raj sharma stories मस्त घोड़ियाँ complete - Desi kamuk kahani – New Episode
ratan- muskurate huye isiliye too mene tairi bat kaa बुरा नहि mana तभी unki coffee aa jati h औऱ darshaniya औऱ
ratan chuskiya lene lagte h, darshaniya kaa land abi tak khada हुआ thaa तभी sapnaa एक् bar फिन सें andar aati h
औऱ कुछ filo ko utha krr vapas jane lagti h तभी
ratan-suno beti
sapnaa- ji papa
ratan- yeh मेरे khaas friend h darshaniya औऱ darshaniya yah मेरी ekloti beti sapnaa h
sapnaa- namaste uncle
darshaniya namaste beta
sapnaa कि nashili najro औऱ gulabi ras सें bhare hontho ko dekh krr darshaniya kaa land फिन सें उसकी pent me tan
chuka thaa, darshaniya फिन सें sapnaa केँ husn me khone wala thaa तभी ratan ne कहा achcha sapnaa beti tm jao
muze jara darshaniya सें कुछ bate karni h औऱ फिन sapnaa vaha सें chali jati h,
darshaniya- yar एक् bat bata ratan tairi beti कि umra karib 25 sal too hongi औऱ tairi umra ko dekh krr lagta नहि h कि
tairi कोई 25 baras कि beti hongi,
ratan- kyo bhay me bi too 50 touch karne wala ho औऱ tu bi sale budhdha hone कि kagar पऱ hi h
darshaniya- haan haan thik h मगर tujhse too दो sal abi छोटा hi ho, पऱ ratan pehle कभी tairi beti ko yaha देखा
नहि,
ratan- muskurate huye lagta h tuze मेरी beti बहोत मनपसंद aai h,
darshaniya- muskurate huye नहि yar wah bat नहि h,
ratan-achcha sun sham ko वक़्त सें aa jana फिन baki bate मेरे farmhouse पर्र hi karege,
darshaniya-achca thik h औऱ फिन darshaniya vaha सें uth krr chl deta h
darshaniya कि gaadi market केँ traffic सें dhire-dhire gujar rahi thi, तभी थोडा aage ratan ko दो mast londiya skirt औऱ
white shirt pahne road सें apne bhari bharkam chutad matkate huye jate dikhi,
darshaniya ne जब gadi थोडा karib
lakar unhe देखातभी एक् ldki ne paas केँ sabji केँ thele पऱ rukh krr apni gaand khujlate huye sabjiyo केँ bhav
puchne lagi, darshaniya kaa land उसकी moti gaand ko dekh krr khada hu गय़ा औऱ जब wah उसके bilkul paas सें gujra too
उसके hosh ud gaye wah ldki कोई औऱ नहि balki उसकी apni beti sangeeta thi,
sangeeta 18 sal कि mast bhare badan
कि londiya thi,
darshaniya- are yah too sangeeta h, पर्र iski gaand kitni mast hu gayi h mene too आज tak कभी iss पर्र gaur hi नहि
किया,
darshaniya ne apni gaadi side सें laga krr apni beti कि gudaj jangho औऱ उसकी gadrai gaand ko अपना land masal-
masal krr dekhne laga, thodi der bad sangeeta us ldki केँ sath aage chalne lagi औऱ maonhar ne apni gaadi apne
घऱ कि औऱ chala di,
darshaniya कि aankho केँ samne abi tak उसकी beti कि gadrai moti gaand drishti aa rahi thi औऱ
उसका land puri prakaar tana हुआ thaa wah जबघऱ pahucha तब उसकी bahu sandhya ne darwaja khola, sandhya joo कि
