My Life @Jindgi Ek Safar Begana ( Action , , Thriller , Adult) (Full Storyd) (romance special) – New Episode
Update 91
थोड़ी दूर हि चले कि रेहाना बोलीं - इसतरह सें तोँ रात बहोत हौ जाएगी घऱ पहुँचते-2, एक् काम करते हें, मे आगे डंडे पर्र बैठ जाती हूं फिन आप् आसानी सें चला सकते होँ.
मैने उसकीतरफ नज़र डाली, तोँ वोँ अपनी हि धुन मे चलीजा रही थि, मानो उसकेलिए यह नॉर्मल सि बात हौ.
मे - तुम् बैठ लोगि डंडे पऱ.? कोई प्राब्लम तौ नहीं होगी बैठने मे.?
वोँ - नहीं.! मुझे क्याँ प्राब्लम होगी, उल्टा पकड़ने कों हॅड्ल जौ मिलेगा औऱ साइकल कां बॅलेन्स भि अच्छा रहेगा.
फिन मैने साइकल खड़ी कि औऱ वोँ उचककर आगे डंडे पऱ बैठ गई,, मैने साइकल आगे बढ़ा दि.
उसकीबात सही थि, अब साइकल बॅलेन्स केँ संगचल रही थि, मैने पैडल पर्र दम लगाना शुरुआत किया औऱ अच्छी ख़ासी स्पीड सें साइकल भागने लगी.
रेहाना नें अपने जिस्म कों बॅलेन्स रखने केँ लिए अपने घुटने थोडा बाहर् कि ओररखे थें औऱ डंडे पर्र वोँ जांघों औऱ चुतड़ों केँ जोड़ कों रखकर बैठी थि,
जिसकी वजह सें उसके कूल्हे दबकर औऱ ज़यादा पीछे कों निकलरहे थें.
पेडल मारने केँ लिए मुझेदम लगाना पड़रहा थां जिससे मेरी टाँगें भि अंदर कि ओर हौ जाती थि, इस कारण सें मेरी जंघें एक् तरफ सें उसकी मंशाल जांघों सें रगड़खा जाती औऱ दूसरी तरफ उसके कूल्हे सें रगड़ जाती.
वोँ अपने दोनों हाथों कों आगे करके हॅंडल थामेहुए थि। मेरी दोनो जंघें बारी-2 सें उसके मंशाल जांघों औऱ कुल्हों सें रगड़रही थि औऱ उपर मेरे दोनो बाजू भि उसके मांसल बाजुओं सें सटेहुए थें.
यौवन सें लदीफदि रेहाना केँ जिस्म कि गर्मी मेरे जिस्म मे उत्तेजना पैदा करनेलगी। पप्पू अपनासर उठाने लगा औऱ पाजामे मे खड़ा हौ गय़ा.
आज नां जाने कितने दिनों केँ बाद साइकल चलाई थि मैने, सो मेरेहाथ हॅंडल कों पकड़े-2 थकनेलगे, औऱ मैने अपना सीधाहाथ हॅंडल कि मूठ सें हटाकर थोडा अंदर कि तरफ पकड़ लिया जहाँ उसके भि हाथरखे हुए थें.
मैने जैसे हि अपनाहाथ उसकेहाथ केँ पासरखा उसने मेरेहाथ कों स्थान देने केँ लिए अपना सीधाहाथ वहा सें हटाकर हॅंडल केँ मूठ पऱ रख लिया.
अब मेरा राइट हॅंड उसके बाजू केँ नीचे सें होकर हॅंडल कों थामे थां,
रेहाना भि शायद मेरीतरह उत्तेजित हौ रही थि, तोँ उसने अपनेबदन कों औऱ पीछे कि ओरकर लिया, अब मेरी बाजू उसके राइटबूब सें टच होनेलगी.
