Doctor मां – New Episode
येकथा एक् मज़ेदार हॉटकथा केँ संगसंग मानव सवेंदना भावना औऱ उसके अंदर छिपेहुए रहस्यों कों समझने कि कोशिश भि हैं !
सिर्फ़ प्रेम हि नहि बल्कि कभीकभी जोँ वर्जित हैं उसे भि करना चाहिए औऱ यहसभी कि एक् दबी हुईँ सि ख़्वाहिश होती हैं
बहोत हि शानदार लिखरहे हें !
Doctor मां – New Episode
सुभह कि उस कच्ची धूप मे कमरे कां माहौल अब किसी 'पवित्र' रिश्ते कां नहि, बल्कि एक् भूखी मादा औऱ उसके वर्चस्वशाली नर केँ बीच केँ आदिमखेल कां अखाड़ा बन चुका थां। आर्यन खाट पर्र शान सें लेटाहुआ थां, उसका७ इंच कां फौलाद उसकी जांघों केँ बीच एक् खंभे कि तरहतना हुआ थां, जिस पर्र अंजलि कि योनि कां रस औऱ पसीना चमकरहा थां।
आर्यन नें अपनी ठंडी औऱ हुक्म भरी आवाज़ मे कहा, "बहोत तड़परही हैं नाँ मम्मी? तोँ अब एक् कामकर। नीचेझुक औऱ अपनेइस जवान बेटे केँ लन्ड कों अपने मुँह मे भर लेँ। औऱ हाँ, अपनीउस गीली गुफा कां स्वाद स्वयं चख, जौ अभि-अभि इस पऱ लगा हैं। आज देखूँ तौ सही, तुँ मेरी कितनी वफादार रांड हैं!"
आर्यन केँ मुँह सें यह शब्द निकलते हि अंजलि केँ मन कां अंतिम बचाहुआ 'सभ्यता' कां तार भि टूट गय़ा। वो किसी जंगली बिल्ली कि तरह झपटकर आर्यन केँ पैरों केँ बीच पहुँच गई।
एक् स्त्री जब कामुकता केँ उसचरम बिंदु पर्र पहुँचकर अधूरी छोड़ दि जाती हैं, तोँ उसकेलिए दुनिया कां कोई नाता, कोई संस्कार औऱ कोई लज्जा मायने नहि रखती। अंजलि कि इस टाइम कि मानसिकता एक् 'नशेड़ी' जैसी थि, जिसे अपनी अगली खुराक केँ लिएकुछ भि करना मंज़ूर थां। उसने बिना एक् समय सोचे आर्यन केँ उस७इंच केँ मूसल कों अपने दोनों हाथों मे भरा औऱ उसे पागलों कि तरह चूमने लगी।
जब उसनेउस अंग कों मुँह मे लिया, तौ उसे अपनी हि योनि कि तीखी औऱ कामुक महक महसूस हुइ। एक् आम स्त्री केँ लिएये घिनौना होँ सकता हैं, मगरहवस केँ इस स्तर पऱ अंजलि कों इसमें एक् रूहानी सुखमिल रहा थां। वो उसेऐसे चाटरही थि जैसे दुनिया कि सबसे कीमती मिठाई होँ। उसकी आँखें बंदथीं औऱ वो पूरीतरह सें आर्यन कि 'गुलाम' बन चुकी थि।
इस अवस्था मे एक् स्त्री कां दिमाग़ पूरीतरह सें खुल जाता हैं। वो वोँ बातें भि कह जाती हैं जौ उसनेकभी स्वयं सें भि नहि कही होतीं। अंजलि नें चूसते-चूसते रुककर आर्यन कि आँखों मे देखा औऱ हांफते हुए फुसफुसाया, "आर्यन। तूने मुझे पागलकर दिया हैं। जानते होँ? मे मंदिर मे बैठकर भि इसी७इंच केँ बारे मे सोचती थि। कि काश.काश यह तेरा फौलाद मेरे अंदर होँ औऱ तुँ मुझेऐसे हि गालियां दे। "
"मुझेअब फर्क नहि पड़ता कि तूँ मेरा बेटा हैं। तुँ मेरा मालिक हैं। मेरा खुदा हैं। तूँ अगर अभि कहेगा कि मे नग्न होकर बालकनी मे खड़ी होँ जाऊँ, तौ मे वोँ भि करूँगी। बस मुझे वोँ सुखदे दे। मुझे अधूरा मतछोड़!"
अंजलि अब आर्यन केँ लन्ड कों अपनेहलक तक उतारने कि कोशिश कररही थि। उसकी सिसकारियां औऱ उसके मुँह सें निकलने वाली 'गप-गप' कि आवाज़ें साफ़बता रहीथीं कि वो अब किसी भि हद कों पारकर चुकी हैं। एक् मां कि ममताअब पूरीतरह सें एक् प्रेमिका कि वहशीहवस मे तब्दील हौ चुकी थि। वो आर्यन केँ अंडकोशों कों सहलारही थि औऱ उसकी आँखों मे वो 'जानवर' साफ़दिख रहा थां जौ मात्र औऱ मात्र अपनेनर कों तृप्त करना चाहता थां।
"चूसइसे औऱ गहराई सें मां। आज तुम्हारी तरफ अपनीइस औकात सें प्रेम हौ जाएगा, " आर्यन नें उसके बालों कों मुट्ठी मे भींचते हुएकहा।
सुभह कि उस सुनहरी रोशनी मे आर्यन नें एक् लम्हा केँ लिए भि अपनी पकड़ ढीली नहि होने दि। जैसे हि अंजलि नें उसके लन्ड कों चूसना शुरुआत किया औऱ अपनी वफादारी कां सबूत दिया, आर्यन नें एक् क्रूर झटके केँ संगउसे अपने सें दूर धक्का दिया। अंजलि अभि उस स्वाद मे खोई हि थि कि वो वापसखाट पऱ औंधे मुँहपेट केँ बलजा गिरी।
अंजलि अभि संभल भि नहि पाई थि कि आर्यन एक् भूखे भेड़िये कि तरह दोबारा उसकेऊपर चढ़ गय़ा। उसने अंजलि केँ कूल्हों कों दोनों हाथों सें जकड़ा औऱ उन्हें ऊपर कि ओरउठा दिया।
आर्यन नें बिना किसी भूमिका केँ, अपनेथूक औऱ अंजलि केँ रस सें सनेहुए उस७इंच केँ कड़क फौलाद कों एक् हि झटके मे दोबारा अंजलि कि गुफा मे उतार दिया। वो प्रवेश इतना चिकना औऱ गहरा थां कि अंजलि कि रूह तक कांप गई। "आह्ह्ह्ह्ह। आर्यन! हाँ.यही। यही चाहिए थां मुझे!" अंजलि केँ मुँह सें निकली वो चीखअब दर्द कि नहि, बल्कि असीम खुशी कि थि।
अंजलि कां जिस्म जोँ पिछले ५ मिनट सें अधूरेपन कि आग मे जलरहा थां, उसे जैसे हि वो गरम लोहा दोबारा अपनी गहराई मे महसूस हुआ, उसकीहर नस मे बिजली दौड़ गई। आर्यन नें अब अपनी रफ्तार कों किसी बेकाबू इंजन कि तरह तेज़कर दिया। 'चप-चप-चप' कि आवाज़ अब औऱ भि तेज़ होँ गई थि, औऱ अंजलि कि भारी गांड़ आर्यन कि जांघों सें टकराकर लाल होनेलगी थि।
आर्यन नें अपनी पकड़ औऱ भि मज़बूत करली औऱ अंजलि केँ बालों कों पीछे सें घसीटकर उसकी गर्दन कों फिन सें चूमना औऱ काटना शुरुआत किया। "बता मम्मी। अब कैसालग रहा हैं? मिल गय़ा अपने बेटे कां यह७इंच कां जवाब?" अंजलि कां मनअब सुन्न हौ चुका थां। उसे महसूस होँ रहा थां कि वो हवा मे तैररही हैं। हर धक्का उसे स्वर्ग औऱ नरक केँ बीच कां सफरकरा रहा थां।
आर्यन अब रुकने वाला नहि थां। उसने अपनीकमर कों पागलों कि तरह चलाना शुरुआत किया। वो ७इंच कां अंग अंजलि कि कोख कों बार-बार चोट पहुंचा रहा थां, जिससे अंजलि कि योनि कि दीवारें ज़ोर-ज़ोर सें फड़कने लगीं। वो अब पूरीतरह सें 'डिस्चार्ज' होने कि कगार पर्र थि। उसकी आँखें पलट चुकीथीं औऱ वो बस एक् हि बातरट रही थि, "औऱ ज़ोर सें। औऱ ज़ोर सें आर्यन। मारडाल अपनीइस रांड कों। आज मुझे पूरीतरह भरदे!"
