Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी - Latest Update 1
हैविंग फन माँ, हुंह!" वैशाली केँ कानों मे जबये मर्दाना आवाज़ गूंजी, एकाएक उसका सम्पूर्ण जिस्म सुन्न पड़ जाता हैं। जिस विशेष नाम सें उसे पिछले बाईस सालों सें पुकारा जारहा थां, वो मर्दाना आवाज़ उसके इकलौते बेटे केँ अलावा औऱ किसकी होँ सकती थि?
"इसका मतलब बापूफिन सें टूर पऱ चलेगए, हम्म!तभी स्वीट ममा मैस्टबेट करके अपना क्रोध जतारही हें, वो भि यूं खुलेआम" अपनी मम्मी कों सम्बोधित करता अभिमन्यु कां ये लगातार दूसरा अश्लील कथन थां औऱ अपनेइस दूसरे कथन कों कहकर जल्दी वो अपनी आँखें वैशाली केँ चेहरे सें हटाकर उसकी नंगी जांघों कि जड़ सें जोड़ देता हैं। उसकी मां केँ बाएंहाथ कि तीन उंगलियां उसकी झांटों सें भरी बुर कि गहराई मे भीतर तक घुसी हुईँ थीं औऱ बाएंहाथ केँ अंगूठे औऱ प्रथम उंगली केँ बीच उसकी मां नें ब्लाउज केँ ऊपर सें हि अपने दाहिने निप्पल कों मरोड़ा हुआ थां, जोँ कि साफ दर्शा रहा थां कि ब्लाउज केँ अंदर उसनेकोई ब्रा नहींपहन रखी थि।
अपने जवान बेटे कि आश्चर्य सें फट पड़ी आंखों कों अपने नंगे निचले धड़ सें चिपके देख अकस्मात वैशाली होश मे आई औऱ तत्काल अपने बाएंहाथ कों अपने दाहिने निप्पल सें हटाकर उसने सर्वप्रथम अपनी अधखुली साड़ी कों पेटीकोट समेत नीचे खींचने कां प्रयत्न कियामगर हड़बडी़ मे येभूल गई कि उसके दाएंहाथ कि तीनों उंगलियां अब भि उसकी बुर केँ भीतर घुसी हुई थीं।
"त.तु.तुम् घऱ केँ अंदर केसेआए? कॉलेज! क.कॉलेज सें इतने जल्द" तीव्रता सें अपनेसिर कों ऊपर उठाकर वैशाली अपने निचले धड़ कि वर्तमान हालत पऱ गौर करतेहुए हकलाई। अपने पहले हि प्रयत्न मे पलंग पऱ लेटी वो मम्मी अपने निचले नंगेधड़ कों अपनी मांसल जाघों केँ अंत तक ढांकने मे सफलरही थि, संग हि इसके उपरान्त उसने अपनेउसी बाएंहाथ कि सहायता सें अपना पल्लू भि अपने ब्लाउज पऱ रख लिया थां।
"अचानक तुम् इतनी घबरा क्यूं गईं? अपनी मम्मी केँ प्रश्नों केँ जवाब नाँ देकर अभिमन्यु उलटा उसीसे प्रश्न पूछ लेता हैं, उसके चेहरे पर्र एक् ऐसी दुष्ट हँसीपनप चुकी थि जिसे देखकर वैशाली लज्जा सें पानी-पानी हौ जाती हैं। वो अपने जवान बेटे केँ समक्ष यूं खुलेआम मुट्ठ मारते हुए पकड़ी गई थि औऱ ऐसी शर्मनाक परिस्थिति मे भि जानबूझकर बेटे द्वारा मां कि घबराहट केँ विषय मे पूछना उसकेलिए उस शर्मनाक परिस्थिति सें भि कहीं ज्यादा शर्मसार कर देने वाला क्षण थां। वो गूंगी होँ गई थि, एक् शब्द तक उसके मुंह सें बाहर् नहीं आँ सका थां।
"घबराने कि कोई जरूरत नहीं मां, वैसे भि ये पहलीबार नहीं जौ मैंने तुम्हें मैस्टबेट करतेहुए देखा हैं" अपनी मम्मी कां हलक चिपकता महसूस कर अभिमन्यु नें अत्यंत-जल्दी एक् औऱ विस्फोट कर दिया औऱ हँसते हुए वो पलंग पऱ वैशाली कि अधनंगी टांगों केँ समीप हि बैठ जाता हैं।
"कब देखा? नहीं! नहीं!ऐसा नहीं हौ सकता। आज सें पहले नहीं.तुम् झूठबोल रहे हौ मन्यु" बेटे केँ दूसरे विस्फोट पऱ वैशाली नें चौंकते हुएकहा औऱ संग हि वो उससे उसके पिछले कथन कां स्पष्टीकरण भि मांगती हैं। हालत कां खेल थां जौ महज एक् गलती पऱ आज बेटा खुद अपनी मम्मी पर्र आरोप-प्रत्यारोप लगारहा थां, उसे प्रत्यक्ष शर्मिंदा कररहा थां मगरफिन भि वैशाली पूरीतरह सें आश्वस्त थि कि अभिमन्यु साफझूठ कहरहा हैं।
"घऱ-घऱ कि यही स्टोरी हैं मां! पति कों पैसे कमाने सें फुर्सत नहीं, पत्नि उंगलियों सें कामचला रही हैं औऱ मजेकोई तीसरा आदमीआकर लें जाता हैं। खी.खी.खी.खी" पुनः अपनी मां केँ सवाल कां उत्तर देने कि बजाय अभिमन्यु नें नयाराग अलाप दिया, उसकी दुष्ट हँसी बिलकुल उसके अश्लील संवादों कि हि परिचायक थि।
