि सफाई सें चलनी होंगी।
अंजलि नें आर्यन कि शर्ट केँ कॉलरठीक किए औऱ उसकी आँखों मे झाँकते हुए धीरे-धीरे सें फुसफुसाया:
"आर्यन, ध्यान सें सुन। जैसे हि कंचन अंदर आएगी, तुँ उसे नमस्कार करके थोड़ी देर बैठेगा, औऱ फिन एक्सक्यूज़ बनाकर मार्केट निकल जाएगा। उसेयह नहि लगना चाहिए कि तूँ यहा ताक-झांक कररहा हैं। उसेसहज महसूस कराना मेराकाम हैं। जब तक तुँ बाहर् रहेगा, मे उसकी ज़मीन रेडी करूँगी। "
अंजलि नें अपनी आवाज़ औऱ धीमीकर ली। "मार्केट सें कुछघऱ कां राशन-पानी लेँ आनां ताकिशक न् होँ, मगर सबसे ज़रूरी चीज़— कॉन्डम केँ पैकेट औऱ लुब्रिकेशन लानामत भूलना। कंचन सालों सें 'सूखी' पड़ी हैं, उसकाबदन इस वक़्त पत्थर जैसा होगा। उसे इस७इंच कों बर्दाश्त करने केँ लिए 'सहायता' कि ज़रूरत पड़ेगी। "
"सामान लाकर तूँ चुपचाप रसोई मे रख देना औऱ बिना किसी हंगामा केँ अपने कमरे मे चला जानां। मे उसे बातों मे फंसाकर उस मानसिक स्थिति मे लेँ आऊँगी जहाँ वोँ अपनी 'मर्यादा' औऱ 'भक्ति' कों भूलने लगेगी। जब मे तुम्हें इशारा करूँगी, तभी तूँ बाहर् आनां। "
यहा अंजलि एक् ऐसी 'प्रॉक्सी शिकारी' कि तरह बर्ताव कररही हैं जोँ अपने शिकार कों पहले चारा डालती हैं औऱ फिनउसे अपनेजाल मे फंसाती हैं।
अंजलि जानती हैं कि कंचन अपनी बड़ी बेहन पऱ आँखबंद करके भरोसा करती हैं। वो पहले एक् 'दुखी औऱ सहानुभूति रखने वाली बेहन' बनकर कंचन केँ दिल कि गहराई मे छिपे राज़ औऱ उसकी अधूरी कोख कि टीस कों कुरेदेगी।
आर्यन कों कॉन्डम औऱ लुब्रिकेंट लाने भेजना ये दर्शाता हैं कि अंजलि इसखेल कों लेकर कितनी गंभीर औऱ योजनाबद्ध हैं। वो चाहती हैं कि जब 'क्रिया' शुरुआत होँ, तौ कोई रुकावट नं आए। उसे पता हैं कि कंचन कां बदनडर औऱ बांझपन केँ कारण शुरुआत मे विरोध करेगा, इसलिये वो लुब्रिकेंट जैसी चीज़ों कों पहले सें सजधजकर रखना चाहती हैं।
आर्यन नें सिर हिलाकर अपनी सहमति दि। उसके दिमाग़ मे अब मार्केट कां सामान नहि, बल्कि वोँ 'पैकेट' घूमरहे थें जोँ रात कों कंचन मासी केँ 'पवित्र' मंदिर मे पहली आहुति देने वाले थें।
तभी.घऱ कि डोरबेल बजी। 'टिंग-टोंग'।
दरवाज़े केँ बाहर् कंचन मासी खड़ी थीं—हाथ मे पूजा कां प्रसाद, माथे पऱ तिलक औऱ चेहरे पऱ वही सादगी भरा मुखौटा। उसे अंदाज़ा भि नहि थां कि अंदर उसका भतीजा अपने मुँह मे अपनी मां केँ वीर्य कां स्वाद लिए बैठा हैं औऱ उसकी मम्मी नें उसकेलिए 'चिकनाई' कां इंतजार कररखा हैं।
साम केँ 7:00 बजरहे थें। बाहर् ढलते सूरज कि नारंगी रोशनी अब अंधेरे मे तब्दील हौ रही थि औऱ घऱ केँ अंदर एक् बहोत हि शांत औऱ पारिवारिक माहौल थां। अंजलि कि योजना केँ अनुसार, सभीकुछ बिल्कुल सामान्य दिखरहा थां—इतना सामान्य कि कोईसोच भि नहि सकता थां कि कुछ घंटों पहलेइसी कमरे मे क्याँ हुआ थां।
कंचन मासी सोफे पऱ बैठीथीं। उनके चेहरे पर्र वही चिर-परिचित सौम्यता औऱ शांति थि। उन्होंने हल्के पीलेरंग कि सूती साड़ी पहनी थि, माथे पऱ एक् छोटा सां लाल तिलक थां औऱ हाथों मे कांच कि चूड़ियां जोँ उनकीहर हरकत पऱ हल्की सि खनक पैदाकर रहीथीं।
अंजलि औऱ कंचन सोफे पर्र बैठकर पुराने रिश्तेदारों कि बातें कररही थीं। बातचीत कां विषय बहोत हि साधारण थां— "विवाह-ब्याह मे कौनआया, किसकी तबीयत खराब हैं, औऱ मंदिर केँ उत्सव मे इसबार कितनी भीड़ थि। " कंचन अपनी बातों मे इतनीखोई हुई थि कि उसे अपनी बड़ी बेहन कि आँखों मे छिपा वो शातिराना रोमांच नज़र नहि आँ रहा थां।
आर्यन पास हि कि कुर्सी पऱ बैठा बड़े ध्यान सें मासी कि बातें सुनरहा थां। वो बीच-बीच मे मुस्कुरा देता याँ किसीबात पऱ हामीभर देता। अंजलि केँ सिखाए अनुसार, उसने अपनी आँखों कि उस'भूख' कों पलकों केँ पीछे छिपा लिया थां। वो एक् आदर्श भतीजे कि तरह बर्ताव कररहा थां।
अंजलि नें उठकर रसोई सें गरमा-गर्म गरमचाय औऱ पकौड़े परोसे। "लेँ कंचन, तेरेहाथ कि बनीगरम चाय तोँ मुझे बहोत यादआती हैं, पऱ आज तूँ मेरेहाथ कि पी। " अंजलि नें बहोत हि सहजता सें कहा। बातों-बातों मे कंचन नें आर्यन केँ करियर औऱ उसकी पढ़ाई केँ बारे मे पूछा, जिसका आर्यन नें बहोत हि सलीके सें जवाब दिया।
कंचन कों डर थां कि शायदयहा कां माहौल उसे असहज करेगा, मगर अंजलि औऱ आर्यन केँ सामान्य बर्ताव नें उसका बचाव तंत्र ढीलाकर दिया। वो अब स्वयं कों सुरक्षित महसूस कररही थि।
आर्यन केँ लिएये एक् परीक्षा कि तरह थां। उसेपता थां कि उसे थोड़ी देर मे निकलना हैं। वो मासी कि सादगी कों देखरहा थां औऱ मन हि मनउस लुब्रिकेंट औऱ कॉन्डम केँ बारे मे सोचरहा थां जौ उसे थोड़ी देर मे लाने थें। वो देखरहा थां कि मासी कितनी 'सीधी' दिखती हें औऱ यही सादगी उसे अंदर हि अंदर उत्तेजित कररही थि।
गरमचाय ख़त्म होते हि आर्यन नें घड़ी देखी औऱ बहोत हि स्वाभाविक अंदाज़ मे खड़ाहुआ।
"मम्मी, मुझेयाद आया। रसोई कां कुछ सामान ख़त्म हौ गय़ा हैं औऱ मुझे अपनी एक् प्रोजेक्ट फाइल केँ लिएकुछ स्टेशनरी भि लेनी हैं। मे अभि मार्केट होकरआता हूं, आधे-पौन घंटे मे लौट आऊँगा। "
अंजलि नें कंचन कि ओर देखकर मुस्कुराते हुएकहा, "हाँ बेटा, जा लेँ आँ। कंचन, तूँ बैठ.तब तक हम् थोड़ी औऱ बातें करते हें। "
कंचन नें मुस्कुराकर आर्यन कों देखा, "आहिस्ता जानां बेटा। " उसे ज़रा भि अंदाज़ा नहि थां कि आर्यन बाज़ार सें 'खाने-पीने' केँ संग-संग उसकी 'पवित्रता' कों भंग करने कां सामान भि लानेजा रहा हैं।
ड्राइंग रूम मे अबसाम कि शांति केँ संग-संग एक् अपनापन सां छा गय़ा थां। आर्यन केँ मार्केट निकलते हि अंजलि नें अपनी योजना केँ अगले हिस्से पऱ काम शुरुआत कर दिया। वो जानती थि कि अगर कंचन कों रसोई केँ कामों मे उलझा दिया गय़ा, तौ वो गहरा संवाद नहि हौ पाएगा जिसकी उसे ज़रूरत थि।
अंजलि नें सोफे पर्र कंचन केँ थोडा औऱ लगभग सरकते हुए अपना मोबाइल निकाला औऱ बड़े लाड़ सें बोलीं:
