पिशाच की वापसी - body-focused teasing – New Episode
पिशाच कि वापसी – 4
"जब तुमने कालू कों खोजा तौ वो तुम्हें कहीं क्यूं नहि मिला”?
“नहि जानता साहब, उसकी औऱ मेरी दूरीकुछ फासले पऱ हि थि, मगर मे उस ढूंढ हि नहि पाया साहब, नहि ढूंढ। पायाउसे मे, सिर्फ़ 2 बार उसकी दर्दनाक, चीख सुनीबस उसके अलावा कुछ औऱ नहि"
उस व्यक्ति कि आवाज़ मे डर, कंपन औऱ एक् गहरा प्रश्न झलकरहा थां
"बहोत अजीबबात हैं यह, एक् व्यक्ति अचानक ऐसे केसे गायब हौ सकता हैं, जरूरकोई तोँ बात होगी”
“मे आपकोबोल रहा हूं साहब, वहांकोई शैतान कां वास हैं, जोँ सोरहा थां औऱ शायद, शायद हमनेउस जगा दिया"
उस व्यक्ति नें अटकते हुए अपनीबात कों पूरा किया
"ऐसा केसे होँ सकता हैं, यहसभी बातें बेकार कि हैं, इनकाकोई मतलब नहि हैं, यह जरूरकुछ औऱ हैं"
कुर्सी पे बैठे व्यक्ति नें समझने कि कोशिश कि
“आपकोऐसा लगता हैं, तौ यह बताइए कि यहकाम किसका होँ सकता हैं"
बोलते हुए कालू केँ संग जोँ व्यक्ति थां उसने अपने चेहरे कों भि परदा किया, जिसेदेख केँ कुर्सी पे बैठे व्यक्ति कि आवाज़ बंद हौ गयीँ,
उस व्यक्ति कां आधा चेहरा, अजीब सें छालों सें भराहुआ थां, जिसपे अजीब अजीब सें छोटे छोटे किडे सें दिखाई देरहे थें
“यह, यह क्याँ हैं"?
हकलाते हुईँ उस व्यक्ति नें पूछा
“यह वो चीज़ हैं साहब, जोँ मुझेकल मिलीउस स्थान पे, औऱ इसका इलाज़ किसी दवाखाने पे भि नहि हैं"
उस व्यक्ति नें कहा औऱ अपना चेहरा फिन सें ढक लिया.
“मेरीबात मानिए साहब, वहांकुछ हैं, जोँ नहि होना चाहिये, शायदकोई बड़ा तूफान आने वाला हैं, एक् ऐसा तूफान, जिसकी असलियत सभी कों ख़त्म कर देगी"
पहले वाले व्यक्ति नें इसबात कों एक् ऐसे लहज़े मे कहा, कि एक् समय केँ लिए सबकीरूह मे अजीब सि कंपन दौड़ गयीँ,, हॉल मे शांति फैल गयीँ, कि तभी
"चटाककककककककक"
एक् बारफिन हॉल मे आवाज़ आई, जिससे सबकीदिल कों एक् ज़ोर कां धक्का लगा, मगर सबने पाया कि हॉल मे लगी खिड़की खुल गई, थि, औऱ हवा अंदर आँ रही थि, नौकरउठा उसने खिड़की कों बंद किया औऱ फिन लकड़ियाँ जलाने मे लग गय़ा, जोँ कि अभि तक नहि जलाई गयीँ, थि क्यूं कि वो स्वयं यहसभी बातें सुनने मे खो गय़ा थां, वो लकड़ियाँ जला हि रहा थां कि इतनीदेर मे दरवाजे पे नॉकहुआ.
“लगता हैं वो आँ गय़ा, छोटू ज़रा जाकर दरवाजा खोल"
कुर्सी पे बैठे व्यक्ति नें जल्दी कहा छोटूउठा, औऱ दरवाजे केँ पास पहुंच करउस खोला,
“आइये साहब आपका हि प्रतीक्षा कररहे थें"
छोटू नें इतनाकहा, औऱ दरवाजे सें एक् शॅक्स कों अंदरआने कि स्थान दे दि.