"बेशर्म! ऐसा कहीं नहीं होता, अपनी मां केँ सामने इसतरह कि गंदीबात कहतेहुए तुम्हें." गुस्सा सें तिलमिते हुए वैशाली अपनाये कथन पूराकर पाती, इससे पहले हि अभिमन्यु उसेटोक देता हैं।
"हाँ मम्मी! शर्मआज कॉलेज नहींआई वर्ना उसे तुमसे मिलवाने आज मे घऱ लाने वाला थां। अम्म!ठीक हि हुआ जोँ वो ऐब्सन्ट थि, नहीं तौ." हँसते हुए अपने दांएहाथ सें उसने अपनी मम्मी कि अस्त-व्यस्त हालत कि ओर इशारा किया औऱ कहीं नां कहीं उसकाये नटखटी संकेत वैशाली कि समझ मे भि आँ जाता हैं मगरइस बार उसके चेहरे पर्र नां हि गुस्स थां औऱ नां हि लज्जा, वो हौले सें मुस्कुरा उठी थि।
"हँसी तोँ फँसी!हे.हे.हे.हे, खैर क्रोध नाँ करो तौ तुम्हारे पिछले प्रश्न कां जवाब देता हूं। मे पहले भि कईबार तुम्हें मैस्टबेट करतेहुए देख चुका हूं पऱ शायदआज कि तरहउन बीते शोज़ कों कभी अॉडियन्स कां प्रतीक्षा नहींरहा थां" कहने कों अभिमन्यु नें अपनाये कथन पूरा तोँ कर दिया थां मगरसंग हि एकाएक उसके टट्टे भि कड़क हौ गए थें। कुछ उत्तेजना कि उसकेठीक सामने पलंग पऱ लेटी उसकी मां कां दायां हाथअब भि उसकी नंगी बुर सें चिपका हुआ हैं याँ ऐसा भि हौ सकता हैं कि उसकी तीनों उंगलियां अबतक ज्यों कि त्यों उसकी बुर केँ भीतर घुसी हुई हों। कुछ स्वीकारने कां भय कि वो छुप-छुपकर अपनी मम्मी कों मुट्ठ मारते हुए देखता हैं औऱ उसने उसपर पऱ ये इल्जाम भि लगा दिया कि उसकी मां आज जानबूझकर यूं खुलेआम मुट्ठ माररही थि ताकि अपने जवान बेटे केँ हाथों पकड़ी जासके।
"चोर-उचक्के कहीं केँ! तुम् मेरी जासूसी करते हौ, अपनी मम्मी कि जासूसी, जिसने तुम्हें पैदा किया अपनीउस सगी मम्मी कि जासूसी। आह! क्याँ करूँ मे इस बेशर्म कां। मन्यु! यू हर्टमी, यू रियली हर्टयोर मदर" वैशाली जैसेबरस पड़ी, अपने बेटे कों चमाट लगाने केँ लिए वो जल्दी पलंग सें उठना चाहती थि पऱ उसेये भि ख्याल थां कि उठकर बैठने सें पूर्व उसे अपने दाहिने हाथ कों उंगलियों समेत अपनी नंगी बुर कि पहुंच सें दूर करना पड़ेगा, यहां तक कि हाथ अपनी साड़ी सें भि बाहर् निकालना होगा। कहीं उसकेऐसा करने सें उसके बेटे कों ये आभास नां हौ जाए कि उसकी मां उसकेसंग बातचीत जारी रहने केँ दौरान भि अपनी बुर सें खेलरही हैं, उंगलियों केँ अलावा उसका पूरा दाहिना पंजा उसकी बुर सें उमड़े कामरस सें भीगाहुआ थां औऱ जौ उसकेहाथ केँ साड़ी सें बाहर् आने केँ उपरान्त निश्चित हि उसके समीप बैठे अभिमन्यु कों नजर आँ जाता।
"चलो ये जासूसी वालीबात तुमने स्वयं हि मानली तौ मैंने तुम्हें माफ कियामगर तुम् मुझपर, अपनी मां पर्र ऐसादोष केसेलगा सकते हौ कि मैंने तुम्हें, अपनेसगे बेटे कों रिझाने केँ लिए अपने कपड़े उतार फेंके?" अभिमन्यु केँ चेहरे कि हवाइयां उड़ीदेख वैशाली अपना अगलाकथन औऱ उसमे शामिल सवाल बेहद शांत स्वर मे पूरा करती हैं।
अभिमन्यु भि उन्हीं अनगिनती जवान होते मर्दों मे शामिल थां जिनसे विपरीत लिंग कां आकर्षक जरा-सां भि नहीं झेला जाता, जिनके मन-मस्तिष्क मे जनाना अंगों केँ सिवाय कुछ अन्य घूमता हि नहीं हैं। एक् पढ़ी-लिखी समझदार महिला होने केँ नाते वैशाली अपने बेटे केँ इस लाइलाज मर्ज कों बहोत पहले हि समझ चुकी थि, उस मम्मी कि चौकसव परिपक्व आँखों कों अभिमन्यु कि बेचैनी कि मुख्य वजह दर्जनो बार सबूत सहित देखने मिली थि। न्यूड मैगजीन्स, इंटरनेट पॉर्न, रोलप्लेज़, सैक्स चैट यहां तक कि कईबार उसने अपने बेटे कि मौजूदगी कों परदे केँ पीछे, बंद दरवाजे कि निचली सांस औऱ कि-होल आदि सें महसूस किया थां औऱ वो भि तबजब वो मुट्ठ मारने याँ नहाने-धोने जैसे एकांत कार्यों मे व्यस्त रहा करती थि।
