Mukkader kaa sikander - Full Story Part 1
सिकंदर किनारे लेटाहुआ थां। समुद्र कि लहरें किनारे सें टकराकर वापसलौट रहीथीं, जैसे किसी अजनबी कि दस्तक होँ जौ भीतरआने कि इजाजत चाहता होँ। मगर सिकंदर अब किसी कों अपने लगभग नहि आने देना चाहता थां।
आजउसे "मार्कोस" सें निकाल दिया गय़ा थां—वोँ स्थान, जहाँ उसने अपनी पहचान बनाई थि, जहाँ उसकाहर शब्द कानून थां। मगरअब सभीबदल गय़ा थां।
उसकी साँसें ठहरी हुई थीं, औऱ उसकी नीली आँखें आसमान मे टिमटिमाते तारों कों देखरही थीं। हवा उसकेघने काले बालों सें खेलरही थि, औऱ उसकी मजबूत कायारेत पर्र यूँ पड़ी थि जैसेकोई घायलशेर अपने ज़ख्मों कों सहलारहा हौ।
उसने गहरी साँसली, मांसपेशियाँ तनगईं, औऱ एक् हल्की मुस्कान उसके होठों पऱ आई—कड़वी, मगर अटूट।
"तौ यहअंत हैं?" उसने स्वयं सें पूछा।
फिन स्वयं हि जवाब भि दिया—"नहि। यह तोँ बस शुरुआत हैं। "
मार्कोस नें उसे ठुकराया थां, मगर सिकंदर वोँ आदमी नहि थां जौ ठुकराए जाने सें ख़त्म हौ जाता। वोँ अबउसलहर कि तरह थां, जोँ किनारे सें टकराकर लौटती नहि, बल्कि सबकुछ बहा लें जाती हैं।
सिकंदर केँ कदम जैसे हि दिल्ली कि सड़कों पऱ पड़े, हल्की ठंडीहवा नें उसका स्वागत किया। चमचमाते बोर्ड, भीड़ सें भरी गलियां, औऱ हरतरफ गाड़ियों कां हंगामा। मगर उसकी नीली आँखें एक् मकसद पऱ टिकी थीं—अपने लिए एक् घऱ ढूँढना।
काली जैकेट केँ कॉलर कों थोडा ऊपर करतेहुए उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई। वोँ इसशहर मे नया थां, मगर उसका अंदाज किसी खानाबदोश कां नहि थां। मजबूत हाइट-काठी, चेहरे पर्र हल्की दाढ़ी, औऱ आँखों मे वोँ अजीब सां ठहराव, जिसे देखकर कोई भि अंदाजा लगा सकता थां कि यह व्यक्ति आम नहि हैं।
वोँ एक् रियल एस्टेट एजेंट केँ पास पहुंचा, उसे उसके साथी नें उस एजेंट केँ पास भेजा थां जोँ अपने दफ़्तर केँ बाहर् खड़ा सिगरेट पीरहा थां।
सिकंदर: "मुझे एक् घऱ चाहिए। जल्द। "
एजेंट नें सिर सें पांव तक उसका जायजा लिया।
एजेंट (हँसते हुए): "दिल्ली मे घऱ चाहिए? औऱ जल्द? भइया, यहा लोग सालों प्रतीक्षा करते हें। बजट कितना हैं?"
सिकंदर (शांतमगर सख्त लहजे मे): "जितना भि चाहिए होगा, दूँगा। बस मुझे मेरीतरह कां घऱ चाहिए—शांत, अकेला, औऱ मजबूत। "
एजेंट कों लगा कि सामने कोई अमीर लड़काआया हैं, मगर सिकंदर कि आँखों मे जौ गहराई थि, वोँ किसी रईसजादे कि नहि थि। वोँ आँखें किसीऐसे व्यक्ति कि थीं जिसने दुनिया कों अपनी शर्तों पर्र जीना सीखा थां।
एजेंट (गंभीर होतेहुए): "ठीक हैं, एक् स्थान हैं। मगर दिल्ली मे ऐसेघऱ महंगे पड़ते हें। "
सिकंदर (हल्की मुस्कान केँ संग): "महँगाई कि चिंता मतकर। स्थान दिखा, अगर मनपसंद आई तौ कल सुभह तक रुपया तेरेहाथ मे होगा। "
एजेंट अबउसे हल्के मे नहि लें सकता थां। उसने मोबाइल निकाला, औऱ एक् स्थान कां पता भेजा।
एजेंट: "ठीक हैं, यहलो लोकेशन। कल सुभहआठ बजे मिलना, मे तुम्हें दिखा दूँगा। "
सिकंदर (आँखों मे गहरा आत्मविश्वास लिए): "सुभह कां प्रतीक्षा नहि कर सकता। अभि दिखा। "
एजेंट चौंक गय़ा।
एजेंट: "अभि रात केँ दोबजे हें!"
सिकंदर: "तोँ क्याँ हुआ?घऱ लेने वाला मे हूं, टाइम मे तय करूँगा। "
एजेंट कों अबसमझ आँ गय़ा थां कि सिकंदर कोई साधारण ग्राहक नहि थां। उसने व्हीकल निकाली औऱ दोनों अंधेरी सड़कों पऱ एक् नएसफर केँ लिए निकल पड़े। सिकंदर कि जीवन मे एक् नया अध्याय शुरुआत होँ रहा थां, औऱ इसबार, वोँ स्वयं अपनी क़िस्मत लिखने वाला थां।
दिल्ली कि सर्दहवा कार कि खिड़कियों सें टकरारही थि। सड़कें सुनसान थीं, स्ट्रीट लाइट्स कि हल्की रोशनी सोसाइटी कि दीवारों पर्र अजीब सि परछाइयाँ बनारही थीं।
एजेंट नें वाहनरोक दि औऱ सिकंदर कि तरफ देखा।
एजेंट (हल्की हँसी केँ संग): "तौ जनाब, यह रही आपकी मंज़िल। "
सिकंदर नें दरवाजा खोला औऱ वाहन सें बाहर् निकला। सामने एक् साधारण सि सोसाइटी थि—नं बहोत आलीशान, नं बहोत बिखरी हुई। चारों ओर पाँच-छह मंज़िला इमारतें, बालकनियों सें लटकते कपड़े, कुछ टूटी-फूटी दीवारें, औऱ बीचों-बीच एक् छोटा सां कुआँ, जिसमें काईजमी हुई थि।
रात केँ इसपहर सबकुछ शांत थां। दूर किसी कमरे सें बच्चे केँ रोने कि आवाज़ आँ रही थि, कहीं पऱ खिड़की सें हल्की पीली रोशनी झाँकरही थि, मगर अधिकतर घरों मे अंधेरा पसरा थां।
सिकंदर नें चारों ओर नज़र दौड़ाई, फिन एजेंट कि तरफ देखा।
सिकंदर: "यही हैं वोँ स्थान?"
एजेंट (कंधे उचकाते हुए):"देख भइया, दिल्ली मे हरकोई महल मे नहि रहता। यह मिडिल क्लास एरिया हैं, मगर स्थान बुरी नहि हैं। तुम्हें शांति चाहिए थि, यहाकोई तेरा पीछा करने नहि आएगा। "
सिकंदर नें कुंए केँ पास जाकर नीचे झाँका। अंदर पानी थां, मगरसतह पऱ पत्ते औऱ धूलतैर रही थि।
सिकंदर (धीमे स्वर मे, जैसे स्वयं सें कहरहा होँ): "शांति। हाँ, शायदयही चाहिए। "
एजेंट नें सिगरेट सुलगाई औऱ सिकंदर कि तरफ बढ़ा दि।
एजेंट: "स्मोक करता हैं?"
सिकंदर (हल्की हँसी केँ संग): "नहि, आदत नहि हैं। "
एजेंट: "अच्छी बात हैं। वैसे, इस सोसाइटी मे तुझेही कोईतंग नहि करेगा। यहालोग अपनी ज़िंदगी मे बिज़ी हें। तेरा घर-मकान पाँचवे फ्लोर पऱ हैं। चाबीकल मिलेगी, मगरअगर अभि देख्ना चाहता हैं तौ देख सकता हैं। "
सिकंदर नें इमारत कि ओर देखा। उसकी बालकनी अंधेरे मे छिपी हुइ थि, जैसे किसी खामोश अजनबी कि तरह जोँ उसेदेख रहा हौ।
सिकंदर: "चल, देख लेते हें। "
एजेंट नें सिर हिलाया औऱ दोनों सीढ़ियों कि ओर बढ़े।
सीढ़ियों पर्र एकदम सन्नाटा थां, बस दीवारों पऱ पुरानी सीलन केँ धब्बे थें। चलते-चलते सिकंदर नें एक् दरवाजे केँ नीचे सें रोशनी झाँकते देखी। अंदर सें किसी कि धीमी हँसी औऱ बर्तन रखने कि आवाज़ आँ रही थि।
एजेंट (आवाज़ धीमी करतेहुए): "यहालोग अपनी दुनिया मे मस्त रहते हें। किसी कों किसी सें मतलब नहि। तुम्हारी तरफ भि अकेले रहने कि आदत हैं, तोँ कोई दिक्कत नहि होगी। "
सिकंदर नें कोई जवाब नहि दिया। वोँ हरकदम केँ संगइस स्थान कों महसूस कररहा थां।
पाँचवे माले तक पहुँचकर एजेंट नें जेब सें एक् टॉर्च निकाली औऱ दरवाजे कि तरफ इशारा किया।
एजेंट: "यही हैं तेराघऱ। "
सिकंदर नें दरवाजा छुआ। ठंडा थां, जैसे इसमें अभि तक किसी कां वजूद नहि बसा हौ।
सिकंदर (आँखों मे अजीब सि चमक केँ संग): "अभि खाली हैं, पऱ अधिकदिन तक ऐसा नहि रहेगा। "
एजेंट हल्के सें मुस्कुराया।
एजेंट: "मुझे तेरा कॉन्फिडेंस मनपसंद आया। वैसे पेमेंट कल तक कर देगा?"
सिकंदर (जेब सें एक् बंडल निकालकर उसकीतरफ बढ़ाते हुए):"रात जितनी लंबी होँ, सौदा उतना हि जल्द पूरा होना चाहिए। "
एजेंट नें पैसों कां वजन महसूस किया औऱ सिर हिलाते हुएकहा—
"तेराकाम होँ गय़ा, सिकंदर। अबयह तेराघऱ हैं। "
सिकंदर नें दरवाजे कों एक् बारफिन देखा औऱ स्वयं सें कहा—
"घऱ.? शायदअब मेरी स्टोरी यहा सें शुरुआत होती हैं। "
सिकंदर नें धीरे-धीरे सें दरवाजा खोला। कमरे मे अंधेरा थां, मगर खिड़की सें आती हल्की चांदनी कुछ चीज़ों केँ अक्स उभाररही थि। उसने अपनी मोबाइल कि फ्लैशलाइट ऑन कि, औऱ उसकी आँखों केँ सामने बेतरतीब फैलाहुआ रूमखुल गय़ा।
फर्श पर्र धूल कि मोटीपरत जमी थि, कोनों मे मकड़ियों केँ जाले थें, औऱ पुराने फर्नीचर पऱ गंदगी कि परतें चढ़ चुकीथीं। दीवारों पऱ नमी केँ निशान औऱ पपड़ी उतररही थि, जैसेयहा सदियों सें कोई नहि आया हौ।
सिकंदर नें गहरी साँसली औऱ हल्की मुस्कान आई—"बिलकुल मेरे हालातों कि तरह। उजड़ा हुआ, पऱ ठहरने लायक। "
वोँ एक् टूटी-सि कुर्सी पऱ बैठ गय़ा औऱ मोबाइल निकालकर कुछदेर यूँ हि स्क्रीन कों देखता रहा। तभी अचानक मोबाइल कि स्क्रीन चमकी, औऱ एक् नामउभर आया—"राहिल कॉलिंग."
सिकंदर नें कॉलआई उठाई।
राहिल (हँसते हुए): "औऱ भइया, नया ठिकाना कैसालगा?"