“आइये, साहब आपका हि प्रतीक्षा कररहे हें"छोटू नें कहा औऱ दरवाजे सें हट गय़ा.
अंदर घुसते हि उस व्यक्ति नें अपनी छतरीबंद कि औऱ छोटू कों दे दि, ब्लैक कोट मे चलताहुआ वो व्यक्ति हॉल केँ अंदर घुसा, जिसेदेख करसभी एक् बारफिन खड़े हौ गये, सिवाउस कुर्सी पे बैठे व्यक्ति केँ.
“अरे मालिक आप् यहा"
उनमें सें एक् व्यक्ति नें कहा.
उस व्यक्ति नें कुछ नहि कहा, बस अपनी टोपी अपनेसर सें हटाई औऱ कुर्सी पे बैठे व्यक्ति कि तरफ बढ़ा.
“आओ, जावेद आओ, तुम्हारा हि प्रतीक्षा कियाजा रहा थां"
"आपके बुलावे पे तौ आनां हि थां मुख्तार साहब, केसे हें आप्"
जावेद नें कुर्सी पे बैठते हुएकहा, जौ अभि अभि छोटूरख केँ गय़ा थां.
"बसकुछ देर पहले तक तोँ ठीक थां, पर्र इनसभी कि बातें सुन केँ"
मुख्तार नें बस इतना हि कहा औऱ वो चुप हौ गय़ा.
"तोँ आप् सभी नें इन्हें सभीकुछ बता दिया"
जावेद नें सब कि तरफ नज़रे करतेहुए कहा.
"क्याँ करते मालिक, एक् केँ बाद एक् हमारे कुछ व्यक्ति इन 2 दीनों मे गायब होँ गये, इसलिये हमें आनां हि पड़ाबडे मालिक सें मिलने"
उस व्यक्ति नें हाथ जोड़ते हुएकहा.
"हम्म, मे तभीसमझ गय़ा थां, जब मुख्तार साहब कां मोबाइल आया थां साम कों, कि किस विषय मे बात करनी हैं"
जावेद नें अपनेहाथ मे पहने ग्लव्स उतारते हुएकहा.
"मैंने तुम्हें इसीलिए बुलाया, कि जब मुझेइन सभी नें मिलने केँ लिएकहा तौ मुझेलगा कोई बड़ीबात होगी, क्यूं कि अगरकोई छोटी, मोटी होती तौ तुम् उसे स्वयं सुलझा लेते"
मुख्तार नें अपनेहाथ मसलते हुएकहा.
"हम्मसही कहा आपने, बात थोड़ी बड़ी हि हैं मुख्तार साहब"
जावेद नें अजीब सि नजरों सें मुख्तार कों देखा, दोनों केँ बीचकुछ सेकेंड केँ लिए आँखों मे इशारे हुए, फिन दोनों सामने मजदूरों कों देखने लगे.
"समस्या तोँ हैं, पर्र इतनी भि बड़ी नहि कि, उस सुलझाया नां जासके"
जावेद अपनी स्थान सें खड़ा होताहुआ बोला.
"मगर यहसभी जोँ कहरहे हें, वो सभी क्याँ हैं"?
मुख्तार नें खड़े होतेहुए कहा.
"कोई हैं मुख्तार साहब, जोँ शायद हमारे संगखेल कररहा हैं, कोई हैं जोँ नहि चाहता वहांकाम हौ"
जावेद नें पानी कां गिलास भरतेहुए कहा.
"सही कहा मालिक आपने, वहांकोई शैतानी रूह हैं, जौ नहि चाहती हम् वहांकाम करे, नहि चाहती वो, तभी वो हम् सभी कों गायबकर रही हैं"
जावेद नें पानी कां गिलास ख़त्म किया औऱ पीछे मूंड़ केँ सब कों देखने लगा,
"ऐसा कुछ नहि हैं जैसा तुम् सभीसोच रहे होँ, कोई शैतान नहि हैं, तुम् सभी अपनेमन सें यह भ्रम निकलदो"
जावेद नें सबको समझाते हुएकहा.