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औऱ सैक्स कि जिन गंदी-गंदी कहानियों कों पढ़कर कुछदेर पहले तुम् अपनी मां कों अपने बहतरीन सामाजिक ज्ञान कां एक् बढ़िया--सां एक्जाम्पल देरहे थें, तौ बेटा जी! वो पति, उसकी पत्नि औऱ उस तीसरे व्यक्ति कों तुम्हें उन्हीं कहानियों मे जाकर दोबारा खोजना चहिए क्योंकि इसघऱ कि कहनी तुम्हारे ज्ञान केँ मुताबिक कभी नहीं होगी"जब अभिमन्यु उस शर्मसार हालत मे पहुँच गय़ा जिसहाल सें कुछ वक़्त पीछे उसकी मम्मी जूझरही थि तब वैशाली अपने बाएंपेर केँ अंगूठे सें उसकीकमर कों गुदगुदाते हुए बोलि।
"एक् तोँ चोरीऊपर सें सीना जोरी, हम्म! तोँ तुम्हें बारे मे पूरी जानकारी हैं। सॉरी माँ! पऱ मैंने सोचा थां कि लाइफ मे पहलीबार मौकालगा हैं तोँ क्यूं नाँ मे भि तुमसे माफी मंगवा लूं" अभिमन्यु गुदगुदी केँ अहसास सें बैड पर्र लोट लगाते हुए बोला।
"कैसी माफी औऱ किसबात कि माफी?"बैड पऱ लोट लगाते अभिमन्यु केँ चूतड़ केँ नीचे वैशाली कि काली कच्छी दबी हुई थि औऱ जिसपर नजर पड़ते हि यौवन सें भरपूर उस अत्यंत कामुक मम्मी कि रुकी हुइ उत्तेजना मे एकाएक पुनः उबाल आँ गय़ा, एक् ऐसा अमर्यादित क्षण कि सभ्य औऱ संस्कारी वैशाली बिना कच्छी केँ अपने जवान बेटे केँ समक्ष विचरण कररही हैं।
"तुम्हारी यार मिसिज मेहता कि झूठी शिकायत कों शायद तुम् भूल गई माँ, जिसकी वजह सें तुमने बेवजह मेरी पॉकेटमनी बंदकर दि औऱ घऱ सें बाहर् जानां बंद कियासो अलग" अभिमन्यु नें उसेबीस दिनों पहले बीती घटना कों याद दिलाते हुएकहा।
"झूठी वो नहीं तुम् होँ, वो तोँ शुक्र करो कि तुम्हारी गंदी करतूत तुम्हारे बापू तक नहीं पहुँची वर्ना हमेशा केँ लिए तुम्हें घऱ सें बाहर् निकाल देते" बोलते हुए वैशाली कि नजरअब भि बेटे केँ चूतड़ केँ नीचेदबी अपनी कच्छी पर्र थि।
"तुम् ऐसीगलत हरकत केसेकर सकते होँ मन्यु? हम् बहोत पुराने यार हैं, तुम्हारी मम्मी समान हैं वो" उसने अपने पिछले कथन मे जोड़ा औऱ इस पूरे घटनाक्रम मे पहलीबार बेटे कि मौजूदगी मे हि उसके दाएंहाथ कि तीनों निर्जीव उंगलियां उसकी नंगी बुर केँ भीतर एकदम सें सजीव हौ उठती हें।
"मैंने नहीं चुराई उनकी पेंटी, मे पहले भि कईबार सफाईदे चुका हूं" अभिमन्यु कि तेजव उत्साहित मर्दाना आँखें जल्दी देख जाती हें कि साड़ी केँ भीतर घुसे उसकी मां केँ दाहिने हाथ मे अचानक सें हलचल होनी शुरुआत होँ गई हैं, जिसके परिणाम स्वरूप वो बिना किसी अतिरिक्त झिझक केँ अपनी मां केँ अधनंगे बाएं पांव कों उठाकर उसे सीधे अपनीगोद केँ बीचोंबीच रख लेता हैं
"बिलकुल ठीककहा तुमने, उसी सफाई केँ कारण हि तुम्हारी मेहरा आंटी कि पेंटी आज मुझे तुम्हारे स्टडी ड्रॉअर मे मिल गई" वैशाली केँ कथन कों सुन अभिमन्यु केँ पसीने छूटगए। अपनेजिस तनेहुए लन्ड कि कठोरता कां स्पर्श वो अपनी मम्मी केँ बाएं तलवे सें करवाने कां इच्छुक थां, उसकी कठोरता शीघ्रता सें घटने लगती हैं।
"चलोइस गलती केँ लिए भि मैंने तुम्हें माफ किया पर्र क्याँ तुम् मुझेये समझाओगे कि तुम्हें अपनी उम्र कि लड़कियों मे दिलचस्पी क्यूं नहीं हैं?" वैशाली नें पूछा औऱ अपना बायां हाथ वो पुनः अपने दाएं मम्मे पऱ रख लेती हैं। शिकार औऱ दाना!ये दोनो शब्द अर्थ मे भले हि एक्-दूसरे सें कितने अलग क्यूं नाँ होंमगर फिन भि इन्हें समानार्थक शब्दों मे गिना जाता हैं, ठीकउसी तरहयदि अभिमन्यु केँ मन-मस्तिष्क कों भेदना थां तौ उसकेलिए वैशाली कों सीधे उसकी जवान फितरत पऱ वार करना थां औऱ जोँ वो हौले-हौले करने भि लगी थि।