23 sal कि mast londiya thi, darwaja kholte hi sandhya ne apne sasur ko देखा औऱ जैसे hi अपना sar jhukaya apne
sasur केँ pent me bane bade सें tambu ko dekh krr wah sann rha gayi औऱ juldi सें dabe panv apne kamara me chali
gayi,
sandhya- are sunte hu तब rohit ne useke dudh apne hantho सें masalte huye क्याँ h मेरी rani kyo bokhlai hoyi
hu,
sandhya- lagta h तुंहारे papa subah-subah kisi kunwari londiya कि uthi hoyi gaand dekh krr aa rahe h jakar
dekho unkah land unke pent ko fad krr बाहर् aane ko betab h,
rohit- क्याँ bak rahi hu rani bechare papa केँ bare me
sandhya- tumhari kasam rohit mene sacch me unkah land khada देखा h,
rohit- achcha thik h अब khada dekh लिया too क्याँ tumhari choot bi phulne lagi h औऱ फिन rohit ne sandhya कि
choot ko उसकी sadi केँ ऊपर सें daboch लिया, sandhya ne nabhi केँ नीचे सें sadi bandhi hoyi thi औऱ raj उसके gudaj pet
ko sahlate huye उसके mote-mote dudh ko daba krr
rohit- sandhya kahin papa कि drishti तुंहारे in kase huye chucho पर्र too नहि pad gayi, papa सें bach केँ rahna tm
नहि jante wah kitne bade chudakkad h, abi जब bua maa केँ sath bajar सें lot krr aayegi तब देख्ना papa
kaa hal,
sandhya- tumhari bua bi too chinal kitni badi randi lagti h har दो mahine me apni moti gaand utha krr chali
aati h, kahti h bete ko too hostel me dal दिया h औऱ shauhar dubai chala गय़ा h अबघऱ me कोई नहि h too
socha bhaiya bhabhi केँ yaha थोडा वक़्त gujar lu,
rohit- अब chhodo bi औऱ क्याँ tm जब dekho kahin kapde dhone kaa कम kahin unhe utha krr फिन jama-jama krr
rakhne kaa कम tumhe मेरे liye too waqt hi नहि milta h
sandhya- achcha tm yah kapde us almari me dal दो me papa ko paani de krr aati ho औऱ फिन sandhya बाहर्
chali jati h,
rohit bethe-bethe dhoye huye kapde ghadi karne lagta h औऱ उसकी drishti एक् gulabi color कि choti si penty पऱ
chali jati h, तभी sandhya rohit केँ hath me wah penty dekh leti h,
rohit - are sandhya yah choti si penty kiski h
sandhya- muskurate huye अब jaan bujh krr anjan mat bano जैसे apni bahen sangeeta कि penty नहि pahchante hu
rohit - yah sangeeta कि penty h, kitni choti si h na
sandhya- sangeeta कि penty ko थोडा phaila krr rohit ko dikhate huye lo dekh lo apni bahen कि penty औऱ socho
kaisi lagti hongi tumhari bahen iss penty me
rohit- muskurate huye tm bi na sandhya
sandhya- rohit kaa land उसकी lungi केँ ऊपर सें pakad leti h joo puri prakaar tana हुआ thaa, kyo yah mota danda apni
bahen कि penty dekh krr iss prakaar tan गय़ा h na, bolo bolo
rohit- sangeeta kaa muh pakad krr chumte huye मेरी rani lagta h tumne papa kaa land sachmuch khada dekh
लिया h तभी itni chudasi hu rahi hu,
kramashah.
raj sharma stories मस्त घोड़ियाँ complete - Desi kamuk kahani – New Episode
मस्त घोड़ियाँ--2
गतान्क सें आगे.