"यह आप् केसेकह सकते हें मालिक, आप् तौ थें 2 दिन हमारे संग, कितना ढूंढा कालू कों औऱ बाकियों कों, पऱ कोई नहि मिला हमें, वहांकोई भटकती रूह हैं मालिक, कोई बहोत हि शक्तिशाली औऱ खतरनाक रूह, हम् वहांकाम नहि करेंगे, कोई नहि, हम् मे सें कोई भि नहि करेगा"
उनमें सें एक् व्यक्ति नें थोड़ी तेज आवाज़ मे कहा.
"काम नहि करोगे, ऐसे केसे नहि करोगे तुम् सभीकाम"
पहलीबार मुख्तार थोड़े गुस्से मे बोले.
बहोत हि उम्दा किस्सा हैं... शानदार लेखन हैं
बहोत हि शानदार अच्छी शुरुआत हैं मित्र
पिशाच की वापसी - body-focused teasing – New Episode
पिशाच कि वापसी – 5
"मुख्तार साहब आप् शांत रहिए, देखो तुम् सभी, कालू कहां गय़ा औऱ बाकीसभी कहां गये उनकापता पुलिस जल्द हि लगा लेगी, उसकी फिक्र तुम् सभीमत करो, रही बात किसी भटकती रूह कि तौ वो सभी तुम्हारे मन कां वहम हैं, मे भि तौ कल तुम्हारे संग पूरादिन थां, मुझे तोँ कुछऐसा नहि दिखा.
"क्यूं कि साहब आप् दोनों दिन, जल्दचले गये थें, औऱ यह हादसे साम कों तकरीबन 5 सें 6 केँ बीचहुए हें, हमने आपको औऱ बडे मालिक कों अपना फैसला सुना दिया हैं, हम् मे सें कोई भि काम नहि करेगा"
"क्याँ करोगे फिनअगर काम नहि करोगे तौ, क्याँ होगा तुम्हारे पत्नि बच्चों कां, जानते हौ नां कि जीतने पैसे तुम्हें यहा रोज़ केँ मिलरहे हें, उतने तुम् 5 दीनों मे भि नहि कमा पाओगे, वैसे भि यहा पे उस हादसे केँ बादकाम मिलने बंद होँ गये हें, जल्द तुम्हें कोईकाम नहि मिलेगा"
जावेद नें मज़दुरो कि कमज़ोरी कों पकड़ते हुए उनको एक् दूसरा पहलू दिखाया.
जावेद कि बातसुन कि सब मज़दुर कां जोश एक् समय केँ लिए ठंडापढ़ गय़ा, हॉल मे शांति थि, बसकुछ आवाज़ थि तौ उन लकड़ियों केँ जलने कि.
"पऱ पैसों केँ लिए हम् अपनीजान जोखिम मे नहि डालेंगे साहब"
शांति कों तोड़ते हुएरघु नें कहा.
“तुम्हें क्याँ लगता हैं, वहांकाम करने सें तुम्हारी मौत होँ जायेगी"
जावेद नें रघु कि तरफ बढ़ते हुएकहा
"मौत होँ नहि जाएगी साहब, मौत होँ हि गई, थि, नाँ जाने केसेबच गय़ा मे, वो स्थान शापित हैं साहब, शापित हैं वो स्थान, वहांकोई इंसान कुछ नहि कर सकता, उसने मुझेकान मे कहा थां, हाँकहा थां उसने मुझेकान मे, इन्हीं कान मे"
रघु थोडा गुराते हुई बोलरहा थां, उसकी साँसें तेजचल रही थि, उसके चेहरे कि रंगत बहुत बदली हुई नज़र आँ रही थि.
"किसने औऱ क्याँ कहा थां तुमसे रघु"
इस बार जावेद नें थोड़ी नर्मी सें कहा.
