छोटी-छोटी रसीली कहानियां, Total 18 stories Complete - desi kamuk kahaniyan – New Episode
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मुझमें बेसब्री कां आलमछा चुका थां। मैंने उसका पजामा भि उतार फेंका औऱ उसके कच्छे कों भि नीचे सरका दिया। उसका कालानाग लटकरहा थां। मैंने उसे अपने मुँह मे भर लिया औऱ ऐसा करतेहुए मैंने अपनी सलवार भि उतार फेंकी।
ये देखकर कालू बड़ाखुश होँ गय़ा औऱ बोला- “देखा मेरी गुड़िया। कहा थां नाँ मैंने कि एक् दिन तुँ स्वयं हि मुझे अपनी लेने केँ लिए कहेगी…”
मेरे मुँह सें भि अचानक हि निकल पड़ा- “कालू… अट्ठारह सावनपार कर चुकी हूं, औऱ तूने जौ आग कि चिंगारी महीने भर पहले लगाई थि वोँ अब शोले कां रूप लेँ चुकी हैं…”
इतना सुनते हि वोँ बड़ेजोश मे आँ गय़ा औऱ उसने मेरी ब्रा कां हुक खोलते हुएकहा- “गुड़िया रानी…देख तेरेदूध कितने बड़े हौ गए हें। जब पहलीबार पकड़ा थां, तब अनार थें औऱ आज मुलायम आमबन चुके हें…”
मे तोँ अपनेहोश खो हि चुकी थि। सो मैंने उसकेसर कों दबाकर अपने मम्मे उसके मुँह केँ हवाले करदिए। वोँ एक् हाथ सें मेरे बाएँ मम्मे कों मसलने लगा औऱ दायें वाले मम्मे कों मुँह मे लेकर चूसने लगा। मेरे सें अबरह पाना मुश्किल हौ रहा थां। मैंने उसके लौड़े कों पकड़ लिया औऱ तेज़-तेज़ सें हिलाने लगी। उसने मेरे चूचुक चूस-चूसकर खड़ेकर दिए थें।
मैंने भि उसके लौड़े कों झुककर अपने मुँह मे भर लिया औऱ चूसने लगी। मैंने उससेकहा- “कालू, तुँ तौ बाहर् मजे लेता रहता हैं, तेरी घरवाली कां क्याँ होता होगा? बेचारी…”
वो बोला- “उसका क्याँ हैं? रात कों चढ़वा लेती हैं मुझे अपनेऊपर। अँधेरे मे हि घुसवा लेती हैं औऱ पानी निकाल देती हैं…”
कालू नें मुझे अपनी बाहों मे उठाया औऱ खाट पर्र पटक दिया। अब वोँ मेरेऊपर चढ़ गय़ा औऱ मैंने भि अपनीराह साफ करने केँ लिए स्वयं हि अपनी टाँगें फैला दि। आग दोनों हि तरफलगी हुइ थि औऱ किसी केँ लिए भि अबदेर करना संभव नहि थां।
उसने अपने लौड़े कों मेरी टांगों केँ बीच मे रखकर एक् जोरदार झटका दिया। बुर तंग होने केँ कारण उसका लौड़ा मेरी बुर मे फँस गय़ा। मुझे बहोत तेज दर्द हौ रहा थां। मगर मैंने तोँ आज किलाफतह करने कि सोचरखी थि। इसलिये मैंने चादर कों जोर सें पकड़रखा थां औऱ मेरे होंठ मेरे दांतों केँ तलेदबे हुए थें। अपनी पीड़ा कों सहन करने कि मुझे ख़्वाहिश शक्ति आँ गई थि औऱ इसलिये मैंने उसे नहि रोका। उसने 2-3 जोरदार झटके लगाये औऱ उसका लण्ड मेरी बुर कों चीरता हुआ पूरा मेरे अन्दर चला गय़ा।
वोँ खुश होतेहुए बोला- “लगता हैं गुड़िया रानी नें आज पूरा लेने कां मन बनाया थां…”
मैंने कहा-“हाँ मेरे कालू…आज तोँ मे पूरी होँ जानां चाहती थि…”
ये सुनते हि उसमें घोड़े जैसाजोश भर गय़ा औऱ वोँ तेजी सें अपनीकमर चलाते हुए मुझे पेलने लगा। धीरे धीरे मेरा दर्द रफू-चक्कर हौ गय़ा औऱ मुझे मज़ाआने लगा। मेरे चूतड़ उठनेलगे औऱ मेरेमुख सें सिसकारियां छूटने लगी। मेरेमुख सें स्वयं हि निकल पड़ा- “कालू औऱ कर… तेज़-तेज़ सें कर… मुझेआज मुझे कच्ची कली सें खिलाहुआ फूलबना दे…”
कालू मखमल जैसीकली कों चोदरहा थां औऱ बहोत खुश थां। वोँ बोला-“चल घोड़ी बनाकर लेता हूं तेरीअब…”
मैंने पूछा- वोँ केसे?