सिकंदर (हल्की मुस्कान केँ संग):"अगर तेरी मनपसंद इतनी खराब होती तोँ तेरा मित्र नां होता। "
राहिल (हँसते हुए): "मतलबसही हैं?"
सिकंदर: "सही नहि, पर्र बुरा भि नहि। सफाई कि जरूरत हैं, पर्र तुँ जानता हैं, मुझे चीजों कों बेहतर बनाना आता हैं। "
राहिल: "बिलकुल, मार्कोस मे भि यही किया थां, पर्र वहा तुझेही ठहरने नहि दिया.अब यहा टिकेगा?"
सिकंदर कि आँखों मे ठंडकउतर आई। उसने धीरे-धीरे सें जवाब दिया—
"जहाँ एक् बारपेर रख देता हूं, वहा सें लौटने कि आदत नहि हैं मेरी। "
राहिल कुछ लम्हा चुपरहा, फिन गहरी साँसली।
राहिल: "देख भइया, पैसे कि चिंता मतकर, जितने चाहिए होंगे, मुझसे लेँ लेना। पऱ एक् बातयाद रखना, यह शहर तुम्हारी तरफ अपनाए याँ नाँ अपनाए, मे हमेशा तेरेसंग हूं। "
सिकंदर कि आँखें हल्की सि भीगगईं, मगर उसने आवाज़ मे वही ठंडापन बनाएरखा।
सिकंदर: "जानता हूं। औऱ जौ उधार दिया हैं, वोँ जल्द हि लौटा दूँगा। तुम्हें मुझे एहसान तलेदबा कर रखने कि इजाजत नहि हैं। "
राहिल हँस पड़ा।
राहिल: "तेरीयह अकड़ हमेशा बरकरार रहनी चाहिए। ठीक हैं, अब आरामकर, कल मिलते हें। "
सिकंदर नें फोनकाट दि।
वोँ कुर्सी पऱ पीछेटेक लगाकर बैठा,
सिकंदर कुर्सी पर्र हि सो गय़ा थां। पूरीरात कां सफर, नए माहौल कि थकान औऱ कमरे कि ठंडक—इन सबनेउसे गहरी नींद मे डाल दिया।
सुभह कि हल्की धूप खिड़की सें अंदर झाँकरही थि। बाहर् गली मे कुछ बच्चे खेलरहे थें, औऱ पड़ोसियों केँ घरों सें नाश्ते कि खुशबू आँ रही थि। इसी हलचल केँ बीच, सोसाइटी केँ एक् फ्लैट कां दरवाजा खुला, औऱ एक् प्यारी-सि लड़की अंगड़ाई लेतेहुए बाहर् निकली।
उसने हल्के गुलाबी रंग कि नाइटसूट पहनी थि, बाल हल्के बिखरे हुए थें, औऱ चेहरे पर्र उनींदा-सां मासूमियत भराभाव थां। वोँ अभि पूरीतरह जागी भि नहि थि कि उसकीनजर सिकंदर केँ कमरे केँ खुले दरवाजे पऱ पड़ी।
लड़की कि आँखें चौड़ी हौ गईं।
"आआआआआ!!!"
उसकी तेज़चीख सें सोसाइटी कि शांति भंग हौ गई।
लड़की (भागते हुए): "अम्मी!! अब्बू!! भाई!!! उठो!!!"
वोँ अपनेघऱ केँ अंदर दौड़ी औऱ पूरे परिवार कों हिलाने लगी।
लड़की (घबराई हुइ आवाज़ मे): "सुनो-सुनो! उस भूतिया कमरे कां दरवाजा खुला थां!"
उसका छोटा भइया, जौ अभि तक आधी नींद मे थां, आँखें मलतेहुए बोला—
"दिदी, सुभह-सुभह हॉरर फिल्म क्यूं चला दि?"
लड़की: "मे सचकहरही हूं! मैंने स्वयं देखा!"
अब उसकी अम्मी औऱ अब्बू भि जाग चुके थें।
अम्मी (आश्चर्य सें): "क्याँ? पऱ वोँ रूम तोँ सालों सें बंद थां!"
अब्बू (चिंतित होकर): "कहींकोई गलत व्यक्ति तौ नहि घुसआया?"
घरवालों नें आस-पड़ोस कों खबर दि, औऱ कुछ हि मिनटों मे पूरी सोसाइटी उस कमरे केँ बाहर् जमा हौ गई।
सिकंदर अब भि कुर्सी पर्र बेसुध पड़ा थां, गहरी नींद मे।
एक् पड़ोसी (फुसफुसाते हुए): "दोस्त, वोँ सच मे भूत निकला तौ?"
दूसरा पड़ोसी (काँपते हुए): "पऱ भूत कमरे मे दरवाजा खोलकर सोते नहि नं?"
उसी टाइम, लड़की कां छोटा भइया औऱ उसकेयार हल्के सें दरवाजे केँ पासगए औऱ अंदर झाँका।
लड़के (हैरान होकर, धीमे स्वर मे): "इतना। हैंडसम भूत?!"
दूसरा लड़का(सर हिलाते हुए): "दोस्त, हॉरर फिल्म केँ हीरो जैसालग रहा हैं! इतनी स्टाइलिश जैकेट औऱ किलरलुक वालाभूत मैंने पहलीबार देखा!"
तीसरा लड़का:"अगर ऐसेभूत होते हें तोँ मे अपनी बेहन कों भि डराने केँ लिए भेजूँ!"
सिकंदर कों धीरे धीरे हंगामा कां एहसास हुआ। उसने हल्की करवटली औऱ माथे पर्र हाथरखा।
सिकंदर (नींद मे बड़बड़ाते हुए): "इतना हंगामा क्यूं हौ रहा हैं.?"
अब तौ भीड़ कि हलचल औऱ बढ़ गई।
एक् बुजुर्ग औरत(गैस कि तरह आवाज़ निकालते हुए):"हे ईश्वर! भूतबोल भि रहा हैं!!"
सिकंदर नें धीरे-धीरे सें आँखें खोलीं, औऱ जोँ देखा तौ उसे स्वयं हि समझ नहि आया कि यह क्याँ तमाशा हौ रहा हैं।
उसके दरवाजे केँ बाहर् पूरी सोसाइटी खड़ी थि—कुछ डर सें, कुछ उत्सुकता सें, औऱ कुछइस उम्मीद मे कि अभि कोई जबरदस्त हॉररसीन देखने कों मिलेगा।
लड़की केँ अब्बू आगे बढ़े औऱ हिम्मत करके बोले—
"त। तुम् कौन होँ?"
सिकंदर उठकर सीधाहुआ, औऱ हल्की आँखें मसलते हुए बोला—
"इंसान। "
भीड़ मे हलचल हुई।
एक् स्त्री (घबराकर): "ओह!भूत झूठ भि बोलते हें!"
सिकंदर (आहिस्ता सें): ".अगरसच मे भूत होता तौ क्याँ तुम् लोगअब तक यहा खड़े रहते?"**
भीड़ एक् समय केँ लिएचुप हौ गई।
लड़की, जिसने सबसे पहलेचीख मारी थि, अब सिकंदर कों ध्यान सें देखरही थि।
लड़की (धीरे-धीरे सें): "भूत तौ नहि लगरहे."
उसका छोटा भइया फुसफुसाया—
"अगरभूत होते तौ इतनी अच्छी दाढ़ी केसे होती?"
सिकंदर अब पूरीतरह जाग चुका थां। उसने अपना कॉलरठीक किया, जेब सें मोबाइल निकाला औऱ देखा कि एजेंट कां एक् मैसेज आया थां—
"उम्मीद हैं, रात अच्छी गुज़री होगी। अब सुभह-सुभह सोसाइटी वालों सें नं लड़ना। "
सिकंदर नें हल्की मुस्कान दि औऱ मोबाइल वापसजेब मे रख लिया। फिन सीधा खड़े होकर भीड़ कि ओर देखा औऱ अपनेउसी ठंडे, गहरे स्वर मे बोला—
"अब कोई बताएगा कि सुभह-सुभह क्यूं तमाशा लगारखा हैं?"
सोसाइटी वालों कों अबलगरहा थां कि शायद वोँ ज़रूरत सें अधिक रिएक्ट करगए।
एक् पड़ोसी (संकोच सें): "हमने सोचा.यह रूम तोँ बरसों सें बंद थां, औऱ फिन अचानक."
सिकंदर (सीधे शब्दों मे): "अबयहरूम मेरा हैं। कोई तकलीफ़?"**
सभी एक्-दूसरे कि ओर देखने लगे।
लड़की (मुस्कान छुपाते हुए, धीरे-धीरे सें अपने भइया सें): "इतना एटीट्यूड! सच मे कोई हीरो लगता हैं!"**
भइया (आँखें घुमाते हुए):"हाँ, औऱ तूँ डर केँ सबसे पहले भागी थि!"**
थोड़ी देरबाद, जब सोसाइटी वालेसमझ गए कि नया पड़ोसी इंसान हि हैं, तौ भीड़ आरामसे छँटने लगी।
सिकंदर नें गहरी सांसली औऱ सिर हिलाया।
"सुभह-सुभह यह ड्रामा। लगता हैं, यहा भि सुकून सें रहना आसान नहि होगा। "
दिल्ली केँ पॉश इलाके मे सुभह कि हलचल शुरुआत होँ चुकी थि। चमचमाती गाड़ियाँ तेज़ रफ्तार सें सड़कों पर्र दौड़रही थीं, औऱ बड़े-बड़े कॉर्पोरेट ऑफिसों केँ बाहर् कर्मचारियों कि आवाजाही बढ़रही थि। मगर एक् स्थान माहौल बाकीशहर सें अलग थां—"इंसिग्निया कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड" केँ गेट केँ सामने मज़दूरों कि भारी भीड़ इकट्ठा थि।
वोँ सभी नारेलगा रहे थें, उनकी आँखों मे क्रोध थां, औऱ हाथों मे तख्तियां थीं—
"हमें हमारा हक़ चाहिए!"
"न्याय दो! न्याय दो!"
बिल्डिंग केँ अंदर कां माहौल भि कुछकम उग्र नहि थां। चौथी मंज़िल पऱ बनी विशाल, शानदार दफ़्तर केँ अंदर माहौल गरम थां।
एक् हसीन महिला अपने कर्मचारियों पर्र ग़ुस्से सें बरसरही थि।
उसकानाम अलीना मिर्ज़ा थां।
चमकदार नीली आँखें, तेज़ नाक-नक्श, दूध-सि सफेद रंगत औऱ ऊँची एड़ी केँ स्टाइलिश सैंडल मे खड़ी अलीना किसी क्वीन्स कि तरहलग रही थि। उसकी आँखों मे वही कड़कपन थां जोँ सिकंदर कि आँखों मे थां, मगर भावनाएँ बिल्कुल विपरीत थीं।
"यह सभी क्याँ हौ रहा हैं!?"
उसकी गूंजती हुईँ आवाज़ नें पूरे बोर्डरूम मे सन्नाटा खींच दिया।
सामने खड़ा उसका CEO राजेश मल्होत्रा सिर झुकाए खड़ा थां।
राजेश: "मैडम, मज़दूरों कां कहना हैं कि उनको पिछले महीने कां पूरा भुगतान नहि मिला हैं, औऱ ऊपर सें उनकी सैलरी भि कमकर दि गई हैं—"
अलीना (तेज़ स्वर मे, आँखें सिकोड़कर): "तुम् मुझेयह सभी बताने आए हौ याँ इसकाहल निकालने?"
राजेश पसीना पोंछने लगा।
राजेश: "मैडम, हम् कोशिश कररहे हें, मगर उनका क्रोध बढ़ता जारहा हैं। अगर आपने स्वयं जाकर उनसेबात कि तोँ शायद—"
अलीना (कड़वी हँसी केँ संग):"बात? मे उन लोगों सें जाकरबात करूँगी जोँ मेरे हि पैसे लेकर मुझसे प्रश्न कररहे हें?"