"उस बहतीहवा नें मालिक, मौत, मौत, उस बहतीहवा मे मौत कां मेसेज थां"
रघु नें आवाज़ उठा केँ कहा, उसकी आवाज़ मे एक् ऐसी कंपन थि, जिसेसुन केँ सब केँ बदन मे कंपन होँ गई,.
"वो सिर्फ़ तुम्हारा वहम हैं रघु, वहांऐसा कुछ नहि हैं जैसा तुम् सोचरहे होँ, अगरफिन भि आप् सभी कों ऐसा लगता हैं कि वहांकोई शैतानी रूह हैं, कोई प्रेत, आत्मा याँ कोई भि अदृष्य शक्ति हैं तोँ ठीक हैं मे वहां जाऊंगा आजरात कों"
जावेद नें अपना फैसला सुनाया,
"नहि….नहि मालिक, यहभूल मत करना, उस स्थान पे कोई जीवन जाती तौ अपनी मर्जी सें हैं, पऱ उसकोमौत उसकी मर्जी सें मिलती हैं"
रघु नें बहोत बड़ीबात जावेद केँ लिएगये फैसले पे कह डाली.
जावेद, रघु कि बातसुन केँ कुछ नहि बोल पाया, औऱ चलताहुआ हॉल कि खिड़की केँ पास जाकर खड़ा होँ गय़ा जहाँ अभि भि हल्की हल्की बारिश होँ रही थि पऱ हवा कि वजह सें ज़ोर ज़ोर सें बाहर् बड़े बड़े पेड़हिल रहे थें, रघु एक् लम्हा केँ लिए जावेद कों देखता रहा औऱ फिन वो हॉल सें निकल गय़ा, उसके जाते हि उनमें सें एक् नें कहना शुरुआत किया.
"देखिए साहब, हम् गरीब व्यक्ति हैं, हमारी जीवन औऱ हमारा परिवार हि सभीकुछ हैं, अगर हमेंकुछ होँ गय़ा तौ हमारे परिवार कां क्याँ होगा"
एक् व्यक्ति नें हाथ जोड़ केँ विनती करतेहुए कहा
"अरे आप् लोगों कि चिंता हमें अपने आप् सें ज़्यादा रहती हैं, मे भला आपको केसे तकलीफ मे डाल सकता हूं, अगर वहांकुछ ऐसी चीज़ हैं तोँ जरूर वहांकाम नहि हौ सकता, पऱ अगर वहांऐसा कुछ नहि हैं तौ क्याँ आप् सभी वहांकाम करने केँ लिए रेडी हैं"
मुख्तार नें आगे कि बात कों संभालते हुए, अपनीबात कही.
सभी मजदूर एक् दूसरे कि शकलें देखने लगे,
"मगर केसेपता लगाएँगे"
कुछ मिनटबाद एक् नें कहा.
"अभि जावेद नें कहा नां कि वो जाएगा आजरात, देखिए आप् बेफ़िक्र रहिए, अभि रात बहोत हौ गयीँ, हैं, आप् आहिस्ता वापिस जाये, मे स्वयं कल साइट पे आऊंगा औऱ पूरादिन आपकेसंग रहूँगा"
मुख्तार नें बात कों ख़त्म करतेहुए कहा.
"ठीक हैं साहब, अगर ऐसा हैं तोँ कल हम् सभी स्थान पे आएँगे, पऱ साहब एक् बात कहना चाहूँगा, हादसे तभी होते हें जब उसके पीछेकोई वजह होती हैं, शायद वहांकोई वजह छुपी हैं"
उस व्यक्ति नें अपनीबात कही औऱ फिनसभी एक् एक् कर केँ निकलगये.
मुख्तार केँ कानों मे कुछ सेकेंड तक, उस व्यक्ति कि कही अंतिम लाइन गूँजती रही,
"वजह होगी हुहह"
मुख्तार नें अजीब सें स्वर मे कहा औऱ जावेद कि तरफ देखा जौ कि अभि भि वैसे हि खड़ा थां.