संध्या-रोहित केँ लन्ड कों कसकर पकड़े हुए अपनी बेहन कि नंगी बुर चाटने कां मनकररहा हैं नां तोँ आओ नां
मुझे हि संगीता समझकर थोडा चोदलो
रोहित- संध्या कों बेड पऱ लेटाकर उसकी बुर कों उसकी पेंटी सरकाकर चाटने लगता हैं
संध्या- हायरे मेरे राजाअब बताओ कैसीलग रही हैं तुम्हे अपनी बेहन कि बुर औऱ चॅटोखूब कसकरचाट लो
रोहित अपनी बीबी कि बुर कों खूब फैला-फैला कर चाटने लगता हैं औऱ जब संध्या उसेये कहती हैं कि अपनी बेहन
संगीता कि बुर कों खूब कस-कसकर चॅटो तोँ वो बिल्कुल पागला होँ जाता हैं औऱ अपनी बीबी कि बुर उसे अपनी बेहन
संगीता कि गुलाबी बुर नज़रआने लगती हैं,
रोहित औऱ संध्या कां रूमऐसा थां कि उनकेबेड केँ पास कि खिड़की सें बाहर् बैठक कां सारा नज़ारा नज़रआता हैं,
तभी रोहित कि माँ मंजू जोँ कि पूरीतरह भरे शरीर कां माल थि औऱ 40 केँ उपर थि औऱ उसकेसंग रोहित कि फूफी
रुक्मणी भि अंदर आँ जाती हैं,
मंजू- भइया मे तोँ थक गई औऱ अब मुझसे बैठा नहीं जाएगा मे तोँ जाकर थोड़ी देरलेट जातीहू
रोहित औऱ संध्या खिड़की सें बैठक कां नज़ारा देखरहे थें औऱ मंजूवहा सें अपनेरूम मे चली जाती हैं,
रुक्मणी अपने भइया मनोहर केँ पासबैठ कर उसकी जाँघो पर्र हाथरख लेती हैं, मनोहर अपनी बेहन रुक्मणी केँ
हाथो सें बॅग लेतेहुए
मनोहर- क्यो रुक्मणी क्याँ खरीदलाई
रुक्मणी -कुछ नहीं भैया भाभीकुछ कपड़े लेकरआई हैं
मनोहर -किसके कपड़े हैं,
रुक्मणी- अरे संध्या औऱ संगीता केँ लिए हैं
मनोहर -अच्छा दिखाओ तोँ
रुक्मणी -अरे भैया तुम् क्याँ करोगे देखकर उसमे मेरी ब्रा औऱ पेंटी भि रखी हैं,
मनोहर- रुक्मणी केँ जूसी होंठो कों देखते हुए तौ क्याँ मे तेरी पेंटी औऱ ब्रा नहींदेख सकता
रुक्मणी- धीरे-धीरे सें अरेकही भाभी नाँ आँ जाए औऱ फिन रुक्मणी धीरे-धीरे सें अपनाहाथ आगे बढ़ाकर मनोहर केँ
लन्ड कों लूँगी मे हाथडाल कर पकड़ लेती हैं, संध्या अपने ससुरजी केँ मोटे लन्ड कों पकड़े देख मस्त हौ जाती हैं
औऱ उधर रोहित अपनी फूफी कि गदराई जवानी उसका साडी केँ साइड सें उठाहुआ पेट औऱ बड़े-बड़े दूधदेख कर उसका
लन्ड झटके मारने लगता हैं,
मनोहर- बॅग मे सें पेंटी निकाल कर अपनेमूह सें लगाकर सूंघ लेता हैं
रुक्मणी- अरे भैया वो तौ तुम्हारी बेटी संगीता कि पेंटी हैं जिसे तुम् सूंघरहे होँ
मनोहर- अच्छा ठीक हैं औऱ फिन मनोहर दूसरी पेंटी उठाकर उसे सूंघने लगता हैं
रुक्मणी -अरे भैया वो तुम्हारी बहू संध्या केँ लिएलाए हैं, औऱ तुम् होँ कि अपनीबहू कि पेंटी कों सूंघरहे
होँ,
फूफी कि बातसुन कर संध्या कि बुर सें पानी आँ जाता हैं जब उसका ससुरजी उसकी पेंटी कों सुन्घ्ता हैं तौ उसे एक् लम्हा केँ
लिएऐसा लगता हैं जैसे बापूजी उसकी स्वयं कि बुर कों सूंघरहे होँ,
मनोहर अब अगली पेंटी सूंघकर रुक्मणी सें पूछता हैं क्यो बेहनये तौ तुम्हारी हैं नाँ
रुक्मणी- उसकेहाथ सें पेंटी छिनते हुएये मेरी औऱ भाभी कि दोनो कि हैं
मनोहर-चौक्ते हुए दोनो कि मतलब