"हर किसी कि अपनीअलग फैंन्टसी होती हैं। मुझे अपनीएज कि गर्ल्स पसन्द नहींये तुम्हें किसने कहा? मुझे लड़कियां पसन्द हैं मगर भाभी टाइप औऱ खासकर मॉम्स टाइप मे मेरे दिलचस्पी थोड़ी ज़्यादा हैं। यूनो माँ, 'एमआईएल एफ' टाइप्स?" अभिमन्यु केँ चेहरे पर्र पसराभय पलभर मे हवा हौ गय़ा जब उसकी मां नें उसकीइस गंदी हरकत केँ लिए भि उसे जल्दी माफकर दिया औऱ तभी वो अपनी कल्पना, अपनी निजी फैन्टसी कों वैशाली केँ संग सांझा करने सें पीछे नहींहट पाता।
"माँ आईवुड लाइकटू फक" वैशाली अत्यंत जल्दी बेशर्मी सें बोलि मगर अंदर हि अंदरउसे कितनी ज्यादा लज्जा कां अनुभव हौ रहा थां ये उसकी कामुक अवस्था याँ वो खुद हि जान सकती थि।
"सहीकहा माँ! कभी-कभी तुमपर मुझे बहोत ज़्यादा प्रेम आँ जाता हैं। यूनो! मेरे किसीयार कि माँ इतनी समझदार नहीं औऱ हमारे जैसाकूल रिलेशनशिप भि किसी औऱ कां नहीं होँ सकता" अपनी मम्मी केँ मुंह सें 'फक" शब्द कां उच्चारण सुन अभिमन्यु केँ सम्पूर्ण जिस्म मे सुरसुरी छूटने लगी थि। वाकई उसकी मां उसकेसब दोस्तों कि माओं सें बैस्ट थि औऱ इसबात सें हमेशा हि उसे स्वयं पर्र फक्र होताआया थां।
"सो! तुम्हारी फैन्टसी मे तुम्हारी अपनी मां कां क्याँ रोल हैं" वैशाली अपनी साड़ी केँ पल्लू कों अपने ब्लाउज पर्र सें हटाते हुए पूछती हैं, उसके दाएंहाथ कां अंगूठा उसकी बुर केँ फूलेहुए भांगुर कों छेड़ने लगा थां।
"क्याँ तुम् मेरेसंग, अपनीसगी मम्मी केँ संग सैक्स करना चाहते हौ? क्योंकि मुझेपता हैं मिसिज मेहरा कि पेंटी तुमने किस कारण सें चुराई थि। मे भि तौ उसी कि तरह हि एक् 'एमआईएल एफ' हूं, अगर तुम्हें ऐसा लगता हौ तोँ वर्ना मे कितनी बूढ़ी हौ चुकी हूं मुझेपता हैं" अभिमन्यु केँ संग वैशाली भि अपने तात्कालिक कथन पर्र चौंकउठी थि। वो हैरत सें अपनी साड़ी केँ भीतर छुपे अपने दाहिने हाथ कि हलचल कों घूरती हैं, जोकि सचमुच साड़ी केँ ऊपर सें उसके द्वारा अपनी बुर सहलाने कां स्पष्ट दृश्य दर्शा रहा थां। उस कुंठित मां कि उत्तेजना उससमय एकदम सें शीर्ष पर्र पहुँच जाती हैं जब अपनी बेशर्मी कों सफा त्यागकर वो अपने बाएंहाथ केँ अंगूठे औऱ प्रथम उंगली केँ बीच खुल्लम-खुल्ला ब्लाउज केँ अंदरकैद अपने दाहिने निप्पल कों बलपूर्वक जकड़ लेती हैं, अपने बेहद ऐंठे चुके निप्पल कों तेजी सें मसलने लगती हैं।
अपनी मम्मी केँ कथन औऱ उसमे शामिल सवाल कों सुन अभिमन्यु गहरीसोच मे पड़ जाता हैं। केसे उसकी मर्यादित मां उसकी आँखों केँ समक्ष हि अपने अधनंगे शरीर सें खेलरही थि, वो चाहकर भि वैशाली कि अश्लील हरकत पर्र सें अपनी अचरजभरी नजरें हटा नहीं पाता। सच कितना कड़वा होता हैं, वो खुद भि तोँ अपनी उत्तेजना केँ हाथों हमेशा हारता आया थां फिन उसकी मां कौन--सि दूसरे किसी ग्रह कि प्राणी थि? मनुष्य चाहे कितनी तरक्की कर लेँ, लाख रोगों केँ इलाज ढ़ूँढ़े जा चुके हें पर्र कामरोग कां इलाजकोई ढ़ूँढ़ सका हैं भला? वो पुनः वैशाली केँ अधनंगे पेर कों बैड सें उठाकर अपनीगोद केँ बीचोंबीच रख लेता हैं ताकि अपनी मम्मी केँ नंगे तलवे सें अपनी पेंट केँ भीतर फड़फड़ाते अपने बेहदतने हुए लन्ड कां स्पर्श करवासके, उसकेऐसा करते हि जहां उसका लन्ड क्षणमात्र मे हि ठुमकी पऱ ठुमकी लगने लगता हैं वहीं वैशाली जल्दी अपनी आँखें मूंद लेती हैं।