अलीना अपनेमेज सें उठी औऱ बड़ी हि रॉयल अंदाज़ मे खिड़की कि ओर बढ़ी।
नीचेगेट केँ बाहर् मज़दूर अब भि नारेलगा रहे थें।
उसने हल्की मुस्कान दि, मगर वोँ मुस्कान ज़हरीली थि।
"राजेश, एक् बातकान खोलकर सुनलो—"
वोँ घूमकर राजेश कि आँखों मे सीधा देखती हैं।
"यह दुनिया ताकत सें चलती हैं, दया सें नहि। इन लोगों कों अगर हमनेआज छूटदे दि, तौ कलयह हमारे सिर चढ़कर नाचेंगे। "
राजेश कि हिम्मत नहि होँ रही थि कि कोई औऱ प्रश्न करे, मगर hour हेड, मिस नीना, जौ हमेशा अलीना सें सहमत रहती थि, थोडा घबराते हुए बोलि—
नीना: "मैडम, मीडिया कां ध्यान भि इस मामले पऱ जा सकता हैं, अगर हमें हड़ताल रोकनी हैं तौ कुछ करना होगा."
अलीना नें ठंडी आँखों सें उसे देखा।
"तुम्हें लगता हैं कि मे नहि जानती कि क्याँ करना हैं?"
वोँ अपनेफोन पऱ एक् नंबर डायल करती हैं औऱ बेहद शांत लहज़े मे किसी सें कहती हैं—
"मुझे नहि चाहिए यह हड़ताल। एक् घंटे मे सभी क्लियर होना चाहिए। समझे?"
वोँ फोन काटती हैं औऱ हॉल मे खड़े स्टाफ कों देखती हैं।
"अबसभी अपनेकाम पऱ लौटो। यह मज़दूर कितने टाइम तक हड़ताल पर्र रहेंगे, यहअब मे तय करूँगी, नां कि वोँ। "
राजेश औऱ नीना एक्-दूसरे कों देखते हें।
इस महिला मे शक्ति, ठंडापन औऱ क्रूरता थि।
वोँ उस सिकंदर कि मम्मी थि—जिससे वोँ सालों सें अनजान थि।
अलीना अपनीसीट पऱ बैठी, थके हुए अंदाज़ मे अपनासिर कुर्सी सें टिका देती हैं। उसकी नीली आँखें धीरे धीरे ठंडी पड़ने लगती हें, जैसे किसी ज्वालामुखी केँ राख मे तब्दील होने कि प्रक्रिया शुरुआत होँ गई होँ।
उसकी टेबल पर्र एक् सुंदर सिल्वर फ्रेम रखा थां, जिसमें एक् टीनेज लड़के कि तस्वीर थि। नीली आँखें, तीखे नाक-नक्श, हल्की मुस्कान औऱ एक् गहरी उदासी सें भरा चेहरा।
सिकंदर।
वही सिकंदर जौ उसका बेटा थां.
वही सिकंदर जिसने उसे छोड़ दिया थां.
वही सिकंदर जौ अब उसकी दुनिया कां हिस्सा नहि थां.
अलीना धीरे-धीरे सें फ्रेम उठाती हैं, उसकी उंगलियाँ तस्वीर केँ किनारों कों हल्के-हल्के सहलाने लगती हें, जैसे वोँ तस्वीर नहि, स्वयं सिकंदर केँ गालों कों छूरही हौ।
"देखरहा हैं नाँ, सिकंदर? केसेसभी मेरे पीछे पड़े हें?"
उसकी आवाज़ मे वोँ ठंडापन नहि थां जोँ अभि कुछ लम्हा पहले उसके कर्मचारियों कों सुनाई दिया थां।
अब उसकी आवाज़ भीगी हुई, टूटी हुइ थि।
"हरकोई चाहता हैं कि मे झुक जाऊं, माफी माँगलूं। मगर मे झुकने वालों मे सें नहि हूं। "
वोँ तस्वीर कों औऱ लगभगकर लेती हैं। उसकी आँखें हल्की लाल होनेलगी थीं।
"मगर मुझे दूसरों सें क्याँ शिक़ायत करनी, जब तूने हि मुझे छोड़ दिया?"
अब उसकी आँखों मे क्रोध उभरने लगा थां, मगर वोँ क्रोध तस्वीर कि मासूमियत देखकर फिन सें दर्द मे बदल गय़ा।
"धोखेबाज़। बुज़दिल."
उसने दाँत भींचलिए औऱ अपनी आँखें कसकरबंद करलीं, जैसेकोई पुरानी यादउसे जकड़रही हौ।
"तुँ भि तौ उनसभी कि तरह हि निकला। तूँ भि मुझे छोड़कर चला गय़ा। मेरे खिलाफ खड़ा हौ गय़ा। तूँ भि मुझसे नफरत करता हैं नाँ?"
वोँ हल्का हँसती हैं, मगर वोँ हँसी ज़्यादा देर तक टिकती नहि।
तस्वीर पर्र उसकी उंगलियाँ औऱ कसने लगती हें।
"मगर देख्ना, एक् दिन तूँ स्वयं वापस आएगा। मां कों भूल सकता हैं क्याँ?"
वोँ तस्वीर टेबल पऱ रखती हैं, मगर उसकी नज़रें अब भि उस चेहरे सें हट नहि रहीथीं।
बाहर् मज़दूरों कि हड़ताल कि आवाज़ें अब भि गूंजरही थीं, मगर अलीना कि दुनिया इससमय बस एक् तस्वीर तक सिमट चुकी थि।
कमरे मे सन्नाटा थां।
औऱ उस सन्नाटे मे एक् मां अपने हि बेटे कि याद मे जलरही थि।
Mukkader kaa sikander – New Episode
अलीना अपनी महंगी व्हीकल सें उतरी। हवेली जैसी उसकी कोठी सोने कि तरहचमक रही थि, मगर अंदर कां सूनापन किसी उजड़े हुए किले जैसा थां।
"सलाम, बेगम साहिबा!"
गुलामों कि झुकी हुई नज़रें, आदर मे झुकेहुए सर—सभी कुछ वैसा हि थां, जैसा अलीना नें अपनेलिए चाहा थां।
मगरफिन भि…
वोँ इस आलीशान घऱ मे अकेली थि।
अलीना किसी सें कुछकहे बिना सीधे अपने कमरे मे चली गई। उसने अपने जूते उतारे, अपने भारी दुपट्टे कों खाट पऱ फेंका औऱ स्वयं भि थकान सें बैड पर्र गिर पड़ी।
छत पऱ उसकी नज़रटिक गई।
अचानक, अतीत केँ दरवाज़े खुलगए।
अलीना कि आँखों मे आँसू थें। उसके मां-बाप केँ सामने वोँ गिड़गिड़ा रही थि।
"अमी, अब्बू… प्लीज़ समझने कि कोशिश करो… मे रहमान सें बेइंतहा मुहब्बत करती हूं!"
अब्बू कि आँखें गुस्से सें लालथीं।
"चुपकर, अलीना! तूँ हमें शर्मिंदा कररही हैं!"
अमी नें घबराई नज़रों सें उसे देखा।
"बेटा, यह तुम् क्याँ कहरही होँ? रहमान हमारे बराबर कां नहि हैं! उसकी औक़ात कुछ भि नहि!"
अलीना नें अपनी मां कि गोदी मे सिररख दिया, उसकी आँखों सें आँसू बहनेलगे।
"अमी, इश्क़ औक़ात नहि देखता…! रहमान मुझसे सच्चा प्रेम करता हैं!"
अब्बू नें गुस्से मे ज़ोर सें मेज़ पऱ हाथ मारा।
"औऱ तूनेउस नालायक केँ संग अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने कि ठानली? बता, तेरीगोद मे जौ बच्चा लम्हा रहा हैं, वोँ किसका हैं?"
अलीना कि आँखें डर सें चौड़ी हौ गईं।
उसने काँपते लहज़े मे जवाब दिया—
"अब्बू… यह रहमान कां बच्चा हैं… हमारा बच्चा। "
घऱ मे सन्नाटा छा गय़ा।
अब्बू कां चेहरा गुस्से सें लाल हौ गय़ा, औऱ उन्होंने झटके सें अलीना कों पकड़ लिया।
"हरामज़ादी! तूने हमारी इज़्ज़त मिट्टी मे मिला दि!"
अमी नें अब्बू कां हाथ पकड़कर अलीना कों छुड़ाया।
"खुदा केँ लिए, उसे मत मारो!"
अलीना फूट-फूटकर रोनेलगी।
"अब्बू, अमी… मेरी इश्क कों ग़लतमत समझो… मे रहमान केँ बिनामर जाऊँगी!"
अब्बू नें गुस्से सें दरवाज़े कि तरफ इशारा किया।
"अगर तुँ मिर्ज़ा सें इतनी मुहब्बत करती हैं, तोँ निकलजा मेरेघऱ सें! आज सें तुँ हमारे लिएमर चुकी हैं!"
अलीना कि दुनिया अंधेरे मे डूब गई।
उसने अपनी मम्मी कि ओर देखा, उम्मीद थि कि वोँ कुछ कहेंगी…
मगरअमी रोतेहुए भि चुपथीं।
अब्बू कां फैसला अंतिम थां।
अलीना कों अपनाघऱ छोड़ना पड़ा… अपनी मुहब्बत केँ लिए
उसकी आँखों मे एक् भि आँसू नहि थां।
अब वोँ लड़की नहि थि जोँ मुहब्बत केँ लिए गिड़गिड़ाती थि।
अब वोँ अलीना रहमान थि।
जिसने दुनिया सें सिर्फ़ नफरत करना सीखा थां।
इश्क़, धोखा औऱ तबाही
अलीना जब रहमान केँ घऱ पहुँची, तोँ उसकी सांसें तेज़ होँ गईं।
उसकादिल उम्मीदों सें भरा थां—
"मेरा रहनान। मेरा प्रेम। मेरी दुनिया। अबसभी ठीक हौ जाएगा."
मगर जैसे हि उसने द्वार (दरवाज़ा) खोला, उसकीरूह काँप गई।
रहामान। वोँ मर्द जिसे वोँ अपनीजान सें भि ज्यादा चाहती थि.
वोँ किसी औऱ केँ संग थां!वोँ 'कोई औऱ' कोई लड़की थि.
अलीना कों एक् झटकालगा। उसकी आँखें चौड़ी होँ गईं, साँसें फंसगईं।
"रहमान। यह क्याँ हैं?" उसकी आवाज़ काँपी। रहमान नें घबराकर पीछे देखा। उसकी आँखों मे पहलीबार डर थां।
अलीना केँ पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी दुनिया, उसकी मुहब्बत—सभी झूठ थां!
"तूँ। तूँ मुझसे धोखाकर रहा थां?"
रहमान नें अपने कपड़े संभाले, औऱ चेहरे पऱ एक् ज़हरीली मुस्कान लेँ आया।
"अब जान गई तुँ? हाँ, मैंने तुम्हे धोखा दिया। मगर अब तुँ कुछ नहि कर सकती। "
अलीना कां खूनखौल उठा।
"हरामज़ादे!" वोँ ज़ोर सें चीखी औऱ उस पर्र झपट पड़ी।
उसकेहाथ रहमान केँ गले तक पहुँचते इससे पहले हि रहमान नें उसकाहाथ पकड़ लिया औऱ ज़ोर सें धक्का दिया।
अलीना ज़मीन पऱ गिर पड़ी। रहमान उसकीओर झुकते हुए हँसा।
"अब तुम कोसभी समझ आँ गय़ा नाँ? मगर बहोत देर हौ चुकी हैं, अलीना."
अलीना नें नफ़रत सें उसे देखा।
रहमान आगे बढ़ा औऱ फुसफुसाया—
"तेरेपेट मे मेरा बच्चा हैं। अब तुँ दुनिया कों क्याँ बताएगी?"
"क्याँ कहेगी सबको? कि अलीना नें विवाह सें पहले किसी कां बच्चा पैदा किया?"
अलीना केँ होशउड़ गए।
रहमान उसकी आँखों मे डरदेख रहा थां औऱ उसेमजा आँ रहा थां।
"अब तुम्हें मुझसे विवाह करनी हि पड़ेगी। नहि तोँ दुनिया तुम्हें जीने नहि देगी। "
अलीना नें अपनेपेट पऱ हाथरखा।
उसके अंदर एक् ज़िन्दगी लम्हा रही थि।
मगर.