रुक्मणी उठकर जातेहुए मतलबये कि मे औऱ भाभी एक् दूसरे कि बदल-बदल कर पहनती हैं,
मनोहर-अरे सुन तौ कहां जारही हैं देख तेरे भैया केसे बुलारहे हैं तेरी औऱ मनोहर अपने लन्ड कों निकाल
कर रुक्मणी कों दिखाता हैं औऱ रुक्मणी उसे अपना अगुठा दिखाते हुए, मे भि भाभी केँ संग जाकर सोउंगी,
संध्या-ओह राम मे नाँ कहती थि तुम्हारे बापू अवश्य इस कुतिया फूफी कों खूबकस कर चोद्ते होंगे
रोहित-हाँ मुझे तोँ यकीन नहीं होँ रहा हैं कि फूफी इसतरह सें बापू कां लन्ड चूस लेगी
तभी संध्या रोहित लन्ड पकड़कर हाय मेरे राजाअब ये क्योताव खारहा हैं कहीइसे अपनी फूफी केँ चूतड़ तोँ
नहीं मनपसंद आँ गये हैं, मे देखरही हूआजकल तुम्हारा लन्ड अपनी फूफी अपनी बेहन औऱ खासकर अपनी माँ
मंजू कि मोटीगंद देखकर बड़ा जल्द खड़ा होता हैं,
रोहित- उसकी बुर केँ अंदर अपनी एक् उंगली डालकर हिलाते हुए, लगता हैं मेरी रानीआज पिताजी कां लन्ड देखकर बहोत
पानी छ्चोड़ रही हैं,
संध्या- तुम् ऐसे नहीं मनोगे औऱ फिन संध्या उठकर संगीता कि पेंटी पहनकर रोहित कों अपनी बुर औऱ
मोटीगंद उठा-उठा कर दिखाने लगती हैं औऱ कहती हैं लो मेरे साजनअब देखो कैसी लगती हैं इस पेंटी मे
तुम्हारी जवान बेहन,
औऱ अपनीगंद कों झुकाकर रोहित दिखाती हुईँ, लो राजा चॅटो अपनी बहना कि मोटी औऱ गुदाज
गंद कों, लो राजादेख क्याँ रहे हौ तुम् जल्द सें अपनी बेहन कि गंदमार लो नहीं तोँ पताचला बापू नें संगीता कों
चोद दिया औऱ तुम् उसकी कुँवारी बुर फाड़ने केँ लिए तरसते हि रहगये,
संध्या केँ मूह सें इतना सुनना थां कि रोहित नें उसकी पेंटी कों उसकीगंद सें साइड मे करके अपनेतने लन्ड कों अपनी
बीबी कि बुर मे पीछे सें एक् झटके मे हि अंदर उतार दिया,
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संध्या बड़ी चतुर थि उसने अपनामूह उस थोड़ी सि
खुली खिड़की कि ओरकररखा थां जिससे उसे पपाजी कां लन्ड आसानी सें नज़र आँ जाए जिसे वो अभि भि बैठे-बैठे
सहलारहे थें, इधर रोहित अपनी आँखेबंद किएहुए संगीता कि मोटीगंद कों याद कर-कर केँ अपनी बीबी कि
बुर माररहा थां, संध्या कि बुर पानी-पानी तौ पहले सें हि थि औऱ रोहित कि मस्त चुदाई नें उसे मस्तकर दिया औऱ
फिन दोनो पति पत्नि वहीलेट गये,
साम कों मनोहर रतन केँ फॉर्माउस पर्र पहुच जाता हैं औऱ रतन कों वहा अकेला बैठादेख कर अंदरआते हुए
मनोहर-क्याँ हुआरतन तुँ तौ अकेला हैं वो माल कहां हैं
रतन-अरे आते हि शुरुआत हौ गय़ा पहलेबैठ तोँ सही औऱ दोघुट शराब केँ तौ लेँ फिन मे तेरीमाल भि दिखा देताहू, रतन कि बात सुनते हि मनोहर शराब कां ग्लास उठाकर एक् घुट मे हि ख़तमकर देता हैं औऱ रतन मुस्कुराते हुएफिन सें एक् लार्ज ग्लास बनाकर उसेथमा देता हैं, दूसरा ग्लास ख़तम करने केँ बाद मनोहर सिगरेट सुलगाते हुए,
मनोहर- हाँ तौ मेरे मित्र अबबता कहां हैं वो रसीला माल,
रतन- अच्छा एक् बातबता सुभह तुँ मेरी बेटी कों चोदने कि नज़र सें देखरहा थां नां