अपने बेटे कि इन्हीं बेशर्म वओछी हरकतों सें आज वैशाली कों सरेआम लज्जित होनापड़ रहा थां। वो अभिमन्यु सें उम्रदराज थि, परिपक्व थि, रिश्ते मे उसकीसगी मां थि औऱ ये अच्छे सें जानती थि कि अपनीजिस निर्मल, निष्कलंक छवि कां वो प्रत्यक्ष हननकर रही हैं उसे कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता हैं। अपनी कामुत्तेजना कों ढ़ाल बनाकर वो अपने इकलौते पुत्र केँ अंतर्मन कों खंगालने कि प्रयासरत थि, ये विध्वंश्क सत्य जानने कि इच्छुक कि उसकी जन्मदात्री उसकी अपनी मां केँ प्रति उसके विचार कितने निष्छल, निष्कपट औऱ निस्वार्थ हैं। अपनी आँखें मूदकर उसने अपने मुट्ठ मारने कि धीमीगति कों एकाएक तीव्रता प्रदान कर दि ताकि अभिमन्यु कि रही-सही झिझक कां भि पूर्ण रूप सें अंत हौ जाए, बस उसके द्वारा पूछेगए सवाल कां जवाबभर उसेमिल जाएफिन वो निर्णय लें सकेगी कि भविष्य मे उसे औऱ क्याँ-क्याँ व केसे-केसे बदलावों सें गुजरना होगा। वो ये भि सोच चुकी हैं कि यदि उसका बेटा सचमुच उसकेसंग कौटुंबिक व्यभिचार करने कां इच्छुक हुआ तौ परिणामस्वरूप उसके अपना मुंह खोलते संग हि उसे अपनी मां केँ करारे थप्पड़ कां सामना करना पड़ेगा औऱ जोँ निश्चित उसकी घरनिकासी तक भि जा सकता थां।
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मे तुम्हारे संग सैक्स नहीं करना चाहता माँ मगर." बहुत सोच-विचारने केँ उपरान्त अभिमन्यु नें अपना आखिरी औऱ निर्णायक फौसला सुना दिया, जिसे सुनकर वैशाली भि तत्काल अपनी मुंदी हुई आँखें खोल देती हैं। उसकी प्रसन्नता कां कोईपार नहीं थां जबउसे उसके बेटे द्वारा सकारात्मक उत्तर कि प्राप्ति हुईँ मगर ज्योंहि उसकीनजर बेटे केँ चूतड़ केँ नीचे पूर्व सें दबी अपनी कच्छी पऱ पड़ी उसकी प्रसन्नता मानोहवा हौ गई। उसके अपनी आँखें मूंदने केँ पश्चात अभिमन्यु उसकी कच्छी कों गायबकर चुका थां औऱ अपनेइस घ्रणित कार्य कों उसने बड़ी सफाई सें अंजाम दिया थां, जिसकी जरा--सि भि भनक आँखें मूंदे लेटी वैशाली कों नहीं होँ पाई थि।
"मगर क्याँ? हूं!" अपने नंगे बाएं तलवे पऱ अपने जवान बेटे केँ पूर्ण विकसित कठोर लन्ड कां घिसाव वैशाली कों अजीब-सि संसनाहट सें भरनेलगा थां पऱ उस घिसाव औऱ उससे पैदा होती संसनाहट कों भुलाकर वो बेटे सें ऊसके अधूरे उत्तर कां स्पष्टीकरण मांगती हैं। अपनीतीन उंगलियों सें निरंतर तेजी--सें अपनी बुर कों चोदती उस अत्यंत हसीन मां नें अपनी आँखें खेलने केँ उपरान्त भि अपनी अश्लील कार्यवाही कों बंद नहीं किया थां अपितु अपने दाएं निप्पल कों भि वो लगातार बलपूर्वक उमेठे जारही थि।
"मगर मे तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं, तुम्हें अपना सबसे करीबी साथी बनाना चाहता हूं" कहतेहुए अभिमन्यु वैशाली केँ बाएं अधनंगे पेर कि घुटनों तक मालिश करना शुरुआत कर देता हैं। उसकी जवान आँखें अपनी मां केँ प्रत्यक्ष मुट्ठ मारने कां लुफ्त उठरही थीं, ऐसा खुशी तौ उसेतब भि कभी नहींआया थां जब वो छुप-छुपाकर उसे पूरीतरह सें नंगी होकर मुट्ठ मारते हुए देखता थां। विपरीत लिंगाकर्षण केँ अद्भुत प्रभाव नें उस नये-नवेले मर्द कों यहां तक गिरा दिया थां कि वैशाली कों नग्न देखने कां वो कोई मौका अपनेहाथ सें जाने नहीं देता थां, फिन चाहे उसकी मम्मी बाथरूम मे नहाए याँ जबतब अपने पति सें चुदवाए।
"क्याँ मे तुम्हें मां रूप मे अच्छी नहीं लगती जोँ तुम् मुझ बूढ़ी कों अपना सबसेखास साथी बनाना चाहते होँ?" बेटे केँ बलिष्ठ हाथों कि मालिश सें हौले-हौले स्वयं कों चरम पऱ पहुँचते महसूस कर वैशाली नें पूछा।
"इश्श्श्श्! ये क्याँ कररहे होँ मन्यु? स्स्स! मम्मी कों.मम्मी कों दर्द हौ रहा हैं बेटा" हस्तमैथुन औऱ बेटे कि मालिश सें उत्पन्न होती उत्तेजना कों पीड़ा कां नाटकीय रूप देती वो कामुक अधेड़ मम्मी जोर-सें सिसियाते हुए बोलि।