"देख कंचन, तुँ बहोत दिनों बादआई हैं। मे नहि चाहती कि आज कि यहसाम चूल्हे-चौके मे बिताए। हम् दोनों बहनें आजजी भरकर बातें करेंगे, इसलिये खानां आज मे बाहर् सें हि मँगारही हूं। "
कंचन नें थोडा संकोच करतेहुए मना करना चाहा, "नहि जीजी, क्याँ ज़रूरत हैं। मे अभि कुछबना देती हूं। " मगर अंजलि नें उसकी एक् नं सुनी। "चुप कर! मुझेपता हैं तुम को पनीर लबाबदार औऱ दाल मखनी कितनी मनपसंद हैं। आज तेरावही फेवरेट खानां आएगा। "
अंजलि नें मोबाइल पर्र शहर केँ सबसे बेहतरीन रेस्टोरेंट सें कंचन कि मनपसंद कां शाही खानां ऑर्डर कर दिया। ये महज़ खानां नहि थां, बल्कि कंचन कों 'स्पेशल' महसूस कराने कां एक् तरीका थां। जबकोई आपको आपकी पसन्द कि चीज़ें बिना माँगे देता हैं, तोँ आप् अनजाने मे हि उस शख्स केँ प्रति अपनी मानसिक दीवारें गिरा देते हें।
अच्छी मेहमाननवाज़ी औऱ बाहर् कां लजीज़ खानां कंचन कों एक् मानसिक 'कंफर्ट ज़ोन' मे लेँ जारहा थां। उसेलग रहा थां कि उसकी बेहन उससे कितना प्रेम करती हैं औऱ उसका कितना ख्याल रखती हैं।
रसोई कि ज़िम्मेदारी समाप्त होते हि अब दोनों बहनों केँ पास घंटों कां वक्त थां। अंजलि जानती थि कि पेटभरा होने पर्र औऱ मन शांत होने पऱ इंसान अपने सबसे गहरे राज़ उगलने लगता हैं। वो कंचन कों भावनात्मक रूप सें 'नग्न' करने कि तैयारी कररही थि।
खानां ऑर्डर करने केँ बाद अंजलि नें मोबाइल मेज़ पऱ रख दिया। कमरे मे अब मात्र पंखे कि हल्की आवाज़ थि। अंजलि नें कंचन केँ चेहरे कों गौर सें देखा—वही सादगी, मगर आँखों केँ नीचे हलके काले घेरे जौ उसके अकेलेपन औऱ रातों कि बेचेनी कि गवाही देरहे थें।
"कंचन." अंजलि नें धीरे-धीरे सें उसकाहाथ अपनेहाथ मे लिया, "ऊपर-ऊपर सें तौ तूँ बहोत शांत दिखती हैं, औऱ पूजा-पाठ मे मन भि लगा लेती हैं। पर्र सचबता, क्याँ तूँ वाकईखुश हैं? तेरी शादीशुदा ज़िंदगी मे वोँ 'चैन' हैं जिसकी तूने उम्मीद कि थि?"
कंचन कि मुस्कुराहट अचानक फीकीपड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुकालीं औऱ अपनी उंगलियों सें साड़ी कां पल्लू मरोड़ने लगी। अंजलि नें सही नब्ज़ पर्र हाथरख दिया थां।
ड्राइंग रूम कां माहौल अचानक भारी हौ गय़ा। अंजलि नें जब कंचन केँ जख्मों कों कुरेदने कि कोशिश कि, तोँ उसेलगा थां कि कंचन रोने लगेगी याँ अपनी सिसकियाँ दबाएगी। मगर कंचन नें अपनी झुकी हुईँ पलकें उठाईं औऱ अंजलि कि आँखों मे सीधे देखते हुएकुछ ऐसाकह दिया कि अंजलि केँ पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
अंजलि, जोँ अब तक इसखेल कि 'मास्टरमाइंड' बनी हुईँ थि, कंचन कि उस एक् बात सें जैसे पथरा सि गई। उसकेपास कोई जवाब नहि थां, कोई दलील नहि थि। वो बसफटी आँखों सें अपनी छोटी बेहन कों देखती रह गई, जिसे वो 'सीधी-सादी' समझरही थि। सन्नाटा इतना गहरा थां कि घड़ी कि टिक-टिक भि हथौड़े कि तरह सुनाई देरही थि।
तभी दरवाजे कि बेलबजी औऱ उस भारी सन्नाटे कों चीर दिया। आर्यन वापस आँ चुका थां।
आर्यन केँ हाथों मे सामान केँ दो बड़े थैले थें। ऊपर सें देखने पर्र उसमें ब्रेड, दूध औऱ रसोई कां कुछ राशन-पानी दिखरहा थां, मगरउन पैकेटों कि गहराई मे कॉन्डम औऱ लुब्रिकेंट कि वोँ डिब्बियाँ छिपीथीं, जोँ आजरात कंचन मासी केँ 'पवित्र' जिस्म पर्र इस्तेमाल होने वालीथीं।
आर्यन जैसे हि अंदरआया, उसने महसूस किया कि कमरे कि हवा बदली हुई हैं। उसकी मम्मी (अंजलि) कां चेहरा सफेद पड़ा थां औऱ वो किसी गहरीसोच मे डूबी थि, जबकि कंचन मासी केँ चेहरे पऱ एक् अजीब सि, रहस्यमयी शांति थि—जैसे उन्होंने कोई बहोत बड़ाबोझ अंजलि केँ कंधों पर्र डाल दिया हौ।
ठीकउसी टाइम रेस्टोरेंट कां डिलीवरी बॉय भि खानां लेकर आँ गय़ा। आर्यन नें सारा सामान रसोई मे रखा औऱ अपनी मां कों एक् 'इशारा' किया कि काम हौ गय़ा हैं। मगर अंजलि नें उसकीतरफ देखा तक नहि, वो अब भि कंचन कि उसबात केँ असर मे थि।
तीनों डाइनिंग टेबल पर्र बैठगए। पनीर लबाबदार औऱ दाल मखनी कि खुशबू पूरे कमरे मे फैली थि, मगरभूख जैसेमर चुकी थि।
वो बार-बार कंचन कों देखरही थि। कंचन बड़े आहिस्ता निवाला तोड़रही थि, जैसे उसनेकुछ कहा हि नं होँ। अंजलि कां दिमाग़ दौड़रहा थां, अंजलि कों पहलीबार लगा कि वो अपनी बेहन कों ज़रा भि नहि जानती।
आर्यन अपनी स्थान पऱ बैठा चुपचाप खानां खारहा थां, मगर उसकी नज़रें बार-बार मेज़ केँ नीचे कंचन मासी केँ पैरों कि ओरजारही थीं। वो देखरहा थां कि मासी कितनी शिष्टता सें बैठी हें, जबकि उसकेबैग मे रखा लुब्रिकेंट बसकुछ हि देर मे उस शिष्टता कि धज्जियाँ उड़ाने वाला थां।
खानां ख़त्म हुआ। कंचन नें उठकर बर्तन समेटने मे अंजलि कि सहायता कि। अंजलि अभि भि सामान्य होने कि कोशिश कररही थि। आर्यन अपने कमरे कि ओर बढ़ा, पर्र रुककर उसने कंचन कों देखा।
"मासी, आप् आजरात मां केँ कमरे मे सोएंगी याँ मेरे वाले कमरे मे? मतलब, मेरारूम बहुत हवादार हैं." आर्यन नें बहोत हि सलीके सें जाल फेंका।
कंचन नें मुड़कर आर्यन कों देखा औऱ एक् ऐसी मुस्कान दि जिसमें ममताकम औऱ गहराई ज्यादा थि। "देखते हें आर्यन"
आर्यन अपने कमरे मे पहुंचा हि थां कि उसके मोबाइल कि स्क्रीन चमकउठी। उसने उम्मीद कि थि कि अंजलि उसे 'ग्रीन सिग्नल' देगी, मगर जोँ मैसेज उसनेपढ़ा, उसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दि।
अंजलि कां मैसेज: "बेटा, आज चाहेकुछ भि होँ जाए, तुँ नीचेमत आनां। भूलकर भि कमरे सें बाहर् मत निकलना। जोँ मैंने सोचा थां, स्थिति उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। "
आर्यन कां मन चकरा गय़ा। उसने अभि-अभि कॉन्डम औऱ लुब्रिकेंट कां इंतज़ाम किया थां, उसकाबदन कंचन मासी कि कल्पना सें दहकरहा थां, औऱ अब उसकी मां उसे पीछे हटने कों कहरही थि?