"नहि!"
अलीना केँ दिमाग़ मे बस एक् हि बातआई—
"मे नाँ तुम को छोड़ूँगी औऱ नाँ इस बच्चे कों!"
उसने घृणा सें रहमान कों देखा।
"मे अपने जिस्म सें तेरीहर निशानी मिटा दूँगी!"
रहमान उसकी आँखों मे पागलपन देखा।
"तुँ। तूँ ऐसा नहि कर सकती." उसने पहलीबार घबराकर कहा।
"देख्ना, मे तेरा नामो-निशान मिटा दूँगी, मिर्ज़ा!"
अलीना उठी, अपने आँसू पोंछे, औऱ वहा सें तेज़ी सें निकल गई।
उसनेशपथ खाई—
"अब मेरी ज़िन्दगी मे कोई इश्क नहि होगी.
मनाली कि ठंडी हवाएँ तेज़ी सें दौड़रही थीं। चारों ओरघना अंधेरा थां।
सुनसान मार्ग पर्र एक् व्हीकल कि हेडलाइट जलरही थि।
स्टेयरिंग पर्र झुकी अलीना, गहरी साँसें लें रही थि। उसकी आँखों मे आँसू थें, होंठ काँपरहे थें।
रात केँ तीनबजे.
उसने अपनाहाथ अपनेपेट पर्र रखा। वहा एक् नन्हीं जान थि, जौ नफ़रत कि आग मे जलरही थि।
"सिकंदर." उसकी आवाज़ टूट गई।
"तुँ सुनरहा हैं नाँ? तेरी मां कों केसे बर्बाद किया गय़ा?"
उसकी साँसें तेज़ होँ गईं।
"तेरे बाप नें मेरी मुहब्बत कों धोखाबना दिया। उसने मेरी इज़्ज़त कों नीलाम कर दिया। उसने मेरे शरीर सें खेला। औऱ अब, तूँ."
उसकी आँखों मे जंगली पागलपन थां।
"मे तेरी परछाई भि अपनेसंग नहि रख सकती!"
अचानक, उसने अपनेपेट पर्र घूंसे बरसाने शुरुआत करदिए।
"तुझेही मरना होगा, सिकंदर!"
उसके होंठ कांपने लगे, मगर उसकाहाथ नहि रुका।
"तूँ इस दुनिया मे नहि आएगा! तेरी मे अपनेसंग नहि घसीटूंगी!"
उसके चेहरे पऱ आँसुओं कि धार थि, मगर उसका गुस्सा ज्यादा गहरा थां।
वोँ ज़ोर सें चीखी—
"मर जा सिकंदर। मरजा!!"
उसकेहाथ झटके सें रुकगए।
उसका जिस्म काँपरहा थां।
"क्यूं नहि मररहा तूँ?"
उसकी आँखों मे पागलपन कां तूफान थां।
अचानक, उसकेपेट केँ अंदर हलचल हुईँ।
उसकादिल ज़ोर सें धड़कउठा।
वोँ बुतबन गई।
"तूँ। तुँ जिंदा हैं?"
एक् गहरी खामोशी छा गई।
उसने अपनेपेट पर्र हाथरखा। औऱ फिन ज़ोर सें रो पड़ी।
"तूँ मेरीकोख मे जिंदा हैं, सिकंदर."
उसने पहलीबार महसूस किया कि वोँ एक् मां थि।
"पऱ मे मम्मी नहि बन सकती। मे नहि बन सकती."****"नहि!"
वोँ फिन सें व्हीकल स्टार्ट करनेलगी।
"इस बच्चे कों ख़त्म करना होगा!"
उसकी आँखों मे आँसू थें। मगरअब उसकी आँखों मे एक् औऱ चीज़ थि—
, दर्द औऱ नफ़रत कां नशा।
तभी उसकी गारी एक् पेड़ सें टकरा गई
अस्पताल कां सफ़ेद रूम। धुंधली रोशनी। औऱ अलीना कि टूटी हुई साँसें।
उसकी पलकें भारीथीं, सिर दर्द सें फटाजा रहा थां। जैसे हि उसने आँखें खोलीं, एक् अजीब सां सन्नाटा उसके कानों मे गूंजा।
"अलीना। मेरी बच्ची!" उसकी मम्मी, फातिमा, रोती हुई उसकेसिर पऱ हाथफेर रहीथीं।
अलीना कि नज़र चारों ओर घूमी। उसके पिता, उसका भइया, उसकी भाभी.सभी वहीं थें।
"यह। मे कहां हूं?" उसकी आवाज़ धीमी औऱ कांपती हुइ थि।
तभी डॉक्टर अंदरआया। उसके चेहरे पर्र एक् गंभीर भाव थां।
"मिस अलीना, आपकोहोश आँ गय़ा, यह बहोत अच्छी बात हैं। "
अलीना दर्द सें कराहउठी, मगर अचानक उसेकुछ यादआया।
"मेरा। बच्चा?"
रूम एक् समय केँ लिए पूरीतरह खामोश होँ गय़ा।
डॉक्टर नें गहरी सांसली।
"आपका बेटा। टाइम सें पहले पैदाहुआ हैं। वो सिर्फ़ सात महीने कां हैं, इसलिये उसकी हालत बहोत नाज़ुक हैं। "
अलीना कि आँखों मे जंगली बेचैनी थि।
"नहि। नहि, यह नहि हौ सकता!"
डॉक्टर कि आवाज़ गहरी थि—
"मगर.उस बच्चे मे जीने कि ज़बरदस्त चाहत हैं, मिस अलीना। उसने दुनिया छोड़ने सें इंकार कर दिया। "
अलीना कां बदनजम सां गय़ा।
"क्याँ मतलब?"
"मतलबयह कि आपका बेटा मरना नहि चाहता, मिस अलीना। उसनेहार नहि मानी। वो जीना चाहता हैं!"
अलीना कां दिल ज़ोर सें धड़कउठा।
"तूँ मेरीकोख मे भि जिंदा रहना चाहता थां। औऱ अब भि?" उसकी आँखों मे आँसू थें।
उसकी मम्मी नें उसकाहाथ थामा।
"अलीना, यह अ23लाह कां करिश्मा हैं। यह बच्चा तुम्हे सबक देनेआया हैं। "
अलीना कांपते हुए बोलीं—
"मैंने उसे मारने कि कोशिश कि थि, अम्मी। मैंने उसे चाहा हि नहि थां। फिन भि वोँ ज़िंदा हैं?"
डॉक्टर कि आवाज़ भारी थि—
"वोँ सिर्फ़ जिंदा नहि हैं, मिस अलीना, वोँ लड़रहा हैं। "
अलीना कि आँखों सें आँसूगिर पड़े।
"मैंने उसेकभी चाहा हि नहि थां."
उसके पिता पहलीबार बोले—
"मगर वोँ तेरी चाहता हैं, अलीना। "
कमरे मे गहरी खामोशी छा गई।
अलीना कि आँखों केँ सामने अंधेरा छानेलगा।
उसने सिर्फ़ एक् बातकही—
"मुझे। मेरे बेटे केँ पास लेँ चलो."
औऱ फिन उसकी आँखों सें आँसू बहनेलगे।
अस्पताल कां आईसीयू… धीमी-धीमी बीप कि आवाज़ें… मशीनों मे उलझाहुआ एक् नन्हा सां बदन…
सफ़ेद कपड़ों मे लिपटा हुआ, कांच केँ पीछेरखा गय़ा वो नन्हा सां बच्चा, जौ अभि पूरीतरह इस दुनिया केँ लिए सजधजकर नहि थां। मगरफिन भि… उसकी छोटी-छोटी उंगलियाँ हरबार हिलरही थीं… उसकी नन्ही सि छाती मुश्किल सें ऊपर-नीचे होँ रही थि, मगर वो सांस लेना नहि छोड़रहा थां।
"नहि। नहि, यह नहि होँ सकता!!" अलीना नें अपने बालों कों मुट्ठी मे भींच लिया।
उसके भीतर सें अजीब सि बेचैनी उठनेलगी।
"अम्मी, यहमर क्यूं नहि रहा?! इसको मरना चाहिए थां, नाँ?! क्यूं लड़रहा हैं यह?!" उसकी आँखें लालथीं, हाथ काँपरहे थें।
उसकी मां नें डरतेहुए उसे थामने कि कोशिश कि—
"अलीना, खुदा केँ लिएहोश मे आँ!"
"नहि अम्मी! यह बच्चा नहि हैं! यह सज़ा हैं मेरी!यह याद दिलाने आया हैं कि मे धोखाखा चुकी हूं, कि मे टूटी हुईँ हूं! इसको मरना चाहिए थां, अम्मी!! मर जानां चाहिए थां!!!"
अलीना घुटनों केँ बल ज़मीन पर्र बैठ गई।
"अल23लाह। अ**ल्ला जी, आप् मुझसे इतनी नफरत क्यूं करते हें? मैंने इस बच्चे कों अपनीकोख मे मारने कि कोशिश कि थि, मैंने वाहन तेज़ चलाई थि ताकियह दुनिया मे नाँ आए…फिन भि इसने मुझेहरा दिया?फिन भि इसने जीने कां फैसला किया? क्यूं? क्यूं, अ**ल्लाह जी?!!"
नर्सें सहमगईं। डॉक्टर चुप हौ गय़ा। उसके पिता नें एक् लंबी सांसली, मगर बोलेकुछ नहि।
मगर आईसीयू केँ कांच केँ दूसरी तरफ़, वो बच्चा अपनी सांसों केँ लिएलड़ रहा थां।
"देखरही होँ, अलीना?" उसके पिता कि आवाज़ भारी थि। "वोँ हार नहि मानरहा। "
"मुझे इसकी ज़रूरत नहि हैं!!!" अलीना नें ज़मीन पऱ हाथ मारा।
डॉक्टर नें धीरे-धीरे सें कहा—
"मगर इस बच्चे कों तुम्हारी ज़रूरत हैं, मिस अलीना। "
एक् लम्हा केँ लिएसभी खामोश होँ गए।
अलीना कि आँखों सें आँसू बहनेलगे।
"इसको मेरी नहि… मेरीमौत कि ज़रूरत थि…" वो फुसफुसाई।
तभी कांच केँ उसपार, वो नन्ही सि जान अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियाँ हल्का सां हिला गई… जैसे वो कहरहा हौ—
"नहि अम्मी… मुझे तुम्हारी ज़रूरत हैं। "
अस्पताल केँ आईसीयू मे दर्द औऱ चीख़ों कां साया थां…
"नहि… नहि… यह नहि होँ सकता!!!"उस 18 साल कि मासूम लड़की अलीना नें अपनेसिर कों दोनों हाथों सें पकड़ लिया, उसकी आँखों मे खूनउतर आया थां। उसकेहलक सें मात्र एक् हि नाम निकलरहा थां—
"सिकंदर…"
आईसीयू केँ कांच केँ उसपार, मशीनों सें जुड़ा वो नन्हा सां बच्चा, साँसों केँ लिएलड़ रहा थां… उसकी नाज़ुक पलकों केँ नीचे हल्की-हल्की नीली नसेंझलक रहीथीं… मगर वो हार मानने कों रेडी नहि थां।
"नहि… नहि… सिकंदर कों नहि जीना चाहिए!!!"
अलीना ज़मीन पऱ घुटनों केँ बलगिर पड़ी, उसकेहाथ काँपरहे थें, चेहरा आंसुओं सें भीग चुका थां।
"अ232लाहजी… सिकंदर कों मारदो!!! मैंने इसको दुनिया मे लाने कां फैसला नहि किया थां! मैंने इसको अपनाने कां इरादा नहि किया थां!! फिन भि क्यूं, क्यूं अ23लाहजी?!!!"