"नाटकमत करो माँ, मुझेपता हैं कि तुम्हें कोई दर्द-वर्द नहीं हौ रहा। खैर हम् अगर बैस्ट फ्रेंड बनते हैं तोँ उससेहमे बहोत फायदे होंगे। एक्-दूसरे सें हमारी लज्जा ख़त्म हौ जाएगी, अपनी बॉडी कि जरूरतों कों हमे छुप-छुपाकर पूरा नहीं करना पड़ेगा। हम् दोनो अडल्ट हें, तुम् भि जानती होगी कि मे भि मैस्टबेट करता हूं। तुम् जानती होँ नां मां?" वैशाली केँ बाएं पांव कों दाएं सें दूर खींच अभिमन्यु नें उनकेबीच एक् निश्चित चौड़ाई उत्पन्न करतेहुए पूछा। उसकीइस शर्मनाक हरकत केँ नतीजन उसकी मां कि साड़ी उसके पेटीकोट समेत उसकी ढ़की हुईँ मांसल जांघों केँ बहुतऊपर तक पहुँच जाती हैं, इतनेऊपर कि अब वो अपनी मम्मी केँ दाएंहाथ कि तीव्रता सें हिलती हुई कलाई कों साफदेख सकता थां।
"रुकजा वैशाली, यहींरुक जाअब भि कुछ नहीं बिगड़ा। तेरे बेटे केँ विषय मे तूँ पहले सें हि वो सबकुछ जानती हैं, जिसे जानने कां स्वांग रचकरबस तुँ अपनी शारीरिक कामिच्छा कि पूर्ति करने कां उद्दंडित प्रयास कररही हैं" सहसा वैशाली केँ कानों मे उसके अंतर्मन कि ये नैतिक आवज गूंजने लगीमगर अबउस आवाज़ सें मोल-भाव करने कां वक़्त बीत चुका थां, तेजी-सें अपनी बुर केँ भीतर अपनी उंगलियां हिलाती अपने पति द्वारा तिरस्कृत वो विवाहित मम्मी अपने अंतर्मन कों ये सोचकर जल्दी झुठला देती हैं कि उसके बेटे सें उसकी पूछताछ अभि पूरी नहीं होँ पाई हैं।
"उन्ह! तुम् एक् निहायती बेशर्म औऱ गंदे लड़के हौ मन्यु, जब तुम् जानते होँ कि तुम्हारी मम्मी तुम्हारे रग-रग सें वाकिफ हैं फिन भि तुम् यदि उसके हि मुंह सें सुनना चाहते हौ तौ सुनो। हाँ मुझे तुम्हारी मुट्ठ मारने कि घिनौनी हरकत कां पता हैं.ओह! उन्ह! औऱ ये भि पता हैं.उन्ह! कि मेरा बद्तमीज बेटा कभी-कभार अपनी मां कों सोचकर हि मुट्ठ मारा करता हैं" अब वैशाली नहीं केवल उसकी उत्तेजना बोलरही थि। सिसकियां लेतेहुए वो पहले सें कहीं अधिक तीव्रता सें अपनी उंगलियां अपनी निरंतर रस उगलती बुर केँ अंतर-बाहर् करनेलगी थि, जिसकी संकीर्ण गहराई मे एकाएक ज़्यादा सें ज़्यादा गाढ़ कामरस उमड़ने लगा थां। उसके निप्पल बुरीतरह सें ऐंठगए थें औऱ संग हि उसकी गांड केँ छेद मे अविश्वसनीय सिरहन कि लंबी-लंबी लहरें दौड़ना शुरुआत होँ गई थीं, कुल मिलाकर वो स्खलन सें पूर्व महसूस होने वाली आनंदमयी तरंगों मे पूर्णरूप सें खो चुकी थि।
"ओह माँ! तुम् मेरे, अपने इकलौते बेटे केँ बारे मे इतनागलत सोचती होगी, मुझे बिलकुल नहींपता थां मगरकोई बात नहीं, अब हम् बैस्ट फ्रेंड जौ बनगए हें। इसके अलावा मुझे लगता हैं कि हमें अपनी न्यूडिटी कों भि कोई खासी वेल्यू नहीं देनी चाहिए बल्कि मे तौ कहूंगा कि अगर हमारे बीच अच्छी अंडरस्टेंडिंग हैं तौ हम् अपने मनमाने ढंग सें घऱ मे रह सकते हें" अपनी मम्मी कि कामुक सिसकियों सें भड़के जवान अभिमन्यु नें बेखौफ उसे अपनी उम्र मुताबिक हि अपनी कामलुलोप इच्छाएं बतना जारीरखा। फिलहाल तोँ बसउसे वैशाली सें गहरी दोस्ती निभाने कि चाह थि, एक् इतनी गहराई युक्त दोस्ती जिससे वो दोनों एक्-दूसरे सें अपनाकोई राज नां छुपा सकें औऱ उनके मर्यादित रिश्ते मे हर संभव खुलापन आँ सके। वो उसकेसंग कोई जबरदस्ती नहीं करना चाहता थां, वो चाहता थां कि उसकी मम्मी स्वयं उसे आमंत्रित करे, उसे ललचाए औऱ अगर वो खुदऐसा करती हैं तब वो उसकी मर्जी सें उसे जरूर चोदेगा।