टच क्याँ होनेलगी, करीब उसकेबूब कां आधा बाहरी हिस्सा मेरी बाजू पर्र रखा थां…
जैसे हि मुझे उसकी गदराई मोटी चुचि कां एहसास अपनी बाजू केँ उपरहुआ, मेरे पूरे जिस्म मे करेंट सां दौड़ गय़ा औऱ मेरा पप्पू औऱ ज़यादा अकड़कर खड़ा हौ गय़ा,
रहना केँ पीछे हटने कि वजह सें वोँ उसकीपीठ मे बगल सें जा भिड़ा.
रात कां अंधेरा गहराता जारहा थां, उबड़-खाबड़ ख़स्ता हाल मार्ग पऱ साइकल उछलरही थि, जिसकी वजह सें दो जवान शरीरों मे घर्षण होँ रहा थां.
मेरी बाईं टाँग उसकी जाँघ सें रगड़ती, राइट जाँघ उसके कूल्हे सें रगड़ती, राइट बाजू उसकी चुचि सें औऱ पप्पू राम उसकीपीठ मे होलकिए देरहे थें.
रेहाना अपनी आँखें बंद करके मज़े लेँ रही थि, बार-2 केँ घर्षण सें मेरे पप्पू कां मुँह गीला होनेलगा।
होँ सकता हैं उसकी मुनिया भि खुशी सें लार टपकारही होँ पऱ यह केसेपता लगे.
फिन मैने अपना लेफ्ट हॅंड भि हॅंडल केँ बीच मे कर लिया,
आप् अगर साइकलिंग करतेहों, तौ आपकोपता होगा कि अगर साइकल कों स्पीड सें चलाना होँ तौ हॅंडल कों बीच मे पकड़ केँ स्पीड सें भगाना आसान होता हैं.
यह शायद रेहाना कों भि पता होगा, इसलिये उसने मेरे दोनो हाथों कों स्थान दे दि, औऱ अपने दोनोहाथ मेरी बाजुओं केँ उपर सें हॅंडल केँ मुठो पर्र रखलिए।
अब मेरी दोनो बाजू उसकी दोनो चुचियों कों साइड सें रगड़रही थि, शायदउसे भि ज्यादा मजाआने लगा थां, क्योंकि उसके सीने कां भर मेरी बाजुओं केँ उपर बढ़ता हि जारहा थां.
जैसे-2 साइकल अपने मंज़िल कि ओरबढ़ रही थि, हम् दोनो कि उत्तेजना भि बढ़ती जारही थि, रेहाना नें अपना लेफ्ट बाजू हॅड्ल सें हटा लिया,
अब वोँ उसे अपनी जांघों केँ बीच लें आई, शायद अपनी गीली मुनिया कों पोन्छ रही होगी…
अब उसकी एल्बो पीछे सें मेरे लन्ड कों दबारही थि.
अब एक् तरफ उसकी मंशाल पीठ कि बगल, दूसरी तरफ उसकी बाजू कां दबाब, उपर सें साइकल कि उच्छल कूद, मुझेऐसा लगरहा थां मानोकोई मेरीमूठ माररहा हौ।
उत्तेजना मे मैने साइकल औऱ तेजकर दि औऱ अपनी बॉडी केँ मूव्मेंट कों आगे-पीछे करनेलगा, मेरे मुँह सें स्वतः हि उउउहह…उउउहह…हूंन।
जैसी आवाज़ें आनेलगी जैसे कि बहोत मेहनत कां काम करते वक़्त निकलती हें.
रेहाना कि आँखें बंद हौ चुकी थि, मेरा लेफ्ट हॅंड हॅंडल छोड़कर उसकी जांघों केँ बीच पहुँच गय़ा, मेराहाथ लगते हि उसकी जांघे अपने आप् खुलती चली गई,.
मैने अपनेहाथ कों जैसे हि उसकी मुनिया केँ उपररखा, मेराहाथ गीला होँ गय़ा, मतलब… वोँ एक् बारझड चुकी थि, औऱ अभि भि लगातार पानीबहा रही थि.