अंजलि कां पूरा जिस्म पसीने सें नहा चुका थां। आर्यन केँ हर धक्के केँ संग अंजलि कि सिसकी एक् लंबीअहह मे बदलरही थि। उसेलग रहा थां कि आज कि सुभह उसकी ज़िंदगी कि सबसे कामुक औऱ सबसे 'पूर्ण' सुभह हैं। वो ७इंच कां शैतान अब अपनी मंज़िल केँ बेहद लगभग थां।
"सजधजकर होँ जा मां। अब वोँ सैलाब आने वाला हैं जौ तुझेही पूरीतरह भिगो देगा!" आर्यन नें दहाड़ते हुए अपनी अंतिम औऱ सबसे भीषण पारी शुरुआत कर दि।
सुभह कि उस मदहोश रोशनी मे आर्यन अब सिर्फ एक् प्रेमी याँ बेटा नहि रह गय़ा थां, वो एक् क्रूर मनोवैज्ञानिक शिकारी बन चुका थां। अंजलि चरमसुख केँ उस बिंदु पर्र थि जहाँ उसका जिस्म फटने कों सजधजकर थां, उसकी बुर कि दीवारें पागलों कि तरह आर्यन केँ ७इंच केँ फौलाद कों जकड़रही थीं।
मगर तभी, आर्यन नें अपना सबसे घातक दांवचला।
आर्यन नें अचानक अपनीकमर कि गति रोकी। उसने अंजलि केँ दोनों हाथों कों बैड केँ सिरहाने पऱ लोहे कि जंजीर कि तरह जकड़ लिया औऱ अपनी मज़बूत जांघों सें अंजलि कि टांगों कों पूरीतरह 'लॉक'कर दिया। अंजलि हिल भि नहि सकती थि। औऱ फिन, एक् झटके मे उसने अपना७ इंच कां नंगा औऱ तपताहुआ लन्ड अंजलि कि गहराई सें बाहर् खींच लिया।
वो अचानक आया 'खालीपन' अंजलि केँ लिए किसी शारीरिक घाव सें भि गहरा थां। उसकी बुर कि नसेंअब भि हवा मे फड़करही थीं, जौ उस७इंच केँ दबाव केँ लिएरो रहीथीं। "आँ। आर्यन। फिन सें? क्यूं? डाल नां। प्लीज। मे मररही हूं!" अंजलि कि आवाज़ मे एक् अजीब सि दरिंदगी औऱ बेबसी थि।
आर्यन नें अपना चेहरा अंजलि केँ कान केँ पास सटाया। उसकीगरम सांसें अंजलि कि गर्दन कों जलारही थीं। उसने भारी औऱ कड़क आवाज़ मे पूछा, "बता। आजसचउगल दे! पिताजी केँ अलावा औऱ किस-किस केँ सामने नंगी हुईँ हैं तुँ? किस-किस मर्द नें तेरेइन दूधिया बदन कों अपनी उंगलियों सें रौंदा हैं? बोल!"
अंजलि केँ मन मे धमाके होनेलगे। एक् तरफ उसके जिस्म कि वोँ आग थि जोँ उसे पागलकर रही थि, औऱ दूसरी तरफ उसके अतीत केँ वोँ राज़ जिन्हें उसने अपनीरूह कि सबसे निचली तह मे दफनकर रखा थां। वो समझ नहि पारही थि कि येसच हैं याँ कोई बुरा सपना। उसकामन सुन्न होँ गय़ा थां।
अंजलि नें रोतेहुए अपनासिर तकिए मे दे मारा। "नहि। आर्यन। प्लीज। यहमतपूछ! मे। मे यह नहि बता सकती। मुझसे यहमत बुलवा! मुझे क्षमा करदे। पर्र मुझेयह सुखदे दे। मे तेरे पांव पड़ती हूं!" अंजलि कि सिसकारियां अब हिचकियों मे बदल गई थीं। वो अपनी सच्चाई बताने कि हिम्मत नहि जुटापा रही थि, पर्र उस७इंच केँ बिना उसका वजूद भि समाप्त हौ रहा थां।
आर्यन नें अपनी पकड़ औऱ भि मज़बूत करली। "अगर नहि बताएगी, तौ यह७इंच आज प्यासा हि बाहर् रहेगा। बोल.कौन थां वोँ? तेरे दफ़्तर कां कोई सहकर्मी? याँ पड़ोस कां वोँ अंकल?"
अंजलि अब पूरीतरह टूट चुकी थि। उसकी कामुकता औऱ उसकी शर्म केँ बीच एक् भीषण युद्ध चलरहा थां। उसका जिस्म पसीने सें नहाया हुआ थां औऱ वो पलंग पऱ किसी तड़पती हुई मछली कि तरह फड़फड़ा रही थि। उसेलग रहा थां कि अगर उसनेसच नहि बोला, तौ वो इस अधूरेपन कि आग मे भस्म हौ जाएगी।
सुभह कि उस कच्ची रोशनी मे रूमअब किसी मनोवैज्ञानिक युद्ध कां मैदान बन चुका थां। आर्यन नें अपनीचाल कों औऱ भि घातकबना दिया। उसने एक् बारफिन अपना७ इंच कां दहकता हुआ फौलाद अंजलि कि गहराई मे उतारा, पऱ मात्र एक् इंच। औऱ फिन झटके सें बाहर् खींच लिया।
ये 'टीजिंग' अंजलि केँ लिए किसी कोड़े कि मार सें भि बदतर थि।
जब एक् महिला कामुकता केँ उस शिखर पर्र होती हैं जहाँ उसका जिस्म पूरीतरह सें सक्रिय हौ, तोँ उसकी मानसिकता किसी आदिम 'मादा' जैसी होँ जाती हैं। यहा 'मर्यादा', 'लोक-लाज' औऱ 'रिश्ते' धुंधले पड़ जाते हें।
इस अवस्था मे एक् स्त्री कां मन सिर्फ एक् हि चीज़ माँगता हैं—तृप्ति। जबउसे बार-बार उससुख केँ मुहाने पऱ लाकर छोड़ दिया जाता हैं, तौ उसके अंदर कां 'ईगो'मर जाता हैं। वो अपनी गरिमा कों पैरों तले कुचलने केँ लिए रेडी होँ जाती हैं। अंजलि कि हालतउस प्यासे जैसी थि जोँ रेगिस्तान मे पानी कि एक् बूंद केँ लिए अपना ईमान बेचने कों सजधजकर होँ जाए।
आर्यन कां वो बार-बार अंदर-बाहर् करना अंजलि कि नसों कों पागलकर रहा थां। उसकी योनि कि दीवारें प्यास सें फड़करही थीं। उसकेलिए अब'सच' बोल्ना आसान थां, मगरउस 'अधूरेपन' कों सहना असंभव। एक् महिला इस मोड़ पऱ अपनी सबसे गंदी सच्चाई भि उगल सकती हैं, क्योंकि उसकाबदन उसके विवेक पऱ हावी हौ चुका होता हैं।
अंजलि कां पसीना, उसकी कांपती जांघें औऱ उसकी बेबस सिसकारियां गवाहथीं कि वो अब पूरीतरह सें 'शिकार' बन चुकी हैं। उसेलग रहा थां कि अगर आर्यन नें अभि उसे पूरा नहि भरा, तौ उसकादिल धड़कना बंदकर देगा।
अंजलि नें अपना चेहरा तकिए सें उठाया। उसकी आँखें लालथीं औऱ वो बुरीतरह हांफरही थि। आर्यन कां हाथअब भि उसकी गर्दन पऱ थां औऱ ७इंच कां मूसल उसकी जांघों केँ पास तांडव कररहा थां।
"बोल.कौन थां वोँ?" आर्यन नें दहाड़ते हुए उसकीकमर पर्र एक् ज़ोरदार तमाचा जड़ा।
अंजलि अब औऱ नहि सहसकी। वो टूट गई। उसने सिसकते हुए, आँखों सें आँसू बहाते हुए चिल्लाकर कहा:
"मासी। तेरी मासी केँ सामने। मेरी छोटी बेहन, कंचन केँ सामने!"