वोँ बोला- तूँ घुटनों केँ बलबैठ केँ झुककर घोड़ी बनजा।
मे उसके बताये अनुसार घोड़ी बन गई औऱ उसने मेरे पीछेआते हुए अपना लौड़ा मेरी बुर मे पीछे सें घुसा दिया। मेरे मम्मे नीचे लटकने लगे थें औऱ उसके धक्कों कि ताल पऱ ताल बजाकर नाचरहे थें। उसनेझुक कर मेरे बूब्ज़ कों पकड़ लिया औऱ उन्हें रगड़-रगड़कर मजे लेनेलगा।
मे- “हायरे रे मेरे कालू… औऱ रगड़ मेरी स्तन कों, बहोत सुखमिल रहा हैं रे। चोद मुझे औऱ तेज़-तेज़ सें चोद…”
अब कालू ज़ोर-ज़ोर सें अपनीकमर हिलाने लगा औऱ मुझे चोदने लगा। जब वोँ झटके लगाने केँ लिए अपना लौड़ा मेरी बुर सें निकालता तोँ मे भि अपनी गाण्ड पीछे धकेलती ताकी रगड़ मेरी बुर पऱ जोर सें लगे औऱ पूरा लौड़ा मेरी बुर मे समाजाए।
कालू बोला- “सालीऐसा लगता हैं कि तुँ अब जहाजी बनने वाली हैं…”
मैंने उससे पूछा- क्याँ मतलब हैं तेरा?
उसने मुझे उत्तर दिया- “मेरा मतलबये कि तुँ एक् लौड़े सें शांत नहि रहने वाली। तेरे अन्दर कि येआग एक् लण्ड सें शांत नहि होने वाली मेरी गुड़िया रानी…”
मैंने कहा-“हाय रे कालू… तुम्हे केसे बताऊँ कि मुझे कैसासुख मिलरहा हैं तेरी चुदाई मे, बयान नहि करपारही मे। औऱ इसलिये तोँ गाण्ड धकेल-धकेल कर मज़ा लें रही हूं…”
वोँ अपने लण्ड कों एक् बारफिन सें जड़ तक पेलते हुए बोला- “साली, पहली चुदाई मे इतनी उतावली होँ रही हैं तूँ… तुँ तोँ पक्का जुगाड़ बनेगी लड़कों केँ लिए…”
मुझे उसके मुँह सें यहसभी बातें बड़ी अच्छी लगरही थि। मेरेमुख सें ठंडीअहह सि निकली औऱ मैंने उससेकहा- “अहह…चोद मुझे, औऱ चोद…मार मेरी… लेताजा मेरी चूत… मेरी बुर कों फाड़ केँ रखदेरे मेरे काले… तेरा घंटा बहोत ज़ालिम हैं रे काले…”
कालूजोश मे भर केँ मेरे मम्मे मसलते हुए बोला- “क्या बात है मेरीजान… मम्मी औऱ चाची सें चारकदम आगे हैं तुँ…”
थोड़ी देर मे मेरा जिस्म अकड़ने लगा औऱ फिन एक् जोर कां ज्वालामुखी मेरी बुर मे छूट पड़ा औऱ गर्म-गर्म लावा मेरी बुर मे निकल पड़ा। दोनों शरीरों सें निकले लावा नें हम् दोनों कों तृप्त कर दिया थां। जब उसने मुझे छोड़ा तौ हम् दोनों हांफने लगे थें। कुछदेर चित्त लेटने केँ बाद हम् दोनों नें कपड़े पहने औऱ वोँ घऱ सें बाहर् निकल गय़ा।
एक् अलग सां स्वाद वोँ मेरे जिंदगी मे छोड़ गय़ा औऱ मेरे चेहरे पऱ संतुष्टि झलकरही थि।
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***** अगलेभाग मे ख़त्म *****
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आप् सब तौ जानते हि हें कि कालू केँ संग मेरे शारीरिक संपर्क बन चुके थें औऱ हम् जब मौका मिलता मस्ती केँ सागर मे डूब जाते थें। तोँ इसी चक्कर मे एक् बार कालू नें मुझे मोटरघऱ मे पकड़ लिया औऱ हम् दोनों कि गर्मी नें अपनारंग दिखाना शुरुआत कर दिया। हमेंकुछ नहि मालूम थां, बस उसका काला लौड़ा मेरी बुर कों हलाल करने मे लगा थां।