वो बैड पर्र बैठ गय़ा, उसकादिल ज़ोर-ज़ोर सें धड़करहा थां। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि कंचन मासी नें खाने सें पहले अंजलि केँ कान मे ऐसा क्याँ कह दिया कि अंजलि इतनीडर गई। क्याँ मासी कों उनके औऱ अंजलि केँ रिश्ते कां पताचल गय़ा? याँ मासी कां अपनाकोई ऐसा कालासच हैं जिसने अंजलि जैसी शातिर महिला केँ पसीने छुड़ा दिए?
अंजलि, जौ कुछदेर पहले तक कंचन कों 'शिकार' बनाने कि योजना बनारही थि, अब अचानक 'डिफेंसिव' मोड मे आँ गई थि। उसका मैसेज महज़ एक् चेतावनी नहि, बल्कि एक् तरह कि 'गुहार' थि। ऐसालग रहा थां जैसे वो आर्यन कों किसी बड़े खतरे याँ किसीऐसे खुलासे सें बचाना चाहती हैं जौ आर्यन बर्दाश्त नहि कर पाएगा।
नीचे केँ ड्राइंग रूम सें हल्की-हल्की फुसफुसाहट कि आवाज़ें आँ रहीथीं। आर्यन नें अपने कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) थोडा सां खोला औऱ गलियारे कि ओरकान लगाए।
उसे कंचन मासी केँ रोने कि नहि, बल्कि बहोत हि सपाट औऱ ठंडी आवाज़ सुनाई देरही थि। वो आवाज़ उस 'सीधी-सादी' मासी कि लग हि नहि रही थि जौ साम कों मंदिर कां प्रसाद लेकरआई थीं।
बीच-बीच मे अंजलि केँ टूटेहुए शब्द सुनाई देरहे थें— "नहि कंचन.ऐसा नहि होँ सकता। तूने इतने सालों तक यहबात छुपाई केसे?"
आर्यन केँ पासदो रास्ते थें। याँ तौ वो अपनी मम्मी कि बात मानकर कमरे मे दुबका रहे, याँ फिन वो चुपके सें नीचेजाए औऱ उस सस्पेंस कां पता लगाए जिसने उनकी पूरी योजना कों तहस-नहस कर दिया थां।
उसनेहाथ मे वही लुब्रिकेंट कि डिब्बी उठाई औऱ उसे कसकर भींच लिया। उसकी मर्दानगी अबउस राज़ कों जानने केँ लिए बेचैनी रही थि। उसेलगा कि शायद कंचन मासीकोई 'सीधी' स्त्री नहि, बल्कि अंजलि सें भि बड़ी 'खिलाड़ी' निकली हें।
रात केँ 11:00 बजरहे थें। घऱ कां कोना-कोना खामोशी कि चादर ओढ़ेहुए थां, मगर आर्यन केँ मन मे हंगामा थमता नहि थां। अंजलि कां वो मैसेज—"नीचे मत आनां"—आर्यन केँ सीने मे किसीकील कि तरहचुभ रहा थां। उसकी मर्दानगी औऱ उसकी उत्सुकता केँ बीच एक् युद्ध चलरहा थां।
आखिरकार, वो स्वयं कों रोक नहि पाया।
आर्यन नें अपने कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) रत्ती भर आवाज़ किए बिना खोला। वो दबे पाँव, बिल्ली कि तरह सीढ़ियाँ उतरकर नीचे पहुंचा। दिल इतनी ज़ोर सें धड़करहा थां कि उसेडर थां कहीं मासीउसे सुन नं लें।
वो अंजलि केँ कमरे केँ बाहर् खड़ा होँ गय़ा। उसने अपनाकान लकड़ी केँ ठंडे दरवाज़े पर्र टिका दिया। वो उम्मीद कररहा थां कि उसेकोई चीख, कोई रोना याँ कम सें कमकोई बड़ा खुलासा सुनने कों मिलेगा।
मगर अंदर सें जोँ सुनाई दिया, उसनेउसे औऱ भि अधिक कंफ्यूज कर दिया। उसे किसी केँ बात करने कां लहज़ा तोँ सुनाई देरहा थां, पऱ शब्दसमझ नहि आँ रहे थें। वो बस एक् 'फुसफुसाहट' थि—जैसे दोलोग किसी बहोत हि गहरे औऱ पुराने राज़ कों एक्-दूसरे केँ कान मे डालरहे हों।
उसे बीच-बीच मे अंजलि कि आवाज़ सुनाई देती, जोँ डरी हुइ औऱ दबी हुइ थि। कंचन कि आवाज़ मे एक् अजीब सां ठहराव थां। ऐसालग रहा थां जैसे कंचनआज अपनी बेहन कों वो आईना दिखारही हैं जिसे अंजलि नें सालों सें नहि देखा थां।
5 मिनट तक वहा सांस रोककर खड़े रहने केँ बाद, जब उसेकुछ हाथ नहि लगा, तोँ आर्यन झेंप गय़ा। उसेलगा कि वो यहा एक् जासूस कि तरह खड़ा हैं औऱ अंदर उसकी मां औऱ मासी शायद किसीऐसी चीज़ मे उलझी हें जोँ उसकीसमझ सें बाहर् हैं।
वो वापस अपने कमरे कि ओर मुड़ा। उसकेहाथ मे अब भि वो लुब्रिकेंट औऱ पैकेट कां ख्याल थां, जोँ अबउसे बेमानी लगरहे थें। जिस 'शिकार' कों वो आजरात फतह करने वाला थां, वो शिकार अब स्वयं एक् रहस्यमयी शिकारी बन चुका थां।
वापस अपने कमरे मे पहुँचकर उसने झटके सें द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ खाट पर्र गिर गय़ा। अंजलि कां वोँ मैसेज अबउसे औऱ भि डरावना लगरहा थां। "स्थिति गंभीर हैं"—इन शब्दों कां मतलब क्याँ थां?