"यह गाँव वाले बड़े चालू होते हें, अधिक पैसेमिल रहे हें तोँ सोचा औऱ लूट लें ऐसी झूठी अफवायह फैला केँ, तुमने बहोत अच्छा किया जावेद जोँ मुझेसाम कों मोबाइल कर केँ बता दिया कि इनसभी नें काम पे आने केँ लिएमना कर दिया, औऱ यहसभी यहाआने वाले हें"
मुख्तार कि आवाज़ नें एक् अलगरूप लेँ लिया
"इतनीदेर सें इन लोगों कि बक-बकसुन केँ मे थक गय़ा थां, अच्छा हुआचले गये, तुमने बहोत सहीदाव फेंका"
मुख्तार नें कहा औऱ चलतेहुए एक् अलमारी खोल केँ उसमें सें वाइन निकल केँ गिलास मे डाली औऱ एक् हि झटके निकल केँ गिलास मे डाली औऱ एक् हि झटके मे पी गय़ा.
"आँ…। मज़ा आँ गय़ा, इन लोगों कों क्याँ पता, कि कितने करोड कां प्रोजेक्ट हैं यह"
बोलते हुए मुख्तार नें जावेद कि तरफ देखा, जौ अभि भि बाहर् देखरहा थां, "
"जावेद किससोच मे डूबेहुए हौ, चलो दोस्त आओ थोडा चखो तोँ बदन मे गर्मी आयेगी, भूलजाओ इससभी बकवास कों"
बोलते हुए उसने गिलास कों मुंह सें लगाया.
"बकवास नहि हैं यह, मुख्तार साहब"
जावेद नें मूड़ केँ कहा, उसकी आवाज़ सुन केँ मुख्तार नें गिलास रोक दिया, औऱ मुंह सें हटा केँ नीचेरख दिया.
"क्याँ कहना चाहते हौ तुम्"?
जावेद कों घूरते हुए मुख्तार नें प्रश्न किया.
"यही कहना चाहता हूं, कि उन मज़दुरो कि बातों मे कुछ तौ सच्चाई हैं"
“तुम्हारा मन तौ नहि खराब हौ गय़ा, तुम् भि इनसभी बातों मे आँ गये जावेद, जानते हौ क्याँ कहरहे हौ तुम्, बहोत, प्रेत, रूह क्याँ तुम् भि इनसभी चीज़ों मे मानते होँ"
मुख्तार थोड़े गुस्से मे बोला.
"नहि, साहब, नहि मे यह नहि कहरहा कि मे यहसभी मानता हूं, मगर जोँ मैंने देखा, उस भूलना मुश्किल हैं औऱ इसबात कों भि नकारना मुश्किल हैं कि मजदूर गलतकह रहे हें".
“कहना क्याँ चाहरहे होँ तुम्"?
जावेद कि शकल पे शिकनदेख केँ मुख्तार कां क्रोध शांत हौ गय़ा
"यही साहब, कालू औऱ बाकीसब कि लाशेमिल चुकी हैं"
जावेद केँ इतना कहने पर्र मुख्तार कों एक् बड़ा झटकालगा.
"यह क्याँ कहरहे होँ तुम्, इन मजदूरों नें कहा थां कि नहि मिली हैं"
मुख्तार एक् दम सें घबरा गय़ा थां, जावेद कि यहबात सुन केँ.
"मुख्तार साहब, उन सभी कों कुछ नहि पता हैं, अगरपता चल जाता तोँ अभि तक बहोत बड़ा बवालमचा देतेयह लोग क्यूं कि जिस हालत मे मुझे वो लाशें मिली, नाँ तौ मैंने ऐसी लाशें कभी देखी हैं नां हि सुनी हैं"
जावेद नें थोड़ी घबराहट केँ संगकहा.
"कैसी मिली हैं तुम्हें वो लाशें"
"आप् वीरा कों तौ जानते हि हें"
“हाँ, जोँ इनसभी कां लीडर हैं, हाँ वैसे वो नहि आयाआज"
बहोत अच्छा लिखरहे होँ दोस्त मजा आँ गय़ा। बहोत हि मस्तजा रही हें स्टोरी भइया अगलेभाग कि इंतजार मे
Nice kahani... Keep it up dear. updates awaited bro ?