जब हम् अलग होकरहोश मे आये तोँ सामने शंकर कों देखकर हमारे चेहरे पऱ तोते उड़ने लगे। मे सम्पूर्ण नंगी थि, एक् भि कपड़ा तन पऱ नहि थां। जल्द सें मैंने अपने हाथों सें अपनी बुर कों छुपाने कि कोशिश कि औऱ जब मैंने अपनी सलवार घसीटकर बुर कों ढकने कि कोशिश कि तोँ मेरे मम्मे दिखने लगे।
शंकर बोला-“वाउ मेम साहब, इस कालू कि पाँचों उँगलियां घी मे रहती हें…”
मे सलवार सीधी करके पहनने लगी तौ उसने मुझेरोक दिया।
मैंने उससे गुस्से मे कहा- “शंकर…जाओ यहा सें…”
वो अपने लण्ड कों अपने लुंगी केँ ऊपर सें हि मसलते हुए बोला- “हमें स्वाद नहि लेने दोगी जवानी कां गुड़िया रानी…”
“मे रंडी नहि हूं जोँ हर किसी सें करवाऊँ…” मे गुस्से मे लालहुए जारही थि।
ये सुनकर वोँ मेरी बाहें पकड़कर मुझे करीब-करीब खींचते हुए बोला- “साली रंडी सें कम भि नहि हैं तुँ। एक् शादीशुदा नौकर केँ संग रंगरलियां मनाते वक्तयाद नहि आया कि रंडी क्याँ होती हैं…”
कालू नें अपने कपड़े ठीक किये औऱ धीरे-धीरे सें निकल गय़ा। शंकर नें आगे बढ़कर मुझे अपनी बाहों मे दबोच लिया औऱ पागलों कि तरह मुझे चूमने लगा। मे उसका विरोध करनाचाह रही थि मगर मुझे अपनेभेद केँ खुल जाने कां डर थां। मेरे स्तन कों ऊपर सें हि दबाते हुए वोँ बोला- “गुड़िया… बचपन सें देखा हैं तुम को। बिल्कुल अपनी मां पर्र गई हैं…”
“शंकरमन मत खराबकर औऱ मुझे छोड़दे…” मैंने उससे विनती कि।
मगर वोँ कहां मानने वाला थां। उसने जल्द सें मुझे लिटाया औऱ जबरदस्ती मुझे मसलने लगा। वो मेरे मम्मे दबाने लगा औऱ फिन उन्हें अपने मुँह मे डालकर चूसने लगा। उसने अपनी लुंगी उतारकर अपना लौड़ा निकाला औऱ मेरी जांघों मे घुसाने लगा। उसने मेरी दोनों टांगें फैला दि औऱ मेरी बुर पऱ थूक लगाया। उसके लौड़े कों अभि तक मे देख भि नहि पाई थि। जब उसने अपना लौड़ा मेरी बुर पर्र सटाकर एक् झटका दियातब मुझेपता चला कि उसका लौड़ा कितना तगड़ा हैं।
मे छटपटाने लगी। कितना बड़ा औऱ कितना मोटा लौड़ा होगा उसकाये सोचकर मेरीजान निकलरही थि। उसने नाँ तोँ मेरी बुर चाटी औऱ नां हि मेरे होंठ चूमेबस देसी लौंडे कि तरह अपनाकाम निकाल रहा थां वोँ। वोँ तोँ बस अपने लौड़े कों बुर मे डालकर अपनाकाम निकाल रहा थां, किलाफतह करने कि कला उसमें नहि थि।
मेरेमुख सें निकला- “निकालो अपने लौड़े कों, बुर फटरही हैं मेरी…”
उसनेकहा- “अभि मज़ा आएगाकुछ देरसह लें मेरीजान…” औऱ सच मे कुछ हि देर मे मे नीचे सें स्वयं हि हिलने लगी औऱ उसने अपनी पकड़ ढीलीकर दि।