आर्यन छत केँ पंखे कों घूमते देखरहा थां। उसे अपनी मम्मी पर्र क्रोध भि आँ रहा थां औऱ चिंता भि हौ रही थि। तभी। उसके कमरे केँ हैंडल केँ घूमने कि हल्की सि आवाज़ आई।
द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुला औऱ एक् साया अंदर दाखिल हुआ। वो अंजलि थि। उसकेबाल बिखरे हुए थें, आँखों मे एक् अजीब सि दहशत थि औऱ वो कांपरही थि।
उसनेआते हि आर्यन कों गलेलगा लिया औऱ सिसकते हुए फुसफुसायी, "आर्यन। वोँ। वोँ वैसी नहि हैं जैसा हमने सोचा थां। "
अंजलि कि सांसें तेज़चल रहीथीं औऱ उसके चेहरे पऱ छाई वोँ घबराहट आर्यन कों अंदर तक हिला गई। उसने आर्यन केँ कंधे कों कसकर भींचा औऱ कांपती आवाज़ मे बस इतना हि कहा:
"आर्यन। अभि मे तुम कोकुछ नहि बता सकती। स्थिति हमारे हाथ सें निकल चुकी हैं। मे बस नीचे पानी पीने केँ बहाने आई हूं, वोँ मेरा इंतजार कररही हैं। तुँ बस। तूँ बस अपना द्वार (दरवाज़ा) अंदर सें बंदकर लेँ औऱ सोजा। "
इतना कहकर अंजलि मुड़ी औऱ अंधेरे गलियारे मे गायब होँ गई। उसके कदमों कि आहट इतनी तेज़ थि जैसे वो किसी खौफनाक साये सें बचकरभाग रही हौ।
आर्यन वहीं खड़ारह गय़ा, उसकाहाथ कमरे केँ हैंडल पऱ हि थां। जोँ उत्साह, जौ हवस औऱ जौ योजना उसने दोपहर सें बनारखी थि, वो अबताश केँ पत्तों कि तरहढह चुकी थि।
आर्यन कों इससमय अपनी मर्दानगी पर्र थोडा क्रोध भि आँ रहा थां। वो ७इंच कां फौलाद, जोँ कुछदेर पहले तक कंचन मासी केँ वजूद कों चीरने केँ लिए बेताब थां, अब एक् ठंडी खामोशी मे सिमट गय़ा थां। अंजलि केँ डर नें आर्यन केँ अंदर कि कामुकता कों 'असुरक्षा' मे बदल दिया थां।
वो बैड पऱ लेट गय़ा, मगर नींद उसकी आँखों सें कोसों दूर थि। कंचन मासी कि वोँ शांत मुस्कान अब उसकेमन मे किसी डरावनी फिल्म केँ सीन कि तरहघूम रही थि। उसने सोचा— "आखिर एक् स्त्री ऐसा क्याँ कह सकती हैं कि अंजलि जैसी खिलाड़ी मम्मी, जिसने स्वयं अपने बेटे केँ संग सारे रिश्ते तोड़दिए, वोँ इतनीसहम जाए?"
आर्यन नें खिड़की सें बाहर् देखा। पूरा मोहल्ला सो चुका थां, मगर उसकेघऱ कि नीचे वाली मंजिल पऱ एक् ऐसा राज़ सांस लें रहा थां जौ सुभह होते-होते सभीकुछ बदलने वाला थां।
आखिरकार, आर्यन नें हारमान ली। उसने अपनी दराज सें वोँ कॉन्डम केँ पैकेट औऱ लुब्रिकेंट निकाला औऱ उन्हें वापस गहराई मे छुपा दिया। उसे अहसास हुआ कि आज कि रात 'शिकार' कि नहि, बल्कि 'बचाव' कि रात हैं।
उसने अपनी आँखें बंदकीं, पऱ नीचे सें आने वालीहर हल्की आवाज़—पंखे कि सरसराहट याँ पानी गिरने कि आवाज़—उसे चौंका रही थि। उसने तकिए कों अपनेकान पर्र रख लिया औऱ स्वयं कों ये समझाने कि कोशिश कि कि सुभहसभी ठीक होँ जाएगा।
धीरे धीरे थकान उसके दिमाग़ पऱ हावी होनेलगी। आर्यन एक् ऐसी नींद मे उतरने लगा जहाँ ख्वाब भि धुंधले औऱ डरावने थें। उसेपता नहि थां कि जब वो सुभहआँख खोलेगा, तौ उसके सामने कंचन मासी कां वही पुरानां चेहरा होगा याँ कोईऐसा चेहरा जिसे देखकर वो स्वयं कों भि भूल जाएगा।
घऱ मे अब पूरीतरह सन्नाटा थां। पऱ ये वोँ सन्नाटा थां जौ किसी बड़े धमाके सें पहले होता हैं।
Doctor मां – New Episode
रात केँ 3:00 बजरहे थें। पूरेघऱ मे सन्नाटे कां पहरा थां, मगर आर्यन कि नींद अचानक टूटी। उसे ऐसालगा जैसेहवा मे कोई बहोत हि बारीक औऱ मादक म्यूज़िक तैररहा होँ। पहलेउसे लगा कि ये उसकावहम हैं, मगर जैसे-जैसे वो सचेतहुआ, आवाज़ें साफ़ होने लगीं।
वो आवाज़ें अंजलि केँ बेडरूम सें आँ रहीथीं।
आर्यन पलंग पऱ उठकरबैठ गय़ा। सन्नाटे कों चीरती हुइ वे आवाज़ें महज़ बातचीत नहि थीं। वे सकसाहटों औऱ सिसकारियों कां एक् ऐसा संगमथीं जौ मात्र चरमसुख केँ क्षणों मे पैदा होती हें।
आर्यन नें गौर किया कि वे आवाज़ें एक् नहि, बल्कि दो औरतों कि थीं। अंजलि कि भारी औऱ मदहोश कर देने वाली आवाज़, औऱ उसकेसंग मिली हुई कंचन मासी कि वो तीखी औऱ कंपकंपाती हुइ आह। वे दोनों एक्-दूसरे केँ इतने लगभगथीं कि उनकेबीच कि दीवारें गिर चुकीथीं।
आर्यन केँ सीने मे जलन औऱ गुस्से कि एक् लहरउठी। "धोखा!" उसकेमन नें चिल्लाकर कहा। दोपहर भरउसे रेडी किया गय़ा, उसे७इंच कि मर्दानगी कां अहसास दिलाया गय़ा, औऱ अबजब असलीखेल शुरुआत हुआ, तोँ उसकी अपनी मम्मी नें उसे 'स्थित गंभीर हैं' कां डर दिखाकर कमरे मे कैदकर दिया औऱ स्वयं मासी केँ संगमजे लें रही हैं?
उसेलगा कि अंजलि नें उसे जानबूझकर बाहर् रखा ताकि वो कंचन कों पूरीतरह अकेले 'हैंडल' करसके। याँ शायद कंचन नें अंजलि केँ सामने कोईऐसी शर्तरखी थि जिसमें आर्यन केँ लिएकोई स्थान नहि थि।
आर्यन कां मन किया कि वो अभि नीचेजाए, द्वार (दरवाज़ा) लात मारकर खोलदे औऱ पूछे कि ये 'गंभीर स्थिति' क्याँ यही थि? मगरतभी उसे अंजलि कां वो चेहरा यादआया जब वो पानी पीने केँ बहाने ऊपरआई थि—वोडर असली थां।
आर्यन सोचने लगा कि क्याँ अंजलि औऱ कंचन नें मिलकर उसे बेवकूफ बनाया हैं? याँ फिन कंचन केँ पासकोई ऐसा चमत्कार याँ राज़ हैं जिसने अंजलि कों भि अपना गुलाम बना लिया हैं?