आर्यन केँ हाथ एक् समय केँ लिए ठिठकगए। उसनेकभी ड्रीम्स मे भि नहि सोचा थां कि उसकीसगी मासी, जोँ दिखने मे इतनी सीधी-सादी थि, इस 'गंदेखेल' कां हिस्सा रही होगी।
अंजलि नें आगे केहना शुरुआत किया, जैसेकोई बाँधटूट गय़ा हौ। "हाँ आर्यन! कंचन औऱ मे। हम् दोनों संग मे नंगी होतीथीं। हम् दोनों नें एक् हि मर्द केँ संग। तेरे पिताजी केँ संगसमय बिताया हैं। हम् बहनों केँ बीचकोई पर्दा नहि रहा। उसने मुझे देखा हैं, मैंने उसे देखा हैं। हम् दोनों कि हवस कि आग एक् जैसी हैं। "
अंजलि नें रोतेहुए आर्यन कां हाथ अपने सीने पर्र रखा। "अब बोल दिया मैंने। सभीबता दिया!अब मुझेमत तड़पा। डालदे अपनायह ज़हर मेरे अंदर! फाड़दे मुझे। पऱ मुझेयह सुखदे दे!"
आर्यन दंगरह गय़ा। उसकी मां औऱ उसकी मासी केँ बीच कां ये 'लेस्बियन' औऱ 'शेयरिंग' वाला राज़ उसकीसोच सें परे थां। मगरइस सच नें अंजलि कों औऱ भि अधिक 'कामुक' बना दिया थां।
आर्यन केँ कानों मे जब अपनीसगी मासी कां नाम पड़ा, तोँ उसकेमन कि नसें जैसे फटने कों रेडी हौ गईं। अपनीसगी मम्मी औऱ मासी कां एक् संग नग्न होना औऱ एक् हि मर्द केँ संगखाट साझा करना—ये एक् ऐसासच थां जिसने आर्यन केँ अंदर केँ 'बेटे' कों पूरीतरह समाप्त कर दिया औऱ एक् दरिंदे कों जन्मदे दिया।
उसकी उत्तेजना अब अपनीचरम सीमा कों पारकर चुकी थि। ७इंच कां वो फौलाद अब किसी अंगारे कि तरहदहक रहा थां।
आर्यन नें अबकोई रहम नहि दिखाया। उसने अंजलि केँ बालों कों इतनी ज़ोर सें पीछे खींचा कि अंजलि कां चेहरा ऊपर कि ओरतन गय़ा औऱ उसकी आँखें फटने लगीं।
आर्यन नें अपनी पूरी ताकत अपनीकमर मे समेटी औऱ एक् हि खौफनाक झटके केँ संग अपना पूरा७ इंच कां मूसल अंजलि कि गहराई मे जड़ तक उतार दिया। 'धपाक' कि एक् भारी आवाज़ आई औऱ अंजलि कि चीख उसकेहलक मे हि दब गई। ये प्रहार इतना गहरा थां कि अंजलि कों अपनीकोख मे एक् असहनीय औऱ मीठा धमाका महसूस हुआ।
अब आर्यन एक् मशीनबन चुका थां। उसने 'चप-चप' कि आवाज़ों कों एक् निरंतर म्यूज़िक मे बदल दिया। वो अंजलि कि कमर कों दोनों हाथों सें जकड़कर उसे अपनीओर खींचता औऱ फिन पूरे ज़ोर सें अपना लोहा उसके अंदरदे मारता। अंजलि कां गोरा जिस्म पलंग पऱ किसी चाबुक कि तरह लहरारहा थां। "आह्ह्ह। आर्यन। हाँ.यही सज़ादे मुझे। अपनीइस गंदी मां कों फाड़दे!"
अंजलि केँ लिएये सुख किसी 'वरदान' सें कम नहि थां। उसने अपना सबसे गंदा राज़उगल दिया थां औऱ बदले मे उसे वोँ ७इंच कां फौलादी सुखमिल रहा थां जिसकी वो प्यासी थि। उसे महसूस होँ रहा थां कि आर्यन उसे नहि, बल्कि उसकेउन 'पापों' कों कुचलरहा हैं जोँ उसने अपनी बेहन केँ संग मिलकर किए थें।
अंजलि कि बुर अबआगउगल रही थि। आर्यन कि गालियां औऱ उसके झटके अंजलि कों होश औऱ बेहोशी केँ बीच केँ उस धुंधलके मे लें जारहे थें जहाँ मात्र औऱ केवल'हवस' कां राज थां। वो पागलों कि तरह अपनी गर्दन हिलारही थि, उसके पसीने कि बूंदें आर्यन केँ सीने पऱ गिररही थीं।
आर्यन कि सांसें अब भारी हौ गई थीं। उसे महसूस होँ रहा थां कि उसकी मर्दानगी कां बांधअब टूटने वाला हैं। उसने अंजलि केँ कूल्हों पर्र एक् अंतिम औऱ ज़ोरदार तमाचा जड़ा औऱ अपनी जांघों कों अंजलि कि जांघों सें पूरीतरह चिपका लिया।
"तौ मासी भि ऐसी हि रांड हैं। रेडीरह मां, अब तेरायह सारा ज़हर मे इसी७इंच सें निकालूँगा!" आर्यन नें दहाड़ते हुए अपनी रफ्तार कों नामुमकिन हद तक तेज़कर दिया।
सुभह कि वो पहली किरणअब कमरे कि दीवारों पऱ अपनी गवाह छोड़रही थि। कमरे मे जिस्मों केँ टकराने कि गूँज औऱ भारी साँसों कां हंगामा अपनेचरम पर्र थां। आर्यन एक् जंगली दरिंदे कि तरह अंजलि केँ ऊपर सवार थां, औऱ उसका७ इंच कां फौलाद अंजलि कि कोमल गुफा केँ भीतर किसी गर्मआरी कि तरहधंस रहा थां।
अंजलि अब अपनी सुध-बुध खो चुकी थि। आर्यन कि गालियां, मासी वाला वोँ खौफनाक सच औऱ पीछे सें पड़ते ७इंच केँ वोँ बेदर्दी धक्के—इन सबने मिलकर अंजलि केँ अंदर एक् ऐसा ज्वालामुखी फोड़ दिया जोँ पिछले कई बरसों सें शांत थां।
अचानक अंजलि कां पूरा जिस्म पत्थर कि तरह सख्त होँ गय़ा। उसकी आँखों कि पुतलियाँ ऊपर कि ओरचढ़ गईं औऱ उसकेहाथ बैड कि चादर कों फाड़ने कि हद तक भिंचगए। उसकी बुर कि नसें पागलों कि तरह आर्यन केँ उस कड़कअंग कों अंदर कि ओर खींचने लगीं। "आह्ह्ह्ह्ह। आर्यन। मे। मे मर गई! उफ़्फ़। यह क्याँ। मेरा। मेरासभी निकलरहा हैं। आह्ह्ह!" अंजलि केँ मुँह सें एक् लंबी औऱ तीखीचीख निकली जोँ किसी म्यूज़िक कि तरह कमरे मे गूँजउठी।
अंजलि कां बदनअब थर-थर कांपरहा थां। उसकी जांघों केँ बीच सें कामुक रस कां एक् सैलाब बह निकला, जिसने आर्यन केँ ७इंच केँ फौलाद कों औऱ भि अधिक चिकना बना दिया। वो लगातार सिसकरही थि, उसकी आवाज़ अब भारी औऱ टूटी हुईँ थि। वो 'जड़' चुकी थि, उसका जिस्म पसीने औऱ उस मीठे दर्द सें नहाया हुआ थां जिसने उसे पूरीतरह खालीकर दिया थां।
मगर जहाँ अंजलि ढेर हौ चुकी थि, वहीं आर्यन अभि भि अपनी पूरी ताकत मे थां। उसका७ इंच कां मूसल अभि भि पत्थर कि तरह सख्त औऱ गरम थां। उसने अपनी रफ्तार ज़रा भि कम नहि कि। अंजलि केँ 'जड़ने' केँ बाद उसकी बुर जोँ औऱ भि अधिक संवेदनशील औऱ गीली हौ चुकी थि, आर्यन अबउसे औऱ भि गहराई सें कूटना शुरुआत कर चुका थां।
अंजलि केँ लिएअब येसभी असहनीय होताजा रहा थां। "आर्यन। बसकर। मेरा। मेरादम निकल जाएगा। मे अब औऱ नहि सह सकती!" वो अधमरी हालत मे फुसफुसा रही थि, पऱ आर्यन केँ लिएये केवल शुरुआत थि। वो अपनी मम्मी कि उसथकी हुईँ औऱ तृप्त देह कों औऱ भि बेरहमी सें मसलरहा थां, जैसे वो आज हि उसके अंदर कां सारा 'ज़हर' निकाल देना चाहता होँ।