चारों तरफ़ सन्नाटा थां… नर्सें चुपथीं… डॉक्टर चुप थां… मगर उसकी चीखें पूरे अस्पताल मे गूंजरही थीं।
"सिकंदर कों मरना होगा, अ23लाहजी! सिकंदर कों मरना चाहिए थां!! इसको दुनिया मे नहि आनां थां!! अ23लाहजी, मेरीसुन लो!!! सिकंदर कों ख़त्म करदो, इसे समाप्त करदो!!!"
वो फर्श पऱ अपनासिर पटकने लगी। उसके नाखून स्वयं केँ हि हाथों मे धंस चुके थें।
"मुझे इसकी सूरत नहि देखनी, मुझे इसकी साँसों कि आवाज़ नहि सुननी! मुझे सिकंदर नहि चाहिए!!!"
डॉक्टर नें नर्स कि तरफ़ इशारा किया।
"इसका ब्लड प्रेशर खतरनाक तरीके सें बढ़रहा हैं… हमेंइसे शांत करना होगा…"
नर्स नें कांपते हाथों सें सिरिंज उठाई।
मगर अलीना अभि भि चीख़रही थि।
"नहि… नहि… सिकंदर कों ख़त्म करदो!!! सिकंदर कों जलादो, मिटादो, मारदो!!! अल234लाह जी, मेरीसुन लो, मेरीसुन लो!!!"
अचानक, डॉक्टर नें उसकेहाथ कों पकड़कर उसे रोका औऱ नर्स नें जल्द सें उसे बेहोशी कां इंजेक्शन लगा दिया।
"नहि… नहि… सिकंदर… सिकंदर… सिक—"
उसकी आवाज़ धीमी होनेलगी।
"सिकंदर… मर जानां चाहिए थां… सिकंदर कों…"
उसकी आँखें बंद हौ गईं।
कमरे मे अब मात्र मशीनों कि बीप कि आवाज़ थि।
आईसीयू केँ उसपार, नन्हा सिकंदर अभि भि साँसों कि लड़ाई लड़रहा थां… औऱ इसपार, उसकी मां बेहोश पड़ी थि। पर्र अबहोस मे आँ रही थि
अलिना कि पलकें आहिस्ता खुलीं। बेहोशी कि हालत सें बाहर् आते हि उसकेमन मे एक् भारीपन महसूस हुआ। उसके चारों तरफ सफेद दीवारें थीं, औऱ हल्की-हल्की दवाइयों कि महक उसके नथुनों मे घुसरही थि।
तभी एक् नर्स नें उसकेपास आकरकहा—
"मिस अलिना, आपकोहोश आँ गय़ा। डॉक्टर कों बुलाती हूं। "
अलिना नें कुछ नहि कहा। उसकादिल बहोत धीमे-धीमे धड़करहा थां, जैसे किसी गहरे कुएं मे गिरा होँ।
तभी दरवाजा खुला औऱ डॉक्टर अंदरआया। उसके हाथों मे एक् छोटा सां सफेद कपड़े मे लिपटा हुआ नन्हा बच्चा थां। वो बहोत हि नाजुक थां, मानो उसकी सांसें अभि भि ज़िन्दगी सें लड़रही हों।
"आपका बेटा, मिस अलिना." डॉक्टर नें धीरे-धीरे सें कहा औऱ बच्चे कों अलिना कि ओर बढ़ाया।
अलिना नें घृणा सें उसे देखा।
"मेरा बेटा? यह मेरा बेटा नहि हैं." उसकी आवाज़ सख्त थि, मगर उसमें कुछ टूटने कि आहट थि।
उसकी अम्मी, जोँ वहींपास खड़ीथीं, नें उसकीओर देखा। उनकी आँखों मे क्रोध नहि, बल्कि मात्र दर्द थां।
"अलिना, इसेगोद मे लो। मां बनो."
अलिना कां दिल काँपा। मगर अगले हि समय उसकी आँखों मे वही नफरतलौट आई।
"नहि! मे इसेगोद मे नहि लूंगी। मे इसकी मम्मी नहि हूं। एक् मां अपने बच्चे कों प्रेम करती हैं, औऱ मे इससे नफरत करती हूं! मे इसेदूध नहि पिलाऊंगी!"
"अलिना!! यह क्याँ कहरही हौ?" उसकी अम्मी कि आँखों मे आँसू आँ गए।
अलिना कि आँखें उस नन्हे बच्चे पर्र जमी हुइ थीं। वो बहोत कमजोर थां, मगर उसकी छोटी-छोटी मुठ्ठियां कसकरबंद थीं। वो जीना चाहता थां।
अलिना कांपरही थि, मगर अपनी नफरत पर्र काबू रखतेहुए बोलि—
"मे तेरीकभी अपनादूध नहि पिलाऊंगी! एक् मम्मी तुम्हें सीने सें लगाकर तुझसे प्रेम करती, मगर मे तुझसे नफरत करती हूं, सिकंदर!"
"तूँ नहि जी पाएगा! तुम को नहि जीना चाहिए! तेरा जन्म हि एक् गलती थां!"
बच्चे नें हल्की-सि करवटली, उसकी साँसे तेज़चल रहीथीं। नर्सउसे अलिना कि गोद मे रखनेलगी, मगर अलिना नें झटके सें मुंहफेर लिया।
तभी उसकी अम्मी नें सख्ती सें कहा—
"अगर तूँ इसेदूध नहि पिलाएगी, तौ यहमर जाएगा, अलिना!"
अलिना केँ दिल मे एक् झटकालगा।
मर जाएगा?
एक् अजीब-सां दर्द उसके सीने मे उठा। उसकी आँखों सें आँसू गिरने लगे। उसने कांपते हुए अपनेहाथ बढ़ाए औऱ बच्चे कों गोद मे लेँ लिया।
"क्यूं आया तुँ मेरी ज़िन्दगी मे.? क्यूं नहि मर गय़ा तूँ वहीं, जहाँ तेरा जन्महुआ थां.?"
मगर बच्चा कुछ नहि बोला। वो मात्र उसकी छाती सें लग गय़ा, औऱ उसी लम्हा अलिना कां दिल तेज़ी सें धड़कउठा।
"तुँ। तूँ जीना चाहता हैं? इतनी मजबूती सें मेरी उंगलियां पकड़रखी हें तूने?"
उसके अंदर कहींकोई दीवार गिररही थि।
आरामसे उसने सिकंदर कों अपने सीने सें लगाया औऱ कांपते हाथों सें उसके मुँह सें कपड़ा हटाया।
"मे तुम्हे दूध नहि पिलाऊंगी। नहि पिलाऊंगी."
मगर अगले हि लम्हा उसकी ममता उसकी नफरत पर्र हावी होँ गई।
अलिना नें रोतेहुए अपने आँचल कों ठीक किया औऱ पहलीबार सिकंदर कों अपनेदूध कां एक् बूंद पिलाया।
उसके आँसू उसके चेहरे सें गिरते रहे, मगर उस छोटे सें बच्चे नें जैसे अपनी मां कि नफरत कों पी लिया होँ।
सिकंदर नें हल्का-सां करवट बदला औऱ धीरे धीरेदूध पीनेलगा। उसकी साँसे अब स्थिर हौ रहीथीं, जैसे वो अलिना केँ सीने सें जुड़कर अपनी ज़िन्दगी कि जंगजीत रहा हौ।
"नफरत करती हूं तुझसे। मगरफिन भि। तुँ मेरी ज़िन्दगी सें जुड़ गय़ा, सिकंदर."
उसरात अलिना नें पहलीबार एक् मां औऱ एक् महिला केँ बीच कि जंग कों महसूस किया।
अलिना नें सिकंदर कों दूध पिलाया थां, मगर उसकादिल अब भि भारी थां। उसके अंदर जोँ नफरतसमय रही थि, वो उस मासूम केँ स्पर्श सें कांपउठी थि। क्याँ वोँ इस नफरत कों ममता मे बदलने देगी? याँ फिनयह बस एक् समय कि कमजोरी थि?
उसके आँसू लगातार गिररहे थें, मगर उसने उन्हें पोंछने कि कोशिश नहि कि। उसकादिल धड़करहा थां, पऱ मन हंगामा मचारहा थां—
"यहवही बच्चा हैं, जौ तेरी जीवन बर्बाद कर देगा। "
"यह वही बच्चा हैं, जोँ तुम्हारी तरफयाद दिलाएगा कि तुझेही केसे धोखा मिला थां। "
"यह तेरा दुश्मन हैं, अलिना। "
मगर उसके सीने सें लगा सिकंदर एक् मासूम जान थां। उसके छोटे-छोटे हाथ उसकी उंगलियों कों पकड़ने कि कोशिश कररहे थें, जैसे वोँ अपनी मम्मी कों अपनी दुनिया बना लेना चाहता हौ।
अलिना नें जल्द सें उसे नर्स कों वापस सौंप दिया।
"इसे लें जाओ। " उसकी आवाज़ मे ठंडापन थां।
"मगरमैम, यह अभि बहोत कमजोर हैं। इसकी मम्मी कों इसकेपास रहना चाहिए। " नर्स नें हिम्मत करकेकहा।
अलिना नें गहरी सांसली औऱ नर्स कों घूरते हुएकहा—
"इसकी मां मर चुकी हैं। "
"मगरमैम."
"मैंने कहा, इसे लें जाओ। "
नर्स घबरा गई औऱ जल्द सें सिकंदर कों लेकरचली गई।
अलिना कि अम्मी नें उसकीओर देखा। उनके चेहरे पऱ नाराजगी, दुःख औऱ दर्द थां।
"तुँ क्यूं इतनी पत्थर दिल होँ गई हैं, अलिना?"
अलिना हँस पड़ी, मगर उसकी हँसी मे दर्द थां।
"पत्थर दिल? अम्मी, मेरी ज़िन्दगी मे जब प्रेम थां, तब आपने मुझेघऱ सें निकाल दिया थां। जब मे गिरी, तोँ कोई नहि थां उठाने वाला। जब मुझे सहारे कि ज़रूरत थि, तब मैंने स्वयं कों संभाला। औऱ अब, जब मे पत्थर बन गई हूं, तोँ आप् पूछरही हें क्यूं?"
उसकी अम्मी कि आँखें भीगगईं।
"बेटा, सिकंदर तेरा बेटा हैं। तुँ चाहे जितना नफरतकर लें, मगर एक् दिन तेरी एहसास होगा कि यह बच्चा तेरीजान हैं."
अलिना नें कोई जवाब नहि दिया। उसने अपना चेहरा दूसरी ओरकर लिया।
मगर सच तौ यह थां कि उसकेदिल मे जोँ जंगचल रही थि, वोँ अभि समाप्त नहि हुई थि।
इसीबीच, सिकंदर कों ICU मे लें जाया गय़ा। वोँ बहोत कमजोर थां। डॉक्टर लगातार उसकी स्थिति कों मॉनिटर कररहे थें।
एक् डॉक्टर नें धीरे-धीरे सें कहा—
"यह बच्चा जिंदा रहने कि पूरी कोशिश कररहा हैं। इसे शायद एहसास हैं कि इसे अपनी मम्मी केँ लिए जीना होगा। "
"मगर अगरइसे मम्मी कां प्रेम नहि मिला, तोँ यह अधिक दिनों तक नहि टिकेगा." दूसरे डॉक्टर नें कहा।
छोटे-छोटे तारों सें जुड़ा हुआ, ऑक्सीजन मास्क सें सांसें लेतेहुए सिकंदर इस दुनिया मे अपनी स्थान बना लेना चाहता थां।
औऱ शायद। किसीदिन वोँ अपनी मां केँ पत्थर दिल कों पिघला देगा।
आईसीयू केँ कमरे मे सन्नाटा थां। मॉनिटर पऱ सिकंदर कि नाज़ुक धड़कनें धीमी होतीजा रहीथीं। डॉक्टरों नें उसे बचाने कि पूरी कोशिश कि, मगर एक् मम्मी केँ दूध केँ बिना वोँ कब तक जिंदा रह सकता थां?