गुस्से औऱ उत्तेजना केँ बीच आर्यन इतनाथक चुका थां कि उसने दोबारा तकिया अपनेसिर पर्र रख लिया। उसे लगा कि अगर वो अभि नीचे गय़ा, तौ शायद वो खेल बिगड़ जाएगा जोँ उसकी मम्मी बनाने कि कोशिश कररही हैं। उसने स्वयं कों सांत्वना दि— "अगर वोँ दोनों संग हें, तोँ सुभह मेरेलिए मार्ग औऱ भि आसान होगा। "
आर्यन नें अपनी आँखें कसकरबंद करलीं। नीचे सें आतीउन सिसकारियों कि गूँज उसके कानों मे गर्म पिघले हुए लोहे कि तरहउतर रही थि। वो ७इंच कां फौलाद, जोँ अब भि शांत नहि हुआ थां, चादर केँ नीचे अपनी मौजूदगी दर्जकरा रहा थां।
अंततः, वो गुस्से औऱ थकान केँ मिले-जुले अहसास मे दोबारा सो गय़ा। मगरये नींद नहि, बल्कि एक् 'बेहोशी' थि
सुभह केँ 7:30 बजरहे थें। रातभर कि उन रहस्यमयी सिसकारियों औऱ अंजलि केँ खौफनाक मैसेज केँ बाद आर्यन कां दिमाग़ भारी थां। वो भारीमन औऱ अधूरी नींद केँ संग सीढ़ियों सें नीचे उतरा। उसे लगा थां कि नीचेघऱ कां माहौल बिखरा हुआ होगा, याँ शायद अंजलि औऱ कंचन किसी गहरी चर्चा मे होंगी।
मगर नीचे कां नज़ारा देखकर आर्यन केँ होशउड़ गए।
ड्राइंग रूम मे अगरबत्ती कि भीनी-भीनी खुशबू फैली थि। सामने मंदिर केँ पास कंचन मासी खड़ीथीं। उन्होंने एक् शुद्ध सफेद औऱ लाल बॉर्डर वाली सूती साड़ी पहनी थि, बाल अभि भि गीले थें जौ उनके कंधों पर्र बिखरे हुए थें। उनकेहाथ मे पूजा कि थाली थि औऱ वो पूरी तन्मयता सें आरतीगा रहीथीं।
ऐसालग रहा थां जैसेरात कों 3 बजे कि वोँ मादक आवाज़ें महज़ आर्यन कां कोई सपनाथीं। कंचन केँ चेहरे पऱ वही पुरानी सौम्यता, वही पवित्रता औऱ वही 'मासी' वाली ममता थि। रात केँ उस 'शिकारी' याँ 'रहस्यमयी' रूप कां कहींकोई नामो-निशान नहि थां।
अंजलि रसोई मे गरमचाय बनारही थि। वो भि पूरीतरह नहा-धोकर रेडी थि। आर्यन नें जब उसकी आँखों मे झाँकने कि कोशिश कि, तोँ अंजलि नें नज़रें चुरालीं। वो रात वाली दहशतअब एक् पथरीली खामोशी मे बदल चुकी थि।
"उठ गय़ा आर्यन? जल्द सजधजकर हौ जा, कॉलेज केँ लिएदेर हौ जाएगी, " अंजलि नें बहोत हि सपाट आवाज़ मे कहा। कंचन नें आरती ख़त्म कि औऱ आर्यन केँ पासआकर उसके माथे पऱ चंदन कां टीका लगाया। "यह लेँ बेटा, ईश्वर कां आशीर्वाद लें। आज तेरामन पढ़ाई मे खूब लगेगा। "
आर्यन तिलक लगवाते वक्त कंचन कि आँखों मे देखरहा थां। वो ढूंढरहा थां—हवस कि कोई लकीर, कोई थकान, याँ कोईऐसा इशारा जोँ रात कि उन सिसकारियों कि पुष्टि करे। पऱ वहाकुछ नहि थां। कंचन कि आँखें झील कि तरह शांत औऱ शीतलथीं।
आर्यन नें बिनाकुछ पूछे ब्रेकफास्ट किया। मेज़ पऱ बातचीत बहोत हि साधारण रही। कंचन नें आर्यन कों कॉलेज केँ लिए शुभकामनाएं दीं औऱ अंजलि नें उसे दोपहर कां दोपहर का खाना बॉक्स पकड़ाया। कोई 'अडल्ट्री' नहि, कोई गंदा इशारा नहि, यहा तक कि अंजलि नें एक् बार भि उस७इंच केँ लोहे कां ज़िक्र अपनी आँखों सें नहि किया।
आर्यन अपनी बाइक स्टार्ट करके कॉलेज कि ओर निकल पड़ा। रास्ते भर उसके दिमाग़ मे मात्र एक् हि प्रश्न घूमरहा थां— "क्याँ रात कों वाकईकुछ हुआ थां? याँ मेरी मम्मी औऱ मासी इतनी बड़ी अदाकारा हें कि पूरीरात तबाही मचाने केँ बाद सुभह सती-सावित्री बन गई हें?"
कॉलेज पहुँचकर भि आर्यन कां मन पढ़ाई मे नहि लगा। वो लेक्चर्स केँ बीच मे बैठा खिड़की सें बाहर् देखता रहा। उसकेपास वोँ लुब्रिकेंट औऱ कॉन्डम केँ पैकेट अब भि उसकेबैग कि एक् गुप्त ज़िप मे रखे थें। उसेलगा कि वो एक् बहोत बड़े औऱ गहरे दलदल मे फँस गय़ा हैं जहाँसच औऱ झूठ केँ बीच कां अंतरमिट चुका हैं।
दोपहर केँ 2:00 बज चुके थें। आर्यन कि छुट्टी होने वाली थि। उसेडर भि लगरहा थां औऱ उत्सुकता भि थि कि जब वो घऱ लौटेगा, तोँ क्याँ वहाफिन सें वही 'नॉर्मल' नाटकचल रहा होगा याँ फिन अंजलि उसे अकेले मे वोँ 'सच' बताएगी जिसने उसरात कों बदल दिया थां?