आर्यन नें अंजलि केँ कांपते हुए कूल्हों कों अपनी मज़बूत पकड़ मे लिया औऱ एक् औऱ ज़बरदस्त धक्का मारा। अंजलि कि आँखें बंदथीं औऱ वो बस एक् बेजान गुड़िया कि तरह उसके नीचेहिल रही थि। आर्यन कि मर्दानगी अभि भि अपनी मंज़िल कि तलाश मे थि, औऱ अंजलि कां वोँ 'तोहफा' (सच)उसे औऱ भि ज्यादा उकसारहा थां।
"तुँ तौ अभि हि ढेर हौ गई मम्मी। अभि तौ मुझे तेरायह सारा गुमान तोड़ना हैं!" आर्यन नें दहाड़ते हुए अपनीकमर कों औऱ भि तेज़ी सें चलाना शुरुआत कर दिया।
सुभह कि उस सुनहरी रोशनी नें अब कमरे केँ हर कोने कों रोशनकर दिया थां, जहाँ मर्यादाओं कि राख पर्र हवस कां एक् वीभत्स औऱ नंगा साम्राज्य खड़ा थां। अंजलि, जोँ कुछदेर पहले तक सिसकरही थि, अब पूरीतरह निढाल हौ चुकी थि। उसकेबदन मे जैसेअब उंगली हिलाने कि भि शक्ति नहि बची थि।
आर्यन नें महसूस किया कि अंजलि कां जिस्म अब किसी बेजान गुड़िया कि तरह उसके धक्कों केँ संगबस हिलरहा हैं। उसकी साँसें उखड़ी हुइ थीं औऱ उसकी आँखें छत कि ओरजमी थीं, जैसे वो होश औऱ बेहोशी केँ किसीबीच केँ लोक मे पहुँच गई हौ।
आर्यन नें एक् अंतिम औऱ गहरा धक्का मारा, जिससे अंजलि केँ हलक सें एक् धीमी सि 'अहह' निकली, औऱ फिन उसने झटके सें अपना७ इंच कां नसों सें भरा मूसल अंजलि कि गहराई सें बाहर् खींच लिया। बाहर् आते हि वो अंगहवा मे अपनी मर्दानगी कां प्रदर्शन कररहा थां, जिस पऱ अंजलि केँ बदन कां रस औऱ पसीना चमकरहा थां।
अंजलि अबपीठ केँ बललेट गई थि। उसके गोरेहाथ पलंग पऱ फैलेहुए थें औऱ उसकी भारी छाती तेज़ी सें ऊपर-नीचे होँ रही थि। उसके चेहरे पर्र एक् अजीब सि शांति औऱ थकावट थि, जैसे वो इस 'युद्ध' मे अपनीहार स्वीकार कर चुकी हौ। उसकी टांगें अब भि अधखुली थीं, जोँ उस७इंच केँ आतंक कि गवाहदे रहीथीं।
आर्यन घुटनों केँ बल रेंगता हुआ अंजलि केँ सिर केँ पासआया। उसने अपनी मज़बूत उंगलियों सें अपनेउस तपतेहुए अंग कों थाम लिया। वो अपनी मां केँ चेहरे कों गौर सें देखरहा थां—वही चेहरा जिसे उसने बरसों सें पूजनीय माना थां, आज वो उसकीहवस कि ज़मीन बन चुका थां। आर्यन नें तेज़ी सें अपनेहाथ चलाना शुरुआत किया औऱ जैसे हि उसके अंदर कां लावा फटने कों सजधजकर हुआ, उसने उसका मुँह सीधे अंजलि केँ सूखे औऱ प्यासे होंठों पर्र टिका दिया।
आर्यन कि मर्दानगी कां वोँ गाढ़ा, सफ़ेद औऱ गरम सैलाब एक् झटके केँ संग अंजलि केँ मुँह केँ अंदरभर गय़ा। वो गर्म 'वीर्य' अंजलि केँ गले कि गहराई तक पहुँच रहा थां। अंजलि नें अपनी आँखें नहि खोलीं, बल्कि एक् आज्ञाकारी दासी कि तरह अपने बेटे केँ उस आखिरी तोहफा कों स्वीकार किया। उसने एक्-एक् बूंद कों अपनी ज़ुबान सें समेटा औऱ उसे गप-गप करके पूरापी गई। उसके चेहरे औऱ होंठों केँ कोनों पऱ सफ़ेद निशान रहगए थें, जोँ इस घिनौने मगर कामुक खेल कि मुहर थें।
आर्यन नें अपनी मम्मी कि उस अवस्था कों देखा—उसके मुँह सें बहती हुई उसकी अपनी मर्दानगी कि बूंदें औऱ उसकीबंद आँखें। उसे एक् असीम संतुष्टि मिली। उसे लगा कि आज उसने अपनी मम्मी कों नं मात्र शारीरिक रूप सें जीता हैं, बल्कि उसके वजूद कों अपनी मुट्ठी मे कर लिया हैं।
वो चुपचाप अंजलि केँ बगल मे ढह गय़ा। दोनों केँ शरीर पसीने सें चिपके हुए थें। आर्यन नें अपना एक् हाथ अंजलि केँ गले पऱ रखा औऱ अंजलि नें अनजाने मे हि उसके सीने सें अपनासिर सटा लिया। बाहर् सुभह कां हंगामा शुरुआत होँ चुका थां, पर्र कमरे केँ अंदरदो रूहें इस घिनौने सुख कि आगोश मे गहरी नींद मे सोगईं।
ap hiro too kamdev kaa avtar bnta jaa rah h , usko pta chal gya h kb kya karna h , vaise joo agni dr mummy ne lgai h uskah fal too bhogna hi hoga ,
Doctor मां – New Episode
सूरज कि किरणें अब खिड़की केँ पर्दों कों चीरकर कमरे केँ अंदर तक फैल चुकीथीं। घड़ी कि सुइयाँ 10 बजारही थीं। घऱ केँ बाहर् कि चहल-पहल शुरुआत हौ चुकी थि, मगरइस कमरे केँ अंदरसमय जैसेथम सां गय़ा थां।
आर्यन औऱ अंजलि, दोनों हि उस गहरी औऱ थका देने वाली नींद सें जागे, जोँ जिस्मानी औऱ मानसिक युद्ध केँ बादआती हैं। आर्यन कां कॉलेज छूट चुका थां औऱ अंजलि नें अपनी क्लिनिक नं जाने कां मनबना लिया थां। उसने कांपते हाथों सें अपने असिस्टेंट कों मैसेज कर दिया थां कि उसकी 'तबीयत खराब' हैं—औऱ एक् तरह सें येसच भि थां, क्योंकि उसका जिस्म औऱ रूह दोनों हि बुरीतरह टूटेहुए थें।
बैड पर्र बिखरी हुइ चादरें औऱ कमरे कि हवा मे फैली वोँ गंधरात औऱ सुभह केँ उस 'तांडव' कि गवाहथीं। आर्यन नें आँखें खोलीं औऱ अंजलि कि ओरहाथ बढ़ाया, मगर अंजलि नें झटके सें अपनीपीठ उसकीओर करली।
अंजलि केँ चेहरे पर्र आज वोँ 'तृप्ति' नहि थि जौ अमूमन ऐसे पलों केँ बाद होती हैं। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि चुभन औऱ क्रोध थां। वो इसबात सें बेहदआहत थि कि आर्यन नें उसके'चरम सुख' कि बेबसी कां फायदा उठाकर उससे उसकी छोटी बेहन (कंचन मासी) वाला वोँ कालासच उगलवा लिया थां। उसेलग रहा थां कि आर्यन नें उसकीरूह कों नंगाकर दिया हैं।
अंजलि मन हि मन स्वयं कों कोसरही थि कि उसनेउस ७इंच केँ दबाव मे आकर अपने औऱ अपनी बेहन केँ उस राज़ कों क्यूं खोल दिया। "तूने अच्छा नहि किया आर्यन." अंजलि नें भारी औऱ दबी हुईँ आवाज़ मे कहा, उसकीपीठ अब भि आर्यन कि तरफ थि। "तूने मुझे मजबूर किया। तूँ जानता थां कि मे उस वक़्त होश मे नहि थि। "