मनोहर- एक् दम सें होश मे आतेहुए, अबे मुझे क्याँ पता थां कि वो तेरी बेटी हैं, मेरी स्थान तुँ भि होता तौ उस वक्त तेरा लन्ड खड़ा नहीं होता क्याँ,
रतन-बात तोँ तूँ सहीकह रहा हैं, अच्छा तेरी भि एक् जवान औऱ हसीन बेटी हैं नाँ
मनोहर- हाँ वो बहोत मस्त हैं 18 बरस कि हौ गई हैं औऱ आज तौ जानता हैं क्याँ हुआ मैनेउसे रोड पर्र जब जातेहुए देखा तोँ मेरी नज़र उसके भारी चूतादो पर्र पड़ी औऱ मे पहले तौ पहचान नहीं पाया औऱ जबपास जाकर देखा तौ पताचला मेरी बेटी हैं,
रतन- अच्छा एक् बात पुंच्छू
मनोहर- ग्लास ख़तम करकेहाँ हाँ पुंछ
रतन- अगर मेरी बेटी जिसे सुभह तूने देखा थां वो तुम्हें चोदने कों मिलजाए तौ
मनोहर -अबे तुँ क्याँ बोलरहा हैं
रतन- पहलेबता तूँ क्याँ कीमतदे सकता हैं
मनोहर- तूँ जोँ कहे
रतन- तौ ठीक हैं मेहता सें मुझे वो ज़मीन दिलवा दे औऱ मे तुम्हारी तरफ अपनी बेटी केँ संग मस्ती करने केँ लिएदे देताहू,
मनोहर- एक् समय सोचते हुए, हस कर साले तूँ मज़ाक कररहा हैं
रतन- अच्छा तुम को यकीन नहीं होता औऱ फिनरतन एक् आवाज़ लगाकर सपना कों बुला लेता हैं
उसकी बेटी सपना जैसे हि उसके लगभगआती हैं मनोहर उसेदेख कर मस्त हौ जाता हैं, सपना मात्र ब्रा औऱ पेंटी मे आकर अपने बापूरतन कि गोद मे बैठ जाती हैं औऱ रतन बड़े प्रेम सें उसकेकसे हुएदूध कों दबाने लगता हैं
रतन- बेटी ज़रा अंकल कों अपनी पेंटी साइड मे करके अपनी गुलाबी बुर केँ दर्शन तौ कर्वाओ
सपना अपने बापू कि गोद मे अपनी दोनो टांगो कों मनोहर कि ओर करके फैला लेती हैं औऱ फिन अपनी पेंटी सरकाकर उसे अपनी गुलाबी औऱ चिकनी बुर खोलकर दिखा देती हैं, मनोहर अपने लन्ड कों मसल्ते हुए अपनामूह फाडे सपना कि बुर कों देखता रहता हैं,
रतन- दोस्त मनोहर अब तौ तुम्हारी स्वयं कि बेटी भि चोदने लायक होँ गई होगी नाँ
मनोहर- अपने लन्ड कों मसल्ते हुए बिल्कुल मस्त लोंड़िया हौ गई हैं रतन मेरी बेटी तोँ उसकी गदराई गंद पूरीतरह तुम्हारी बेटी सपना कि गंद जैसी नज़रआती हैं,
रतन- तुमने कभी अपनी बेटी कि गंद कों इसतरह फैलाकर उसकीकसी हुइ गुदा देखी हैं औऱ फिनरतन सपना कि पेंटी केँ साइड सें उसकी गुदा कों फैलाकर जब मनोहर कों दिखाता हैं तौ वो मस्त होँ जाता हैं सपना अपने बापू केँ उपर दोनोतरफ पैर करके चिपककर बैठी थि औऱ रतन उसकी गुदा कों खोलकर मनोहर कों दिखारहा थां,
रतन-अब कहो मनोहर अगर तुम्हे अपनी बेटी कि गंदइस तरह सें देखने कों मिले तोँ क्याँ करोगे
मनोहर -सीधे अपनीजीभ उसकी गुदा मे डाल दूँगा रतन
रतन- तौ फिन अभि मेरी बेटी कि गुदा अपनेमूह सें सहलाना चाहते हौ
मनोहर-हाँ मेरे दोस्त हाँ
रतन- तोँ ठीक हैं मगरयाद रहे मुझे मेहता कि ज़मीन चाहिए
मनोहर- तुँ फिकर नाँ करसमझ लेँ ज़मीन तेरी हुईँ औऱ बसफिन क्याँ थां मनोहर उठकर सपना कि मोटीगंद कि गहरी दरार मे अपनीजीभ डाल देता हैं,
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