"हम्.हम् उसे नहि बचापाए। " डॉक्टर नें गहरी सांस लेतेहुए कहा।
अलिना केँ परिवार वालों नें एक्-दूसरे कों देखा। उनके चेहरों पऱ दुःख थां, मगर उनकेलिए अलिना ज्यादा अज़ीज़ थि।
अलिना केँ चेहरे पर्र कुछसमय केँ लिए एक् अजीब-सि शांति आई। उसकेदिल मे एक् अजीब-सां चैन उतरा। "खत्म होँ गय़ा सभी। "
मगर अगले हि समय, जैसे हि उसने सिकंदर केँ छोटे-छोटे ठंडे हाथों कों देखा, उसकादिल किसी नें मुट्ठी मे जकड़ लिया।
"सिकंदर.?" उसकी आवाज़ मे कंपन थां।
उसने धीरे-धीरे सें सिकंदर केँ नन्हें बदन कों अपनीगोद मे उठाया। एक् निःशब्द झटका उसकी आत्मा कों लगा।
"चला गय़ा तूँ.?" उसकी आवाज़ कांपरही थि, "जा मेरे शहज़ादे, जा.वहा अ232लाह केँ पास मेरा प्रतीक्षा करना। जब मे आउंगी, फिन मां तेरेपास हमेशा-हमेशा केँ लिए रहेगी."
उसके आँसू सिकंदर कि बंद पलकों पर्र गिररहे थें। उसेलग रहा थां जैसे सिकंदर उससेकुछ कहरहा हौ।
"मां। मे तुम्हारी तरफइस दुनिया सें बचाने आया थां। मैंने अपनी पूरीजान लगा दि मम्मी। ताकि मे तेरे ज़ख्मों पर्र मरहम लगाने केँ क़ाबिल बन सकूँ। पऱ तूने हि मेरेसंग धोखा किया."
अलिना कां पूरा जिस्म सिहरउठा। उसकी सिसकियाँ पूरे कमरे मे गूंजरही थीं।
"तेरा सिकंदर अबहार मानता हैं, मां."
अलिना कि साँसें तेज़ हौ गईं। "नहि, नहि। यहसच नहि हौ सकता!"
वोँ पागलों कि तरह सिकंदर कां चेहरा देखने लगी। अचानक, उसने महसूस किया कि सिकंदर कि पलकों मे हल्की-सि हरकत हुइ।
"डॉक्टर!" वोँ चीख पड़ी, "यह ज़िंदा हैं! सिकंदर ज़िंदा हैं!"
कमरे मे अफरातफरी मच गई। डॉक्टर जल्दी दौड़ पड़े।
"मगर यह केसे हौ सकता हैं?" एक् नर्स नें हैरानी सें कहा।
"ममता। मां कि ममता नें इसे वापस बुला लिया। " डॉक्टर नें गहरी सांस लेतेहुए कहा।
अलिना कि आँखों सें आँसू रुकने कां नाम नहि लेँ रहे थें। अब वोँ हार मानने लगी थि— अपने हि बेटे सें।
अबउसे समझ आँ चुका थां। नफ़रत औऱ दर्द जितना भि गहरा क्यूं नं होँ, ममता हमेशा उससेजीत जाती हैं।
डॉक्टरों कि पूरीटीम दौड़ पड़ी। सिकंदर कों ऑक्सीजन सपोर्ट पर्र डाला गय़ा। उसकी नन्हीं-नन्हीं साँसें अभि भि लड़रही थीं, जैसे किसी नें उसे वापस बुला लिया होँ।
अलिना कि आँखें सिकंदर केँ चेहरे पर्र टिकीथीं। "यह केसे होँ सकता हैं?" उसकादिल ज़ोर-ज़ोर सें धड़करहा थां।
डॉक्टर नें सिकंदर कि जाँच कि औऱ चौंकते हुएकहा, "यह किसी जादू सें कम नहि! बच्चे केँ जिस्म मे अभि भि जान बाकी हैं। जल्द सें इसे आईसीयू मे शिफ्ट करो!"
अलिना वहीं ज़मीन पऱ गिर पड़ी। उसका पूराबदन काँपरहा थां।
"नहि! इसेमर जानां चाहिए थां। यह ज़िंदा क्यूं हैं?" उसकी आवाज़ कांपरही थि, "अ323लाह, तूनेइसे वापस क्यूं भेज दिया?"
मगर उसकी आँखों सें गिरते आँसूकुछ औऱ हि बयांकर रहे थें।
"बेटा। तूने इतनी कोशिश कि जीने कि?"
"तेरी मां हि तेरा क़त्ल करनेचली थि औऱ तुँ फिन भि इस दुनिया मे आनां चाहता थां?"
"क्यूं? आखिर क्यूं सिकंदर?"
उसके अंदर एक् अजीब-सि जंग छिड़ चुकी थि।
उसने सिकंदर कों अपनीगोद मे उठाया। उसकी नन्हीं उंगलियाँ अब भि ठंडीथीं।
"जा मेरे शहज़ादे। अगर तूँ जिंदा रहना चाहता हैं तोँ जी लें। मे तुम्हें अब नहि रोकूंगी। "
उसी वक्त सिकंदर कि हल्की-हल्की साँसे चलने लगीं। नर्सें उसे आईसीयू मे लेकर भागीं।
"अलिना, अब भि वक्त हैं!" उसकी अम्मी नें कहा, "तूँ मम्मी बनजा। सिकंदर तेरा हैं!"
मगर अलिना अभि भि लड़रही थि— अपने अंदर कि नफ़रत सें, अपनी हि ममता सें।
अब प्रश्न यह थां— क्याँ वोँ सच मे सिकंदर कों अपनाने केँ लिए सजधजकर थि?
Mukkader kaa sikander – New Episode
4 सालबीत चुके थें। अलीना अब 22 साल कि होँ गई थि औऱ सिकंदर 4 साल कां। अलीना अबसमझ गई थि कि उसे एक् बच्चे कों पालना हैं। जौ उसके बिना सादी किये उकसेगोद मे आँ गय़ा हैं। समाज केँ तनो सें बचने कां एक् हि तारीका हैं स्वयं कों कामयाब बनाओ। अलीना इस केँ लिएजी तोर मेहनत करनेलगी। औऱ कुछ हि सालो मे वोँ एक् नामी बुल्डर बन चुकी थि.उसके भइया औऱ बाप केँ सपोर्ट नें उसेयहा तक पहुंचाया थां.
अलिना केँ दफ़्तर मे मोबाइल कि घंटीबजी। "हाँ, मे अभि आँ रही हूं। " उसने गुस्से सें कहा औऱ मोबाइल पटक दिया।
वोँ जल्द सें घऱ पहुँची, देखा कि सिकंदर अपने कपड़े पूरे पेंट सें खराबकर चुका थां। रंग-बिरंगे हाथ, चेहरे पऱ भि पेंट केँ निशान। पास हि दीवार पर्र कुछ उल्टा-सीधा बनारखा थां।
अलिना कि आँखों मे क्रोध उमड़ पड़ा। "सिकंदर!" उसकी तेज़ आवाज़ सें पूराघऱ हिल गय़ा।
सिकंदर डरकर कोने मे दुबक गय़ा। "मम्मा, मैंने कुछ नहि किया…"
अलिना गुस्से मे आगे बढ़ी, "यह क्याँ किया तूने?घऱ कों कोई पेंट करता हैं क्याँ?"
सिकंदर कि आँखों मे आँसू आँ गए, "मम्मा, मैंने आपकेलिए हार्ट बनाया थां। आप् कहती हौ नां कि मे आपका शहज़ादा हूं। तौ मैंने लिखा थां 'माई मम्मा, माई क्वीन'."
अलिना ठिठक गई। उसने दीवार पऱ नजर डाली— टेढ़ा-मेढ़ा दिलबना थां, जिस पर्र छोटे-छोटे अक्षरों मे "माई मम्मा, माई क्वीन" लिखा थां।
एक् लम्हा केँ लिए उसकादिल पिघल गय़ा, मगर अगले हि लम्हा वोँ स्वयं कों संभालते हुए बोलीं, "यहसभी बेकार कि बातें मतकर। तूँ दिन-ब-दिन सर पऱ चढ़ता जारहा हैं। जा, मुँहधो औऱ यहसभी साफकर!"
सिकंदर मायूस होँ गय़ा। उसने धीरे-धीरे सें कहा, "मम्मा, आप् मुझसे प्रेम नहि करतीं?"
अलिना नें कोई जवाब नहि दिया। वोँ गुस्से मे थि, मगर उसकेदिल मे कहींकुछ टूटरहा थां।
रात मे जबसभी सो चुके थें, सिकंदर अपने खिलौनों सें खेलरहा थां। तभी अलिना आई औऱ उसेगोद मे उठा लिया।
"मम्मा कों अकेला छोड़ देगा तूँ?"
सिकंदर नें सिर हिलाया, "नहि मम्मा, मे आपकोकभी अकेला नहि छोड़ूँगा। "
अलिना नें उसे सीने सें लगा लिया। "पता नहि तुझसे इतना क्रोध क्यूं आता हैं मुझे."
सिकंदर नें अपनी नन्हीं हथेलियाँ उसकी गालों पर्र रखीं, "मम्मा, जब आप् क्रोध होती हौ, तब भि आप् मुझसे प्रेम करती हौ नाँ?"
अलिना कि आँखों मे नमी आँ गई, मगर उसने जल्द सें उसे छुपा लिया।
"पागल हैं तुँ। सोजाअब!"
सिकंदर मुस्कुराया, "मम्मा, जब मे बड़ा होँ जाऊँगा, तब भि आप् मुझेऐसे हि गोद मे लोगी?"
अलिना नें गहरी साँसली, "अगर तूँ मुझसे दूर गय़ा, तौ तेरी ढूंढकर वापस लाऊँगी। "
सिकंदर हँसते हुए उसकीगोद मे समा गय़ा, औऱ अलिना कों एहसास हुआ कि जितनी नफ़रत वोँ सिकंदर सें जताने कि कोशिश करती थि, उतनी हि गहराई सें वोँ उसे प्रेम भि करती थि।
मगरयह नाता अभि भि अधूरा थां…
अलिना कां रुख़ सिकंदर केँ लिए अजीब थां। एक् समय मे वोँ उसेदूर कर देती, औऱ दूसरे हि लम्हा उसे सीने सें लगा लेती।
एक् दिन सिकंदर खेलने केँ दौरान गिर गय़ा औऱ उसके घुटने छिलगए। जैसे हि वोँ रोतेहुए अलिना केँ पास पहुंचा, उसने गुस्से मे कहा—
"तूँ गिर गय़ा? तोँ क्याँ मे तेरी उठाऊँ? हरसमय कोई तेरी देखभाल नहि करेगा, समझा?"
सिकंदर कि आँखों मे आँसू थें। उसने धीरे-धीरे सें कहा—
"मगर मम्मा, जब आप् रोती हौ, तब मे हमेशा आपकेपास आता हूं। "
अलिना ठिठक गई।
रात कों जबसभी सो चुके थें, तोँ उसने धीरे-धीरे सें सिकंदर केँ पास जाकर देखा। उसका छोटा सां हाथअब भि तकिए पर्र पड़ा थां, जैसे वोँ सोतेहुए भि किसी कों पकड़ने कि कोशिश कररहा होँ।
अलिना केँ दिल मे कुछ चुभा। उसने उसके छोटे सें घुटने पर्र मरहम लगाया औऱ बुदबुदाई—
"पता नहि तुझसे इतना प्रेम भि क्यूं हैं…"
तभी सिकंदर करवट बदलकर उसकीगोद मे समा गय़ा। वोँ आधी नींद मे बुदबुदाया—
"मम्मा, मे अच्छा बच्चा बनूँगा… बस आप् मुझसे प्रेम करनाबंद मत करना…"
अलिना कि आँखों मे आँसू आँ गए। उसने उसकीपीठ सहलाई औऱ स्वयं सें कहा—
"सिकंदर, तूँ नहि जानता… मुझे स्वयं नहि पता कि तुम को प्रेम करूँ याँ तुझसे दूर भागूँ…"
पर्र एक् बात तोँ साफ थि— वोँ सिकंदर केँ बिनाजी नहि सकती थि।
ऐसे हि दिन गुजरता जारहा थां। एक् दिन
अलिना अपने कमरे मे तकिए मे मुँह छुपाए रोरही थि। आज उसकेहाथ सें एक् बहोत बड़ा टेंडर निकल गय़ा थां। उसके अब्बू-अम्मी पहले हि गुस्से मे थें, औऱ अब भइया भि नाराज़ थां। सबकी बातें उसे अंदर तक चुभरही थीं।
तभी दरवाज़े केँ पास हल्की हलचल हुईँ। छोटे-छोटे कदमों कि आवाज़ आई औऱ एक् नन्हा सां जिस्म अलिना केँ बैड पर्र चढ़आया।
सिकंदर (मासूमियत सें) – "मम्मा, तुम् रोरही होँ?"