दोपहर केँ 3:00 बजरहे थें। जब आर्यन नें घऱ केँ अंदरकदम रखा, तोँ उसे उम्मीद थि कि वही रहस्यमयी भारीपन महसूस होगा, मगर घऱ केँ अंदर सन्नाटा पसराहुआ थां। कंचन मासी कां सामान वहां नहि थां—वो जा चुकीथीं। अंजलि भि घऱ पऱ नहि थि, शायद वो क्लीनिक निकल गई थि ताकिइस अजीबोगरीब स्थिति सें थोडा ब्रेक लेँ सके।
आर्यन केँ बदन औऱ दिमाग़ पऱ पिछले 48 घंटों कां बोझ इतना अधिक थां कि उसकी हिम्मत जवाबदे गई थि। वो ७इंच कां फौलाद, जौ कल तक आगउगल रहा थां, अब थकान केँ मारे सुस्त पड़ चुका थां।
आर्यन नें रसोई मे रखा खानां बेमन सें खाया। उसकामन अभि भि उन आवाज़ों, उस वीर्य युक्त चुंबन औऱ सुभह कि उस 'पवित्र' आरती केँ बीच उलझाहुआ थां। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वो जीतेजी किसी स्वर्ग मे थां याँ किसी हसीन नर्क मे।
दो दिनों तक लगातार उत्तेजना, घृणा, औऱ ऊँचे दर्जे कि 'कामुक राजनीति' नें उसकी नसों कों ढीलाकर दिया थां। उसनेतय किया कि वो अपने कमरे मे नहि जाएगा। वो नीचे अपनी मम्मी केँ कमरे मे हि चला गय़ा।
अंजलि केँ खाट पर्र वही इत्र औऱ उसकीदेह कि खुशबू रची-बसी थि। आर्यन उसी तकिए पर्र सिर रखकरलेट गय़ा जहाँकुछ घंटों पहले उसकी मम्मी औऱ मासीसंग थीं। उसे लगा कि शायदयहा सोने सें उसेउन सिसकारियों कां कोई सुराग मिलजाए, मगर थकान इतनी गहरी थि कि लेटते हि उसकी आँखें मुँदने लगीं।
जैसे हि उसने करवटली, उसे अंजलि केँ बैड कि चादर पर्र एक् अजीब सि सिलवट औऱ हल्की सि नमी महसूस हुईँ, मगर उसका दिमाग़ अब औऱ विश्लेषण करने कि स्थिति मे नहि थां। वो एक् ऐसी गहरी नींद मे डूब गय़ा जहाँ न् कोईहवस थि, न् कोई प्रश्न।
आर्यन लगभग 3 घंटे तक घोड़े बेचकर सोतारहा। बाहर् सूरजढल चुका थां औऱ कमरे मे अंधेरा छानेलगा थां। तभीउसे अहसास हुआ कि कोई उसके बालों कों बहोत सहलारहा हैं।
वो नींद औऱ होश केँ बीचझूल रहा थां। उसेलगा कि अंजलि क्लीनिक सें वापस आँ गई हैं। मगरजब उसने अपनी आँखें खोलीं, तोँ उसने देखा कि पलंग केँ किनारे कोई बैठा हैं, औऱ वो अंजलि नहि थि।
उस साये नें झुककर आर्यन केँ माथे कों चूमा। "सो गए मेरेशेर? बहोत थकगए थें नां?" वो आवाज़ अंजलि कि थि, पऱ उसके लहज़े मे एक् ऐसी 'महारानी' वालीखनक थि जौ आर्यन नें पहलेकभी नहि सुनी थि।
साम केँ 6:15 बजरहे थें। कमरे मे पसरे धुंधलके कों चीरते हुए अंजलि कि आवाज़ आर्यन केँ कानों मे मिश्री कि तरह घुली। उसने बड़े प्रेम सें आर्यन कां कंधा थपथपाकर उसे जगाया। "उठजा आर्यन। बहोत सो लिया। बाहर् आँ, मैंने गरमचाय बनाई हैं। "
आर्यन नें अंगड़ाई ली। उसके जिस्म कि थकान तोँ मिट चुकी थि, मगरमन कां कौतूहल अभि भि बरकरार थां। वो मुँहहाथ धोकर बाहर् बालकनी सें सटे छोटे सें डाइनिंग एरिया मे पहुंचा, जहाँ अंजलि दोकप अदरक वालीगरम चाय औऱ बिस्किट लिए उसका इंतजार कररही थि।
अंजलि आज बहोत शांतलग रही थि, मगर उसकी आँखों मे एक् ऐसी गहराई थि जौ बतारही थि कि वो अबकुछ भि छिपाने केँ मूड मे नहि हैं। दोनों नें खामोशी सें गरमचाय केँ पहलेकुछ घूंटभरे। बाहर् साम कां आसमान गहरा नीला होँ रहा थां।
अंजलि नें गरमचाय कां कपमेज पर्र रखा औऱ सीधे आर्यन कि आँखों मे देखा। "तूँ कलरात सें बहोत कन्फ्यूज हैं नं? औऱ तेरा क्रोध भि जायज हैं। तुम्हें लगा होगा कि मैंने तुझेही डराकर ऊपरभेज दिया औऱ स्वयं यहामजे लिए। "
अंजलि नें एक् ठंडी सांसली। "आर्यन, कंचन वैसी नहि हैं जैसी हम् उसे समझते आए थें। कलजब तुँ बाहर् गय़ा थां, उसने मुझसे जोँ कहा, उसने मेरेहोश उड़ादिए। उसने मुझसे कहा— 'जीजी, आप् आर्यन कों मेरेपास भेजने कि जौ प्लानिंग कररही हें, उसेबंद कर दीजिए। क्योंकि मुझे आर्यन मे नहि, बल्कि आपमें दिलचस्पी हैं। '"
आर्यन केँ हाथ मे पकड़ा बिस्किट गरमचाय मे हि गलकरगिर गय़ा। उसे उम्मीद थि कि कंचन मासी कां कोई 'अतीत' होगा याँ कोई 'बॉयफ्रेंड' होगा, मगर ये खुलासा उसकी कल्पना सें परे थां।
आर्यन कों समझआया कि रात कों जोँ सिसकारियां उसने सुनीथीं, वे किसी पुरुष औऱ औरत कि नहि, बल्कि दोसगी बहनों कि थीं। कंचन मासी अपनी 'पवित्रता' केँ पीछे एक् ऐसी स्त्री कों छिपाए बैठीथीं जौ अपनी हि बेहन केँ जिस्म कि प्यासी थि।
आर्यन नें महसूस किया कि अंजलि कि आवाज़ मे अबकोई लज्जा नहि थि। "उसने मुझे मजबूर कर दिया आर्यन"
"इसीलिए मैंने तुम्हें मना किया थां, " अंजलि नें गरमचाय कां घूंट भरतेहुए आगेकहा। "मे नहि चाहती थि कि तुँ इससभी मे फंसे। मगर रात कों 3 बजे.जब वोँ मेरेपास आई। तौ मुझे अहसास हुआ कि वोँ भि मेरी हि तरह बरसों कि प्यासी हैं। हम् दोनों बहनें पूरीरात एक्-दूसरे केँ शरीर सें अपना-अपना अकेलापन मिटाते रहे। "
आर्यन अवाक होकरसुन रहा थां। उसकी मम्मी, जिसने उसे 'मर्दानगी' कां पाठ पढ़ाया थां
"अब वोँ जा चुकी हैं, " अंजलि नें आर्यन केँ हाथ पऱ अपनाहाथ रखा। "वोँ अपनी प्यास बुझाकर गई हैं”
आर्यन नें गरमचाय कां कपमेज पर्र पटक दिया, उसकी आंखों मे हताशा औऱ जिज्ञासा कां मिला-जुला भाव थां। "मम्मी, मुझेइन पहेलियों औऱ इशारों मे कुछसमझ नहि आँ रहा हैं। आप् साफ़-साफ़ बताइए कि उसरात क्याँ हुआ औऱ मासी नें ऐसा क्याँ कहा कि आप् इतनीसहम गईं?"