हाथ कि रगड़ पाते हि रेहाना केँ मुँह सें एक् सिसकी निकल गई, औऱ उसने मेरेहाथ कों अपनी जांघों मे भींच लिया.
रास्ते कां हमेंपता हि नहींचला कब हम् उस स्थान पहुँच गये, जहाँ सें चले थें, मगरतब तक मेरा भि पाजामा गीला हौ चुका थां…!
घऱ पहुँच कर जैसे हि साइकल खड़ी हुइ, वोँ उतरकर नज़रें झुकाए घऱ मे घुसने लगी, मैने उसको पुछा-यह साइकल कहां रखूं.?
मेरे सें बिना नज़रें मिलाए, वोँ किसी रोबोट कि तरह मूडी, मेरेहाथ सें साइकल ली औऱ अंदर लेँ गई,।
घऱ मे एक् लालटेन जलाकर रोशनी कररखी थि.
उसकाघऱ एक् सामान्य रहने लायक साधारण सां घऱ थां, आगे एक् वरामदा जैसा थां, उसकेबाद एक् बड़ा सां रूम, उसके पीछे एक् किचन जैसीबनी थि.
वरामदा सें हि साइड मे दूसरा रूम वोँ भि काफ़ी बड़ा थां, जिसके दोगेट थें, एक् वरामदा सें थां औऱ दूसरा पीछे कि ओर किचेन सें थां.
किचेन कों रूम सें होकेर हि जायाजा सकता थां।
अमीना बी औऱ शाकीना भि हमेंदेख कर बाहर् आँ गई,।
सबसे पहले अमीना बी नें शाकीना कों बोलकर मेरेलिए गुनगुना पानी वरामदे केँ हि साइड मे बने एक् ओट सें मे बड़ा सां पत्थर डालकर रखा थां उस पर्र रखवा दिया.
अमीना बी मेरे कंधे कि चोट कों देखकर बोलीं - ओह्ह। तुम्हें तोँ चोटलगी हैं बेटा, जाओ पहलेयह कपड़े उतारकर पानी सें अपने शरीर कों साफ कर्लो, फिन मे तुम्हारी दवा दारूकर देती हूं।
औऱ शाकीना ! बेटी वोँ देख असलम केँ कपड़े रखे होंगे उसमें सें एक् जोड़ी लें आँ.
मैने अपनी कमीज़ उतारकर साइड मे रख दि औऱ अपने जिस्म कों गर्म पानी सें साफ किया,
मेरे पीछे खड़ी दोनो बहनें मेरी चौड़ी पीठ कों देखकर हि मेरेबदन कि बनावट कां अनुमान लगारही थि.
पाजामा मैने नहीं उतारा, क्योंकि वोँ साला लन्ड केँ पानी सें गीला हौ रहा थां.
अमीना बी नें कुछ जड़ी बूटियाँ पत्थर पर्र पीसकर मेरे जख्म पऱ रख दि, बड़ीजलन सि हुइ, मेरे मुँह सें नाँ चाहते हुए सीत्कार निकल गयीँ,,
वोँ बोलि- बेटा यह शर्तिया दवा हैं, थोडा जलेगा अवश्य मगर देख्ना सुभह तक हि यहआधा ठीक हौ चुका होगा.
फिन एक् कपड़े सें जख्म कों बाँध दिया, औऱ मैने असलम कि कमीज़ कों पहन लिया जोँ मुझे टाइटपड़ रही थि, पऱ जैसे-तैसे आँ गई,।
कमीज़ मे सें मेराआधा सीना बाहर् दिखरहा थां, जिसे रेहाना नज़र गढ़ाए देखेजा रही थि गुमसूम सि खड़ी।
यहाआने केँ बाद सें हि उसने मुझसे नज़र हि नहीं मिलाई थि, शायद रास्ते मे हुए उत्तेजक एनकाउंटर कि वजह सें उसे लज्जा आँ रही थि.