एक् दम मस्त एपसोड हैं भइया अगले एपसोड कां इंतजार रहेगा
Very Nice, Fantastic, Awesome, Mind blowing update .................... Keep it up bro ............... Waiting for next update ................
बढ़िया उपडेट तुस्सी छागएबॉस अगले एपसोड कां इंतजार रहेगा
संगबने रहने केँ लिए आप् सभी कां आभारी हूं
बहोत हि उम्दा. बढ़िया मस्त एपसोड हैं साथी अगले एपसोड कां इंतजार रहेगा
पिशाच की वापसी - body-focused teasing – New Episode
पिशाच कि वापसी – 6
"उसे मैंने हि मना किया थां, असल मे आज हम् बचे हें तौ उसकीवजह सें हि, वीरा हि थां जिसने उन लाशों कों खोजा औऱ फिन ……………"जावेद धीरे-धीरे धीरे-धीरे सारेी बात बताने लगता हैं.
"अच्छा हुआ, जोँ तुमने औऱ वीरा नें सभी संभाल लिया, जावेद इसबात कों यहीं दफ़नकर दो, किसी कों कभी भि कुछपता नहि चलना कहिए, पुलिस कों मे संभाल लूँगा"मुख्तार कि चेहरे पे घबराहट दिखाई देरही थि.
कुछसमय केँ लिएहॉल मे शांति फैल गई,, फिनउसे शांति कों जावेद नें समाप्त किया
"एक् चीज़ हैं जौ मुझेबार बार मजबूर कररहा हैं, इनसभी बातों कों मानने केँ लिए"
जावेद नें थोड़े कंपन केँ संगकहा.
"क्याँ"
"यही जोँ मैंने दृश्य आज देखा, क्याँ वो सपना थां, याँ फिन हकीकत"
उसनेफिन सहमी आवाज़ मे कहा
“ऐसा क्याँ देख लिया तुमने"
"वो निशान मुख्तार साहब, वो खून सें बनते निशान, औऱ उसे निशान मे कुछऐसे शब्द, जोँ शायद किसी तूफान कि तरफ दर्शा रहे हें"
इसबार जावेद नें आने वाले खतरे कों भाँपते हुएकहा.
"केसे शब्द"
"वो तोँ एक् अंत थां, इसनयी दर्दनाक शुरूवात कां"
जावेद नें इतनाकहा, औऱ दोनों एक् दूसरे कों घूरने लगे.
"केसे मिली तुम्हें वो लाशें"?
"आप् वीरा कों तौ जानते हि हें"
“हाँ, जौ इनसभी कां लीडर हैं, हाँ वैसे वो नहि आयाआज"
"उसे मैंने हि मना किया थां, असल मे आज हम् बचे हें तौ उसकीवजह सें हि, वीरा हि थां जिसने उन लाशों कों खोजा ……………"
जावेद नें अपनीबात कहनी शुरुआत कर दि.
जावेद कमरे मे बैठा, कुछ देखरहा थां, बड़े बड़े चार्ट्स उसके सामने रखे थें, उसेमें डिज़ाइन बननेहुए थें, कि तभी उसकेघऱ केँ दरवाजे पे दस्तक हुईँ,
"कौन हैं"?
जावेद चीलाया.
"साहब मे हूं, वीरा, जल्द खोलिए बहोत जरूरी काम हैं आपसे"
बाहर् सें आवाज़ आई.
"यहयहा अचानक सें केसे आँ गय़ा"?
जावेद नें अपने आप् सें कहा औऱ उन बड़े बड़े चार्ट्स कों फोल्ड कर केँ रखनेलगा.
“साहब खोलिए"
बाहर् सें फिन आवाज़ आई.
"हाँ हाँआया"
जावेद नें उन चार्ट्स कों एक् अलमारी मे डाल केँ लॉक किया औऱ बाहर् पहुंच केँ दरवाजा खोला.