अलिना (आँसू पोंछते हुए, गुस्से मे) – "नहि, धूलचली गई आँख मे!"
सिकंदर (हाथ जोड़कर) – "अल्#लाह जी सें बोलूँ? वोँ पंखाबंद कर देंगे!"
अलिना (झुंझलाकर) – "पंखे सें धूल नहि आई, मेरे नसीब मे धूल थि!"
सिकंदर (सोचते हुए) – "ओह! तोँ अब्बू-अम्मी नें तुम्हें भि ज़मीन पऱ घुटनों केँ बल चलाया क्याँ?"
अलिना नें आँसू पोंछते हुएउसे घूरा। सिकंदर झट सें उसके आँसू देखकर स्वयं भि मुँह फुलाकर रोनेलगा।
अलिना (चौंककर) – "अब तुम्हें क्याँ हुआ?"
सिकंदर (सुबकते हुए) – "तुम् रोरही होँ नां? तौ मुझे भि रोना चाहिए! टीम वर्क मम्मा!"
उसने सिकंदर कों गोद मे घसीटकर कसकरगले लगा लिया।
अलिना (हल्की मुस्कान केँ संग) – "पगले, रोने सें कुछ नहि होता। "
सिकंदर (नाक सुड़कते हुए) – "अच्छा? फिन तुम् क्यूं रोरही थि?"
अलिना कों जवाब नहि सूझा। उसने धीरे-धीरे सें सिकंदर केँ बालों मे उंगलियाँ फेरीं औऱ कहा—
"क्योंकि कभी-कभी, जबदिल बहोत भारी हौ जाता हैं, तौ उसे हल्का करने केँ लिए रोना पड़ता हैं। "
सिकंदर (मासूमियत सें) – "तौ फिन तुम् हँस क्यूं नहि देती? हँसने सें भि दिल हल्का होँ जाता हैं!"
अलिना नें पहलीबार दिल सें हँसी। इस नन्हे सें बच्चे नें उससे अधिक ज़िंदगी समझली थि। उसने सिकंदर केँ गाल खींचते हुएकहा—
"अगर तुँ मेरेसंग हैं नाँ, तोँ मुझे रोने कि ज़रूरत नहि पड़ेगी। "
सिकंदर (चमकती आँखों सें) – "तौ फिन हमेशा मेरेसंग रहो नाँ, मम्मा!"
रात केँ उस अंधेरे मे, जब सारी दुनिया सोरही थि, अलिना औऱ सिकंदर कि दुनिया बस एक्-दूसरे केँ आसपास सिमट गई थि।
अलिना नें सिकंदर कों अपने सीने सें लगाया, उसकी नन्हीं उंगलियाँ उसके गालों पर्र फिनरही थीं, जैसे वोँ उसकी उदासी कों पोंछ देना चाहता हौ।
सिकंदर (मासूमियत सें) – "मम्मा, क्याँ तुम् हमेशा ऐसे हि रोती हौ जबकोई तुम्हें डाँटता हैं?"
अलिना (हल्की मुस्कान केँ संग) – "नहि, बस कभी-कभी, जबदिल बहोत दुखी होता हैं। "
सिकंदर (सोचते हुए) – "फिनजब मे बड़ा हौ जाऊँगा औऱ कोई मुझे डाँटेगा, तौ मे भि रोऊँगा?"
अलिना (चौंककर) – "नहि! मेरा बेटा कभी नहि रोएगा!"
सिकंदर (आँखें बड़ी करतेहुए) – "तोँ फिन तुम् क्यूं रोरही थि?"
अलिना कों कोई जवाब नहि सूझा। वो केवलउसे देखती रही। ये चारसाल कां बच्चा हरबार उसे उसकी हि बातों मे फँसा देता थां।
सिकंदर (शरारती अंदाज़ मे) – "मम्मा, तुम् बहोत गड़बड़ हौ!"
अलिना (भौंहें उठाकर) – "अच्छा? औऱ तूँ क्याँ हैं?"
सिकंदर (गर्व सें) – "मे सुपरहीरो हूं! जब तुम् रोती हौ, तौ मे तुम्हें हँसाने केँ लिएआता हूं!"
अलिना नें सिकंदर कों कसकरगले लगा लिया।
अलिना (मुस्कुराते हुए) – "तुँ सच मे मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं, सिकंदर!"
सिकंदर (छाती चौड़ी करके) – "औऱ सबसे बड़ासर दर्द भि!"
अलिना हँसते-हँसते खाट पऱ गिर पड़ी औऱ सिकंदर उसकेऊपर चढ़कर खिलखिलाने लगा। उस रात, उसकी दुनिया केँ सारे दर्द सिकंदर कि हंसी मे घुलगए थें।
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सर्दियों कि वोँ साम, जब अलीना अपनेनए बिज़नेस प्रोजेक्ट केँ सिलसिले मे होटल केँ आलीशान कॉन्फ्रेंस हॉल मे दाखिल हुई, तौ वहा कि रॉयल शानो-शौकत नें उसेकुछ सेकंड केँ लिएरोक दिया।
उसकी मुलाकात आज एक् बहोत बड़े इन्वेस्टर सें होने वाली थि— नवाब शेरज़ादा मीरहसन।
हॉल केँ एक् कोने मे, सिल्क केँ शेरवानी औऱ काली पगड़ी मे बैठे नवाबमीर हसन कि पर्सनैलिटी किसीशेर सें कम नहि थि। गहरी आँखें, घनी दाढ़ी औऱ एक् ऐसा रुतबा कि पूरेहॉल मे सन्नाटा छा गय़ा थां। जैसे हि अलीना उनके लगभग पहुँची, उन्होंने नज़र उठाकर उसकीओर देखा।
मीर हसन (गहरी आवाज़ मे) – "तोँ आप् हें मिस अलीना शाह?"
अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ मे) – "जी, औऱ आप् नवाबमीर हसन। बहोत सुना हैं आपके बारे मे। "
मीरहसन (हल्की मुस्कान केँ संग) – "औऱ मैंने भि। आप् जिस तेज़ी सें बिज़नेस कि दुनिया मे नामकमा रही हें, वो काबिल-ए-तारीफ हैं। पर्र आप् जितनी हसीन हें, उससे कहीं अधिक खतरनाक भि लगती हें। "
अलीना (हैरान होतेहुए) – "खतरनाक?"
मीरहसन (हल्का हँसते हुए) – "हाँ, क्योंकि जिस स्त्री मे इतनी हिम्मत हौ कि वोँ अकेले हि अपनी दुनिया बनासके, वोँ किसी तूफान सें कम नहि हौ सकती। "
अलीना उसकी बातों सें ज़रा असहज होँ गई, पर्र उसने स्वयं कों संयम मे रखा।
अलीना (मुस्कान दबाकर) – "मे यहा बिज़नेस कि बात करनेआई हूं, नवाब साहब। तारीफें सुनने कि आदत नहि हैं मुझे। "
मीर हसन (गंभीरता सें) – "औऱ मे सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों कि तारीफ करता हूं, जोँ तारीफ केँ लायक होती हें। "
दोनों कि नज़रें टकराईं, जैसे एक् शेरनी औऱ एक् शेर आमने-सामने खड़ेहों। हॉल मे मौजूद सबलोग इस टकराव कों महसूस कर सकते थें।
मीरहसन (धीरे-धीरे सें झुककर) – "ख़ैर, बिज़नेस कि बात करते हें। मुझे आपका प्रोजेक्ट मनपसंद आया, मगर मे किसीऐसे इंसान पऱ भरोसा नहि करता, जिसे मे ठीक सें जानता नं हूं। "
अलीना (मजबूत लहजे मे) – "तौ फिन केसे भरोसा करेंगे?"
मीरहसन (हल्की मुस्कान केँ संग) – "जब आप् मेरेसंग एक् डिनर करेंगी औऱ मुझे अपनी स्टोरी सुनाएंगी। "
अलीना कुछदेर तक सोचती रही। ये व्यक्ति नं सिर्फ़ रुतबे वाला थां, बल्कि उसकी पर्सनैलिटी भि किसी पहेली सें कम नहि थि। उसे पहलीबार किसी सें इसतरह केँ सवालों कां सामना करनापड़ रहा थां।
अलीना (गहरी साँस लेतेहुए) – "अगर मेरेकाम केँ लिए ज़रूरी हैं, तोँ ठीक हैं। "
मीरहसन (आँखों मे चमक केँ संग) – "तौ फिनये एक् डील समझिए। "
घऱ पहुंचते हि उसकी आँखे सिकंदर कों ढूंढने लगी सिकंदर आमतोर पऱ उसे बाहर् हींखरा मिलता थां। वोँ अलीना केँ आने कां इंतज़ार करता रहता थां। पर्र आज सिकंदर कों नां देखकर वोँ चिढ़चड़ी होनेलगी.
अलीना( भोये चढ़ाते हुवे )- सिकंदर कहां हैं.
नौकरानी- बीबी साहिबा। छोटे साहबछत पर्र पतंगउड़ा रहे हैं.
अलीना कां चेहरा गुस्से सें तमतमाया हुआ थां। जैसे हि उसने सुना कि सिकंदर छत पर्र पतंग उड़ारहा हैं, उसका पारा औऱ चढ़ गय़ा। उसे क्रोध इसबात पर्र नहि थां कि वोँ अब तक खेलरहा थां, बल्कि इसबात पऱ थां कि वोँ घऱआते हि सबसे पहले सिकंदर कों क्यूं नहि देखपाई!
तेज़ कदमों सें सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसनेछत कां द्वार (दरवाज़ा) ज़ोर सें खोला। सिकंदर, जौ अपनी पतंग कि डोर कों ऊँचाई तक लेँ जाने मे मग्न थां, अचानक झटके सें पलटा। उसकी आँखें चमकरही थीं, बाल बिखरे हुए थें औऱ हाथ मे पतंग कि डोर थि।
अलीना (गुस्से सें चिल्लाते हुए) – “सिकंदर! तूँ यहा क्याँ कररहा हैं? रात केँ इसपहर पतंग उड़ारहा हैं?”
सिकंदर समझ गय़ा कि उसकी शामत आँ चुकी हैं। उसने धीरे-धीरे सें पीछे हटने कि कोशिश कि, मगरतब तक अलीना उसके लगभग पहुँच चुकी थि। उसने वहींरखी पतली छड़ी उठाई औऱ सिकंदर केँ हाथ पऱ मार दि।
सिकंदर (रोतेहुए भागता हुआ) – "अम्मी मत मारो! अम्मी बस एक् औऱ पतंग उड़ानी थि!"
अलीना (गुस्से सें डाँटते हुए) – "तुम्हारी तरफसमझ नहि आता?जब मे घऱआती हूं, तौ सबसे पहले तेरा चेहरा देख्ना चाहती हूं! औऱ तूँ यहा पतंगों मे मस्त हैं! तुम्हे मेरी ज़रा भि परवाह नहि हैं?"
सिकंदर आँखों मे आँसूलिए छत केँ दूसरे कोने कि तरफ भागा।
सिकंदर (हकलाते हुए) – "मां, मैंने सोचा थां आप् बिज़नेस कि मीटिंग सें थक गई होंगी। इसलिये मैंने आपको डिस्टर्ब नहि किया। "
अलीना (गुस्से मे, छड़ी पटकते हुए) – "बहाने मतबना! अगर मे कहरही हूं कि तुम्हें सबसे पहले मेरेपास आनां चाहिए, तौ इसका मतलबयही हैं!"