अंजलि नें एक् लंबी औऱ बोझिल सांसली। उसने अपनी नज़रें झुकालीं, जैसेउस राज़ कों दोबारा ज़ुबान पऱ लाना उसकेलिए भि भारीपड़ रहा हौ। उसनेगरम चाय कि अंतिम चुस्की ली औऱ बोल्ना शुरुआत किया।
अंजलि कि आवाज़ अब धीमी औऱ गंभीर होँ गई थि, जैसे वो किसी पुरानी कब्र कों खोदरही होँ।
"आर्यन, तुँ अपनी मासी कों एक् सुखी शादीशुदा स्त्री समझता रहा हैं नं? मगर हकीकत इससे बिल्कुल उलट हैं। विवाह केँ महज़दो महीने बाद हि कंचन कों पताचल गय़ा थां कि उसका पति 'गे' (Gay) हैं। उसे औरतों मे रत्ती भर भि दिलचस्पी नहि थि। वो विवाह केवल समाज कों दिखाने केँ लिए कि गई थि। "
आर्यन ये सुनकर चौंक गय़ा, उसकी आँखें फटी कि फटीरह गई। अंजलि नें आगेकहा, "कंचनफिन भि हार नहि मानी। वो एक् पुराने ख्यालात कि स्त्री हैं, उसने सोचा कि वो अपनी सेवा औऱ प्रेम सें अपने पति कों बदल देगी। वो सालों तक इस उम्मीद मे जलतीरही कि शायदकभी उसे भि एक् स्त्री होने कां सुख मिलेगा। वो उस 'ठंडे' मर्द केँ संग मात्र इसलिये रही ताकि वो इसनरक कों झेलते हुए भि एक् 'घऱ'बचा सके। "
"उसका अंतिम सहारा एक् बच्चा थां, " अंजलि कि आवाज़ थोड़ी कांपने लगी। "वोँ सोचती थि कि अगर किसीतरह उसे एक् औलादमिल जाए, तोँ वो अपनी पूरी ज़िंदगी उस बच्चे कों पालने मे बिजीकर देगी औऱ अपनी जिस्मानी प्यास कों भूल जाएगी। मगर भाग्य कों कुछ औऱ हि मंज़ूर थां। जब सालों बाद भि कुछ नहि हुआ, तौ उन्होंने डॉक्टर कों दिखाया। औऱ रिपोर्ट्स मे जोँ आया, उसने कंचन कों पूरीतरह तोड़ दिया। "
अंजलि नें आर्यन कि आँखों मे झाँका। "डॉक्टर नें साफ़कह दिया कि कंचनकभी मां नहि बन सकती (Infertility)। सोच आर्यन, एक् स्त्री जिसके पास नं शौहर कां प्रेम होँ औऱ नं हि मम्मी बनने कां सुख। वो अंदर सें कितनी बंजर हौ चुकी होगी। वो दोनों तरफ सें हार गई—जिस्मानी तौर पर्र भि औऱ रूहानी तौर पऱ भि। "
आर्यन सन्न बैठा थां। जिस मासी कों वो कल तक केवल एक् 'शिकार' समझरहा थां, वो अबउसे इस दुनिया कि सबसे बदनसीब स्त्री लगरही थि।
उसे अपनीउस ७इंच कि मर्दानगी पर्र थोडा अफ़सोस होनेलगा। वो उसे 'अपवित्र' करने कि सोचरहा थां, जबकि वो महिला पहले सें हि क़िस्मत कि मारी हुईँ थि।
अबउसे समझआया कि रात कों अंजलि क्यूं डरी हुईँ थि। कंचन मासी कां वोँ रूप जोँ रात कों निकला थां, वो बरसों कि कुंठा, अकेलेपन औऱ उस खालीपन कां नतीजा थां जिसे वो अब औऱ नहि ढो सकती थि।
आर्यन केँ हाथ सें गरमचाय कां कप छूटते-छूटते बचा। उसका दिमाग़ चकरा गय़ा। उसने अपनी ज़िंदगी मे कई अजीब कहानियाँ सुनीथीं, मगरये हकीकत उसकीसोच कि सीमाओं केँ पार थि। वो स्तब्ध होकर अपनी मां कों देखरहा थां, जिसे स्वयं येसभी बताते हुए एक् अजीब सि बेचैनी होँ रही थि।
अंजलि नें मेज पर्र झुकते हुए आवाज़ कों औऱ भि धीमाकर लिया, जैसे वो डररही हौ कि दीवारें भि ये राज़ नं सुन लें।
"आर्यन, कंचन नें जोँ किया वो किसी केँ लिए भि सोचना नामुमकिन हैं। जबउसे समझ आँ गय़ा कि उसका पति कभीउसे स्त्री होने कां सुख नहि दे पाएगा औऱ वो स्वयं कभी मम्मी नहि बन पाएगी, तोँ उसनेहार मानने केँ बजाय कुदरत सें हि जंगलड़ ली। उसकेपास पैसों कि कोईकमी नहि थि, उसके पति कां बिजनेस बहोत बड़ा थां। उन दोनों नें मिलकर एक् ऐसा मार्ग निकाला जिससे समाज कि नज़रों मे उनकी विवाह बचीरहे औऱ उनकी निजी ज़रूरतें भि पूरी होँ सकें। "
अंजलि कि आवाज़ कांपी। "उसने अपने पति कि रज़ामंदी सें विदेशों मे अपनीकई सर्जरी करवाईं। ऊपर सें वो आज भि वही सुंदर, सादगी भरी कंचन दिखती हैं—वही साड़ी, वही बिंदी, वही ममतामयी चेहरा। मगर नीचे सें। नीचे सें उसने अपनी पहचान बदलली हैं। उसने 'जेंडर रीअसाइनमेंट' सर्जरी केँ ज़रिए पुरुष अंग लगवा लिया हैं। वो अब एक् ऐसी हकीकत बन चुकी हैं जौ दुनिया केँ लिए महिला हैं, मगरबैड पऱ एक् मर्द कि ताकत रखती हैं। "
"अबसमझ आया आर्यन? कलरात जौ तूने सुना, वो मात्र दो बहनों कां प्रेम नहि थां। वो कंचन कां वो रूप थां जोँ उसने सालों कि घुटन केँ बाद हासिल किया हैं। वो अब अपनी जीजी(मुझ) पऱ अपनाहक जतारही थि। वो मुझेये अहसास करारही थि कि उसेअब किसी मर्द कि ज़रूरत नहि हैं, वो स्वयं एक् मुकम्मल मर्दबन चुकी हैं अपनी मर्ज़ी सें। "
आर्यन केँ लिएये जानकारी किसीबम धमाके सें कम नहि थि। वो ७इंच कां फौलाद, जौ कल तक कंचन कों फतह करने केँ ख्वाब देखरहा थां, अब एक् अनजाने डर सें सुस्त पड़ गय़ा।
आर्यन कों ये सोचकर हि पसीना आँ गय़ा कि जिस मासी केँ पेर उसने सुभहछुए थें, उनकेपास भि वही 'हथियार' हैं जौ उसकेपास हैं। एक् स्त्री केँ लिबास मे छिपाहुआ वो पुरुष अंग आर्यन कि मर्दानगी केँ लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गय़ा थां।
उसेअब समझआया कि अंजलि कलरात क्यूं कांपरही थि। अंजलि नें अपनी बेहन केँ उसनए औऱ 'कृत्रिम' अंग कां अनुभव किया थां। अंजलि कों डराया गय़ा थां, उसे मजबूर किया गय़ा थां।
अंजलि नें अपनी ठंडीगरम चाय कां अंतिम घूंटभरा। "आर्यन, कंचन नें जाते-जाते जौ मुझसे कहा हैं, वो सुनकर तेरे रोंगटे खड़े होँ जाएंगे। उसनेकहा हैं कि उसे अपनीइस नई 'शक्ति' कां असली टेस्ट करना हैं। औऱ वो टेस्ट वो किसी औऱ पर्र नहि, बल्कि तुझ पर्र करना चाहती हैं। "
आर्यन कां गलासूख गय़ा। "मुझ पऱ? मतलब?"