आर्यन बैड पर्र उठकरबैठ गय़ा। उसके चेहरे पर्र कोई पछतावा नहि थां, बल्कि एक् विजयी मुस्कान थि। उसने अपनी मम्मी कि नग्न औऱ गोरीपीठ कों गौर सें देखा, जिस पर्र अब भि उसकी उंगलियों औऱ दांतों केँ निशान थें। "मम्मी, सच कड़वा होता हैं, पऱ वोँ बाहर् आँ हि जाता हैं। अब मुझेपता हैं कि मेरी 'सीधी-सादी' मासी केँ अंदर भि वहीआग हैं जौ आपमें हैं। "
अंजलि नें चादर कों अपने सीने तक खींच लिया। उसे अब आर्यन कि नज़रों सें डरलगरहा थां। उसे अहसास होँ गय़ा थां कि अब आर्यन उसे औऱ उसकी बेहन, दोनों कों अपनी उंगलियों पऱ नचाएगा। "अब तूँ क्याँ चाहता हैं? क्याँ तूँ कंचन कों भि इसीआग मे झोंकेगा?" अंजलि कि आवाज़ मे डर औऱ क्रोध मिलाहुआ थां।
कमरे मे सन्नाटा छा गय़ा। अंजलि कि नाराज़गी ज़ाहिर थि, मगर उसकी साँसें अब भि आर्यन कि मौजूदगी सें तेज़ हौ रहीथीं। वो नाराज़ थि, पर्र वो ये भि जानती थि कि अब वो इस'लत' सें कभी बाहर् नहि निकल पाएगी। आर्यन नें झुककर उसकी गर्दन पऱ एक् छोटा सां चुंबन लिया, जिससे अंजलि कां पूराबदन एक् बारफिन सिहरउठा।
"नाराज़ मत हौ मां। अब तोँ खेल औऱ भि दिलचस्प होगा, " आर्यन नें फुसफुसाते हुएकहा।
सूरज कि तेज़धूप अब खिड़की केँ पर्दों सें छनकर अंजलि केँ चेहरे पर्र पड़रही थि, मगर उसकेमन मे छाया अंधेरा औऱ कड़वाहट कम होने कां नाम नहि लेँ रही थि। आर्यन नें महसूस किया कि इसबार मामला मात्र जिस्मानी नहि, बल्कि भावनाओं केँ गहरेघाव कां हैं।
आर्यन धीरे-धीरे सें खिसककर अंजलि केँ लगभगआया। उसने अपने मज़बूत हाथ अंजलि कि नग्न औऱ कोमलकमर पऱ रखे। अंजलि कां बदन आर्यन केँ स्पर्श सें एक् लम्हा केँ लिए सिहरा, पर्र उसने जल्दी अपनी मांसपेशियों कों सख्तकर लिया।
आर्यन नें अपना चेहरा अंजलि केँ कंधे केँ पास झुकाया औऱ बहोत हि मद्धम, रेशमी आवाज़ मे कहा, "मम्मी। अभि भि क्रोध हौ? मैंने जौ कुछ भि पूछा याँ कहा, वोँ मात्र इसलिये क्योंकि मे आपको पूरीतरह जानना चाहता थां। आपके औऱ मेरेबीच अबकोई पर्दा नहि रहना चाहिए। कंचन मासी वालीबात सुनकर मे आपसेदूर नहि हुआ, बल्कि मुझेलगा कि हम् एक्-दूसरे केँ औऱ लगभग आँ गए हें। "
आर्यन नें अंजलि कों पीछे सें अपनी बाहों केँ घेरे मे लेने कि कोशिश कि। उसने चाहा कि अंजलि मुड़े औऱ उसके सीने सें लगजाए। उसने अंजलि कि गर्दन केँ उस संवेदनशील हिस्से पऱ अपने होंठ टिकादिए जहाँ सुभह उसने गहरे निशान छोड़े थें। "चलो नाँ मां, क्रोध छोड़ो। देखोआज हम् दोनों घऱ पर्र अकेले हें। कॉलेज औऱ क्लिनिक दोनों कि छुट्टी हैं। आज कां पूरादिन केवल आपका औऱ मेरा हैं। "
मगर अंजलि इसबार पिघलने केँ मूड मे नहि थि। उसने आर्यन केँ हाथों कों अपनीकमर सें झटक दिया औऱ बैड पऱ थोडा औऱ दूर खिसक गई। "नहि आर्यन, बस बहोत हुआ! तूनेआज वोँ सीमापार कि हैं जिसे मे कभी स्वयं कों माफ नहि करपा पाऊँगी। तूने मेरी बेबसी कां फायदा उठाया। तूने मुझेउस हाल मे मजबूर कियाजब मे 'नां' कहने कि स्थिति मे नहि थि। "
अंजलि अब उठकरबैठ गई, उसने चादर कों अपनेबदन पर्र लपेटा औऱ घुटनों मे सिर देकर सुबकने लगी। "तूने मुझे अपनी 'रांड'बना दिया, मुझे गालियां दीं, औऱ फिन मेरे परिवार केँ सबसे बड़े राज़ कों छीन लिया। मुझेअब स्वयं सें घिन आँ रही हैं। जायहा सें। मुझे अकेला छोड़दे। "
आर्यन शांत होकरउसे देखता रहा। उसनेसमझ लिया थां कि अंजलि कि नाराज़गी ऊपरी नहि हैं; उसेइस बात कां डरसता रहा हैं कि अब आर्यन केँ पास उसकी बेहन कंचन कां भि 'कंट्रोल' आँ गय़ा हैं। अंजलि कां स्वाभिमान औऱ उसकी ममताइस समय उसके अंदर कि हवस सें लड़रहे थें।
आर्यन नें एक् गहरी सांसली। वो जानता थां कि अंजलि कों मनाना इतना आसान नहि होगा, मगर वो ये भि जानता थां कि अंजलि केँ बदन कि आग अभि पूरीतरह बुझी नहि हैं।
आर्यन समझ गय़ा थां कि इस टाइम ज़ोर-ज़बर्दस्ती याँ कामुक बातें आग मे घी कां काम करेंगी। अंजलि कि रूह जख्मी थि औऱ उसे मरहम कि ज़रूरत थि, न् कि औऱ ज्यादा हवस कि। उसने एक् गहरी सांसली औऱ बिनाकुछ बोले पलंग सें उठ गय़ा। उसने अपना नेकर पहना औऱ कमरे सें बाहर् निकल गय़ा।
लगभगआधे घंटेबाद, जब अंजलि अभि भि चादर मे लिपटी अपनी क़िस्मत औऱ शर्मिंदगी पर्र आँसूबहा रही थि, कमरे केँ दरवाज़े पर्र एक् हल्की दस्तक हुईँ। आर्यन हाथ मे एक् ट्रेलिए अंदरआया।
ट्रे मे गरमा-गर्म कप कॉफ़ी केँ दोमग, मक्खन मे डूबेहुए टोस्ट औऱ अंजलि केँ पसंदीदा कटेहुए फल थें। आर्यन नें कोई आवाज़ नहि कि। उसने चुपचाप ट्रे कों साइड टेबल पर्र रखा औऱ अंजलि केँ पैरों केँ पासबेड पऱ बैठ गय़ा। वो अब एक् 'वहशी प्रेमी' नहि, बल्कि वही 'छोटा आर्यन' लगरहा थां जोँ मां कि ज़रा सि तकलीफ पर्र बेचैन होँ जाता थां।
आर्यन नें धीरे-धीरे सें अंजलि केँ कांपते हुएपेर कों सहलाया। इसबार उसकी छुअन मे हवस नहि, बल्कि एक् अजीब सि शांति औऱ माफी थि। "मम्मी। मे जानता हूं मैंने आज सुभह अपनी सीमाएं लांघीं। मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना नहि थां, बसउस पागलपन मे मे भूल गय़ा कि आप् मेरी मम्मी भि हौ। प्लीज, कुछखा लो। सुभह सें आपने मात्र आँसूपिए हें। "
कप कॉफ़ी कि सोंधी गंध औऱ आर्यन केँ नरम शब्दों नें अंजलि केँ गुस्से कि दीवार मे एक् दरारकर दि। उसने अपनी भीगी आँखों सें आर्यन कि ओर देखा। आर्यन कि आँखों मे इस टाइमवही मासूमियत थि जोँ बचपन मे हुआ करती थि। अंजलि कां ममतामयी दिल, जौ कुछदेर पहले नफरत सें भरा थां, अब आरामसे पसीने लगा। एक् मां चाहे कितनी भि नाराज़ क्यूं नं हौ, अपने बेटे कि सेवा औऱ उसकी झुकी हुई नज़रों केँ आगेहार हि जाती हैं।