सामने वीरा खड़ा थां, उसके चेहरे पे एक् अजीब सि शिकन दिखाई देरही थि,
"अरे वीरा तुँ, केसे आनांहुआ, औऱ क्याँ बात हैं जौ तुँ इतनी जल्द क्यूं मचारहा हैं"?
जावेद नें उसे अंदर बुलाया औऱ दरवाजा बूंदकर दिया.
"क्याँ करूँ साहब, आप् अगर मेरेआने कां मतलब जानेंगे तब आपकोपता चलेगा"
वीरा नें थोड़ी दबी आवाज़ मे कहा.
"क्याँ हुआ, तेरीशकल देख केँ ऐसालग रहा हैं कोई तकलीफ़ कि बात हैं, क्याँ हुआ हैं"?
जावेद नें भि थोडा परेशान होतेहुए कहा.
"साहब आपकोपता हैं, कल कल्लू गायब होँ गय़ा"?
"क्याँ"?
जावेद नें चौंकते हुएकहा.
"हाँ साहब, उसकेसंग दो मजदूर औऱ भि गायबहुए हें, यहीसभी देख केँ सारे मजदूर आज बड़े मालिक केँ पास जाने कां सोचरहे हें, उन्होंने काम करने सें मनाकर दिया हैं, मैंने बहोत समझाया मगर वो सभी नहि मानने.”
“केसे गायबहुए सभी, कल तक तौ सभीकुछ ठीक थां, कल क्यूं किसी नें नहि बताया कि कालू गायबहुआ हैं”
"कल तक किसी कों नहि पता थां साहब, वो तोँ आजरघु नें आकर बताया, उसके चेहरे कां भि बहोत बुराहाल हैं, उसकेबाद जबसब मजदूरों कों इकट्ठा किया तोँ पाया कि 2 औऱ मजदूर गायब हैं”
"क्याँ कालू औऱ बाकीसभी अभि तक मिले नहि"?
जावेद नें चिंता दिखाते हुए पूछा.
"मिल गये साहब पऱ"!
वीरा कहतेहुए रुक गय़ा,
"पर्र, पऱ क्याँ वीरा, कहां हैं तीनों"?
"जंगल मे"
वीरा नें धीमी आवाज़ मे कहा औऱ जावेद कि आँखों मे देखने लगा, दोनों कि नज़रे मिली औऱ जावेद कों समझते देर नां लगी कि कोई बहोत बड़ी गड़बड़ हुई हैं.
दोनों जंगल कि तरफबढ़ रहे थें, जावेद केँ चेहरे पे गहरी चिंता छायी हुईँ थि, वहां कां वातावरण बिलकुल शांत थां, मानो खाने कों दौड़रहा हौ, हवा मे जबरदस्त ठंड थि, कोहरा इतनाघना थां मानो आसमान सें बादलउतर केँ नीचे आँ गये होँ.
"औऱ कितनी दूर हैं"?
जावेद नें आगेचल रहे वीरा सें पूछा.
"बस साहब, पहुंच हि गये, मगर एक् बार मेरीबात फिन सें मान लीजिए, आप् उन लाशों कों नहि देख पायेंगे"
वीरा नें जावेद कि तरफ देखते हुएकहा, मगर जावेद नें सिर्फ़ उसेआगे बढ़ने कां इशारा किया.
कुछ हि मिनट औऱ चले थें दोनों, कि तभी वीरा चलते चलतेरुक गय़ा, सामने इतनाघना कोहरा थां कि सामने सिर्फ़ वो सफेद रोशनी दिखरही थि उसके अलावा औऱ कुछ नहि.
“क्याँ हम् पहुंच गये"?
जावेद नें धीमी आवाज़ मे पूछा, बदले मे वीरा नें सिर्फ़ हाँ मे गर्दन हिलाई.
"पऱ यहा तौ मुझेकुछ नहि दिखाई देरहा, कुछ"
जावेद वीरा कि तरफ देखते हुएबस इतना हि कह पाया क्यूं कि जब उसकी नज़र सामने पड़ातब …
अपने आप् सामने सें वो सफेद चादर हटनेलगी, वो घना कोहरा छटनेलगा, धीरे-धीरे धीरे-धीरे सामने कां नज़ारा दिखने लगा, जैसे हि जावेद नें सामने कां नज़ारा देखा उसकेकुछ कदम पीछे कि तरफ होँ गये.