हमारे लौटने तक मम्मी बेटी नें खानां बना केँ रखा थां, हम् सबने खानां खाया, औऱ आपस मे कुछदेर बात-चीत करतेरहे,
मैने उनसे उनके परिवार केँ बारे मे पुछा जोँ उन्होने मुझेसभी डीटेल मे बता दिया.
रात काफ़ी होँ चुकी थि, सो अमीना बी नें मेरे सोने केँ लिए साइड वाले कमरे मे बिस्तेर करने कों बोला, मैनेकहा मे वरामदे मे हि सो जाउन्गा, आप् लोग अंदर अपने हिसाब सें सोजाओ.
उन्होने मेरीबात मानली औऱ एक् चारपाई पऱ मेरा बिस्तेर लगा दिया, औऱ वोँ लोग अंदरचली गयीँ, सोने,
अमीना औऱ शाकीना दोनो मां-बेटी सामने वाले कमरे मे सोती थि औऱ रेहाना अकेली साइड वाले कमरे मे.
मे पलंग पऱ लेटते हि गहरी नींद मे डूब गय़ा, क्योंकि पूरेदिन कि थकान सें शरीर टूटा पड़ा थां, उपर सें 4 किमीडबल सवारी साइकल खींची थि, जोँ नाँ जाने कितनी मुद्दतो केँ बाद चलाई थि, मेरी जांघें एक् दम टाइट हौ रखी थि साइकल चलाने सें.
वैसे तौ मार्च एप्रिल कां महीना थां, मगर वोँ इलाक़ा एक् तौ पहाड़ी थां, उपर सें उत्तरी छोर पऱ, तौ आधीरात सें हि मौसम ठंडा सां हौ जाता थां,
नींद कि वजह सें मे कुछओढ़ भि नहीं पाया थां, तोँ ठंड सें मे उकड़ूं लेटा पड़ा थां, मेरे दोनो घुटने पेट सें लगे पड़े थें.
पता नहींरात कां कौन सां प्रहार हुआ होगा, कि मुझे अपने बालों मे किसी कि उंगलियों कां स्पर्श महसूस हुआ, बदन पर्र भि एक् कंबल पड़े होने कां एहसास हुआ, मेरी नींदटूट गई, औऱ मैने धीरे-धीरे सें अपनी पलकें खोली.
अमीना बी मेरेसर केँ पास चारपाई पर्र बैठी मेरेसर कों सहलारही थि, औऱ मेरे सोतेहुए मासूम सें चेहरे कों देखेजा रही थि.
मैनेजान बूझकर करवट बदली औऱ उसकीतरफ मुँह करके अपनाहाथ उसकी जांघों पऱ रख दिया, अमीना बी कां बदन हल्के सें काँपा जौ मुझे महसूस हुआ,
फिन उसने मेरे चेहरे पऱ नज़र डाली, जब मुझे सोतेहुए पाया तौ झुककर मेरे माथे पर्र एक् चुंबन लिया जिससे उनकी भारी अधेड़ चुचियाँ मेरेसर सें दब गई,.
कितनी हि देर वोँ इसी पोज़िशन मे झुकीरही मेरेउपर औऱ मेरेसर औऱ गालों कों सहलाती रही,
मेराहाथ जोँ शुरुआत मे सीधा थां जोँ उसकी दूसरी जाँघ तक चला गय़ा थां, मैने खींचकर उसके जांघों केँ बीच मे कर लिया, अब मेरेहाथ औऱ उसकी बुर केँ बीचकुछ हि इंच कां फासला बचा थां.
उसने अपने गान्ड कों थोडा खिसका कर नीचे कों किया औऱ मेरेहाथ कों पकड़कर अपनी बुर केँ उपरदवा दिया, अब मेरा मुँह भि उसकी कुरती केँ उपर सें हि उसकेपेट केँ बगल मे घुसाहुआ थां औऱ वोँ मेरेउपर झुकी हुइ थि.
मेरा पप्पू यहसभी कहां झेलने वाला थां, स्त्री केँ अंगों कां स्पर्श पाते हि औकात मे आँ गय़ा.