अंजलि नें धीरे-धीरे सें हाथ बढ़ाकर कप कॉफ़ी कां मगउठा लिया। उसने एक् छोटा सां घूँटभरा औऱ अपनी नज़रें झुकालीं। "तूँ बहोत शातिर हैं आर्यन। पहले मुझे बर्बाद करता हैं औऱ फिनऐसे प्रेम दिखाता हैं जैसेकुछ हुआ हि न् होँ। " उसकी आवाज़ अब सख्त नहि थि, उसमें एक् दर्दभरी मिठास लौटआई थि।
आर्यन नें मुस्कुराकर अंजलि केँ माथे कों चूमा। "मे शातिर नहि हूं मम्मी, बस आपका हूं। औऱ जोँ अपना होता हैं, वोँ हक भि जताता हैं औऱ माफ़ी भि माँगता हैं। " अंजलि नें एक् ठंडीअहह भरी औऱ धीरे धीरे टोस्ट खानेलगी। कमरे कां तनावअब कम हौ चुका थां, मगर कंचन मासी कां वोँ राज़अब भि दोनों केँ बीच एक् अदृश्य पुल कि तरह मौजूद थां।
अंजलि कों लगरहा थां कि वो आर्यन कि इस 'दोहरी पर्सनैलिटी' केँ जाल मे पूरीतरह फंस चुकी हैं—जहाँ एक् समय वो उसे अपनी जांघों तले कुचलता हैं औऱ अगले हि लम्हा उसे किसी देवी कि तरह पूजने लगता हैं।
ड्राइंग रूम मे पसराहुआ सन्नाटा अब एक् भारी औऱ संजीदा बातचीत मे तब्दील होँ चुका थां। आर्यन नें अंजलि केँ लगभग बैठकर उसके हाथों कों अपनी हथेलियों मे लिया। अंजलि कि नज़रें अब भि झुकी हुईँ थीं, मगर उसका जिस्म अब पहले जैसा सख्त नहि थां।
आर्यन नें अंजलि कि आँखों मे आँखें डालकर बहोत हि संजीदगी सें अपनीबात शुरुआत कि:
"मम्मी, आप् जोँ नाराज़ होँ रही हें, एक् बार ठंडे दिमाग़ सें सोचिए। मैंने यहसभी क्यूं किया? क्योंकि मुझेपता थां कि आपके अंदर एक् ऐसी प्यास हैं जिसे दुनिया कां कोई 'नॉर्मल' नाता नहि बुझा सकता। आपको वोँ 'गंदापन', वोँ गालियाँ औऱ वोँ बेबाकी चाहिए थि जोँ आपकेदबे हुए अरमानों कों बाहर् लासके। मैंने केवलवही रोल निभाया जोँ आपकामन बरसों सें चाहता थां। "
आर्यन नें अंजलि कां हाथ अपनेदिल पऱ रखा औऱ बहोत हि गंभीर स्वर मे कहा, "मे आजइस खुदा कि शपथ खाता हूं मां। आपके, बापू केँ औऱ कंचन मासी केँ बीच कां यह जौ भि राज़ हैं, यहइसी कमरे कि दीवारों केँ बीचदफन रहेगा। दुनिया कों छोड़ो, स्वयं मासी कों भि कभी कानो-कान खबर नहि होगी कि मुझेयह सभीपता हैं। मे आपका बेटा हूं मां, आपका दुश्मन नहि। "
इस पूरे प्रकरण मे अंजलि कि मानसिक स्थिति कों समझना बहोत ज़रूरी हैं, जौ हरउस स्त्री कि स्टोरी बयां करती हैं जिसके अंदरदबी हुईँ फंतासियां औऱ सामाजिक मर्यादाओं केँ बीच युद्ध चलता हैं:
एक् स्त्री केँ लिए अपने सबसे गंदे राज़ कों किसी केँ सामने ज़ाहिर कर देना बहोत बड़ा 'मानसिक बोझ' हल्का करने जैसा होता हैं। अंजलि जौ अब तक मासी वाला राज़ अकेले ढोरही थि, उसे आर्यन केँ सामने उगलने केँ बाद एक् अजीब सि 'शुद्धि' महसूस हुइ। यद्यपि वो नाराज़ थि, मगर अवचेतन मन मे वो खुश थि कि अब वो इस राज़ केँ संग अकेली नहि हैं।
स्त्री कि मानसिकता मे अक्सर 'समर्पण' कां एक् गहरा कोना होता हैं। जब आर्यन नें उससेसच उगलवाया, तौ अंजलि कों अपनी 'कमज़ोरी' कां अहसास हुआ। एक् स्त्री कों तब औऱ भि ज्यादा कामुक सुख मिलता हैं जब उसका'नर' इतना शक्तिशाली होँ कि वो उसकेमन केँ ताले तोड़सके। आर्यन कां येरूप उसे डराता भि हैं औऱ उसे एक् 'अजीब सुरक्षा' कां अहसास भि कराता हैं।
जब आर्यन नें शपथखाई, तोँ अंजलि केँ मन कि घबराहट ख़त्म हौ गई। स्त्री कि मानसिकता ये चाहती हैं कि उसका मित्र उसे उसके 'सबसे गंदे'रूप मे भि स्वीकार करे औऱ उसे दुनिया सें बचाकर रखे। आर्यन नें वही किया—उसने अंजलि केँ राज़ कों स्वीकार किया औऱ सुरक्षा कां वचन दिया।
अंजलि नें एक् लंबी औऱ गहरी साँसली। उसका तनावअब ढीलापड़ चुका थां। उसने पहलीबार सिर उठाकर आर्यन कों देखा। उसकी आँखों मे अब शिकायत नहि, बल्कि एक् अजीब सि 'अधीनता' थि। उसने महसूस किया कि आर्यन नें न् मात्र उसके शरीर कों जीता हैं, बल्कि उसके अतीत औऱ भविष्य कों भि अपनी मुट्ठी मे कर लिया हैं।
"तूने मुझे पूरीतरह खालीकर दिया हैं आर्यन। अब मेरेपास तुझसे छुपाने कों कुछ नहि बचा, " अंजलि नें एक् धीमी मुस्कान केँ संगकहा।
दोपहर केँ 12 बज चुके थें। बाहर् सूरज अपनी पूरी तपिश पर्र थां, मगर कमरे केँ अंदर कां माहौल अब एक् ठंडी औऱ रहस्यमयी चादर मे लिपटा हुआ थां। नाश्ते केँ बाद अंजलि कां मन हल्का होँ गय़ा थां, औऱ आर्यन केँ 'सुरक्षा केँ वादे' नें उसके अंदर केँ डर कों एक् गहरे विश्वास मे बदल दिया थां।
अंजलि अब सोफे पर्र आर्यन कि बाहों मे सिमटी हुइ थि। उसने अपनी आँखें मूंदलीं औऱ यादों केँ उस गलियारे मे पहुँच गई जहाँ उसने अपनी बेहन कंचन केँ संग मिलकर समाज कि हर दीवार कों गिरा दिया थां।
अंजलि नें आर्यन कि छाती पऱ अपनी उंगलियां फेरते हुए धीमी आवाज़ मे केहना शुरुआत किया, जैसे वो कोई गुप्त मंत्र पढ़रही हौ।
"आर्यन, तेरी लगता हैं कि तेरी मासी बहोत सीधी हैं, पर्र सच तौ यह हैं कि वोँ मुझसे भि दोकदम आगे हैं। जब तुँ छोटा थां औऱ तेरे पिताजी काम केँ सिलसिले मे शहर सें बाहर् जाते थें, तब कंचन अक्सर यहा रहनेआती थि। हम् दोनों बहनों केँ बीचकोई लज्जा नहि थि। हम् एक् हि खाट पऱ सोते थें औऱ घंटों एक्-दूसरे केँ शरीर कि बनावट औऱ अपनी अधूरी इच्छाओं केँ बारे मे बातें करते थें। "
अंजलि कि आवाज़ मे अब एक् अजीब सि मादकता थि। "मुझेयाद हैं वोँ गर्मी कि दोपहर, जब हम् दोनों नें तय किया कि हम् एक्-दूसरे कों वैसे हि देखेंगे जैसे खुदा नें हमें बनाया हैं। हमने सारे कपड़े उतारदिए औऱ आईने केँ सामने खड़ी होकर अपनी तुलना करने लगीं। कंचन कि कमर मुझसे थोड़ी पतली हैं, मगर उसके उभार मुझसे भि ज्यादा सख्त औऱ नुकीले हें। उसने पहलीबार मुझे सिखाया थां कि एक् महिला हि दूसरी स्त्री कों वोँ सुखदे सकती हैं जौ कोई मर्द नहि समझ सकता। "