"तौ क्याँ.तौ क्याँ न्यूडिटी सें तुम्हारा ये मतलब हैं कि घऱ पऱ मे तुम्हारे सामने नंगीरहा करूं? तुम्हारी अपनीसगी मां। ओह मन्यु! तुम् सच मे एक् घटिया सोच रखने वाले लड़के होँ, उन्ह! उन्ह! अपनी माँ.अहह! अपनी माँ कों घऱ मे नंगी होकरकाम करतेदेख तुम्हें लज्जा नहीं आएगी बेशर्म लड़के। उफ़्फ़! मे घऱ मे नंगी घूमूं, जबकि मेरेसंग मेरा अपना जवान बेटा भि घऱ मे मौजूद हौ। अहह! मन्यु अहह! क्याँ बेहुदा चाहत हैं तुम्हारी" वैशाली स्खलन केँ बेहद लगभग पहुँचते हुए फुफकारी। एक् तोँ बेटे कि उपस्थिति औऱ ऊपर सें उसकी वर्जित व निषिद्ध चाहतों नें उस अबतकरही संस्कारी मां कों खुद निर्लज्ज बना दिया थां। अभिमन्यु कि सुर्ख लाल आँखों मे स्वयं अपनी आँखों समान तैरती वासना देखबैड पऱ लेटी खुल्लम-खुल्ला मुट्ठ मारती वो शिष्ट मां घबराहटवश अपना बाएंहाथ अपने कड़क निप्पल सें हटाकर अत्यंत-जल्दी उसे अपने बेटे कि ओर बढ़ा देती हैं।
"ओह! मन्यु, जब तुम्हारी बेशर्म मां कों तुम्हारे सामने यू खुलेआम मुट्ठ मारने मे लज्जा महसूस नहीं होँ रही तौ क्याँ पताकल सें वो सचमुच हि घऱ मे नंगी नां घूमने लगजाए औऱ क्याँ पता कि अहह!अहह! अहह! कि आगे वो तुमसे चु." अभिमन्यु नें ज्यों हि अपनी मम्मी केँ बाएँहाथ कों थामा, उसकी आँखों मे देखते हुए वो तीव्रता सें झड़ पडी़।
"स्स्स! मन्यु ओह! आहऽऽऽऽऽऽ! आहऽऽऽऽ! अभिमन्यु मे गई" पूरा बेडरूम वैशाली कि सीत्कारों सें गूंजउठा।
"कोई नहीं मम्मी, कोईबात नहीं। मे हूं नां यहा, तुम्हारा बेटा तुम्हारे पास हि हैं घबराओ मत" कहतेहुए अभिमन्यु अपनी मम्मी कां कांपता बाएँहाथ अपने दोनो पंजों सें सहलाने लगता हैं।
"फिकरमत करो, मे तुमसे सैक्स नहीं करना चाहता। आहां! नेवर माँ औऱ तुम् कोई बेशर्म नहीं हौ, बेशर्म तौ मे हूं देखो जिसने तुम्हें रुला दिया, अपनी बैस्ट फ्रेंड कों रुला दिया"कुछ मनभावन स्खलन औऱ कुछ आंतरिक सरम केँ प्रभाव सें वैशाली कि आँखे बहनेलगी थीं जिन्हें देख अभिमन्यु भि करीब रोने-सां लगता हैं। भले हि वो जवान थां, कईबार चुदाई कर चुका थां मगरजिस तरह केँ अद्भुत, अकल्पनीय स्खलन कों वो अभि तत्काल मे देखरहा थां मानो उसका सम्पूर्ण जिस्म एक् अनजाने भर सें थरथरा उठा थां। उसके लन्ड कि कठोरता सुन्न-सि होँ चुकी थि, माथे सें बहकर पसीना उसके गालों सें होताहुआ उसकी शर्ट भिगोने लगा थां।
स्खलन केँ दौरान वैशाली कि पीठ एकाएक पलंग सें ऊपर कों उठ गई, उसके चेहरे पर्र गहन पीड़ा केँ भाव उमड़आये थें, चीखते हुए वो रोनेलगी थि, उसके शारीरिक कंपन कि तोँ कोई सीमा हि नहींरही थि औऱ जिसे प्रत्यक्ष इतने नजदीक सें देख सहसा अभिमन्यु केँ जबड़े जोरों सें भिंचगए जैसे अपनी मां केँ स्खलन केँ खुशी कों वो दर्द स्वरूप खुद महसूस करनेलगा थां।
कुछदेर तक हांफते रहने केँ उपरान्त वैशाली कां ऐंठाहुआ जिस्म स्थिर हौ गय़ा औऱ ज्यों हि वो शांत हुइ, अभिमन्यु जल्दी उसकी साड़ी कों नीचे खींच उसके घुटनों तक ढांक देता हैं ताकि स्खलन केँ संग बाहर् आए अपने कामरस कों देख पुनः उसकी मां कों सरम कां सामना नहीं करना पड़े। वैशाली नें जबये देखा तोँ उसकीनम आँखें उसके बेटे कि नम आँखों सें जा टकराईं औऱ यही वो क्षण थां जब क्रोधित याँ शर्मिंदा होने कि बजाए वो अभिमन्यु कों अपने बाएंहाथ सें अपनीओर खींचते हुएउसे अपने सीने सें चिपका लेती हैं।
"लोजी करलोबात! मै तोँ तुम्हें बहुत डेरिंग लड़का समझती थि जोँ कुछ दिनों पहले मेरीयार, यानी कि अपनी मम्मी समान महिला केँ बाथरूम सें उसकी यूस्ड पेंटी तक चुरा लाया थां पर्र तुम् तौ चूहा निकले" वैशाली अपने बाएंहाथ सें अभिमन्यु कि पीठ सहलाते हुए बोलीं, उसके चेहरे पऱ बेहद खूबसूरत--सि मुस्कान छा गई थि।
"औऱ पता हैं इस चूहे कि सजा क्याँ हैं? उसनेउसे अपने सीने सें हल्का सां दूर करतेहुए पूछा।