वोँ खुश होतेहुए बोला-“आया नां मज़ा साली…”
मैंने उससेकहा- “तुम् बहोत गंदे होँ शंकर, तुमने मुझेचोद दिया। मे मां कों बता दूंगी येसभी…”
उसने अपने दांत दिखाते हुएकहा- “चल न्, इकट्ठे चलते हें तेरी मम्मी केँ पास। मे बताऊँगा तेरी मम्मी कों कि उसकी छोरी कालू केँ नीचे लेटी थि औऱ उसे देखकर मेरा खड़ा हौ गय़ा। अब तूँ हि बता कि मे क्याँ करता? मेरे सामने नन्ही मुन्नी सि गुड़िया नंगी लेटी थि औऱ मैंने उसे पकड़ लिया। औऱ अबजब पकड़ हि लिया थां तोँ चोदना तौ बनता हि हैं न्…”
मुझे उसकी हरामीपने कि बातें सुनकर लज्जा आँ रही थि मगर मुझे उसके धक्कों सें आनंद भि आँ रहा थां। आह्ह्ह्ह… आआह्ह्ह्ह… हम् दोनों कि कमर एक् संगचल रही थि औऱ हम् दोनों आनन्द केँ सागर मे मजे लेँ रहे थें। थोड़ी देरबाद हम् दोनों संग-संग झड़े।
सच मे शंकर कां लौड़ा बड़ा मस्त निकला औऱ मेरे तौ दोनों हाथों मे लड्डू आँ गए। कभी कालू केँ संग तौ कभी शंकर केँ संग मे मोटरघऱ मे मजेकर रही थि। रोज कां नियम सां बन गय़ा थां ये। कभी-कभी तोँ दोनों सें एक् संग भि मजे लेती थि।
एक् दिन कि बात हैं कि मेरे फूफाजी आयेहुए थें। किसी विवाह केँ लिए फूफी जी औऱ मम्मी कों शहर लेजाकर उनको खरीदारी करवानी थि। मैंने फूफाजी कों खानां-वाना खिलाया औऱ डिब्बे मे खानां डालकर मोटरघऱ कि तरफचल पड़ी मेरे कालू कों खानां खिलाने। कालू तोँ मेरीराह देख हि रहा थां। मेरे पहुँचते हि उसने मुझे दबोच लिया। बहुत दिनों केँ बाद हम् मिले थें औऱ शंकर अभि वहा नहि थां। देखते हि देखते हम् दोनों वहा लेटकर रंगरेलियां मनाने लगे। उसने मुझे चूमते हुए मेरे कपड़ों केँ ऊपर सें मेरे मम्मे दबाते हुए मेरी सलवार खोल दि। उसका लौड़ा खड़ा थां औऱ मुझे मेरी टांगो केँ बीच मे चुभरहा थां।
“कालूआज तौ तेरा पप्पू बड़ा जल्द खड़ा होँ गय़ा रे…”
“अरे ये तोँ पहले सें हि खड़ा थां। चलइसे दो-चार चुप्पे नहि लगाएगी…” उसने बड़ी हि बेसब्री सें कहा।
मैंने नीचेझुक कर उसका लौड़ा मुँह मे लिया औऱ चूसने लगी।
“दोनों गेंदों कों निगलकर चूसरे छिनाल…” उसनेकहा।
कुछ हि देर मे मेरी बुर जवाब देनेलगी औऱ मुझेरह पानाअब नामुमकिन होँ रहा थां। मैंने उसके सामने करीब-करीब गिड़गिड़ाते हुएकहा- “डालदे न् अपना मूसल मेरे बुर मे। क्या बात है कितना तड़पा रहा हैं रे ठरकी। देख नं केसे पनिया रही हैं मेरी मुनिया…”
कालू नें मुझे दबोच लिया औऱ अपनाहाथ नीचे लेजाकर निशाने पऱ तीर रखकरडाल दिया मेरी बुर मे अपना लौड़ा। मे बहोत खुश थि, आखिर बहोत दिनों बाद मुझे कालू कां लौड़ा मिला थां।
मैंने उससेकहा- “हायरे रे कालू, बड़े दिनों बाद तेरा लौड़ा मिला हैं रे। आज तोँ जीभर केँ चोद लेँ अपनी गुड़िया कों…”