My Life @Jindgi Ek Safar Begana ( Action , , Thriller , Adult) (Full Storyd) (romance special) – New Episode
Hello, Ladies & Gentleman,
We are so glad too Introduce Ultimate kahani Contest of this year.
jaesa की ap sabhi Jante haen iss baar Hum USC contest chala rahe haen और Kuch Din pehle hi Humne Rules & Queries Thread kaa announce krr दिया thaa और अब Ultimate kahani Contest kaa Entry Thread air krr दिया h joo 17th, Nov 2019, 11:59 PM ko close hoga.
Khair अब mein point pr Aate haen Jaisa की entry thread aired hu chuka h इसलिए ap Sabhi readers और writers से Meri personally request h की iss contest में ap Jarur participate kare और Apni kalpnao ko shabdon kaa raah dikha के yaha pesh kare hu sakta h लोग use पसंद kare.
or joo readers नहीं likhna chahte woh bakiyo की kahani padhke review de sakte h muze बहुत khusii hongi अगर ap iss contest में participate लेकर apni kahani likhenge too.
yeh ap Sabhi k liye एक बहुत hi sunhara avsar h इसलिए Aage Bade और apni Kalpanao ko shabdon main likhkar world Ko dikha De.
yeh एक short kahani contest h jisme Minimum 800 words से maximum 6000 words tak allowed h itne hi words में apni kahani complete Karni hongi, or एक hi post में complete krna h और Entry Thread में post krna h.
I hope ap muze niraash नहीं Karenge और iss contest main Jarur participate Lenge.
On Behalf of Admin Team
Regards :- kahani Collector
My Life @Jindgi Ek Safar Begana ( Action , , Thriller , Adult) (Full Storyd) (romance special) – New Episode
UPDATE 92
अमीना बी कि वासना जोँ नां जानेकब सें दबी पड़ी थि, एक् जवान मर्दाने शरीर केँ एहसास सें भड़कउठी,
उसने अपने पैरों कों भि चारपाई केँ उपररख कर मेरेबगल मे हि अढ़लेटी सि पड़ गई, औऱ अपना एक् हाथ कंबल केँ अंदरडाल कर मेरेबदन कों धीरे-धीरे-2 सहलाने लगी.
जैसे-2 उसकाहाथ नीचे कि ओरबढ़ रहा थां मेरी उत्तेजना भि बढ़ती जारही थि,
आख़िर मे उसकाहाथ अपनी मंज़िल पऱ पहुँच हि गय़ा औऱ जैसे हि उसकाहाथ मेरे लन्ड सें लगा, एक् ठुमका सां मारकर उसने उसकेहाथ पऱ झटका दिया.
अमीना बी कों कुछशक हुआ तोँ उसने मेरे चेहरे कि ओर देखा, मगर अब भि मुझे नींद मे देख उसने मेरे लन्ड कों मुट्ठी मे लें लिया।
लन्ड कां आकार महसूस कर उसकी बुर पनियाने लगी, औऱ मुँह हि मुँह मे बुदबुदाकर उसने मेरे पप्पू कि तारीफ कि.
अब वोँ उसे पाजामे केँ उपर सें हि सहलारही थि, नाँ जाने उसने क्याँ सोचा, अपनी सारी झिझक छोड़कर उसने मेरे पाजामे कि डोरीखोल दि औऱ नंगे लन्ड कों अपनी मुट्ठी मे भरके मुठियाने लगी,
मेरा भि अब लन्ड जबाबदे गय़ा औऱ उसने मुझे आदेश दिया कि अब तूँ भि खुलके मैदान मे आँ जा.
मेराहाथ उसकी भारी भरकम चुचियों पऱ चला गय़ा औऱ उन्हें ज़ोर सें मसल दिया, अमीना बी केँ मुँह सें आहह-आहह… निकल गई, औऱ मेरीओर देखा,
अब मैने भि अपनी आँखें खोलली थि.