"हम्म! क्याँ हैं सजाकहो?" अभिमन्यु धीरे-धीरे सें फुसफुसाया, वो अबतक अपनी मम्मी केँ उस अद्भुत स्खनल केँ अलावा कुछ भि अन्य सोचने-विचारने मे असमर्थ थां औऱ उसके चेहरे पर्र छाई तकलीफ़ व घबराहट देख वैशाली केँ मन मे एकदम सें कुछऐसा अजीब कार्य करने कि ख़्वाहिश जाग्रत हुईँ, जोँ उसके मां होने कि छवि कों पुनः दागदार करदे। उसने अभिमन्यु केँ होंठों कों चूमने कां निर्णय लिया पऱ फिन अचानक दूसरा ख्याल मन मे आते हि उसके चेहरे पर्र व्याप्त उसकी हसीन--सि मुस्कान एक् दुष्ट मुस्कान मे परिवर्तित होँ जाती हैं।
"तुम्हें तुम्हारी ये शर्ट अपने हाथों सें धोनी पड़ेगी, मंजूर?" वैशाली नें पूछा तौ अभिमन्यु हैरत मे पड़ गय़ा।
"ये कैसीसजा हुईँ मम्मी? मैंने तौ सोचा थां कि इसबार तुम् मुझे सीधेघऱ सें बाहर् निकाल देने सें कमसजा नहीं दोगी याँ फिन मेरे अगले महीने कि पॉकेटमनी पर्र भि रोकलगा दोगी" अभिमन्यु नें उल्टा उससे सवाल किया।
"ऊंहूं! येसजा उससे भि बड़ी हैं शैतान लड़के" हँसते हुएऐसा कहकर वैशाली अपने दाएंहाथ कों अपनी साड़ी सें बाहर् निकाल लेती हैं। उसका पूरा पंजा उसके गाढ़े व चिपचिपे कामरस सें भीगाहुआ थां औऱ जिसे अपने बेटे कि अचरच सें फट पड़ी आँखों मे झांकते हुए वो नई-नवेली बेशर्म मां उसकी शर्ट सें पोंछने लगती हैं। दाईं छाती पर्र अपनी लिसलिसी उंगलियों कों रगड़ने केँ उपरान्त बाकीबचा कामरस उसने दाईं छाती सें पोंछ डाला।
"हाय मां! तुम् कितनी डर्टी हौ। छी!छी! छोड़ो मेरी शर्ट कों यू नॉटीबिच" अभिमन्यु भि हँसते हुए बोला, वो जल्दी वैशाली केँ गीले दाएंहाथ सें दूर होने कां झूठा प्रयास करने लगता हैं। उसकीनाक केँ दोनों नथुए उसकी मम्मी केँ कमरस कि मादक सुगंध सें जल्दी फूलगए थें, स्खलन केँ चरम कों छू लेने केँ बाद उसका चेहरा पूरनमासी केँ चाँद--सां दमकउठा थां जिस कारण अभिमन्यु कि खोई उत्तेजना दोबारा लौटआती हैं औऱ अपनीउसी उत्तेजना केँ मद मे वो कब अपनी मम्मी केँ संबोधन मे 'बिच' जैसे गंदे शब्द कों शामिल कर लेता हैं इसका ख्याल जबतकउसे होँ पातातब तक बहुतदेर होँ चुकी थि
"तौ मे कुतिया हूं? घटिया इंसान, चलोअब जाओयहा सें, माफ किया" वैशाली नें मुस्कान केँ संगकहा। उसके लगातार अभिमन्यु कि छोटी-बड़ी गलतियों कों यूं हि हमेशा सें माफ करते जाने कां परिणाम थां जौ आजउसे अपने इकलौते बेटे केँ मुंह सें एक् कुतिया कि संज्ञा प्राप्त हुई थि औऱ इसपर भि जैसे जल्दी उसनेउसे माफ भि कर दिया थां, अजीब तौ थां मगर जानकर भि वो उस अजीब शब्द केँ हँसी-हँसी मे भुला देती हैं।
पलंग सें नीचे उतरने सें पूर्व अभिमन्यु नें वैशाली केँ माथे कां एक् छोटा--सां चुम्बन लिया औऱ फिन बिना उसकीओर देखे तेजी सें उसके बेडरूम केँ खुलेहुए दरवाजे सें बाहर् जाने लगता हैं।
"मुझे मेरी पेंटी धुली हुई वापस चाहिए" वो दरवाजे सें केवलदो कदमआगे निकल पाया थां कि सहसा अपनी मम्मी कि आवाज़ औऱ हँसी सुनकर वहीं ठिठक जाता हैं।
"तुम्हें पता थां मां। ओह मम्मी! यूडेम फकिंग नॉटीबिच। खैर तुमने मेरे स्टडी ड्रॉअर सें मेहता आंटी कि पेंटी चुराई तौ मैंने तुम्हारी चुराली, हिसाब बराबर। अबये पेंटी मेरी हैं" कहकर अभिमन्यु अपनी पैंट केँ अगले हिस्से केँ भीतरहाथ डालकर वैशाली कि कच्छी कों बेशर्मों कि तरह वहीं उसके सामने बाहर् निकाल लेता हैं औऱ अपने दाएंहाथ कि प्रथम उंगली केँ ऊपरउसे लपेट गोल-गोल घुमाते हुए हँसकर उसकी नजरों सें ओझल हौ जाता हैं। वैशाली स्तब्ध हैं कि उसके बेटे नें उसकी कच्छी कों बिलकुल अपने लन्ड केँ ऊपर छुपाया थां याँ शायद उसनेउसे सीधे अपनी अंडरवेयर केँ अंदररखा थां।
"बिच! तूने अपनी इज्जत स्वयं अपने हि हाथों गवां दि औऱ जोँ अबकभी वापस नहीं आएगी" वैशाली बैड पऱ बैठेहुए यहीसोच रही थि।
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी - Next part mein bada twist
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