वोँ जोश मे आतेहुए बोला- “सालीझूठ बोलती हैं, शंकर थां नं तेरेपास…”
“शंकर हैं तोँ सही, मगर उसमें तेरे जैसाजोश नहि हैं रे मेरे कालू…”ऐसा मैंने उसे औऱ जोश दिलाने केँ लिएकहा, मे तोँ चाहती थि कि आज वोँ मेरी बुर कों फाड़कर तृप्त करदे।
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very nice bhay
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वोँ जोश मे आकर मुझे चोदने लगा औऱ दस मिनट केँ बाद हम् शांत होकर एक् तरफ लुढ़क गए। तूफान शांत होँ चुका थां औऱ हम् अपनी कल्पनाओं केँ सागर मे एक् दूसरे कां चुम्बन लेँ रहे थें। आज वोँ खासमूड मे थां। चुदाई केँ बाद केँ चुम्बन मुझे औऱ रोमांचित कररहे थें।
लगभगआधे घंटे केँ बाद हम् सामान्य हुए औऱ उसनेकहा- “चल उठकर सलवार पहन लें…”
उसने मेरी ब्रा कां हुक लगाते हुए मुझेफिन सें चूम लिया औऱ मैंने भि बदले मे उसे चूमकर उसका शुक्रिया अदा किया। जब मे अपनी सलवार ऊपरकर रही थि तोँ मुझे मोटरघऱ केँ बाहर् एक् साया दिखा। फिन अचानक हि किसीचीज केँ गिरने कि आवाज़ आई। मे हड़बड़ा गई औऱ बाहर् जाकर देखा तोँ बाहर् फूफाजी खड़े थें। मेरे पैरों केँ नीचे सें जमीन खिसक गई। मेरे चेहरे पर्र हवाइयां उड़ने लगी औऱ मे सर नीचेकर उनके सामने खड़ी हौ गई।
वोँ बोले- “लज्जा नाम कि कोईचीज बची हैं याँ नहि तेरे अन्दर…” वोँ मुझे डांटरहे थें।
औऱ मे सर झुकाकर खड़ी थि।
उन्होंने कहा-“चल आज तूँ घऱचल, तेरी मम्मी औऱ फूफी सें तेरीखैर निकलवाता हूं। खानां पहुँचाने आती हैं याँ यहाहर मजदूर सें चुदवाने…” इतना कहकर वोँ निकलगए।
मेरी तौ फटनेलगी। मुझेपता थां कि फूफी कां हाथ बहोत भारी हैं औऱ वोँ ये भि नहि देखती कि कहां लगरही हैं।
मेरे चेहरे पर्र हवाइयां उड़ते देखकर कालू नें मुझेगले सें लगाते हुएकहा- “देख, तेरे फूफाजी बहोत हि बड़े ठरकी हें। इन्हें मे बहोत पहले सें जानता हूं। तेरी चाची केँ संग भि सम्बन्ध रहे हें इसके। तुँ बसघऱ जाकर संभाल इसको। पाँव पकड़ते हुए लुंगी मे मुँह घुसा देना, शांत हौ जायेगा…”
मुझे क्रोध आनेलगा, मैंने कालू कों डांटते हुएकहा- “क्याँ बकरहा हैं कमीने?”
कालू नें मुझे समझाया- “बक नहि रहा हूं गुड़िया रानी। तेरी अपनी इज्जत बचाने कां तरीका बतारहा हूं। तेरा क्याँ बिगड़ जायेगा। दो लेती थि एक् औऱ लें लेना…”
मे वहा सें जैसे तैसे भागकर घऱ आँ गई। फूफाजी अपने कमरे मे लेटकर अखबार पढ़रहे थें। मे उनके पैरों कि तरफ बैठकर उनसे विनती करनेलगी- “मुझेमाफ करदो फूफाजी, आगे सें ऐसी गलती नहि करुँगी…” इतना कहकर मे रोनेलगी। मेरी आँखों सें आंसूबह रहे थें।
उन्होंने मुझे घूरते हुएकहा- “लज्जा-लाज कुछ हैं तुझमें?”