सिकंदर औऱ तेज़ रोनेलगा।
सिकंदर (गिड़गिड़ाते हुए) – "माँ, बस एक् पतंग! एक् अंतिम पतंग काटनी थि!"
अलीना गुस्से सें भरी हुईँ थि, मगर जैसे हि उसने सिकंदर केँ चेहरे कों देखा, कुछ अजीब सां महसूस हुआ। उसकी छोटी-छोटी आँखों मे आँसू थें, होंठ काँपरहे थें, औऱ वोँ डर सें सहमाहुआ थां। अलीना कां दिल अचानक पिघलने लगा।
उसका क्रोध एक् लम्हा मे हवा हौ गय़ा औऱ उसके भीतर एक् अलग हि एहसास दौड़ पड़ा—यह कैसा पागलपन थां उसका? पहले क्रोध, फिन प्रेम। फिन क्रोध, फिन प्रेम.
उसने छड़ीदूर फेंकी औऱ सिकंदर केँ पासआकर उसे अपनी बाहों मे भींच लिया।
अलीना (धीमे स्वर मे) – "तूँ जानता हैं नां, मे तुझसे बहोत प्रेम करती हूं?"
सिकंदर (सिसकते हुए) – "मगर आप् मुझे बहोत मारती भि होँ मां."
अलीना हल्का सां हँसी औऱ उसकेसिर पऱ प्रेम सें हाथ फेरा।
अलीना (मुस्कराते हुए) – "मार इसलिये खाता हैं क्योंकि तुँ बहोत ज़िद्दी हैं। औऱ तुम कोपता हैं, तेरा मेरी नज़रों सें दूर होना मुझे मनपसंद नहि। "
सिकंदर अपनी मां केँ सीने मे मुँह छुपा लेता हैं औऱ मासूमियत सें कहता हैं –
सिकंदर (धीमे सें) – "माँ, मे फिन भि पतंग उड़ाऊँगा!"
अलीना फिन गुस्से सें उसे देखती हैं, मगर अगले हि लम्हा उसकागाल पकड़कर हल्के सें खींच देती हैं।
अलीना (हँसते हुए) – "अगरफिन उड़ाई, तोँ छत सें नीचे फेंक दूँगी तुम्हारी तरफ!"
सिकंदर उसकी बाहों मे छुपकर हँसने लगता हैं, औऱ अलीना स्वयं भि समझ नहि पाती कि यह क्रोध हैं याँ बेइंतेहा मुहब्बत.
खेर डिनर कि रात आँ गई.
रात कां माहौल बेहद शानदार थां। आलीशान रेस्तरां केँ चारों ओर मोमबत्तियों कि हल्की रोशनी थि, औऱ बैकग्राउंड मे धीमी-धीमी सुरमई धुनबज रही थि। अलीना एक् हसीन कालेरंग कि गाउन मे थि, जिसने उसकी हुस्न कों औऱ भि निखार दिया थां। वहीं, हसन मिर्ज़ा अपनी रौबदार पर्सनैलिटी केँ संग बैठे थें—एक् हैंडसम, चार्मिंग नवाब, जिनकी आँखों मे गहरी कहानियाँ छुपीथीं।
डिनर केँ दौरान, हसन मिर्ज़ा नें अचानक मुस्कराते हुएकहा—
हसन (हल्की मुस्कान केँ संग) – "अलीना, इतनी हसीनरात मे मात्र बातें करना तोँ नाइंसाफी होगी। मे चाहता हूं कि तुम् मेरेसंग एक् डांसकरो। "
अलीना (चौंककर, हल्का हँसते हुए) – "मे। मे डांस नहि करती। "
हसन (आँखों मे शरारत केँ संग) – "ओह, ये तौ बड़ा अन्याय हुआ! इतनी हसीन महिला, औऱ डांस सें डरती हैं?"
अलीना (मुस्कराते हुए) – "डरती नहि, बस.आदत नहि हैं। "
हसन (हल्के सें झुकते हुए, हाथ आगे बढ़ाते हुए) – "तोँ फिनआदत डालनी पड़ेगी। मे नवाब हूं, हुक्म देना मेराकाम हैं। औऱ आज मेरा हुक्म हैं—डांस!"
अलीना नें कुछ लम्हा उसे देखा, फिन हल्की मुस्कान केँ संग उसकाहाथ थाम लिया। हसन उसे धीरे धीरे डांस फ्लोर कि ओर लेँ गय़ा।
धीमी रोशनी मे, म्यूज़िक कि मधुरधुन पऱ दोनों थिरकने लगे।
हसन (उसकीकमर पऱ हाथ रखतेहुए, धीमे स्वर मे) – "तुम्हें शायदपता नहि, मगर तुम्हारी आँखें किसी कों भि मदहोश करने केँ लिए बहुत हें। "
अलीना (हल्का हँसते हुए) – "ओह! तोँ आप् flirting भि कर सकते हें?"
हसन (गहरी मुस्कान केँ संग) – "नवाब कि जबान सें निकले शब्द फ़्लर्ट नहि, शायरी कहलाते हें। "
अलीना हल्का सां मुस्करा दि, मगरतभी हसन कि आँखों मे एक् गहरी उदासी झलक पड़ी।
अलीना (नरम आवाज़ मे) – "क्याँ हुआ?"
हसन (थोडा रुककर, फिन धीमी आवाज़ मे) – "आज सें कुछसाल पहले, इसी तरह मैंने अपनी पत्नि कां हाथ थामा थां। वो मेरीजान थि…मगर अब वोँ इस दुनिया मे नहि रही। "
अलीना (हैरानी सें) – "ओह। मुझे अफ़सोस हैं। "
हसन (हल्की मुस्कान केँ संग, मगर दर्द छुपाते हुए) – "ज़िंदगी किसी केँ बिना नहि रुकती, मगरकुछ रिश्ते ऐसे होते हें जौ भुलाए नहि जा सकते। "
अलीना (धीमे स्वर मे) – "आप् उससे बहोत प्रेम करते थें, हैं नां?"
हसन (गहरी नज़रें अलीना पर्र डालते हुए) – "हाँ, शायद उतना हि, जितना कोई अपनी सांसों सें करता हैं। मगर जानते हौ अलीना, जबकोई बिछड़ जाता हैं, तोँ उसकी यादें एक् साए कि तरह हमारे संग रहती हें.औऱ कभी-कभी वोँ साया किसी औऱ कि मुस्कान मे भि दिखने लगता हैं। "
अलीना उसकी गहरी नज़रों कों पढ़ने कि कोशिश करनेलगी, मगर वो जल्दी अपनी नजरें झुका गई।
अलीना (हल्के सें हँसते हुए, माहौल हल्का करतेहुए) – "अगर आपकी पत्नि नें आपको इतना रोमांटिक देखा होता, तौ शायद वोँ भि आपसे औऱ अधिक प्रेम करने लगती। "
हसन (मुस्कुराते हुए, धीरे-धीरे सें उसकी उंगलियों कों छूतेहुए) – "शायद.मगर अगर वोँ यहा होती, तोँ मुझे तुम्हारे संग डांस करने कि इजाज़त कभी नं देती। "
अलीना हल्के सें हँस दि, मगर उसकेदिल मे कहीं नं कहींहसन केँ लिए सहानुभूति जागउठी थि। उसे पहलीबार लगा कि इस नवाब कि रौबदार पर्सनैलिटी केँ पीछे एक् टूटाहुआ दिल भि छुपा हैं…
आरामसे, अलीना औऱ हसन कि नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं। अक्सर दोनों कों बड़े बिज़नेस इवेंट्स मे संग देखा जाता। कभी किसी रेस्तरां मे, तौ कभी किसी आलीशान महल मे होने वाली पार्टियों मे—हर स्थान उनके रिश्ते केँ चर्चे होनेलगे थें।
सुभह कि ताज़ा अख़बार मे एक् हेडलाइन छपी:
"नवाबहसन मिर्ज़ा औऱ बिज़नेस टायकून अलीना—क्याँ यह नाता महज़ बिज़नेस पार्टनरशिप हैं याँ कुछ औऱ?"
अलीना नें अख़बार कि यह लाइनें पढ़कर हल्की मुस्कान दि। उसे महसूस होनेलगा थां कि उसकी ज़िंदगी मे फिन सें ख़ुशियाँ दस्तक देनेलगी हें।
हसन कां न्योता
एक् दिनहसन नें अलीना कों अपनेमहल मे आमंत्रित किया।
हसन (मुस्कुराते हुए) – "आज तुम्हें किसी ख़ास शख़्स सें मिलवाना हैं। "
अलीना (हैरानी सें) – "कौन?"
हसन (हल्के सें मुस्कराकर) – "मेरे बेटे सें। "
अलीना (थोडा चौंकते हुए) – "तुम्हारा बेटा?"
हसन (गर्व सें) – "हाँ, शाहबाज़ मिर्ज़ा। "
महल मे दाखिल होते हि, अलीना कि नज़र शाहबाज़ मिर्ज़ा पऱ पड़ी—एक् 22 साल कां नौजवान, लंबा, बेहद रौबदार औऱ आकर्षक। उसके चेहरे पऱ वही नवाबी ठसक थि, जोँ उसके पिता मे थि।
शाहबाज़ (हसन सें, हल्के मज़ाकिया लहज़े मे) – "अब्बा, यहकौन हें जिनके लिए आप् इतने बेचैन थें?"
हसन (मुस्कुराते हुए) – "अलीना, मेरी बहोत खास मित्र। "
शाहबाज़ (अलीना कों देखता हुआ, हल्के सें मुस्कुराकर) – "तौ आप् हि हें, जिनकी तस्वीरें अब्बू केँ संगहर अख़बार मे छपरही हें?"
अलीना उसकी बेबाकी पऱ हल्का सां हंस पड़ी।
अलीना (शरारत सें) – "औऱ तुम् हि वोँ बेटे हौ, जिसकी तारीफ हसन मिर्ज़ा करते नहि थकते?"
शाहबाज़ (हंसते हुए) – "लगता हैं अब्बा नें आपको मेरी अच्छाइयाँ हि बताई हें, बुराइयाँ नहि। "
हसन (गंभीर लहज़े मे) – "क्योंकि बुराइयाँ तुम्हारे अंदर हें हि नहि, शाहबाज़!"
शाहबाज़ नें हल्की मुस्कान दि औऱ फिन अलीना सें बोला—
शाहबाज़ (मज़ाकिया अंदाज़ मे) – "वैसे, अगर आप् अब्बू कि जीवन मे आँ रही हें, तोँ एक् शर्त हैं। "
अलीना (हैरानी सें) – "क्याँ?"
शाहबाज़ (हंसते हुए) – "आपको मुझसे भि दोस्ती करनी होगी!"
अलीना हंस पड़ी, औऱ हसन मिर्ज़ा अपने बेटे कों गर्व सें देखने लगे।
उस साम, हसन मिर्ज़ा नें अलीना कों अपने हसीन बागीचे मे लें जाकरकहा—
हसन (गंभीर होतेहुए) – "अलीना, मे जानता हूं कि तुमने बहोत कुछसहा हैं…मगर क्याँ अब अपनी ज़िंदगी कों एक् नया मौका दोगी?"
अलीना (धीमे स्वर मे) – "मौका…कैसा मौका?"
हसन (गहरी नज़रों सें देखते हुए) – "ख़ुश रहने कां। प्रेम करने कां। फिन सें जीने कां। "
अलीना नें कोई जवाब नहि दिया, मगर पहलीबार उसे एहसास हुआ कि ज़िंदगी अबउसे दूसरा मौकादे रही हैं…
Mukkader kaa sikander - Next part miss mat karna
dher dhre kahani apne origenal plot per aayege. muze waqt chahye plot bildupp k liyee. yeh kahani mere pichle dono kahani say bheter hoge. yeh maira manna h
भइया शुरुवात तोँ बेहतर मगर किस्सा कों लेकरकुछ संशय हैं, क्याँ आपको PM कर सकता हूं इसे लेकर ?
क्याँ पूछना हैं. तुम् पूछ सकते होँ यार. पर्र वोँ कहानी सें रिलेटेड हनी चाहिए
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