उसने अपनाहाथ पाजामे सें बाहर् खींच लिया औऱ उठनेलगी, तौ मैने उसकीकमर मे हाथडाल कर अपने सें सटाते हुएकहा- अब कैसी लज्जा बीबी…
इतनासभी कुछ करनेबाद अब पीछे हटने कां क्याँ मतलब, अब औऱ थोडा वाकी हैं उसे भि होँ हि जानेदो.
मेरीबात सुनकर वोँ मेरे सीने सें चिपक गयीँ, औऱ फिन उसकीदबी कुचली वासना इसकदर बाहर् निकली कि सारे बंधन तोड़कर खूबबही, औऱ ऐसीबही कि उसकी टाँगें बुर औऱ लन्ड रस सें सराबोर हौ गई, ….!!
वोँ चुदाई मे खो सि गयीँ, …
मुद्दत केँ बादउसे लन्ड मिला थां, औऱ वोँ भि एक् जवान कां लन्ड जिसने उसकी मुरझाई हुईँ बुर कि अंदर तक ऐसी सेवा कि, कि वोँ फिन सें हरीभरी होँ गई,.
पूरीतरह संतुष्ट होने केँ बाद वोँ मेरेगाल चूमकर अपने बिस्तेर पऱ चली गयीँ, औऱ मे फिन सें गहरीनीद मे चला गय़ा….!!
दूसरे दिनलेट तक सोने केँ बाद मे उठा, थोडा बहोत घऱ केँ कामों मे हाथ बँटाया, इन लोगों नें तोँ मना कियामगर मैने उन्हें मजबूर कर दिया सहायता लेने केँ लिए.
दिन मे शाकीना जानवरों कों चराने लेँ गई,, मे उसके आस-पास हि रहा, मगर कोशिश यहरही कि कोई मुझे नोटीस नाँ करे…
वैसे तोँ इनकाघऱ अलग-थलग थां, मगरफिन भि खंखा कि मुशिबत फिलहाल गले पड़े, यह मे नहीं चाहता थां…
साम कों मैने उनको बोला कि मे थोडा घूम फिरके आता हूं, कुछ अपनेलिए कपड़े वग़ैरह कां इंतज़ाम करता हूं,
अमीना नें मुझे स्थान बताई औऱ पैसे देनेलगी, तोँ मैनेकहा कि नहीं मे इंतेज़ाम कर लूँगा.
रेहाना कि साइकल उठाई औऱ चल दिया बस्ती कि तरफ,
कबीले केँ दूसरी ओर एक् सुनसान जंगल मे एक् छोटा सां खंडहर थां, शायदकोई पुराने जमाने मे किसी कां चरागाह रहा होगा…
इसमें कई गुप्त जगहऐसे थें जौ बारीकी सें ढूढ़ने पर्र हि खोजेजा सकते थें,
आजकलऐसे हि एक् स्थान मैने अपना अड्डा बनारखा थां। वहा मैने अपने सारी ज़रूरत कि चीज़ें छिपारखी थि.
एक् हल्के वजन कि स्पोर्ट्स बाइक भि लेँ ली थि यहाआकर, वोँ भि वही छिपारखी थि।
मेरा खंजर औऱ दारोगा सें छीनी हुई गन तोँ वहा हि थि सो औऱ कोई हथियार लेने कि तोँ ज़रूरत हि नहीं थि, तोँ 3-4 जोड़ी कपड़े औऱ कुछ पैसे लेकर मे लौट लिया.
वापसघऱ पहुँचते-2 अंधेरा छा गय़ा थां। मैने थोडा गर्म पानी कराया औऱ आजकई दिनों केँ बादढंग सें नहाया औऱ कपड़े चेंजकिए.
नहा धोकर, मैने चारपाई बाहर् खुली स्थान मे बिच्छाई औऱ उस पर्र बैठकर अपने प्लान केँ बारे मे सोचने लगा।
रेहाना थोड़ी दूर पर्र हि जानवरों केँ बाडे मे कुछकर रही थि, कश्मीरी सूट मे वोँ बहोत खूबसूरत दिखरही थि.