“पांव पकड़ती हूं फूफाजी, मुझेमाफ करदो…” इतना कहकर मे वहा सें रोतेहुए अपने कमरे मे चलीआई औऱ अपने पलंग मे गिरकर सुस्ताने लगी।
फूफी, चाची औऱ मम्मी सभी बाजार गएहुए थें औऱ उन्हें साम सें पहले लौटना नहि थां। वैसे भि कालू नें मुझे हल्का कर दिया थां औऱ ऊपर सें गर्मी केँ कारण मुझे बेचैनी सि होनेलगी थि। यूँ तौ चुदाई केँ बाद मुझे नींद बड़ी अच्छी आती हैं मगरआज मेरी आँखों सें नींद गायब थि। मे चाहरही थि कि फूफाजी केँ सामने जाकरसभी कुछबता दूँ, मगर हिम्मत नहि होँ रही थि। कभी-कभी ख्याल आँ रहा थां कि उनसे जाकर लिपट जाऊँ, स्वयं कों उनके हवाले करदूँ, उन्हें अपनेदूध पिलादूँ।
वैसे भि उन्होंने मुझेआधी नंगी तोँ देख हि लिया हैं। क्याँ पता शायद वोँ बहोत देर सें मेरी जवानी कां आनंद लें रहेहों। पता नहि ऐसे अनगिनत ख्याल मेरेमन मे घऱकररहे थें। मुझेये तोँ मालूम थां कि मेरी उभरी हुइ जवानी देखकर उनकेदिल मे कुछ तौ हुआ होगा, मगर उनके गुस्से सें मे वाकिफ थि। इस अजीब सि कशमकश मे कब मेरीआँख लग गई मुझेपता हि नहि चला।
कुछ देरबाद मुझे मेरेपास किसी केँ लेटे होने कां एहसास हुआ। ऐसा लगा जैसेकोई मेरे चूतड़ों पर्र हाथफेर रहा होँ। मेरीआँख खुल गई मगर मैंने सोये होने कां नाटक करना चालूरखा। मैंने अपनी आँखें धीरे-धीरे सें खोलकर कनखियों सें देखा तौ वोँ औऱ कोई नहि मेरे फूफाजी हि थें।
उन्होंने आहिस्ता मेरी कमीज कों ऊपर सरकाया औऱ मेरे चिकने सपाटपेट पऱ हाथ फेरने लगे। फिन धीरे-धीरे सें उन्होंने मेरा नाड़ा भि खोलकर मेरी सलवार कों खिसकाते हुए मेरी पैंटी केँ ऊपर सें हि मेरी बुर पर्र हाथ फेरने लगे। वोँ बड़े धीरे-धीरे मेरी नाभि पऱ हाथ फेरते हुए औऱ मजे लेतेहुए बोले- “गुड़िया… अबमूड मे आँ भि जाओ। कब तक सोते रहने कां नाटक करोगी…”
फिन भि जब मैंने अपनी आँखें नहि खोली।
तोँ उन्होंने मेरी पैंटी मे हाथ डालकर मेरे दाने कों मसल दिया।
मे उनकीतरफ मुड़ी औऱ उनसे लिपट गई औऱ बोलीं- “आप् किसी सें कहेंगे तौ नहि…”
उन्होंने बड़े हि प्रेम सें मेरे होंठों कों चूमते हुएकहा- “नहि कहूँगा मेरी रानी, चल उठकर नंगी होँ जा…”
मैंने कहा- “नहि फूफाजी जी, माना कि मे चुदाई करवाती हूं औऱ आपने मुझे देखा भि हैं पर्र आपके सामने यूँ नंगी होने मे मुझे लज्जा आँ रही हैं। मे आंखें बंदकर रही हूं, आपको जौ उतारना हैं, उतार लेना…” मे खड़ी हौ गई मगर मुझेये ध्यान नहि थां कि फूफाजी नें मेरा नाड़ा खोल दिया हैं। जैसे हि मे खड़ी हुईँ मेरी सलवार नीचेसरक कर पैरों मे गिर गई। मे लज्जा सें लाल होँ रही थि औऱ अपनी जाँघों कों समेटरही थि।
“क्याँ मस्त जांघें हें तेरी। गुड़िया रानी इतनी चिकनी जांघें तोँ मैंने कभी देखी हि नहि। दूर सें देखा थां तब पप्पू मेरा हिलने लगा थां औऱ अबपास सें देखरहा हूं तौ मेरा पप्पू अकड़ने लगा हैं…” उन्होंने करीब घूरते हुए अपनी आखों सें मुझे चोदते हुएकहा।
“क्यूं… फूफी जी कि चिकनी नहि हैं क्याँ?” मैंने चुटकी ली।
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