सामने कां नज़ारा सच मे बहोत हि खौफनाक नज़ारा थां, यह वो लम्हा थां जौ एक् आम इंसान शायद हि भुलापाए, सामने पेड़ पे लटकती वो तीन लाशें, जिस्म सें वो टपकता खून, पर्र दिल दहला देने वाली चीज़ थि उनकेबदन कि वो हालत जौ उसे वक़्त उन दोनों केँ सामने थि.
एक् केँ उपर एक् लाशदो पेड़ सें जुड़ केँ लटकी हुइ थि, मानोदो पेड़ कों जोड़ने केँ लिए एक् मार्ग बनाया गय़ा हौ तीनोलाश एक् केँ उपर एक् थि, तीनो लाशों केँ बीच एक् समानगैप थां पऱ दिल दहला देने वालीबात उनके जिस्म पे वो घाव थें जिसेदेख केँ कोई भि इंसान सहमजाए.
तीनो केँ जिस्म पे लगभग, गोल गोल 2 इंच केँ होल थें, हर एक् केँ जिस्म पे, पऱ सिर्फ़ एक्, दो याँ तीन नहि, बल्कि ऐसे एक् केँ बादहोल बननेहुए थि, चेहरे कां तोँ बहोत बुराहाल थां, आंखे तौ थि हि नहि बल्कि उसकी स्थान होल थां, उपर वालीलाश केँ होल सें टपकता खून, नीचे वाले केँ होल मे सें गिरता हुआ, उसके नीचे वाले केँ होल मे सें होताहुआ ज़मीन पे गिररहा थां, औऱ यही चीज़हर एक् होल मे होँ रही थि, खून बूंद बूंदटपक रहा थां, यह एक् ऐसा दृश्य थां जौ शायद एक् आम इंसान कि जीवन मे शायदहे कभीआए.
"यह, यह, केसेसभी"?
जावेद कि जबान बोलते हुए लड़खड़ा रही थि.
"यह तोँ मे भि नहि जानता साहब, पर्र यहमौत देखरहे हें आप्, केसे बुरीतरह तीनों केँ लाश मे यहछेद किए हें, ऐसा लगता हैं बिलकुल नापतोल केँ किएगये होँ, बहोत हि दर्दनाक मौत मिली हैं तीनों कों"
“किसी जानवर कां काम"
जावेद नें अपनी शंका जाहिर कि.
"मुश्किल लगता हैं साहब, कोई जानवर ऐसे इतनी बुरीतरह सें केसेमार सकता हैं, इनकेबदन मे कुछबचा हि नहि हैं, हर स्थान छेद हि छेद दिखाई देरहे हें, औऱ"
बोलते बोलते वीरारुक गय़ा, जावेद नें वीरा कि तरफ देखा जौ एक् टक नीचे ज़मीन पे देखरहा थां.
“क्याँ हुआ"?
जावेद नें वीरा सें पूछा, बदले मे वीरा नें सामने कि तरफ उंगली कर दि, जावेद नें सामने कि तरफ देखा तौ एक् लम्हा केँ लिए उसकी धड़कने तेज होँ गई,, उसकीरूह कांपउठी, जिस्म सें टपकता खून नीचे ज़मीन पे गिररहा थां, पऱ वो एक् स्थान इकट्ठा नहि हौ रहा थां, बल्कि खून सें कुछ बनता दिखाई देरहा थां.
धीरे-धीरे धीरे-धीरे टपकटपक करखून नें ज़मीन पे अपनी कलाकारी बनानी शुरुआत करी,
पिशाच की वापसी - body-focused teasing - Aage kya hua? Next part padhiye
संगबने रहने केँ लिए आप् सभी कां आभारी हूं
बहोत हि शानदार भाग हैं मित्र
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