निकाह कों एक् साल भि नहीं बीता थां कि बेचारी कों अपने शौहर सें बिछड़ना पड़ा थां, डेढ़-दो साल सें नां जाने केसे वोँ अपनी जवानी कों संभाले हुए थि.
वोँ झुककर कुछकर रही थि, शायद सुखीघास जानवरों कों डालरही होगी, अंधेरे मे इतनीदूर सें कुछ साफ-साफ दिखाई नहींदे रहा थां.
मे उठ केँ उसकीतरफ चल दिया, नज़दीक सें उसके सुडौल कूल्हे दो बड़े-बड़े बॉल जैसे झुकने कि वजह सें साफ-2दिख रहे थें, सूटकुछ ढीला होने कि वजह सें बीच कि दरार हल्की सि दिखाई देरही थि.
मैने उसके पीछे पहुँच कर उसको आवाज़ दि, तौ वोँ चोंककर खड़ी हौ गई, औऱ मेरीओर मुड़कर नज़रें झुकाए बोलीं- जी अशफ़ाक़ साब ! कोईकाम थां.?
मे - नहीं मुझेकोई काम नहीं थां, क्याँ तुम्हें मेरीकोई सहायता चाहिए.?
वोँ - नहींऐसा कोई भारीकाम नहीं हैं, बस थोड़ी सि घास जानवरों केँ आगेडाल देती हूं, रात मे खाते रहेंगे, आप् चलो मे अभि डाल केँ आती हूं.
मे - रेहाना ! नां जाने क्यूं मुझेऐसा लगरहा हैं कि तुम् मेरेयहा रहने सें खुश नहीं हौ…!
मेरीबात पर्र वोँ एकदम चोंककर बोलीं - क्यूं.? आपकोऐसा क्यूं लगा.?
मे - जबसेआया हूं, नां तौ तुमने मुझसे कोईबात कि हैं औऱ नाँ हि मेरेपास बैठी होँ, दूर हि दूररह रही हौ…!
मुझसे डरलगरहा हैं तुम्हें कि मे कुछ ग़लत नाँ करदूं तुम्हारे संग.?
वोँ – यह क्याँ कहरहे हें आप्.? प्लीज़ ऐसाकुछ सोचना भि मत.!
वोँ बस साइकल पऱ जौ अंजाने मे मेरे सें हौ गय़ा तौ उसकीवजह सें मुझे आपसेबात करने मे हया आँ रही हैं, औऱ कुछ नहीं…!
मे - तुमसे होँ गय़ा मतलब। क्याँ हुआ थां.? मुझे तौ ऐसाकुछ नहींलगा कि तुमसे कुछहुआ थां.? अबआगे बैठने सें इतना तोँ होँ हि जाता हैं, इसमें हयाआने जैसी तौ कोईबात नहीं हुईँ.?
अब तक उसकाकाम ख़तम होँ गय़ा थां, हम् बातें करतेहुए वापसघऱ कि तरफ आँ गये,
मे आकर चारपाई पर्र बैठ गय़ा, वोँ अंदर जानेलगी तौ मैनेकहा-
देखो अभि भि मेरेसंग नहीं बैठना चाहती होँ, यह नाराज़गी नहीं तोँ औऱ क्याँ हैं.?
वोँ - नहीं ! नहीं ! प्लीज़ आप् ऐसी बातें मत करिए, बस यूँही, शायद अम्मी कों मेरीकुछ सहायता लगे इसलिये जारही थि.
मे उसकाहाथ पकड़कर अपनेसंग बिठाते हुए बोला - छोड़ो उसे ! ऐसा क्याँ ज्यादा काम होगा, वोँ दो हें कर लेंगी, आओ बैठोकुछ बातें करते हें.
वोँ मेरेसंग सकुचती सि बैठ गई,। कुछदेर हम् दोनो केँ बीच चुप्पी छाइरही,
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