अंजलि नें एक् गहरी सांसली। "कंचन कों 'शेयरिंग' कां बहोत शौक हैं। वोँ कहती थि कि अगरकोई चीज़ अच्छी हैं, तौ उसे अकेले क्यूं भोगना? तेरे पिताजी केँ संग जोँ कुछ भि हुआ, उसमें कंचन नें हि पहल कि थि। उसने मुझसे कहा थां, 'जीजी, आज इसे मिलकर चखते हें। ' उसरात हम् तीनों नें मर्यादा कि हरहदपार कर दि थि। कंचन नें उसे वैसे हि खुश किया जैसेआज तूने मुझे किया हैं। "
अंजलि नें आर्यन केँ कान केँ पास झुककर फुसफुसाया, "तेरी मासी कों ऊँचे औऱ कड़क मर्दों कां बहोत शौक हैं। वोँ अक्सर मुझसे कहती थि कि उसेकोई ऐसा चाहिए जोँ उसे हुक्म देसके, जौ उसे उसकी औकातयाद दिलासके। आजजब तूँ मुझे गालियां देरहा थां, तौ मुझे कंचन कि वही बातें याद आँ रहीथीं। "
अंजलि अबइस राज़ कों आर्यन केँ संग साझा करके एक् तरह कि 'मानसिक कामुकता' कां खुशी लेँ रही थि। एक् महिला जब अपनी बेहन केँ संग बिताए निजी पलों कों अपने 'प्रेमी' कों बताती हैं, तौ उसे एक् अलग स्तर कां रोमांच मिलता हैं। उसे महसूस हौ रहा थां कि वो आर्यन कों कंचन कि ओर आकर्षित नहि कररही, बल्कि वो आर्यन कों येबता रही हैं कि उसका पूरा खानदान हि इसी 'मिट्टी' कां बना हैं।
आर्यन केँ लिएये जानकारी किसी खज़ाने सें कम नहि थि। उसके दिमाग़ मे अब कंचन मासी कि एक् नईछवि बनरही थि—एक् ऐसी मासी जौ ऊपर सें शांत हैं, मगर अंदर सें ज्वालामुखी दबाए बैठी हैं।
अंजलि नें अपनीबात ख़त्म कि औऱ आर्यन केँ चेहरे कों अपने हाथों मे लेँ लिया। "अब तुँ मेरासभी कुछजान गय़ा हैं आर्यन। मेरीरूह भि औऱ मेरा अतीत भि। अबबता, क्याँ तूँ अब भि अपनीइस मां सें वैसा हि प्रेम करेगा?"
आर्यन कि आँखों मे एक् नईचमक थि। वो समझ गय़ा थां कि अब कंचन मासी भि उसकेइस 'खेल' कां हिस्सा बनने वाली हें, भले हि उन्हें अभि इसबात कां पता न् हौ।
आर्यन कि आँखें इस खुलासे सें फटी कि फटीरह गईं। उसकेमन मे कंचन मासी कि जोँ छवि थि—सफेद याँ हल्के रंग कि साड़ियाँ, माथे पर्र छोटी सि बिंदी, औऱ हाथ मे हमेशा रहने वाली पूजा कि थाली—वो अंजलि कि बातों सें पूरीतरह मेल नहि खारही थि।
आर्यन नें अंजलि कि कमर मे हाथ डालते हुएउसे थोडा औऱ लगभग खींचा औऱ अचरज सें पूछा, "क्याँ? मासी? मम्मी, आप् यकीन सें कहरही हें? कंचन मासी तोँ इतनी सीधी दिखती हें, हर टाइम पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन। मंदिर केँ बिना तौ उनकादिन शुरुआत नहि होता। मुझे तोँ लगा थां कि वोँ इनसभी बातों सें कोसों दूर होंगी। "
अंजलि नें एक् फीकी मुस्कान दि औऱ आर्यन केँ सीने पऱ अपनी उंगलियां फिराते हुएकहा:
"आर्यन, जौ जितना ज्यादा शांत औऱ धार्मिक दिखता हैं, उसके अंदर उतनी हि गहरीआग दबी होती हैं। कंचन कां वोँ पूजा-पाठ मात्र दुनिया केँ लिए एक् ढाल हैं। वोँ स्वयं कों उन कामों मे इसलिये व्यस्त रखती हैं ताकि दुनिया उसकी नज़रों मे छिपीहवस कों न् पढ़सके। वोँ जितनी सफाई सें अपनी साड़ी कां पल्लू संभालती हैं, उतनी हि सफाई सें उसने अपनेइस राज़ कों बरसों सें संभाल कररखा हैं। "
आर्यन नें उत्सुकता मे अगला प्रश्न दागा, "तोँ क्याँ। क्याँ मासी कि विवाह केँ बाद भि आप् दोनों नें यहसभी संग मे किया? मतलब, क्याँ वोँ सिलसिला अब भि जारी हैं?"
अंजलि नें जल्दी अपनासिर हिलाया औऱ आर्यन कि आँखों मे देखकर बड़ी संजीदगी सें कहा, "नहि आर्यन। वोँ जौ कुछ भि हुआ, वोँ बस एक् हि बारहुआ थां। वोँ एक् ऐसीरात थि जब हम् सभी भावनाओं औऱ हालात केँ बहाव मे बहगए थें। कंचन कि विवाह केँ बाद वोँ बहोत बदल गई। उसने अपनेउस 'गुनाह' कों ईश्वर केँ चरणों मे अर्पित कर दिया औऱ स्वयं कों पूरीतरह भक्ति मे डुबो लिया। उसकेबाद हम् बहनों नें कभीउस बारे मे बात नहि कि, औऱ न् हि फिनकभी किसी तीसरे कों अपनेबीच आने दिया। "
अंजलि कि इसबात मे एक् गहरी सच्चाई छिपी थि। एक् महिला कि मानसिकता अक्सर 'एक् बार कि गलती' कों जिंदगी भर केँ लिए एक् सबकबना लेती हैं। अंजलि नें बताया कि कंचन मासी नें उस एक् रात केँ बाद अपने चरित्र पर्र ऐसा पर्दा डाल लिया कि अबउसे भेद पाना करीब-करीब नामुमकिन हैं।
अंजलि नें बताया कि कंचनआज भि उस एक् रात केँ लिए स्वयं कों दोषी मानती हैं, औऱ शायदयही वजह हैं कि वो अब इतनी अधिक धार्मिक होँ गई हैं। वो अपनेउस 'कामुक रूप' कों फिन सें बाहर् नहि आने देना चाहती।
अंजलि जहाँ स्वयं कों आर्यन केँ हवाले कर चुकी थि, वहीं वो ये भि जानती थि कि कंचन कों फिन सें उस रास्ते पऱ लाना आसान नहि होगा।
आर्यन चुपचाप कुछ सोचने लगा। उसकेमन मे अब कंचन मासी कां वो चेहरा घूमरहा थां जोँ मंदिर कि घंटियों केँ बीच शांत दिखता थां, मगर अंजलि नें उस शांति केँ पीछे छिपे तूफ़ान कि गवाही दे दि थि। भले हि वो एक् बारहुआ थां, मगर 'वो हुआ तोँ थां'—यही बात आर्यन केँ लिए बहुत थि।
"तोँ मासीअब पूरीतरह 'पवित्र' बन चुकी हें." आर्यन नें गुनगुनाते हुएकहा, उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सि चुनौती थि।
दोपहर कि उस खामोशी मे अंजलि कि आवाज़ मे अब एक् अजीब सि उदासी औऱ चिंता घुल गई थि। आर्यन अंजलि कि गोद मे सिर रखकर लेटाहुआ थां औऱ अंजलि धीरे धीरे उसके बालों मे उंगलियां फेररही थि, जैसे वो अपने अतीत केँ पन्नों कों एक्-एक् करकेपलट रही हौ।
अंजलि नें एक् लंबी ठंडीअहह भरी औऱ खिड़की सें बाहर् ताकते हुएकहा:
"सच कहूँ आर्यन, तोँ अब कंचन औऱ मेरेबीच वैसी बातें नहि होतीं। विवाह केँ इतनेसाल बीतगए, मगर वोँ अपनी हि दुनिया मे सिमट गई हैं। शायदउस एक् रात केँ Guilt नें उसे मुझसे भि दूरकर दिया। बहोत वक्त होँ गय़ा हैं मैंने उससे खुलकर बात नहि कि। हमारी बातें अब केवल औपचारिकताओं तक हि सीमित रह गई हें। "
अंजलि कि आवाज़ थोड़ी भारी हौ गई। "उसकी विवाह कों इतनेसाल होँ गए, मगर उसकीगोद अब तक सूनी हैं। कोई बच्चा नहि हुआउसे। एक् महिला केँ लिएयह बहोत बड़ीटीस होती हैं, आर्यन। शायदयही वजह हैं कि उसका रुझान पूजा-पाठ कि तरफ औऱ भि बढ़ गय़ा। वोँ अपनीकोख केँ खालीपन कों मंदिर कि घंटियों केँ हंगामा मे दबाने कि कोशिश करती हैं। "
"पिछली बारजब वोँ मुझसे मिलने आई थि, तोँ बहोत दुःखी थि। उसने मुझसे झिझकते हुए पूछा थां कि क्याँ मे उसे किसी अच्छी गाइनोकोलॉजिस्ट कां पताबता सकती हूं। मैंने उसे सलाह भि दि औऱ एक् डॉक्टर कां नाम भि बताया थां, पर्र उसकेबाद उसनेकभी पलटकर नहि बताया कि क्याँ हुआ। मुझे तौ कभी-कभी लगता हैं कि उसकी शादीशुदा ज़िंदगी मे भि वोँ 'आग' ख़त्म हौ चुकी हैं। "
यहा अंजलि एक् ऐसी महिला कि मानसिकता कां वर्णन कररही थि जोँ अंदर सें टूटी हुइ हैं:
कंचन मासी कां मां नं बन पाना उसकेलिए एक् मानसिक बोझबन गय़ा हैं। जब एक् स्त्री कों लगता हैं कि वो 'पूर्ण' नहि हैं, तोँ वो अक्सर वैराग्य याँ भक्ति कां मार्ग चुन लेती हैं ताकि वो अपनी शारीरिक ज़रूरतों औऱ इच्छाओं कों 'पाप' मानकर दबासके।
अंजलि जानती थि कि कंचन केँ अंदरअब भि वोँ 'चिनगारी' कहीं नं कहीं ज़िंदा हैं, मगर संतान नं होने केँ दुख औऱ पूजा-पाठ केँ पर्दे नें उसे पत्थर बना दिया हैं। वो अपनी बेहन सें भि अब कतराती हैं, क्योंकि अंजलि उसे उसकेउस पुराने 'उन्मुक्त' रूप कि याद दिलाती हैं।
आर्यन नें अंजलि कि बातगौर सें सुनी। उसके दिमाग़ मे अब एक् नया औऱ गहराखेल चलरहा थां। एक् ऐसी महिला जोँ बरसों सें अतृप्त हैं, जिसकी कोख सूनी हैं औऱ जौ भक्ति केँ नाम पर्र अपनीहवस कों दबाए बैठी हैं—ऐसी महिला कों फिन सें 'जीवित' करना आर्यन केँ लिए एक् नई चुनौती कि तरह थां।
"तौ मासी कों डॉक्टर कि नहि, शायद किसी'खास' इलाज कि ज़रूरत हैं." आर्यन नें बुदबुदाते हुए अंजलि कि हथेली कों चूम लिया।
दोपहर कि उस तपती खामोशी मे अंजलि नें महसूस किया कि कंचन कि बातें जैसे-जैसे गहरी हौ रही हें, आर्यन केँ जिस्म कि हलचलबदल रही हैं। वो उसकीगोद मे सिर रखकर लेटा तोँ थां, मगर उसका ध्यान अब बातों सें ज्यादा उस 'कल्पना' मे खो गय़ा थां जहाँ मासी कि पवित्रता औऱ उनकीदबी हुईँ हवस कां मिलन हौ रहा थां।
अंजलि नें बात करते-करते अचानक अपनी नज़रें नीचे झुकाईं औऱ जोँ देखा, उसने उसकी धड़कनें बढ़ादीं। आर्यन केँ नेकर केँ ऊपर सें हि उसका७ इंच कां फौलाद अब एक् कड़क खंभे कि तरहतन चुका थां। कंचन मासी केँ अधूरेपन औऱ उनकीदबी हुईँ आग केँ ज़िक्र नें आर्यन केँ अंदर कि दरिंदगी कों फिन सें जगा दिया थां।
अंजलि नें अपनी एक् उंगली सें आर्यन कि नाक कों हल्के सें दबाया औऱ एक् शरारती मुस्कान केँ संगउसे डांटते हुएकहा, "ओह हौ। तोँ साहबज़ादे कां ध्यान मासी कि तकलीफ पऱ कम औऱ अपनीइस 'लाठी' पऱ अधिक हैं? लज्जा नहि आती तुम्हे? मे अपनी बेहन केँ सूनीगोद कि बातकर रही हूं औऱ तुँ यहा उसकेनाम सें हि घोड़े दौड़ा रहा हैं?"
आर्यन थोडा झेंप गय़ा, मगर उसने नज़रें नहि चुराईं। उसने देखा कि अंजलि कि आँखों मे अब क्रोध नहि, बल्कि एक् अजीब सि चमक थि। वो अपनी मम्मी केँ चेहरे केँ लगभगआया औऱ मुस्कुराते हुए बोला, "क्याँ करूँ मम्मी। आपकी बातें हि इतनी 'गर्म' हें। मासी कां वोँ पूजा-पाठ वाला चेहरा औऱ उसके पीछे छिपी वोँ आग। सोचकर हि मेरायह ७इंच बेकाबू होँ रहा हैं। "
अंजलि नें नेकर केँ ऊपर सें हि उस उभरेहुए हिस्से कों गौर सें देखा। वो जानती थि कि आर्यन अब कंचन कों मात्र एक् 'मासी' कि नज़र सें नहि देखरहा। "तूँ बहोत बिगड़ गय़ा हैं आर्यन। कंचनअगर देख लें कि तुँ उसके बारे मे क्याँ सोचरहा हैं, तोँ वोँ शायद मंदिर सें बाहर् हि न् निकले। " अंजलि नें हंसते हुएकहा, मगर उसकेहाथ अनजाने मे हि आर्यन केँ बालों कों सहलारहे थें
यहा अंजलि कि मानसिक स्थिति बड़ी दिलचस्प थि:
उसे थोडा बुरालगा कि उसकी बेहन कां ज़िक्र आर्यन कों इतना उत्तेजित कररहा हैं।
संग हि, उसेये सोचकर रोमांच भि होँ रहा थां कि उसका जवान बेटा अब उसके खानदान कि 'पवित्र' महिलाओं केँ मुखौटे उतारने केँ लिए सजधजकर हैं। उसे अपनी बेहन केँ संग बिताई वोँ 'एक् रात'याद आँ गई औऱ उसेलगा कि शायद कंचन कि ज़िंदगी कां सन्नाटा मात्र आर्यन जैसा 'तूफ़ान' हि तोड़ सकता हैं।
अंजलि नें अपनाहाथ धीरे-धीरे सें आर्यन केँ उस उभरेहुए हिस्से केँ पास लेँ जाकररोक लिया। "देख केसे अकड़ केँ खड़ा हैं यह। जैसे अभि कंचन कों यहीं बुला लेगा। बता, क्याँ चलरहा हैं तेरेइस शातिर मन मे?"
आर्यन नें अंजलि कि कलाई पकड़ली औऱ उसेउस तनेहुए लोहे पर्र टिका दिया। "यही चलरहा हैं मां। कि मासी कों डॉक्टर कि नहि, बल्कि इस७इंच कि 'दवा' कि ज़रूरत हैं। क्याँ आप् अपनी बेहन कि सहायता नहि करेंगी?"
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lg raha h , ap iss story mai kisi tisri ya tisre kee entry krne bale h , hahakari update rhe sb , par ghtnakrm teji say bdla , yovan kee andhi si aa gyi sadhuvad
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