अंजलि नें उसकी आँखों मे देखा, जिसमें अब एक् साज़िश कि झलक थि। "वो चाहती हैं कि अगलीबार जब वो आए, तौ वो ये देखे कि उसकी 'बनावटी मर्दानगी' औऱ तेरी 'कुदरती मर्दानगी' मे सें कौन जीतता हैं”
आर्यन केँ चेहरे कां रंगउड़ गय़ा थां। उसकी आँखों केँ सामने कलरात कां वो सारा मंजर एक् डरावनी फिल्म कि तरह घूमने लगा। अब उसेसमझ आया कि अंजलि केँ उस मैसेज—"बेटा, आज चाहेकुछ भि हौ जाए नीचेमत आनां"—कां असली मतलब क्याँ थां। वो अपनी मम्मी कि घबराहट कों महसूस करपारहा थां। उसेलगा कि कलरात वो केवल एक् 'राज' सें नहि बचा थां, बल्कि एक् ऐसी स्थिति सें बचा थां जौ उसकी पूरी पुरुषवाचक पहचान कों हिलाकर रख देती।
रात केँ 9:00 बज चुके थें। घऱ मे अबवही दोलोग थें—मां औऱ बेटा—मगर उनकेबीच अब एक् तीसरा साया हमेशा केँ लिएबैठ गय़ा थां, जोँ भले हि वहां मौजूद नहि थां, पर्र उसकी चर्चा नें हवा कों भारीकर दिया थां।
अंजलि नें बहोत हि सादा डिनर रेडी किया थां। दोनों डाइनिंग टेबल पऱ आमने-सामने बैठे थें। आर्यन कि नज़रें बार-बार अपनी थाली मे जमी रहतीं, जबकि अंजलि बीच-बीच मे उसे कनखियों सें देख लेती। वो ७इंच कां फौलाद, जौ कल तक अपनीधमक महसूस करारहा थां, आज आर्यन कि पतलून केँ अंदर जैसे दुबककर बैठ गय़ा थां।
आर्यन नें माहौल केँ तनाव कों कम करने केँ लिए बहोत हि सामान्य बात छेड़ी। "मम्मी, यह सब्जी अच्छी बनी हैं। " अंजलि नें एक् फीकी मुस्कान दि, "धन्यवाद बेटा। कल सें वैसे भि हमें थोडा रूटीन पऱ ध्यान देना होगा, तुम्हारी पढ़ाई औऱ मेरा क्लीनिक। "
बातें बहोत हि सतही थीं—कॉलेज कि अटेंडेंस, शहर कां मौसम औऱ आने वालेकुछ बिल। मगर उन बातों केँ पीछे दोनों कां मनउसी एक् बिंदु पऱ अटका थां: कंचन कां वोँ बदलाहुआ रूप।
डिनर करते टाइम आर्यन केँ मन मे कई ख्याल आँ रहे थें:
आर्यन कों पहलीबार अपनी मां केँ प्रति एक् अलगतरह कि सहानुभूति महसूस हुई। उसेलगा कि अंजलि नें कलरात वो सभी अकेले झेला ताकि आर्यन कों उस 'अनोखे' अनुभव सें बचासके। वो अपनी मम्मी कों अब मात्र एक् कामुक संगिनी केँ रूप मे नहि, बल्कि एक् रक्षक केँ रूप मे देखरहा थां।
भले हि वो थोडा डराहुआ थां, मगर उसके अंदर केँ Male Ego नें आहिस्ता सिर उठाना शुरुआत किया। उसे लगा कि क्याँ वाकईकोई 'बनावटी' चीज़ उसकी कुदरती ताकत कां मुकाबला कर सकती हैं?
डिनर केँ बाद दोनों नें मिलकर बर्तन समेटे। अंजलि जब रसोई कां काउंटर साफकर रही थि, आर्यन उसके पीछे जाकर खड़ा हौ गय़ा। उसनेकुछ कहा नहि, बस अंजलि केँ कंधे पऱ हाथरखा। अंजलि ठिठक गई, उसने पलटकर आर्यन कों देखा। उसकी आँखों मे अबडर नहि, बल्कि एक् तरह कां 'समर्पण' थां।
"मम्मी। जौ भि हौ, मे आपकोअब औऱ अकेला नहि छोड़ूँगा, " आर्यन नें धीमी आवाज़ मे कहा।
अंजलि नें उसकेगाल कों सहलाया। "मे जानती हूं आर्यन। मगरयाद रखना, कंचनअब वोँ नहि रही जोँ हम् समझते थें। वोँ अब एक् जिद्दी 'शिकारी' बन चुकी हैं। "
रात केँ 11:30 बजरहे थें। कमरे कि मद्धम रोशनी मे हवा केँ अंदर एक् अजीब सि भारीपन औऱ गर्मी महसूस होँ रही थि। अंजलि आज अपनी मर्यादा केँ सारे बंधन तोड़कर सिर्फ गहरे नीलेरंग कि ब्रा औऱ पैंटी मे थि, उसका दूधिया शरीरउस कम रोशनी मे चमकरहा थां। आर्यन भि मात्र एक् पतले सें नेकर मे थां।
दोनों खाट पऱ लेटे थें। आर्यन नें पीछे सें अंजलि कों अपनी बाहों मे भर लिया थां। उसका 7 इंच कां फौलाद नेकर केँ अंदर पूरीतरह सें तन चुका थां औऱ अंजलि कि भारी औऱ रसीले गांड केँ बीच केँ खांचे मे पूरी ताकत सें दबाहुआ थां। मगरआज उस दबाव मे मात्र हवस नहि थि, बल्कि एक् 'जलन' औऱ 'अधिकार' कि आग थि।
आर्यन कां मेलईगो Male Ego बुरीतरह चोट खायाहुआ थां। उसेये बात अंदर हि अंदरखाए जारही थि कि उसकी मौजूदगी मे, उसी केँ घऱ मे, उसकी मां नें किसी औऱ केँ अंग कों अपनीदेह मे स्थान दि—चाहे वो कंचन मासी कां 'बनावटी' अंग हि क्यूं न् हौ।
आर्यन नें अपनी पकड़ औऱ मज़बूत कि औऱ अपना चेहरा अंजलि कि गर्दन केँ पास लें जाकर भारी आवाज़ मे फुसफुसाया, "मम्मी। एक् बात सच-सच बताओ। क्याँ कलरात आप् दोनों नें वाकई सेक्स किया थां? क्याँ आपने उसका वो 'बनावटी औज़ार' अपनी बुर केँ अंदर लिया थां?"
अंजलि कि सांसें तेज़ हौ गईं। आर्यन नें जारीरखा, "मेरे होतेहुए। मेरेइस 7 इंच केँ लोहे केँ होतेहुए, आपको किसी औऱ कि ज़रूरत केसेपड़ गई? क्याँ उसने आपको मुझसे ज्यादा सुख दिया?"
आर्यन कां हाथ अंजलि केँ पेट पऱ कस गय़ा। उसेये सोचकर घिन औऱ क्रोध दोनों आँ रहे थें कि उसकी मां कि उस 'पवित्र' स्थान पऱ, जिसे वो अपना साम्राज्य समझता थां, कलरात किसी औऱ कि घुसपैठ हुइ थि।
अंजलि नें महसूस किया कि उसका बेटा आज एक् प्रेमी याँ बेटे कि तरह नहि, बल्कि एक् जलन सें भरे मर्द कि तरह बर्ताव कररहा हैं। उसे आर्यन कां येरूप अंदर तक रोमांचित कर गय़ा। वो धीरे-धीरे सें पलटी औऱ आर्यन कि आँखों मे आँखें डालकर लेटी।
"आर्यन। तुँ पागल हौ गय़ा हैं क्याँ?" अंजलि नें उसके चेहरे कों सहलाते हुएकहा। "सुख?सुख तौ सिर्फ तूने मुझे दिया हैं। कलरात जोँ हुआ, वोँ 'सेक्स' नहि थां। वोँ एक् मजबूरी थि, एक् डर थां। उसने मुझे अपनी ताकत सें दबाया थां। उसने वो चीज़ मेरे अंदर डाली अवश्य, पर्र मुझे केवल दर्द औऱ अजीब सां अहसास हुआ। उसमें वोँ जान कहां, जोँ तेरेइस फौलाद मे हैं। "
आर्यन कां क्रोध अभि शांत नहि हुआ थां। उसने झटके सें अंजलि कि टांगों केँ बीच अपना घुटना अड़ा दिया। "मुझे नहि पता मम्मी, पर्र मुझेआज बहोत क्रोध आँ रहा हैं। मुझेऐसा लगरहा हैं जैसे किसी नें मेरी सबसे कीमती चीज़ चुराली होँ। मुझे अभि, इसी वक़्त अहसास दिलाओ कि तुम्हारी यहदेह मात्र मेरी हैं। "
अंजलि नें मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपनी ब्रा कि हुक ढीली कि औऱ आर्यन कों अपनीओर खींच लिया। "तोँ फिनदेर किसबात कि हैं? मिटादे अपनीयह जलन। औऱ अपनीइस मम्मी कों फिन सें अपनाबना लें। "
Doctor मां - Kahani ab aur interesting hogi
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